भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
पहली परत- देवव्रत
मुझे सवेरे से ही खुन्नस है और इसीलिए मैं घर नहीं जा रहा हूँ। बाहर मुझे अब कोई काम भी नहीं है, परन्तु घर जाने को भी जी नहीं कर रहा है आज शनिवार है। चेतन अंकल घर आ गये होंगे और पापा के साथ चैस्स खेल रहे होंगे। माँ ने गर्म-गर्म चाय के मग उनके सामने रख दिये होंगे। पापा के लिए तेज चीनी वाली और अंकल के लिए ब्लैक टी, शुद्ध ब्लैक टी।
मेरी समझ से बाहर है वह बात कि इतने कम समय में पापा और चेतन अंकल की मित्रता कैसे हो गयी। पहले कभी पापा को इस प्रकार चैस्स खेलने का चस्का नहीं देखा गया था। उनको यह नया शौक जागा है और अब हर शनिवार शाम को वह बे-सब्री से चेतन अंकल की प्रतीक्षा करते हैं। आने पर गले मिलते हैं। भाँभी शनिवार को खाने वाले पदार्थ अंकल की पसंद की बनाती है।
पता नहीं क्यों, कुछ लोग आपको अच्छे नहीं लगते! कई बार आदमी अपनी पसंद-ना-पंसद का कारण भी नहीं जानता। चेतन अंकल को भी मेरा ना पसंद करना कछ ऐसा ही है। उनका ना पसन्द करने का मेरा कारण बताना भी कठिन ही नहीं असंभव है। मैं बचपन से ही माता-पिता की अकेली संतान होने के कारण एकल हो गया हूँ। हमारे तीन के रिश्ते के बीच किसी का आना मुझे पसंद नहीं। हम घर के तीनों लोग परस्पर इतने समीप हैं कि हम तीनों एक-दूसरे की कुछ बातें बिना कहे ही समझ लेते हैं। मुझे चेतन अंकल का इतना आना-जाना और देर तक बैठे रहना हमारी नजदीकी निजी जिन्दगी में दखल अन्दाजी लगती है। खैर, जो भी है, मैं चेतन अंकल के सामने बहुत कम आना चाहता हूँ। सामना हो ही जाए तो जब मैं उनके पाँव छूने को झुकता हूँ तो वह मुझे गले लगा लेते हैं। और फिर चूम लेते हैं। मैं जब उनके चुंबन से बचने का प्रयास करता हूँ तो वह मेरा सिर चूम लेते हैं। उनके गले लगाने और चूमने से मैं कतराता हूँ।
हो सकता है चेतन अंकल को मेरे पसंद न करने का कारण पापा और चेतन अंकल रूप-स्वरूप और स्वभाव का अन्तर हो। पापा तोन्दल, गोल-मटोल और गंजे हैं और उनका स्वभाव साफ और खुला है- कोई दिखावा या दुराव-छिपाव नहीं है। यदि बनयान पहने हुए बैठे हों और घर में कोई आ जाए तो उन्हें कमीज पहनने का ख्याल नहीं आता। बस हँस-हँस कर बातें करते रहेंगे। दूसरी ओर ऊँचे-लंबे चेतन अंकल, इस उम्र में भी चुस्त और सुघड़ देह वाले, सिर पर घने केशराशि, सफेद-काले बाल और सदा स्मार्ट वस्त्र पहनने वाले, जैसी किसी पार्टी में जाने को तत्पर हों। उनके इस प्रकार सज-धज कर रहने पर मुझे न जाने क्यों खीझ और घृणा हो आती है। इसका कारण संभवतः यही है कि जिसे आप पसन्द नहीं करते, उसकी आपको कोई भी बात अच्छी नहीं लगती।
