Ghutan
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Hindi Kahani: स्मिता हर सुबह समय पर उठती, नाश्ता बनाती, रवि को तैयार करती और खुद ऑफिस के लिए निकल जाती। ऑफिस में मीटिंग्स, प्रेजेंटेशन, बॉस की डांट, सहकर्मियों की राजनीति—सब कुछ सहकर वह शाम को घर लौटती। फिर वही खाना बनाना, घर साफ़ करना, और रवि की खामोश उम्मीदों को पूरा करना।

हर दिन वही दिन।
हर पल एक सा।
हर सांस भारी।
स्मिता के चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन भीतर एक शोर था—अनकहा, अनसुना।
एक शाम कॉलेज की दोस्त माया से मुलाकात हुई। माया अब भी पेंटिंग करती थी, स्वतंत्र थी, अकेली थी लेकिन खुश। उसने पूछा, “तू ठीक है स्मिता?”
स्मिता ने सिर हिलाया, पर उसकी आँखें कुछ और कह रही थीं। माया ने फिर कहा, “तू पहले कितना लिखती थी, तुझे याद है?”
स्मिता चुप रही। उसे याद आया, कॉलेज के दिनों में वह कविताएँ लिखती थी, डायरी भरती थी। अब डायरी भी धूल खा रही थी, जैसे उसकी इच्छाएँ।
माया के जाने के बाद स्मिता देर रात तक जागती रही। कमरे की दीवारें उसे घूरती रहीं। रवि पास में सो रहा था, मगर वह खुद से बहुत दूर हो चुकी थी।
अगली सुबह, पहली बार उसने अलार्म बंद कर दिया। ऑफिस को छुट्टी की मेल भेजी। डायरी निकाली और लिखा:
“मैं घुट रही हूँ। हर दिन एक नई मुस्कान का मुखौटा पहनकर जी रही हूँ। मैं ज़िंदा हूँ पर महसूस नहीं कर रही। क्या ये ही है जीवन?”
वह लिखती रही… और पहली बार उसकी आँखों से आंसू नहीं, सुकून बहा।
उस दिन उसने तय किया—हर हफ्ते खुद के लिए एक घंटा निकालेगी। लिखेगी, जिएगी, खुद से जुड़ेगी।
घुटन खत्म नहीं हुई, लेकिन वह उसे पहचानने लगी थी। और यह पहचान ही पहला कदम था आज़ादी की ओर।
स्मिता ने धीरे-धीरे खुद को फिर से खोजना शुरू किया। हर हफ्ते वह एक घंटा खुद के लिए निकालती, डायरी में लिखती, पुरानी कविताएँ पढ़ती और कभी-कभी माया से मिलने चली जाती।
पहले तो रवि को यह बदलाव अजीब लगा।
“आजकल कुछ ज्यादा ही सोचने लगी हो,” उसने एक दिन कहा।
स्मिता मुस्कराई, “शायद अब तक कम ही सोचती थी।”
रवि चुप हो गया। वो बदलाव को देख रहा था, लेकिन समझ नहीं पा रहा था।
स्मिता ने अपने ब्लॉग की शुरुआत की—”अंदर की आवाज़” के नाम से।
वह अपनी कविताएँ, छोटी कहानियाँ और अनुभव वहाँ साझा करने लगी।
कुछ ही महीनों में उसके पाठकों की संख्या बढ़ने लगी।
कमेंट्स में लोग लिखते, “आपकी लिखी बातें मेरे दिल की आवाज़ हैं।”
एक दिन ऑफिस में बॉस ने कहा,
“तुम्हारे चेहरे पर आजकल एक अलग चमक है। कोई सीक्रेट?”
स्मिता ने सिर झुका लिया, “बस… खुद को थोड़ा सा वापस पाया है।”
पर हर कहानी में एक मोड़ आता है।
एक दिन रवि ने उसका ब्लॉग पढ़ लिया।
उसकी एक कविता थी:
“रिश्तों की दीवार में दरार नहीं चाहिए,
पर एक खिड़की तो हो जहाँ से मैं खुद को देख सकूं।”
रवि देर तक शांत रहा। उस रात उन्होंने बहुत देर तक बात की—शायद पहली बार इतने खुले दिल से।
स्मिता ने कहा,
“मैं हमेशा सब निभाती रही, लेकिन खुद से ही रिश्ता टूटता जा रहा था।”
रवि की आँखें नम हो गईं।
“मैंने कभी सोचा ही नहीं कि तुम घुट रही हो। लगता था सब ठीक चल रहा है।”
स्मिता बोली,
“ठीक चलना और खुश होना, दोनों अलग बातें हैं।”
अब हर रविवार स्मिता और रवि साथ बैठते हैं—कभी माया के स्टूडियो जाते हैं, कभी कविता-संमेलनों में।
रवि भी धीरे-धीरे खुद को खोलने लगा है।
वो कभी स्मिता की कविताओं पर रिव्यू देता है, कभी चुपचाप उसकी डायरी पढ़ता है।
तीन महीने बाद…
स्मिता की एक कविता “घुटन की दीवारें” एक ऑनलाइन साहित्यिक पत्रिका में छपी।
टाइटल था: “मैं घुटी नहीं, अब जी रही हूँ।”
अंत नहीं, नई शुरुआत
स्मिता की कहानी उन लाखों महिलाओं की आवाज़ है जो जिम्मेदारियों के बोझ तले अपनी पहचान खो बैठती हैं।
पर एक छोटी सी शुरुआत—बस खुद से ईमानदारी और थोड़ी सी हिम्मत—उन्हें फिर से जीना सिखा सकती है।