Hindi Immortal Story: भिम्मा एक अनाथ भील लड़का था। जंगल में रहकर रात-दिन निशानेबाजी का अभ्यास करता था। तीर चलाने में उसका कोई जोड़ नहीं था। उसके कबीले के लोग उसकी बहादुरी और तीरंदाजी की बहुत तारीफ करते थे। कहते थे, ‘निशाना साधने की कला तो कोई भिम्मा से सीखे। यह चाहे तो मीलों दूर बैठे दुश्मन की आँखें भी भेद सकता है।’
इसलिए भीलों को अगर किसी से युद्ध लड़ना होता, तो वे अमलतास को ही आगे कर देते। अकेला भिम्मा शत्रु सेना के आगे पहाड़ की तरह छाती तानकर खड़ा हो जाता। वह देखते ही देखते अपने पैने तीरों से शत्रु की सेना को तितर-बितर कर देता था।
हर महीने भील लोग पूर्णमासी की रात को जंगल में उत्सव मनाते थे। उस रात भील युवक और युवतियाँ सुंदर-सुंदर रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर आते। भील युवक रंग-बिरंगे फूलों की मालाएँ पहनते और युवतियाँ चंपा, कनेर और गुलाब के फूलों को गहनों की तरह सजा लेतीं। उस रात देर तक भील युवक और युवतियाँ नृत्य करते। बाकी लोग आकर उस नृत्य का आनंद लेते, बाद में आधी रात को दावत होती। सब लोग जी भरकर पकवान खाते।
अगले दिन भाला-युद्ध और निशानेबाजी की प्रतियोगिता होती। उसमें भिम्मा का नंबर हमेशा पहला आता। निशानेबाजी में तो भला उसका कोई जोड़ ही नहीं था। तलवार और भाला चलाने में भी उसके आगे कोई टिक नहीं पाता था।
इस समारोह में भीलों के सरदार की बेटी लिप्पा भी जरूर आती थी। नृत्य में उसका कोई सानी नहीं था। लिप्पा सुंदर भी बहुत थी। वह सितारों जड़ा सुंदर नीला परिधान पहनकर नाचती, तो लगता मानो चाँद-सितारे धरती पर उतर आए हों।
एक बार की बात है। भिम्मा अपनी निशानेबाजी की कला दिखा रहा था। लिप्पा दूर से ही उसे देखकर बार-बार तालियाँ बजा रही थी। इससे भिम्मा और जोश में आ गया। उसने तीरंदाजी के ऐसे-ऐसे कमाल दिखाए कि लोग झूम उठे।
उसी दिन भिम्मा ने लिप्पा के पास जाकर कहा, “लिप्पा, तुम्हारा नृत्य में कोई जोड़ नहीं और मैं बेजोड़ धनुर्धर हूं। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?”
सुनकर लिप्पा गंभीर हो गई। बोली, “भिम्मा, एक तो तुम अनाथ हो, गरीब भी हो। फिर ज्यादा सुंदर भी नहीं हो। मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकती।”
सुनकर भिम्मा उदास हो गया। उसी समय वह उस समारोह को छोड़कर चल दिया। चलते-चलते भिम्मा एक घने जंगल में पहुँच गया। वह जंगल इतना अधिक घना था कि दिन में ही वहाँ अँधेरा सा छाया रहता। दूर-दूर तक बस पेड़ों के झुंड ही नजर आते। पेड़ भी इतने घने जैसे एक-दूसरे को गलबहियाँ डाले खड़े हों। आगे चलकर एक नदी का किनारा आ गया। वहीं एक बड़ा पुराना, बूढ़ा बरगद का पेड़ था। भिम्मा उस पेड़ के नीचे बैठ गया। अपने हालात पर दुखी होकर वह मन ही मन रो रहा था। बार-बार उसकी आँखें आंसुओं से भर आतीं।
वह होठों में ही बुदबुदाकर कह रहा था, “हे राम! अगर मुझे सम्मान-भरा जीवन नहीं देना था, तो तुमने मुझे पैदा ही क्यों किया?”
उस पेड़ पर सोने जैसी सुनहरी, प्यारी-प्यारी सुंदर चिड़ियाँ रहती थीं। उन्होंने भिम्मा की बात सुनी, तो बहुत उदास हो गईं। देर तक आपस में कुछ सोच-विचार करती रहीं। फिर सबने अपना एक-एक पंख भिम्मा के ऊपर गिरा दिया।
भिम्मा अपने-आप में इतना खोया हुआ था कि उसे कुछ पता ही नहीं चला। तब सारी की सारी सुनहरी चिड़ियाँ पेड़ से उतरीं और भिम्मा के चारों ओर घेरा बनाकर बैठ गईं। उनमें से एक चिड़िया फुदककर भिम्मा के पास आई। उसके कंधे पर बैठकर चटकीली आवाज में बोली, ‘छीं! तुम तो बहादुर हो। बहादुर कहीं रोते हैं! जाओ, तुम अपने घर जाओ। तीरंदाजी का अभ्यास करो। अब तुम लिप्पा से कुछ न कहना। जो भी कहना होगा, वही कहेगी।” भिम्मा ने हैरान से देखा—अरे, सोने जैसी चमचम-चमचम करती ये सुनहरी चिड़ियाँ कहाँ से आ गईं? उसने कंधे पर बैठी चिड़िया से पूछना चाहा, “तुम कौन हो? कहाँ से आई हो?”
लेकिन भिम्मा कुछ पूछे, इससे पहले ही चिड़िया फुर्र हो गई।
भिम्मा घर लौट आया। और फिर रात-दिन तीरंदाजी के अभ्यास में जुट गया। इस बार उसने निशानेबाजी के और भी नए-नए गुर और कलाएँ सीखीं।
अगली बार पूर्णमासी का समारोह हुआ तो सब ओर भिम्मा ही भिम्मा नजर आ रहा था। उसने तीरंदाजी का वह कमाल दिखाया कि लोग अश्-अश् कर उठे। उसने नदी पर तीरों का पुल बना दिया। तीरों की ही सीढ़ियाँ। जो देखता, वह यही कहता, ऐसा कमाल ने देखा था, न सुना था। फिर भिम्मा सुंदर भी बहुत लग रहा था। सुनहरी चिड़ियों ने भिम्मा पर जो सुनहले पंख गिराए थे, वे अब भी उसके शरीर पर चिपके हुए थे। लगता था, उसका पूरा शरीर सोने के अनोखे चम-चम करते गहनों से मढ़ा है। सभी भिम्मा को बधाई दे रहे थे। बार-बार उसकी वीरता का बखान कर रहे थे।
दूर से लिप्पा भी यह देख रही थी। वह दौड़ी-दौड़ी भिम्मा के पास आई। आँखों में आँसू भरकर बोली, “माफ करना भिम्मा, माफ करना! मैंने तुम्हारा बहुत जी दुखाया। मैं तुम्हीं से विवाह करूँगी, तुम्हीं से! अब अपनी नाराजगी छोड़ दो।”
भिम्मा और लिप्पा का धूमधाम से विवाह हुआ और जीवन भर वे सुख से रहे। सुनहरी चिड़ियों के पंख चम-चम करते सोने के गहनों की तरह, जीवन भर भिम्मा के शरीर पर चिपके रहे। अगले जन्म में यही भिम्मा, अमलतास का पेड़ बना। घोर गरमियों में उस पर सोने जैसे चम-चम करते, पीले फूल लगते हैं, तो लोग खुशी झूम उठते हैं।
ये कहानी ‘शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Shaurya Aur Balidan Ki Amar Kahaniya(शौर्य और बलिदान की अमर कहानियाँ)
