dharatee ka mahaan teerandaaj
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Hindi Immortal Story: आकाशपुर का अभिमानी राजा था सूर्य। उसका एक ही बेटा था, जिसका नाम था जगतार। एक दिन उसने सूर्य से कहा, “पिता जी, मैं अकेले घूमते-घूमते तंग आ गया हूं। मैं चाहता हूं, मेरा कोई साथी हो।”

असल में जगतार एक बार धरती पर आया था। वहाँ उसने आदिवासी कबीले की एक युवती मानकी को देखा। मानकी सीधी-सादी थी, पर रूप ऐसा, जैसे कोई साँवली परी हो। वह मानकी से प्यार करने लगा। मानकी भी उसे चाहती थी। जब कभी जगतार धरती पर आता, वह मानकी से खूब बातें करता। वह मानकी से विवाह करना चाहता था।

सूर्य को जगतार की बात सुनकर बड़ा क्रोध आया। पर बेटे की जिद देख, वह मान गए। उन्होंने जगतार को मानकी से विवाह करने की अनुमति दे दी। लेकिन, “एक शर्त है। इस लोक में आने से वह धरती पर फिर नहीं जा सकेगी।” जगतार के कहने पर मानकी ने यह बात मान ली।

जगतार और मानकी का विवाह हुआ, तो दोनों का जीवन हँसी-खुशी से बीतने लगा। कुछ समय बाद उनके एक बेटा हुआ। जगतार और मानकी ने प्यार से उसका नाम रखा चकमक। नन्हा चकमक बहुत सुंदर और स्वस्थ था। उसके लाड़-चाव में मानकी सब कुछ भूल गई।

एक दिन मानकी चकमक को खिलाते-पिलाते पूर्व दिशा की ओर गई। वहाँ फूलों का एक सुंदर बगीचा था। बीच में एक गोल घेरे में बड़ा कड़ाह रखा था। उसमें काले रंग का एक घोल उबल रहा था। मानकी को देखकर

हैरान हुई, “कड़ाह के नीचे आग बिल्कुल नहीं जल रही है। फिर भी काले रंग का यह घोल इतनी तेजी से कैसे उबल रहा है।?”

घर लौटकर मानकी ने जगतार से पूछा। जगतार ने कहा, “यही तो है सूर्य की रहस्यमय शक्ति। इसी से सूर्य सभी को गरम रखता है।”

फिर जगतार ने मानकी को चेतावनी देते हुए कहा, “अब कभी उस दिशा में मत जाना। कड़ाह को बिल्कुल न हिलाना। नहीं तो पिता जी नाराज होंगे।” मानकी ने जगतार की बात सुनी, तो उसे मन में उत्सुकता जाग गई। अगले दिन फिर वह उसी दिशा में गई। उसने चुपके से कड़ाह को हिलाया। हाथ लगाते ही कड़ाह दूर खिसक गया। नीचे एक बड़ा छेद था, जिससे धरती दिखाई दे रही थी। मानकी ध्यान से देखने लगी।

अचानक उसे अपने कबीले के लोग दिखाई पड़े। फिर अपना घर और चारागाह, जहाँ वह भेड़-बकरियाँ चराया करती थी। देखते ही वह धरती पर लौटने के लिए बेचैन हो गई।

रात को उसने जगतार से कहा, “अब मैं यहाँ नहीं रह सकती। मैं धरती पर जाना चाहती हूं।” जगतार ने बहुत समझाया। लेकिन मानकी का आंसुओं भरा चेहरा उससे देखा नहीं गया। आखिर सूर्यदेव के पास जाकर उसने कहा, “मानकी वापस धरती पर जाना चाहती है।”

सुनते ही सूर्य का चेहरा तमतमा गया। गरजकर बोले, “ठीक है, उसे धरती पर छोड़ आओ। यह भी बता दो, अब वह कभी इस लोक में नहीं आ पाएगी। कभी तुमसे नहीं मिल सकेगी।”

जगतार ने मानकी को यह बात बता दी। फिर भी मानकी अपनी जिद पर अड़ी रही।

जगतार मानकी और चकमक को लेकर पूर्व दिशा की ओर चला। उसी बगीचे में आ गया। फिर उसने हाथ से कड़ाह को हटाया। नीचे छेद दिखाई पड़ा। दरअसल वह एक सुरंग थी, जहाँ से होकर सूर्यलोक से धरती पर जाया जा सकता था। सुरंग में भीषण आग धधक रही थी।

फौरन जगतार ने एक थैले में से सुनहरी झिल्ली निकालकर उसे मानकी और चकमक के चारों और अच्छी तरह से लपेट दिया। बोला, “अब आग तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा पाएगी। अलविदा मानकी। अलविदा चकमक!”

