भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मुझे लग रहा था कि मैं सफलता के अन्तिम शिखर को बस छूने ही वाला हूँ। हम दोनों आज जिस मुकाम पर पहुँच चुके हैं, वहाँ दोनों के मनों में उथल-पुथल मची हुई थी। पर इस उथल-पुथल की नौईयत दोनों की अपनी अपनी तरह की थी। इस पर ‘जानते हो, कल तक जो कड़वाहट जहर की भाँति मेरे लहू में दौड़ रही थी और वही जहर मेरे शब्दों, मेरी हँसी और मेरे आँसुओं, मेरे व्यवहार और दुर्व्यवहार के जरिए प्रकट हो जाता था, आज उस जहर और कड़वाहट के लिए मेरे दिल-दिमाग में कोई जगह ही नहीं बची। तुमने ब्लॉटिंग पेपर की तरह मेरे अन्दर का सारा जहर चूस लिए है।’ उसने मेरी बायीं बाँह पर अपनी मुंदरियों वाली उंगलियाँ फिराते हुए समाधिस्थ अवस्था में कहा।
‘हूँ।’ मैं उसे इस समाधिस्थ अवस्था से बाहर नहीं निकालना चाहता था इसलिए अपनी बातों में उलझाने की बजाय मैंने उसको अपने ही शब्दों के वेग में बहने देना अधिक उचित समझा। इसलिए केवल ‘हूँ, हाँ’ करके ही उसे उत्साहित करता रहा।
‘पता है, तू मेरे जहन पर, मेरी सोच पर इस कदर छा गया है कि मेरी सोच को तूने अपने खयालों से इतना लबरेज कर दिया है कि दूसरे किसी असुखद खयाल के मेरी सोच में दाखिल होने के लिए अब कोई स्पेस ही नहीं बची तुझे नहीं पता, तूने मुझे कितना बदल दिया है।’ वह उसी उन्माद भरी स्थिति में बोल रही थी। उसकी उंगलियाँ मेरी बाँह पर लगातार सितार बजा रही हैं और मेरी आँखों के आगे देवदास फिल्म का एक दृश्य घूम जाता है। देवदास चन्द्रमुखी से कह रहा है-‘पारों के नाम से देवदास नाम का प्याला इतना भर चुका है चन्द्रमुखी कि इसमें तुम कुछ और डालोगी तो छलक जाएगा।
‘पर फिर भी लोग तो यही कहेंगे न कि प्याले को छू कर निकली है’ उस चन्द्रमुखी ने भी मेरे सामने बैठी चन्द्रमुखी की तरह उमंगित होकर कहा था देवदास को। मुझे हँसी आ जाती है, दोनों परिस्थितियों पर, पर मैं जबरन अपनी हँसी दबा लेता हूँ। इस वक्त मेरा हँसना शिष्टाचार के विरुद्ध है। क्योंकि जिस संवेदनशील स्थिति में यह चन्द्रमुखी इस समय अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण मेरे सामने कर रही है, उस स्थिति में उसके प्रेमी को भी ऐसे ही संवेदनशील और अनुभवपरक प्रकटीकरण की जरूरत है। देवदास और देवदास वाली चन्द्रमुखी के फिल्मी डायलॉग का विश्लेषण फिर कभी सही। हालांकि देवदास फिल्म के इस डायलॉग पर मेरा हमेशा आलोचना करने को दिल करता है। पर इस समय यह आलोचना इस चन्द्रमुखी के सामने नहीं की जा सकती। इसलिए मैं अपने चेहरे पर हद दर्जे की संवेदनशीलता ओढकर अपनी उंगलियाँ उसके कटे बालों में उलझा लेता है और वह मानो तड़प कर अपना मुँह मेरे सीने में छुपा लेती है।
