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हरा हाथी-21 श्रेष्ठ बालमन की कहानियां गुजरात-Elephant Story
Green Elephant Story

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Elephant Story: छमछमपुरी नाम का एक छोटा-सा गांव है। थोड़े बिखरे-बिखरे घर और लहराते खेतों से हरा-भरा है यह गांव। इस गांव के बीचो-बीच एक कुंआ है। गांव की स्त्रियों के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी पानी भरने के लिए आते हैं।

छमछमपुरी के बच्चों के लिए ‘छमछम विद्यालय’ नाम की एक सुंदरशाला है। छोटे बच्चे सुबह में दौड़ते-दौड़ते स्कूल पहुंच जाते हैं। छोटे बच्चों को खेलने के लिए छमछम विद्यालय के पीछे एक सुंदर उद्यान है। उसमें झूला, फिसलन, दोड़ते घोड़े, मेरी गो राउन्ड वगैरह मनोरंजन के साधन भी हैं। इस उद्यान का मुख्य आकर्षण है इसका हरा हाथी। उद्यान के माली रामजी चाचा ने पत्तों की बेल से उद्यान के मध्य में एक हाथी के आकार का पुतला तैयार किया है। उसके बड़े सूप जैसे कान, स्तंभ जैसे पैर और लंबी सुंड भी हरे पत्तों से तैयार की है। असल हाथी ही दिखता है।

यह हाथी का नाम क्या होगा? अरे, यह तो हरे पत्तों का हाथी है! इसलिए उसका नाम “हरा हाथी।”

स्कूल छूटने के बाद सभी बच्चे उद्यान में खेलने के लिए आते हैं। बच्चों को देख हरे हाथी को बहुत आनंद होता है। रविवार या छुट्टियों के दिन में बच्चे खास हरे हाथी को मिलने के लिए उद्यान में आते हैं।

बच्चों को खेलते हुए ‘हरा हाथी’ देखा करता और उसे भी खेलने का मन करता पर वह तो एक जगह बांधा गया है। वह न तो चल सकता है, न फिर सकता है…कई बार वह बड़बड़ाता है,

“मैं तो बगीचे का हाथी… मैं तो बगीचे का हाथी…

कहां गए हैं बोलो, मेरे सभी संगी साथी…?”

उस वक्त बच्चों हरे हाथी को, “हम तुम्हारे साथी ही हैं…” ऐसा कहकर मनाते। फिर भी हरे हाथी को लगता कि मेरा साथी मेरा जैसा ही होना चाहिए।

एक दिन की बात कहूँ- दोपहर का समय था। स्कूल छूट चुका था। बच्चे अपने-अपने घर चले गए थे। उद्यान का गेट बंद था। वहां एक बड़ा हाथी गेट के पास आकर खड़ा हो गया। हरा हाथी उसे देखकर अचंभे में पड़ गया। “उसके तो मेरे जैसे बड़े कान हैं, लंबी सूंड है, स्तंभ जैसे पैर हैं।” हरे हाथी ने मन ही मन कहा। गेट पर खड़े हाथी के मन में भी ऐसा ही हुआ। “पर इसका रंग तो हरा है। सूंड भी नहीं हिलती है। चलता भी नहीं है।” मैं पुकारता हूँ, “ओ हाथी भाई…हैलो…”

उसने वहीं खड़े-खड़े कहा, “तुम इस गेट की कुंडी खोलकर अंदर आ जाओ। मैं तो बंधा हुआ हूँ।”

उस हाथी ने गेट खोला। फिर उसने उद्यान में प्रवेश किया। हरे हाथी के पास जाकर पूछा, “तुम कौन हो? हाथी होकर क्यों बंधे हुए हो? तुम्हें किसने बांधा? अनेक…सवाल पूछे।

हरे हाथी ने कहा, “मुझे मेरे नाम का पता ही नहीं है। छोटे बच्चे मुझे ‘हरा हाथी’ कहकर बुलाते हैं। पर तुम कौन हो?”

“मैं तो जंपी हाथी हूँ। मैं अपने दोस्तों के साथ रहता हूँ। मैंने कई हाथी देखे हैं, लेकिन ऐसा हरा हाथी कभी नहीं देखा है।”

‘दोस्त’ शब्द सुनकर हरा हाथी रोने लगा,

“मैं तो बगीचे का हाथी…मैं तो बगीचे का हाथी…

कहाँ गए है बोलो, मेरे संगी साथी…?”

“अरे…अरे…रो मत…मैं तेरा दोस्त बनूँगा…” जंपी हाथी ने कहा।

“तेरे दोस्त कहाँ गए? “हरे हाथी ने पूछा।

“हम घूमने निकले थे। नदी के तट पर पानी पीकर आराम कर रहे थे। मेरा छोटा भाई गोंटु, उसको नींद नहीं आती इसलिए वह खेलता था। नींद में से जगकर देखा तो गोंटु दिखाई नहीं दिया। हम अलग-अलग दिशाओं में गोंटु को ढंढने के लिए निकल पडे।” जंपी हाथी ने रोते-रोते सारी बात बताई।

जंपी की बात सुनकर हरा हाथी भी रो पड़ा। अचानक जंपी हाथी ने रोना बंद कर दिया। हरा हाथी स्तब्ध हो गया।

“अरे…मेरे गोंटुडे…” इतना कहकर जंपी हाथी तो हरे हाथी को अपनी सुंड से सहलाने लगा। जंपी हाथी को लगा कि यह हरा हाथी उसका भाई गोंटु ही है।

“मुझे माफ कर… मैंने तुझे पहचाना नहीं। लगता है कि तू खेलता-खेलता इधर आ गया होगा और माली ने तुझे पत्तों से बांध दिया होगा…मेरे गोंटु… “कहकर जंपी हाथी बार-बार उसे प्यार करने लगा।

हरे हाथी की समझ में कुछ नहीं आया था। पर उसे एक अच्छा दोस्त मिला, इस बात से बहुत खुश हो गया।

“तो अब तू मेरे साथ ही रहेगा न? “हरे हाथी ने पूछा।

“हां… हां… अब तो मैं तेरे साथ ही रहूँगा। तू भले बंधा हुआ हो। मैं तेरे साथ बातें करूँगा, गीत गाऊँगा… “जंपी हाथी ने कहा।

उस दिन से जंपी हाथी छमछमपुरी में रहने लगा। पूरा दिन हरा घास, फूल वगैरह खाता रहता और हरे हाथी के साथ बातें किया करता। हरा हाथी भी गाता रहता,

“मैं तो बगीचे का हाथी… मैं तो बगीचे का हाथी…

मुझे मिला है मेरा, एक नया संगी साथी…।”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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