पापा के साथ बात करना एक मित्र के साथ बात करने जैसा है। चेतन अंकल बड़ी सोच-समझ कर बात करते हैं। उनके साथ बात करने का जब भी अवसर बनता है, वह सदैव मुझे मेरी पढ़ाई और मेरे करियर के विषय में भाषण-सा देते हैं। एक बार उन्होंने मुझे करियर-गाईड-सी कुछ पुस्तकें भी लाकर दीं, जो खुन्नस के कारण मैंने खोली भी नहीं। जब वह हमारे घर से चले जाते हैं तो किसी न किसी बात पर मेरी मम्मी-पापा के साथ बहस हो जाती है। चेतन अंकल के विषय में मेरा रवैया मम्मी की तेज नजरों से छिपा न रह सका। उसने मुझे दो-तीन बार समझाया भी कि बड़ों का आदर करना चाहिए. पर मैंने हर बार हँस कर बात टाल दी।
अब साँझ घिर आई है। चेतन अंकल को देर बाद भोजन करके ही जाना है; कितनी देर ऐसे ही बाहर घूमता रहूँगा? घर तो जाना ही है।
दूसरी परत- चेतन
मैं अपने जीवन के उस हिस्से को लगभग भूल चुका था। मैंने और पार्वती ने उस तूफानी रिश्ते को यौवन में उठने वाले कुदरती उबाल से अधिक महत्त्व नहीं दिया था। शादी के बाद तो मुझे उसको बिलकुल भूल जाना चाहिए था, परन्तु हुआ बिलकुल ही उलटा।
जैसे-जैसे कुशा के स्वभाव की परतें मेरे सामने खुलने लगीं और ज्यों-ज्यों हमारे आपसी रिश्तों के धागे तने जाने लगे, त्यों-त्यों मेरे मन में बार-बार अपने और पार्वती के संबन्धों से जुड़ी बातों, घटनाओं की याद आने लगी। कुशा अपनी हर गलती और कमी के लिए मुझे ही जिम्मेवार ठहराने लगी। हमारा रिश्ता ऐसे मुकाम पर आ पहुँचा कि उसका उत्तर देने पर भी झगड़ा हो जाता और चुप रहने पर भी जंग। जब उससे कोई गलती हो जाती तो मुझे सब से अधिक सन्देह रहता था। मेरा पूरा प्रयत्न रहता कि उसके गलती के विषय में उसे कुछ न जतलाऊँ, पर वह मेरी कोई पुरानी भूल या गलती का स्मरण करवा कर झगड़ने का बहाना बना ही लेती थी। कुशा के साथ मेरा हर टकराव और झगड़ा मुझे पार्वती का स्मरण करवा देता। मुझे प्रायः अपने प्रति उसका पूर्ण समर्पण याद हो आता। मुझे लगता कि मैं कितना दुर्भाग्यशाली हूँ कि उसके प्यार से वंचित हो गया, जो मेरे छोटे से प्रयास से मझे सदा-सदा के लिए मिल सकता था: मेरे जीवन का हिस्सा हो सकता था। वह प्यार यदि मेरे जीवन में होता तो मेरे जीवन का अर्थ ही बदल जाना था।
कुशा से त्याग लेना अपने आप में एक बड़ी लंबी और कष्टदायी कहानी है, पर उससे अलग होने का मुझे अफसोस नहीं हुआ, बल्कि मुझे लगा कि सम्भवतः कुशा के लिए भी अच्छा ही हुआ। खैर, देर से ही सही पर जीवन में कुछ सहजता आई, पर पार्वती मुझे याद आती रही। जीवन में कुछ गंवाने का एहसास बना ही रहा।
फिर कम्पनी के इन्दौर वाले कारखाने में स्थानांतरण का चांस बना। मैंने कुछ इच्छा व्यक्त की और काम बन गया और मेरा स्थानांतरण हो गया।