चन्द्रमुखी के साथ मेरा रिश्ता भी अजीब है। देखने-सुनने वाले जानते हैं कि मैं जिस घर में किराये पर कमरा लेकर, एक प्रायवेट ट्यूटोरियल में मैथ्स की ट्यूशन पढ़ाता हूँ, चन्द्रमुखी उसी मकान की मालकिन है। मेरे से सिर्फ चार बरस छोटा उसका बेटा दूसरे शहर के किसी कालेज में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है और उससे करीब दो साल छोटी उसकी बेटी फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के लिए दिल्ली में है। उसका पति किसी सरकारी विभाग में बड़ा अफसर है। यानी ब्यूरोक्रेट। सवेरे जब एक सफेद रंग की अम्बेसडर कार उनके दरवाजे पर आकर रुकती है और एक वर्दीधारी व्यक्ति ड्राइवर की बगल वाली सीट पर से उतरकर तेज-तेज कदमों से घर की सीढ़ियों से उतरते समय मैं अपने मकान-मालिक का दीदार कर पाता हूँ। उनकी गाड़ी के चले जाने के बाद तुरन्त मेरी नजर टेरिस पर कैक्टस के गमलों के मध्य खड़ी चन्द्रमुखी पर पड़ती है। मैं बड़े ध्यान से उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई भाव पढ़ने की कोशिश करता हूँ, पर मुझे कभी सफलता नहीं मिली। शाम को जब मैं सो चुका होता तो गाड़ी का हॉर्न बजता। नौकर दौड़कर गेट खोलता। और इस अजीब-सी हलचल में सभी ऊपर चले जाते। बस, उस समय मुझे पता चलता कि मालिक पर लौट आया है।’
मेरा कमरा पोर्च के ऊपर है। जब मैंने कमरा ढूँढने के लिए इस कॉलोनी में रहने वाले अपने एक मित्र से कहा था तो उसने तुरन्त इस घर की सिफारिश कर दी थी। मेरे मित्र की पत्नी भी उसी किट्टी पार्टी की मेंबर है जिसकी यह चन्द्रमुखी। मैंने जब अपने मित्र की बीवी के माध्यम से इस घर में कमरा लेने की बात चलाई तो चन्द्रमुखी ने सबसे पहले यही बात कही थी कि उसे कोई फैमिली वाले लोग चाहिए। परिवार छोटा हो और अगर किराये पर रहने वाली औरत उसकी हम उम्र की हो तो और भी अच्छा। वह दरअसल अपने अकेलेपन से बहुत परेशान रहती है और चाहती है कि घर में कोई उससे बोलने-बतियाने वाला, उसके एकाकीपन को बांटने वाला हो, ताकि उसकी उदासी भी कम हो। वे बातें मेरे मित्र की पत्नी ने मुझे बताई थीं। बातों-बातों में मझे यह भी मालम हो गया था कि चन्द्रमखी का अफसर पति अक्सर दौरों पर ही रहता है। वैसे भी, वह शहर के बड़े-बड़े क्लबों का मेंबर है इसलिए उसकी रात दिन की व्यस्तता ही चन्द्रमुखी के अकेलेपन और डिप्रेशन का कारण है। यह सब कुछ जानकर मैं शशापंज में पड़ गया था। किराये पर कमरा लेने की शर्त जरा मुश्किल तो थी पर दिलचस्प भी कम नहीं थी। मेरे अन्दर मानो उत्सुकता का कोई कीड़ा कुलबुलाया था।
‘ठीक है, भाभी जी। मैं पाशी और अपनी बेटी-डिम्पी को भी यहीं ले आता हूँ। इसी बहाने डिम्पी को भी किसी अच्छे स्कूल में डाल देंगे। पाशी भी तो एम.ए., बी.एड है। हो सका तो किसी प्राइवेट स्कूल में उसको भी एडजस्ट करा देंगे।’ मैंने झटपट ही सारी योजना बना ली और अगले ही दिन हम चन्द्रमुखी के घर किरायेदार होकर उनके पोर्च के ऊपर बने कमरे में शिफ्ट हो गए। साथ ही, एक छोटा-सा किचन भी था। पाशी को यद्यपि इतना छोटा किचन पसंद नहीं था, पर बाकी सारा वातावरण उसके मिजाज के अनुकूल था। उसे शोर-शराबा पसंद नहीं था। इसलिए उसके शांतिप्रिय स्वभाव के लिए यह माहौल अधिक सुखद था।