मानकी उस सुरंग में उतर पड़ी। जैसे-जैसे वह बढ़ती जा रही थी, आग और प्रचंड हो रही थी। पर मानकी और चकमक का बाल बाँका न हुआ। वे सुरंग से बाहर आने वाले ही थे, तभी चकमक रोने लगा। वह झिल्ली से बाहर मुँह निकालने के लिए जिद कर रहा था।

आखिर मानकी ने थोड़ी-सी झिल्ली हटा दी। तभी आग की एक लपट चकमक के माथे को छूने लगी। माथे पर गहरा घाव हो गया।

धरती पर आकर मानकी कुछ दिन खूब खुश रही। माता-पिता, भाई-बहन और कबीले के लोगों से मिलकर उसे लगा, “सच्चा आनंद धरती पर ही है!”

उसने चकमक का इलाज कराया। उसके माथे का घाव तो ठीक हो गया लेकिन उस जगह एक बदसूरत सा निशान बन गया था। वह किसी तरह ठीक होने में नहीं आता था। मानकी इस बात से दुखी थी। पति से बिछुड़ने का भी पछतावा होने लगा था। लिहाजा मानकी बीमार रहने लगी। एक दिन चकमक को अकेला छोड़कर चल बसी।

चकमक अनाथ हो गया। लेकिन उसे कबीले वालों का भरपूर स्नेह मिला। वह सभी का लाड़ला बन गया। दिन भर यहाँ-वहाँ घूमता रहता। तीरंदाजी का उसे बेहद शौक था। हाथ में तीन-कमान लिए कई बार सारे-सारे दिन जंगल में तीर चलाने का अभ्यास करता। कुछ ही समय में उसने तीर चलाने में कमाल हासिल कर लिया। कबीले में बेताज बादशाह बन गया। कितने ही संकटों में उसने कबीले वालों को बचाया था।

एक दिन पूर्णिमा की रात को कबीले के लोग इकट्ठे हुए। हर बार की तरह चाँदनी रात में मेला-सा जुड़ गया। सबने अपने-अपने करतब दिखाए। कोई संगीत का कमाल दिखा था था, तो कोई जादूगरी का। चकमक ने तीरंदाजी का कौशल दिखाया, तो सभी वाह-वाह कर उठे।

उस मेले में चकमक की निगाहें लीरा को ढूँढ़ रही थीं। लीरा कबीले के मुखिया की लड़की थी। असाधारण रूपवती। चकमक उससे बेहद प्रेम करता था। लीरा एक ऊँचे टीले पर खड़ी तरह-तरह के करतब देख रही थी। चकमक की तीरंदाजी का कमाल देख, उसने खूब तालियाँ बजाईं। कुछ देर बाद चकमक उसके पास गया। बोला, “लीरा, मुझसे विवाह करोगी?”

सुनकर लीरा मुसकरा उठी, “चकमक, तुम वीर हो। तुम्हारी वीरता की मैं प्रशंसा करती हूं। लेकिन मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकती। तुम्हारे माथे का बदसूरत दाग देखकर मेरा मन दुखी हो जाता है।”

लीरा की बात सुन, चकमक सिर झुकाए वापस चला आया। दुख और अपमान के कारण उसका हृदय छलनी हो गया था। वह तमाम वैद्य-हकीमों के पास गया, लेकिन कोई उसका इलाज न कर सका।

अंत में किसी ने सुझाया, “जाकर सूर्य देवता से ही कहो न! वे तुम्हारे दादा दादा हैं। जरूर कोई रास्ता निकालेंगे।”