चार पाँच बार उसी स्टोर में जाना हुआ जहाँ प्रायः कर्ण घर का सामान खरीदने के लिए आया करता था। फिर एक दिन अदायगी के लिए मैं और कर्ण इकट्ठे कांउटर खड़े थे तो मेरे मुँह से डोगरी का वाक्य सुनकर कर्ण ने हैरान होकर मेरी ओर देखा और पूछा, “आप जम्मू से हैं? मेरे हाँ कहने पर उसने बताया कि जम्मू के साथ उसका खास रिश्ता है। जम्मू में उसका ससुराल है। फिर परिचय हुआ; उसने घर चलने का आग्रह किया। इस प्रकार मेरी उसके घर तक पहुँच हुई।”
कर्ण बेचारा नहीं जानता कि न तो उस स्टोर में मेरा जाना अचानक था और न ही डोगरी का वह वाक्य मेरे मुँह से निकलना अनायास था। यह सब पार्वती तक पहुँचने के लिए मैंने जान-बूझ कर किया था। परन्तु मुझे आशंका भी थी कि पार्वती मुझे देखकर क्या करती है या उसका व्यवहार कैसा होता है।
मुझे देख कर कुछ क्षणों के लिए उसके चेहरे का रंग पीला हो गया था, मुझे अपने भय में सत्यता का अनुभव हुआ। परंतु स्थिति शीघ्र ही संभल गयी थी।
पार्वती ने एक सुघड़ गृहस्थन की तरह पति के साथ आए अतिथि को बिठायाः चाय पिलाकर कशल क्षेम पछा। फिर यह जान कर कि मेरी नौकरी आज कल इन्दौर में है प्रसन्नता प्रकट की। इस प्रकार उनके घर जाने का सिलसिला चला। फिर उनके घर शतरंज-बोर्ड और मुहरे देखकर पता चला कि कभी कर्ण को भी शतरंज का शौक था। इसके साथ शतरंज खेलने के बहाने हर शनिवार को उनके घर जाने का रास्ता खुल गया।
इस प्रकार अब मैं पूरा सप्ताह शनिवार की प्रतीक्षा करता रहता, जैसे ठंडे शीतल पानी को देख मन की प्यास भड़क उठती है।
हो सकता है कि इस प्रकार निरन्तर उनके घर जाने में मुझे झिझक महसूस होती, पर कर्ण का शतरंज खेलने का शौक, उतावले होकर मेरी प्रतीक्षा करना और मेरे पहुंचने पर गर्म जोशी से मिलना, यह सब मेरी झिझक मिटाने के लिए काफी था। कर्ण बहुत ही सहज और सरल है। शतरंज की बाजी जीतने पर भी हँसता है और हारने पर उससे भी बड़ा ठहाका लगाता है।
उस घर में जाने से पहले मुझे देव व्रत के बारे में कोई जानकारी न थी। देवव्रत को देखकर मुझे अचंभा भी हुआ और प्रसन्नता भी। कुछ लड़के-लड़कियाँ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें देखकर मन खिल उठता है, देवव्रत भी ऐसा ही लड़का है। मैं तो केवल पार्वती का सामीप्य खोज रहा था, पर अब तो देवव्रत को देखने को मन करता रहता था। पर वह न जाने क्यों खिंचा-सा रहता है। इससे दुःख होता है।