कुछ ही दिनों में पाशी और चन्द्रमुखी पक्की सहेलियाँ बन गई, आयु में बहुत अधिक अन्तर होने के बावजूद, धीरे-धीरे पाशी के जरिए मुझे चन्द्रमुखी के भीतरी सूनेपन का अंदाजा हो गया। हम यह सोचते हैं कि क्या पैसे से सारी खुशियाँ हासिल की जा सकती हैं? इतना पैसा है इन लोगों के पास, पर दिल को चैन नसीब नहीं। चैन ढूँढने के लिए साहब क्लबों और शराबों में अन्तर्लीन रहता है और मेम साहब दुख बांटने के लिए किसी का सहारा खोजती है।
चन्द्रमुखी अब अक्सर हमारे घर में आने लगी। मुझे भी उसका इस तरह हमारे संग घुलमिल जाना अच्छा लगता था। हम मिलकर टी.वी. पर कोई फिल्म देखते। पाशी पकौड़ियाँ तल लाती। कभी मैं बाहर से आइसक्रीम ले आता और कभी चन्द्रमुखी का नौकर कोई मीठी या नमकीन चीज तलकर ले आता। पहले मुझे हर समय सिरदर्द की शिकायत रहती थी, पर अब कई दिनों से मुझे सिरदर्द हुआ ही नहीं, न ही रात में नींद की गोली खाने आवश्यकता पड़ी है।
‘पता है पाशी, तुम्हारे संग गप्पे मारते, हँसते-खेलते वक्त कैसे बीत जाता है. पता ही नहीं चलता।’ चन्द्रमखी अक्सर कहती।
अब हम फुर्सत के क्षणों में ताश खेलने लग जाते। कभी कैरम और कभी बैडमिंटन। हाँ, चैस न मुझे खेलनी आती थी, न पाशी को। पर चन्द्रमुखी ने हमें वह भी सिखा दी।
चन्द्रमुखी उसका असली नाम नहीं है। यह तो मैंने उसे अपनी ओर से प्यार भरा नाम दे रखा है। मेरे लिए वह चन्द्रमुखी ही है। सचमुच की चन्द्रमुखी! एकदम पतीसे जैसी! निरी खस्ता! जीभ की नोक पर रखो तो पलक झपकते ही घुलकर अन्दर उतर जाए। यूँ है भी बड़ी रख-रखाव वाली। शौक भी उसके बस हफ्ते में एक बार किट्टी पार्टी में जाने से बढ़कर कुछ नहीं। अब कभी-कभी वह और पाशी बाजार में शॉपिंग करने चली जाती और पाशी लौट कर बताती- ‘ये सूट मुझे दीदी ने दिया है। अपने लिए लेने लगी तो मुझे भी जबरदस्ती दिया। बहुत न-न किया, पर नाराज हो गई। मुझे मजबूरन लेना पड़ा।’ शायद मैं नाराज न हो जाऊँ, इसलिए पाशी स्पष्टीकरण दिए जाती।
लेकिन मैं तो अन्दर ही अन्दर बहुत खुश होता। यद्यपि जाहिर नहीं होने देना चाहता था। मेरे खुश होने का कारण यह नहीं था कि मेरी बीवी को चार-पांच सौ रुपये का सूट मुफ्त में मिल गया और मेरी जेब हल्की होने से बच गई, बल्कि इन दोनों औरतों की आपसी आत्मीयता मुझे अच्छी लग रही थी। क्योंकि मुझे चन्द्रमुखी के उदास चेहरे पर आजकल बदले-बदले सुर्ख रंग की झलक भली लग रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि अकेलेपन के अंधेरे में से निकल कर वह रंगों से खेलने की कोशिश कर रही है। इकट्ठा बैठते, ताश या कैरम खेलते वैसे भी अनजाने में अगर कभी हमारे हाथ परस्पर छू जाते तो मैं चोर निगाहों से उसके चेहरे की ओर देख लेता। लेकिन, वह अपने भावों को लाख चतुराई से छिपाते हुए भी, मेरे सामने जाहिर हो ही जाती।
