girvi ki raseedein
girvi ki raseedein

वह आदमी मुझे एक डाक्टर के नाते अपनी पत्नी के पास ले चलने को आया था। उसकी पत्नी, अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली थी। मैं चलने को राजी हो गया। तभी उसने मुझे पेशगी फीस देने के लिए अपना बटुआ निकाला और कांपते हुए हाथों से उसे खोला! बटुए में से दो टिकट निकलकर मेरी मेज पर गिर पड़े।

मैंने देखा कि वे गिरवी रखे हुए माल की रसीदें थीं। मैंने वे रसीदें देख लीं, इससे उसे बेचौनी-सी हुई और उसने सफाई-सी देते हुए कहा- ‘मैं एक छोटी-सी नौकरी करता हूँ और आपकी फीस देने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। सो अपनी घड़ी गिरवी रखकर पैसे लाया हूँ। यह एक रसीद उसी की है।’ ‘पैसों की कोई जल्दी नहीं है, मैंने कहा- बाद में जब भी सुविधा हो, दे देना। और यह दूसरी रसीद कैसी है?’

उसके चेहरे पर और भी बेचौनी उभर आयी और कुछ क्षण वह चुप रहा, जैसे उलझन में फंसा हुआ हो। अंत में उसने सकुचाते हुए कहा- “कल मेरी पत्नी का जन्मदिन है। मैं उसे कोई उपहार देना चाहता था। सो युद्ध में मुझे जो तमगा मिला था, उसे गिरवी रखकर उपहार खरीदने के लिए पैसे लाया हूँ।”

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)