पार्वती को अपने समीप देखकर मेरे मन में उसके और समीप जाने की आकाँक्षा ने मुझे ऐसा कुछ करने पर बाध्य किया, जो उचित न था। मेरी इस कोशिश को पार्वती ने जिस सख्ती से मुझे रोका था, वह दुत्कारने के समान था। कितने ही दिन मेरा मन उचाट रहा, पर अगले ही शनिवार मैं उनके घर पहुँच गया था फिर से। पार्वती के व्यवहार में कोई अन्तर नहीं था। वह पहले की तरह ही थी। अब मैं हर शनिवार उनके घर में जाता हूँ। मैं जानता हूँ कि पार्वती मुझ से प्यार नहीं करती, पर पार्वती को उस घर में उठते-बैठते चलते-फिरते, काम करते और बोलते देख मुझे जाने कौन-सा सुख मिलता है। कर्ण के ठहाके भी बड़े दोस्ती भरे लगते हैं।
देवव्रत को देखकर भी एक संतोष मिलता है। मैं समझता हूँ कि उस गृहस्थी और घर का हिस्सा होने का मेरा कोई हक नहीं, पर जीवन के इस मुकाम पर यदि मेरे मन के अन्दरूनी तार किसी की ओर खिंचते हैं तो वे इस घर की ओर। निस्संदेह मैं कई बार सोचता हूं कि क्या मुझे उस घर में जाना चाहिए? मुझे केवल अपने मन में पलने वाले रिश्तों की आंच को महसूसने के लिए, उस गृहस्थी की सुरीली सरगम में जबरदस्ती बेसुरा राग अलाप कर उसमें मिलाना चाहिए। पर मेरा तर्क हार जाता है। उस गृहस्थी के अतिरिक्त मुझे कोई और स्थान भी तो जाने के लिए नहीं मिलता।
तीसरी परत- पार्वती
मनुष्य इस जीवन से साधारणतया जो कुछ माँगता है, वह सब लगभग मेरे पास है। एक प्रसन्न चित्त, जी भरकर प्रीत करने वाला और हर छोटी, हर कही-अनकही बात का ख्याल रखने वाला पति और खिलती कली-सा नवयुवक पुत्र, जिसकी ऊर्जा के उजियारे से हमारा घर-बाहर रोशन है। इसी उजियारे में हमारे तीन जनों के आपसी प्यार और विश्वास की सुगन्ध भी मिली है।
यह सब कुछ होते हुए भी मैं अपने भीतर एक काले अंधेरे भेद का बोझ ढो रही हूँ। मेरे मन की गहरी परतों के नीचे छुप कर बैठा यह भेद प्रायः खुशी के क्षणों में मेरे अन्दर से निकलकर सामने आ खड़ा होता है और मुझे याद दिलाता है कि बेशक तू प्रसन्न हो ले, पर यह भूल नहीं मैं भी तेरे अंग-संग हूँ।
मेरे कर्ण और मेरा पुत्र देवव्रत, अर्थात् वे दो व्यक्ति जो मेरे जीवन का केन्द्र और मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं, उनके साथ ही मैं अपने इस राज का भार साँझा नहीं कर सकती। इस बात का दुख मुझे सदैव सालता रहता है। बहुत बार जी करता है कि कर्ण को बता दूँ, पर फिर डर लगता है। कैसी विडंबना है, विश्वास का रिश्ता इतना मजबूत होते हुए भी भय? क्या प्यार-विश्वास के इतने मजबूत दिखने वाले रिश्ते वास्तव में किसी ऐसी रेत की नींव पर खड़े किए गये होते हैं कि भूतकाल से हवा का कोई झोंका आकर इन्हें गिरा सकता है?
कर्ण जैसा साथी मिलना मेरा सौभाग्य था। उनके स्वभाव में ही जैसे सबके लिए अपनत्व मिला है, परन्तु देवव्रत के साथ उनका इतना प्यार देखकर मुझे कभी-कभी डर लगता है। किसी के साथ अधिक अपनत्व और ममत्व भी डराते हैं। मन डरता है कि किसी कारण इनके सम्बन्ध में यदि दरार पड़ जाए तो क्या होगा?