किराए पर होने के कारण हमने अपना निजी टेलीफोन नहीं लगवा रखा है। इसलिए अपने जान-पहचान के लोगों और अन्य जान-पहचान के लोगों और अन्य रिश्तेदारों को हमने मकान मालिक का ही नंबर दिया हुआ था। वक्त-बेवक्त मुझे या पाशी को चन्द्रमुखी के घर में फोन सुनने के लिए जाना पड़ता। आरंभ में तो मैं स्वयं फोन सुनने जाने से झिझकता था और जबरन पाशी को संग लेकर जाया करता। पर अब क्योंकि हम आपस में काफी बेतकल्लुफ हो गए थे, इसलिए मेरा निजी फोन आने पर पाशी खीझकर कहती-‘मुझे क्यों अपने संग घसीटते रहते हो? वहाँ कौन है जो तुम्हें खा जाएगा? दीदी से डरते हो? उनके तो बच्चे हमारी उम्र के है।’ और मैं निश्चिंत होकर चन्द्रमुखी के कमरे में चला जाता। आजकल फोन भी कुछ ज्यादा ही आने लगे थे कमबख्त।
एक दिन चन्द्रमुखी का नौकर घबराया-सा दौड़ता हुआ आया।
‘मेम साहिब बहुत परेशानी में रो रहे हैं। आप चलकर पूछो जरा।’
हम घबराये हुए वहाँ पहुँचे तो देखा कि वह हिचकियाँ भर-भर कर रो रही थी। आँखें सूजी हुई थीं और चेहरा लाल। बहुत पूछने पर उसने बताया कि मायके से फोन आया है, उसकी माताजी बहुत बीमार हैं। वह फिर फूट-फूट कर रोने लग पड़ी। बड़ी मुश्किल से हमने उसे हौसला दिया। चुप कराने के बहाने हमने यूँ ही उसे बातों में लगाना चाहा। उसके पति को नौकर ने फोन करके सारी बात बता दी। फोन पर उसने जल्दी घर आने का वायदा किया। चन्द्रमुख ने थोड़ा संभल कर अपने बारे में हमें बताना शुरू किया। वह दरअसल दूर दराज के एक गाँव की अल्हड़ लेकिन बेहद खूबसूरत लड़की हुआ करती थी खूबसूरत तो वह आज भी है, माशा अल्लाह उस वक्त कितनी रही होगी। मेरी नजर उसका भरपूर जायजा लेती है। मैं मन ही मन मुस्कुरा पड़ता हूँ। फिर स्वयं को कोसने लगता हूँ क्योंकि चन्द्रमुखी ‘V’ करके अपनी नाक और आँखें पोंछती हुई अपनी कहानी सुना रही है। उसकी सास ने किसी विवाह में उसे देख कर अपने पढ़े-लिखे शहरी पुत्तर के लिए उसे खोज कर पसंद किया था। पढ़ी-लिखी बेशक वह भी थी, पर गाँव की लड़की होने के कारण शहरी लड़के ने बहुत न नुकर की। उसे अपने स्टेटस और अपने जैसी खुले विचारों वाली जीवन-साथिन की तलाश थी, पर माँ की हठ के आगे उसकी एक न चली। और चन्द्रमुखी शहरी अफसर की अफसरानी बनकर इस तिलस्मी काँच के रंगीन महल में कैद हो गई। कोशिश के बावजूद वह अपने आप को शहरी रंगीनियों, बेबाक ठहाकों वाले क्लबों के मदहोश कल्चर में ढाल न सकी। इसलिए धीरे-धीरे अकेलेपन की गहरी खाई में गिरती-गिरती कई मानसिक बीमारियों की शिकार हो गई। साहब की अपनी रंगीन दुनिया थी और मेम साहब की अपनी अंधेरी दुनिया। दोनों दरिया के दो किनारों की भांति साथ-साथ तो थे लेकिन उनके मध्य बहुत कुछ पानी के तेज बहाव की तरह निरंतर बह रहा था।
अगले दिन चन्द्रमखी हमें सौ-सौ हिदायतें देती नौकरों पर निगाह रखने की ताकीद करती अपने मायके चली गई। उसका पति नोकरी की व्यस्तता के कारण उसके संग नहीं जा सका था, इसलिए ड्राइवर ही उसे छोड़ आया था। हम दोनों ने उसके घर की पूरी हिफाजत और देखभाल रखने का उसे यकीन दिलाया था। और अब हम अपने कमरे में बैठे उसी के विषय में बातें कर रहे थे।
उसे मायके गए अभी दो ही दिन हुए थे। मैं ट्यूटोरियल से लौटकर आया तो देखा, पाशी बड़ी परेशानी में बल्कि गुस्से की हालत में भरी बैठी मेरा इंतजार कर रही थी। मेरे पहुँचते ही उसने हमेशा की तरह पानी का गिलास देने की बजाय अपना गुस्सा उगल दिया।