बस, चकमक ने सूर्यलोक जाने का निश्चय कर लिया। वह पूर्व दिशा में काले पहाड़ की ओर बढ़ चला। काला पहाड़ ऊबड़-खाबड़ था। सीधी चढ़ाई थी। दूर-दूर तक सन्नाटा था। जगह-जगह भयानक जंगली पशुओं से मुठभेड़ होती थी। लेकिन चकमक घबराया नहीं। वह आगे बढ़ता गया।

वह काले पहाड़ की चोटी पर जा पहुँचा। अब क्या करे? कहाँ जाए? उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह आँखें बंद करके बैठ गया। कुछ देर बाद उसे लगा, आँखों में इंद्रधनुषी रंग झिलमिला रहे हैं।

चकमक ने आँखें खोल दीं। वाकई सामने इंद्रधनुषी झूला नजर आ रहा था। सूर्य की किरणों से बना हुआ। चकमक सावधानी से उस झूले पर चलने लगा। सामने उसे नीले काँच जैसा फर्श नजर आया। वह उसी ओर बढ़ चला। यही था सूर्यलोक।

कुछ आगे चलने पर चकमक को एक विचित्र दृश्य दिखाई दिया। एक दुबला-पतला व्यक्ति सात गिद्धों से घिरा हुआ था। सातों गिद्ध एक साथ उस पर झपट रहे थे। उसकी आँखें निकाल लेना चाहते थे। वह व्यक्ति आँखों पर हाथ रखे, खुद को गिद्धों के हमले से बचाने की कोशिश कर रहा था।

चकमक को उस व्यक्ति पर बहुत तरस आया। उसने एक-एक करके धनुष पर सात तीर चढ़ाए, पूरी ताकत से धनुष खींचकर छोड़ दिए। एक साथ सातों गिद्ध जमीन पर आ गिरे।

यह देख, वह व्यक्ति चकित रह गया। चकमक के पास आकर पूछा, “वीर युवक, तुम कौन हो? मैंने ऐसा बहादुर आज तक नहीं देखा!”

चकमक के अपना नाम बताया, तो वह खुशी से उछल पड़ा। बोला, “तुम मेरे बेटे हो। तैं तुम्हारा पिता हूँ, जगतार!”

फिर जगतार चकमक को लेकर सूर्यदेव के पास गया। सूर्य भी पोते को देखकर, आनंद-विभोर हो उठे। उन्होंने फौरन बड़े कड़ाह में से काला घोल मंगवाकर चकमक के माथे पर लगाया। कुछ देर होंठों में बुदबुदाते रहे। अचानक चकमक के चेहरे का बदसूरत निशान गयाब हो गया। वह एक सुंदर युवक बन गया।

फिर सूर्य ने चकमक को एक बाँसुरी और मोरपंख दिया। कहा, “अब लीरा के पास जाओ।”

सूर्य के प्रताप से चकमक तुरंत लीरा पास पहुँचा। वहाँ उसने सूर्यदेव की दी हुई बाँसुरी निकाली और लीरा का नाम लेकर बजाने लगा। लीरा मुग्ध होकर सुन रही थी। उसका हृदय झूम उठा। कुछ देर बाद चकमक ने बाँसुरी बजाना बंद किया, तो लीरा बोली, “अरे, तुम इतने सुंदर कैसे हो गए? यह मनमोहक बाँसुरी कहाँ से लाए? मुझे मेरी गलती के लिए माफ कर दो, चकमक। मैं तुम्हीं से विवाह करूँगी।”

फौरन चकमक के अपनी जेब से मोरपंख निकाला। उसे पहले अपने, फिर लीरा के माथे से छुआया। सहसा दोनों हवा में ऊपर उठने लगे। सूर्यलोक में जा पहुँचे। वहाँ धूम-धाम से उनका विवाह हुआ। कई दिनों तक दावत चलती रही।

सूर्य ने उन्हें एक रियायत दी। वे जब चाहते, धरती पर आ जाते। जब चाहते, सूर्यलोक में पहुँच जाते। सूर्य ने जो व्यवहार मानकी के साथ किया था, चकमक के साथ नहीं करना चाहते थे। होते-होते चकमक और लीरा की कहानी अमर हो गई। आज भी कबीले के लोग मस्ती से बाजे पर गा-गाकर इसे सुनाते हैं।

ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)