देवव्रत भी उन्हें उतना ही प्यार करता है। छोटे से देवव्रत को हँसाने और उसकी खुशी भरी किलकारियाँ सुनने के लिए कर्ण कैसी उल्टी-सीधी हरकतें करते थे, यह याद करके मुझे हँसी आ जाती है।
एक बार कर्ण ने मुझसे आधी रात के समय जगाकर कहा था कि वह हमारे आपसी रिश्ते के संबंध में एक बहुत आवश्यक बात करना चाहते हैं। उनके हँसमुख चेहरे पर इतनी संजीदगी ने ही मुझे भयभीत कर दिया था। मन की मिट्टी के नीचे दबा भूत सिर उठाने लगा था। मैंने कुछ घबरा कर उनसे कहा था, “बताओ।” तो उन्होंने मुस्करा कर मुझे बाहुपाश में लेकर कहा था, “मैं तेरा धन्यवाद करना चाहता था; तू खुशियाँ बाँटने वाली देवी है, जिसने मुझे देवव्रत का प्रसाद दिया है, धन्यवाद।” कर्ण अपने निश्छल स्वभाव के कारण मुझ पति से अधिक अपने मित्र लगते हैं। उनके साथ रहकर मेरे मन की कितनी ही सिलवटें साफ हो गयी हैं और मैल धुल गया है।
कर्ण की बहुत इच्छा थी कि देवव्रत के साथ के लिए एक छोटी बहन या भाई हो। देवव्रत के छ:-सात वर्ष हो जाने पर भी जब हमारे घर कोई दसरा बच्चा न हआ तो उन्होंने सलाह दी कि हम दोनों डॉक्टर से जाँच करवाएँ कि कहीं कुछ नुक्स तो नहीं हो गया है। मैं भय से काँप गयी थी। मुझे पता था कि जाँच का परिणाम क्या निकलेगा। मैंने कहा, “जब हमारे यहाँ पहले ही एक लड़का है तो हमें जाँच की क्या आवश्यकता है?” बात टल गयी; फिर मुझे लगा कि भूल भी गयी है। कितने ही वर्ष बीत गये। जीवन अपने सौन्दर्य का एहसास दिलाता, जैसे किसी मनभाते राग की तरह मखमली सुरों पर फिसलता चलता रहा।
फिर अचानक कर्ण एक दिन चेतन को लेकर घर आ पहुँचे। मेरे मन की परतों के नीचे छिपा बैठा वह अन्धेरा राज किसी अघोरी साध की भांति प्रेतों की तरह अपने शरीर और जटाओं से धूल उड़ाता एक झटके के साथ उठ खड़ा हुआ।
कर्ण अपने मसखरे स्वभाव के अनसार चेतन को मेरे शहर की बटी कहकर मिलाया था। कुछ क्षणों के लिए मेरे अंदर से निकले हुए उस भूत ने मुझे अपने नियंत्रण में रखा होगा। कर्ण ने कहा था, “मैडम जी अब उन्हें अन्दर भी आने देंगी या इसी तरह द्वार ढके खड़ी रहेंगी।”
चेतन ने हाथ जोड़ कर मुझे नमस्ते की थी। वह सम्भवतः यह प्रकट करना चाहता था कि हम एक-दूसरे से परिचित हैं, परन्तु मैंने उन कुछ क्षणों में ही निर्णय कर लिग था और अधिक से अधिक सहज होकर चेतन से पूछा था, “आप यहाँ कैसे?”
कर्ण मुस्करा कर कुछ हैरानी से बोले थे, “तो आप एक-दूसरे को जानते हैं?”