‘पता नहीं कैसा मर्द है यह कुत्ता, हरामजादा’ पाशी के मुँह से ‘हरामजादा’ शब्द सुनकर मुझ पर जैसे अपमान से बिजली गिर पड़ी। यह बिलकुल ही नया शब्द पाशी की निजी डिक्शनरी में शामिल हुआ था, पर उसका तमतमाया चेहरा और क्रोध में आपस में उलझ रही उसकी उंगलिरों की बेचैनी को देख, मैं समझ गया था कि मामला अति गम्भीर है। कहीं पाशी के साथ किसी ने सोचते हुए मेरे शरीर में कंपकंपी-सी दौड़ गई थी। पर शीघ्र ही अपने आप को संभालते हुए मैंने उसे दोनों कंधों से पकड़ कर झिंझोड़ते हुए पूछा, ‘क्या बात हो गई, खैरियत तो है? तू किसके बारे में बात कर रही है? कौन हरामजादा।’ घबराहट और परेशानी में मैं न जाने कितने प्रश्न कर गया था। अपनी घबराहट का अंदाजा मुझे जल्द ही हो गया क्योंकि पाशी को दिलासा-सा देते समय उसके कंधे मैंने इतनी जोर से दबा दिए थे कि दर्द के साथ खींझते हुए उसने मेरे दोनों हाथ झटक दिए। मैंने देखा, वहाँ गहरी लालिमा उभर आई थी। मैंने थोड़ा नरम पड़ते हुए पूछा, ‘सॉरी पाशी पर यह बता, तू आज किस पर बरस रही है।’ वह भी जरा संभल चुकी थी। अतः धैर्य से सड़े हुए लहजे में बोली, ‘ये मर्द सारे ही पता नहीं एक जैसे होते हैं मौके की तलाश में कुत्तों की भांति सूंघते घूमते हैं कि कब कोई मौका हाथ में आए तो बस।’ उसने दाँत पीसते हुए कहा, पर मेरा सब्र अब जवाब दे गया। मैं लगभग चीख ही पड़ा, ‘सच सच बक ना, क्या बात हुई? क्या तुझे किसी ने कुछ?’
उसने मेरी बात बीच में ही काटते हुए कहा, ‘इतनी हिम्मत है किसी में जो कोई मुझे कुछ कह सके। पर यह हमारा मकान मालिक बड़ा अफसर बीवी तीन दिन से अपनी बीमार माँ के पास गई हुई है और यह हरामी (पाशी ने दूसरी बार दाँत भींचते हुए यह शब्द इस्तेमाल किया था) अपनी बीवी की गैरहाजिरी में किसी बालकटी कंजरी को घर में लाया हुआ था, रंग-रेलियाँ मनाने के लिए।’
पाशी की बात सुनकर हालांकि मुझे बड़ी हैरानी हुई थी, पर फिर भी मैंने कोई सिरा पकड़ने की कोशिश में कहा, ‘हो सकता है उसकी कोई दोस्त, कोई जान-पहचान वाली या कोई रिश्तेदार ही हो। इतना बड़ा आदमी है। उसका सामाजिक दायरा भी तो उतना ही बड़ा होगा। हो सकता है, तुझे यूँ ही भ्रम हुआ हो।’ मैंने उसकी तसल्ली करनी चाही, पर वह तो जैसे मकान मालिक का सारा गुस्सा मुझ पर ही निकालने पर तुली हुई थी, ‘हाँ-हाँ, तुम भी तो मर्द ही हो। तुम तो उसकी तरफदारी करोगे ही। पर मैं कोई बेवकूफ हूँ? मैंने उन दोनों को गाड़ी में से उतरकर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए देखा था, दरवाजे की जाली से। तौबा-तौबा! कैसे एक दूजे की बाँहों में झूलते और लिपटे हुए चूमा चाटी करते अपने कमरे में घुस गए। सच बताऊँ? मुझे तो देखकर उबकाई आ गई थी। ‘पाशी सचमुच ही वाशबेसिन में जोर से थूक दिया। मैं इस स्थिति को अभी भी समझने का यत्न कर रहा था, इसलिए पाशी के सम्मुख पुनः संशय जाहिर किया, ‘उनका नौकर भी तो घर में ही होगा, क्या उसके सामने ही?’
