वहीँ दूसरी तरफ कोरोना का कहर रौशनी समान तीव्र गति से बढ़ता जा रहा था। कोरोना एक ऐसा वायरस है जो एक बार किसी व्यक्ति को हो जाए तो उस व्यक्ति का बच पाना बेहद मुश्किल होता है।

आनंद को अपने हाँथ में लगे चोट के दुःख से ज़्यादा अपने घर जाने की ख़ुशी थी। उसका भी एक छोटा सा प्यारा सा परिवार था जो वुहान में रहता था और मूल रूप से भारतीय था।  आनंद तब अपनी माँ के गर्भ में था जब उसे पिता को चाइनीज़ कंपनी में नौकरी मिली और वे सपरिवार चाइना आ पहुंचे। आनंद को अपने सैनिक भाइयों का कोरोना के विरुद्ध साथ न दे पाने की अवस्था खल रही थी मगर वह यह भी नहीं चाहता था कि वह अपने सैनिक भाइयों पर बोझ बने इसलिए वह अपने शहर वापस लौट जाता है।

वह जब वुहान पहुँचता है तो देखता है कि पूरा शहर शांत पड़ा है। जहां कभी गाड़ियों का ताँता लगा रहता था, वहाँ आज अकेले वही खड़ा है, पूरी सड़क सूनी पड़ी हुई है। जिन दुकानों के सामने लंबी- लंबी कतार लगी रहती थी, वहाँ आज सन्नाटा छाया हुआ है। इतने में शाम हो जाती है और चारों तरफ अंधकार छा जाता है। जहाँ कभी आधी रात को भी अंधेरा नहीं होता था या यह भी कह सकते हैं कि वुहान अपने उज्वल प्रकाश के लिए प्रसिद्ध है वहाँ आज हर तरफ अंधकार छाया हुआ था। फिर भी आनंद आशा की किरण जलाये अपने घर पहुँचता है मगर वहाँ भी वह अंधकार देखता है। उसे घर में कोई नहीं है इस वजह से उसकी चिंता परिवार के प्रति और बढ़ जाती है और वह पास – पड़ोस में पागलों सा अपने परिवार को खोजता है लेकिन वहाँ कोई नहीं मिलता है, इतने में वह समझ जाता है और घुटनों के बल गिर कर फूट – फूट कर रोने लगता है।

 दुःखी मन से वह यांग्त्ज़ी नदी के किनारे जाकर बैठ जाता है। उस नदी से उसकी पुरानी यादें जुड़ीं हुई थीं इसलिए उसके लिये वह नदी बेहद पवित्र थी। वहाँ चैंग बचपन में अपने माता – पिता के साथ आया करता था और वहाँ पास में स्थित एक दुकान से आइस-क्रीम खाया करता था। आज वहाँ वह दुकान तो है पर दुकानदार नहीं! वहाँ आइस-क्रीम खाने को कोई बच्चा नहीं है! नदी तो है मगर उसके माता-पिता नहीं हैं! उसके कानों में उसके माता-पिता की आवाज़ें गूंजती हैं “बेटा नदी में मत जाना” मगर हक़ीक़त में वहाँ लहरों की तरंगे ही गूँज रही है। इस वक्त उसके पास परिवार की यादें तो हैं मगर परिवार नहीं होता। उसके हाँथ में चोट तो है मगर इस बार उसके चोट को देखकर विचलित होनेवाली उसकी माँ नहीं होतीं, उसके घाव को गर्व से सीना चौड़ा करके देखने के लिए उसके पिता नहीं होते हैं। वह जब सड़क से गुज़रता है तब वहां उसे गाड़ी की हॉर्न तो सुनाई देती ही मगर वहाँ कोई गाड़ी गाड़ी नहीं होती। वह जब बाज़ार से गुज़रता है तो वहाँ सन्नाटे को चीरती हुई विभिन्न प्रकार की आवाज़ें गूंजती हैं मगर वहाँ उसके सिवा और कोई मनुष्य नहीं होता। वह जब मैदान के पास से गुज़रता तब वहाँ बच्चों के खेलने की आवाज़ें तो आती मगर वहाँ कोई बच्चा नहीं होता।

वह जब घर पहुँचता है तो देखता है कि उसकी माँ हाँथ फैलाए दरवाज़े पर खड़ी थीं उसके लिए मगर वह जब उनसे गले लगना चाहता है तो वहाँ उसकी माँ नहीं होतीं। वह मायूस होकर बैठ जाता है और दिवार पर लगी अपने परिवार की तस्वीर को निरंतर देखता रहता और रोता रहता है। तस्वीर को देखकर उसे उस सुनहरे वक्त की याद आती है जब वह अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन व्यतित करता था। उसे उस फ्रेम के पीछे एक दृश्य याद आता है जब उसके पिता ने उसकी माँ को पारिवारिक फोटोशूट के लिए बुलाया था। सुबह का समय था इसलिए हमेशा की तरह उसकी माँ उनके लिए नाश्ता बना रही थी और फोटोशूट के लिए पिता के बुलावे के कारण उन्हें जले हुए नाश्ते का सेवन करना पड़ा।

अपने परिवार को खोने के दुःख में वह अपने जीवनभर की सारी कमाई कोरोना पीड़ितों की सेवा के लिए दान कर देता है और टूटा हाँथ लिए अपने सैनिक भाइयों के साथ कोरोना के विरुद्ध संघर्ष में पूरी शक्ति से जुट जाता है। इस तरह वह सैन्य जीवन के क्रूरता वाले मार्ग को पीछे छोड़ता हुआ पारिवारिक करुणा से भरे मार्ग पर चलने लगा।

उपर्युक्त कहानी केवल व्यक्तिगत रूप से आनंद की नहीं है। यह उन सभी सैनिकों, डॉक्टरों, सहायक नागरिकों की एक कहानी है, जिसके कारण इस व्यापक यांग्त्ज़ी नदी के दोनों ओर एक प्रकाश उत्सव मनाया गया, जिसमें गगनचुंबी इमारतों और पुल के साथ स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रोगियों की छवियों को दिखाया गया है। नागरिकों ने झंडे लहराए, “वुहान, लेट्स गो!” के नारे लगाए और चीन का राष्ट्रगान किया।फिर से खुले ब्रिजों पर यातायात वापस अपनी गति से दौड़ने लगी, सौ से भी अधिक लोग अपने रेलगाड़ी, अपने हवाई जहाज़ की प्रतीक्षा करने लगे और कई अपने काम पर लौटने का स्वप्न देखने लगे।