मैंने कहा था, “हाँ, हम एक ही मुहल्ले में रहते थे।” चेतन ने बीच में झूठ की मिलावट करते हुए कर्ण से कहा, “पर आपकी शादी से बहुत पहले हम वहाँ से शिफ्ट कर गये थे।” कर्ण ने ठहाका लगाते हुए कहा, “गुड, गुड तो मैंने अच्छा किया जो उन्हें साथ ले आया।”
चेतन का आना मेरे जीवन में शांत झील में पत्थर पड़ने पर तरंगों की हलचल पैदा होने के समान था। हलचल निस्संदेह हुई, पर सतह पर ही; वह झील खासी गहरी थी।
वे कैसे पल थे जिनमें वह अन्धेरा भेद उत्पन्न हुआ था, जिसका बोझ मैं आज तक अपनी आत्मा पर ढो रही हूँ और कैसी विडंबना है कि उन्हीं पलों के कारण मेरे और कर्ण के जीवन में खुशी का वह सोता फूटा था, जो आज तक हमारे जीवन को एक विशेष अर्थ दे रहा है।
मेरे जीवन की बीस वर्ष की पुरानी खिड़की खुल गई। घर वालों की ओर से कर्ण के साथ मेरे विवाह का निर्माण पक्का हो चुका था और तारीख भी निश्चित हो चुकी थी। पर मैंने मन ही मन किसी और को अपना मान लिएथा। मैंने माँ को अपने मन की बात बता दी थी। माँ के लिए बड़ी मुश्किल थी। शादी की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी, फिर भी माँ ने मेरे पिता जी के साथ डरते-डरते बात की थी। पिता जी ने इसे मेरे मन का बचपन का फितूर मानकर माँ को डाँट दिया था कि मैंने समाज में उनका अपमान करवाने की बात भी सोची तो मुझसे बुरा कोई न होगा। मैं हर ओर से हताश हो गयी। मुझे लगा कि मेरे लिए अब जीवन का कोई उद्देश्य नहीं बचा है। किसी को मेरी खुशी की कोई परवाह नहीं थी। सभी मेरा काम निपटा कर सुर्खरू होना चाहते थे। मेरे मन में क्रोध के शोले भड़क उठे। मैंने विद्रोह की आग में जलते हुए, एक जलता हुआ निर्णय कर लिए। कि ठीक है यह सभी अपने मन की बात पूरी कर लें, पर एक बार मैं भी अपने मन की पूरी करके छोडूंगी। कौन रोक सकता है मुझे? दहकती आग में जलती लकड़ी से चिटख कर निकलते हुए अंगारे की भांति मैं चेतन की गोद में गिरी थी और उसे अपना सब कुछ समर्पित कर दिया।
आज जब मैं उन क्षणों के विषय में सोचती हूँ तो मुझे लगता है कि चेतन इसके लिए तैयार न था। मेरे साथ शारीरिक सामीप्य बनाने की इच्छा से अधिक उसके मन में हैरानी का भाव था। सब कुछ ऐसे हुआ जैसे कोई भयानक झंझावात आया हो और फिर सब शांत हो गया। इस झंझावात के उपरान्त मेरे मन में केवल एक खालीपन था। न कुछ मिलने और न खोने का एहसास था। अपनी करनी पर कोई पश्चाताप भी न था। इस आँधी ने मानो मेरे मन से चेतन के मोह को भी धो डाला था। यदि मोह न बचा था तो उसके स्थान पर कोई नफरत भी न थी। जैसे मेरा नया जन्म हुआ हो। उस दिन से आज तक, उसके बाद कर्ण के अतिरिक्त मेरे मन में किसी और के प्रति मोह न जागा।
अब चेतन कभी-कभी हमारे घर आने लगा। फिर से कर्ण को शतरंज का पुराना शौक जागा। बोर्ड और गोटियों पर से धूल-मिट्टी साफ कर दी गयी। उन्होंने चेतन के साथ हर शनिवार की शाम को बाजी लगाने का मुस्तकिल प्रोग्राम बना लिए। देर रात तक शतरंज खेली जाती, फिर चेतन रोटी भी हमारे घर पर ही खाता। मुझे लगा कर्ण चेतन को काफी पसन्द करते हैं, उसे ठहाके मार-मार कर लतीफे सुनाते रहते हैं। शायद वह इसलिए भी चेतन का ख्याल रखते हैं कि वह मेरे जम्मू शहर का है।
मन ही मन मैं चाहती थी कि चेतन हमारे घर न ही आए। पर उसके आने से मैं उतनी परेशान भी नहीं होती। परेशानी का कारण और है। मुझे उस समय भय लगता है जब चेतन और देवव्रत एक-दूसरे के समीप होते हैं। हो सकता है यह मेरा भ्रम ही हो पर मुझे लगता है कि यदि कोई जरा भी गम्भीरता से देखे तो उन दोनों के नैन-नक्श में सांझापन ढूँढ सकता है, विशेषतः आँखों में। दोनों की आँखों के कोनों पर चीनियों की तरह झुर्रियां ही पड़ती हैं, पर चेतन की नजर की दोनों पर चीनियों की तरह झुर्रियाँ ही पड़ती हैं, पर चेतन की नजर की ऐबक कुछ रंगदार है।
यद्यपि चेतन ने मुझे प्रगट नहीं होने दिया, पर मुझे पक्का विश्वास है कि चेतन ने पहचान लिए है कि देवव्रत उसी का बेटा है। पता नहीं क्यों देवव्रत चेतन को पसंद नहीं करता।
कई बार पानी का गलास देते चेतन की उँगलिए मेरी उँगलिरों को छू गयी थी। पहले मैंने इस ओर ध्यान नहीं दिया, पर जब बहुत बार ऐसा हुआ तो मन में कुछ शंका उभरी, शायद चेतन ने जान-बूझ कर ऐसा किया है। मुझे अच्छा नहीं लगा। फिर एक दिन जब चेतन हमारे घर आया तो न वह शनिवार था और न ही उसके आने का समय था। घर पर न कर्ण था और न देवव्रत। मैंने उसे बिठाया, पानी पिलाया, उँगलियाँ फिर से छू गयीं। मैंने पूछा, “कैसे आए?” चेतन ने मुस्कराकर कहा, “आज दफ्तर से जल्दी फ्री हो गया, सोचा थोड़ा जल्दी चलते हैं, थोड़ी गप-शप कर लेंगे।”
मैंने अपने भीतर की सख्ती को विनम्रता का चोला पहनाते हुए चेतन की नज़रों से नजरें मिला कर कहा, “मेरी आपको सलाह है कि आप उसी समय आया करें, जब कर्ण घर पर हो। अब आप बैठे। मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ। कर्ण जी के आने तक आप टेलीविजन देखें।”
इसके बाद चेतन कभी हमारे घर असमय नहीं आया।
देवव्रत और चेतन के संबंध में मैंने कोई भ्रम नहीं पाला है। उसे जन्म देने का निमित्त भले कोई भी रहा हो, मेरे लिए इसका न कोई महत्त्व है न अर्थ। देवव्रत के पिता कर्ण ही हैं- यही सच्चाई है। मैं कर्ण के अतिरिक्त उसके पिता के स्थान पर और किसी का सोच भी नहीं सकती। पर मैं इतना अवश्य चाहती हूँ कि देवव्रत चेतन को यूँ ना पसन्द न करे। यह मुझे ठीक नहीं लगता।
चौथी परत– कर्ण
जब मैं पहली बार चेतन को अपने घर लेकर आया था, तब मुझे पार्वती का व्यवहार कुछ सहज नहीं लगा था। इस घर में जब भी अपने साथ किसी अतिथि को लेकर आया, पार्वती ने हमेशा उसका अपनेपन और गर्मजोशी से स्वागत किया और मैंने पार्वती के आतिथ्य पर सदा गर्व का अनुभव किया है। चेतन का स्वागत करने में वह सहजता थी और न ही अपनत्व की गर्मी। अधिक अचंभा तो इस बात का था कि चेतन पार्वती के अपने जम्म का था. उसी जम्मू का जिसके विषय में बातें करते हुए थकती न थी, और मैं और देवव्रत प्रायः उसके जम्मू प्रेम को लेकर उसे खिझाते रहते थे।
मुझे लगा कि मेरे मन में बहुत देर पहले उठे सवालों का कुछ न कुछ संबंध चेतन से अवश्य है, जिन्हें मैं अपने अंतस के कुएँ में दूर डुबो बैठा था।
कोई ग्यारह बरस पहले की बात होगी। जब देर तक हमारे घर में कोई दूसरा बच्चा न हुआ तो मैंने पार्वती को सलाह दी कि हम दोनों किसी डॉक्टर से अपनी जाँच करवा लें, कहीं देवव्रत के जन्म के बाद कोई नुक्स या कमी न आ गयी हो। पार्वती ने इस सलाह को पूरी तरह खारिज कर दिया था। उसने अपने टिके हुए शान्त स्वभाव के उलट जिस तरह से मना किया था, उससे मैं कुछ हैरान हुआ था। फिर भी मैंने पार्वती को बिना बताए अपने टैस्ट करवाए थे। टैस्टों का नतीजा हैरान करने वाला था। डाक्टर के अनुसार न तो मैं पिता बनने के योग्य था और न ही किसी उपचार से हो सकता था। यह मुझ में जन्मजात कोई जैनेटिक कमी थी।
मन में बहुत से प्रश्नों का उठना स्वाभाविक था। परन्तु मैं पार्वती को इतनी अच्छी तरह जान और समझ चुका था कि उसके चरित्र पर शक करना मेरे लिए अपने आप पर शक करने के समान था। पार्वती का व्यवहार, उसके व्यक्तित्व की गरिमा और गृहस्थी के प्रति उसका समर्पण मुझे उसके विषय में कुछ भी घटिया सोचने की अनुमति नहीं देते थे। यदि पार्वती ने मुझे कोई बात सुनानी उचित न समझी तो वाकई वह सुनाने योग्य नहीं होगी।
देवव्रत में मेरे रक्त का अंश नहीं होगा, पर वह किसी प्रकार भी मेरे अपने पुत्र से कम न था। अपना बच्चा न होने पर लोग बच्चा गोद भी लेते हैं। और उनसे अपने बच्चे से भी अधिक प्यार करते हैं। देवव्रत में तो फिर भी पार्वती का अंश है, उस पार्वती का जिसे मैं इस संसार में सबसे अधिक प्यार करता हूँ।
चेतन के आने के साथ और उसके साथ पार्वती के अजीब बर्ताव के कारण मेरा तीसरा नेत्र खुल गया। मेरे इस नेत्र ने देख लिए। कि पार्वती चेतन के आने पर खुश नहीं होती। देवव्रत चेतन का पुत्र है, यह समझने में मुझे देर नहीं लगी। चेतन के मन में पार्वती के प्रति लगाव और पार्वती की ओर से चेतन की ओर कोई भी आकर्षण न होना मेरी इस आँख से न बच सके।
पार्वती सोचती है कि जो भेद वह अपने मन में छिपा कर जी रही है, उसका पता किसी और को तो नहीं। हालाँकि चेतन जान चुका है कि देवव्रत उसी का बेटा है। परन्तु वह भी सोचता है कि मुझे इसका पता नहीं। मैं भी सोचता हूँ शायद यही स्थिति सबके लिए अच्छी है, विशेषकर पार्वती के लिए। मैं जानता हूँ कि इस राज़ का भार ढोना पार्वती जैसे व्यक्तित्व के लिए एक संताप है। पर यदि उसका यह राज़ उसके अपने या किसी और के कारण मेरे सामने खुलता है तो उसे लगेगा कि वह मेरी नजरों में गिर गई है। फिर मैं भले ही कितना विश्वास दिलाऊँ कि इस बात से मेरे और उसके सम्बन्धों में या उसके विषय में मेरी सोच में कोई अन्तर नहीं पड़ता। मैं कभी भी किसी परिस्थिति में भी नहीं चाहूँगा कि पार्वती अपने आप को हल्का अनुभव करे। इस घर में चेतन के आने से भी अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि मैं जानता हैं कि पार्वती के मन में चेतन के लिए कोई आकर्षण या रुचि नहीं है। चेतन को हमारे घर में आकर यदि कुछ सुख मिलता है तो उसको इससे वंचित क्यों किया जाए? जिस दिन वह स्वयं आने का निर्णय करे तो वह जाने।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