वह पानी का गिलास भर लाई थी और मुझे जबरन पकड़ाते हुए बोली, ‘उनके कमरे में जाने के दसेक मिनट बाद मैंने नौकर को तेजी से बाहर जाते हुए देखा था। मैंने आवाज देकर धीमे से उसे बुलाया भी था, पर वह जानबूझ कर अनसुना-सा करके बाहर निकल गया और तब तक नहीं लौटा जब तक ये हरामी-हरामिन घर में से दफा नहीं हो गए।’ गुस्से में भरी बैठी पाशी ने सारा आँखों देखा हाल बयान कर दिया। मैं सोच रहा था कि बेड़ा गर्क हो इन कंजरों का जिन्होंने मेरी सुन्दर, सुशील, सद्व्यवहारी और मृदुभाषी बीवी की जुबान पर ‘हरामी’ और ‘हरामिन’ जैसे भद्दे और वाहियात शब्द ला धरे थे। लेकिन मैं जानता था, इसमें बेचारी बीवी का कोई दोष नहीं था। बल्कि परिस्थिति ही ऐसी थी। खासकर जब हम दोनों ने चन्द्रमखी को उसके घर की हर चीज की हिफाजत करने का वायदा किया हुआ था। पर क्या हम उसके घर की हिफाजत कर सके थे? क्या जवाब देंगे हम चन्द्रमुखी को?
‘मैं तो दीदी को सब बता दूंगी।’ पाशी गुस्से में बोली। उसका कोमल नारी मन दूसरी नारी पर होते अन्याय को बर्दाश्त नहीं कर सका था।
‘नहीं, पाशी नहीं। पति-पत्नी का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है। अगर आपस में विश्वास तिड़क जाए तो रिश्ते टूट जाते हैं। इसीलिए रिश्तों के भ्रम बने रहने चाहिए। हमें क्या फायदा चन्द्रमुखी को सब कुछ बताकर उसका घर तोड़ने में? हमें चार दिन यहाँ रहना है, चुप करके रह छोड़ परे।’
‘यही तो मैं पूछ रही हूँ कि रिश्तों की पवित्रता और नजाकत का अहसास क्या मर्दो को नहीं होता? अगर यही कुछ औरत करे तो?’ पाशी दाँत पीसते हुए पूछती है। पता नहीं क्यों उसकी बात सुन मुझे बेचैनी-सी होने लगती है और मैं बात को टालने के बहाने उससे स्ट्रांग-सी कॉफी की मांग कर बैठता हूँ। वह भरे मन से किचन में चली जाती है और मेरा ध्यान चन्द्रमुखी की तरफ चला जाता है।
मेरी हैरानी की तब कोई सीमा नहीं रहती जब अगले दिन भी मेरे लौटने पर पाशी मुझे बताती है कि आज भी साहब के साथ कोई दूसरी औरत आई हुई थी। तीसरे दिन भी पाशी ने ऐसा ही बताया मैं सोच रहा था कि क्या इस आदमी को इतनी भी शर्म नहीं कि घर में कोई किरायेदार भी रहते हैं। पर मैंने इसका उत्तर स्वयं ही खोज लिग। वह बेचारा सबह नौ बजे घर से निकलता है जबकि मैं सुबह सात बजे ही घर छोड़ देता हूँ। पाशी तो पूरा दिन घर से बाहर ही नहीं निकलती। जब वह रात में दस-ग्यारह बजे लौटता है, उस समय हम सो चुके होते हैं। उसके आने पर हमें तभी पता चलता है जब नौकर, उसका ड्राइवर और चपरासी उसे बाँहों में घसीटते हुए-से सीढ़ियाँ चढ़ाकर उसे ऊपर लाते हैं। स्वयं चलने या सीढ़ियाँ चढ़ने लायक तो वह उस समय तक रहता ही नहीं है। ऐसी स्थिति में उसे क्या मलूम कि घर में कौन रहता है और कौन नहीं। उसे बस अपने नौकर के बारे में ही पता होगा जिसे वह ऐसे अवसरों पर बाजार या कोई फिल्म देखने के लिए भेज देता होगा, कोई कोरा-सा नोट पकडा कर। अपनी आदत के अनुसार मैं इस वक्त भी हँस पड़ता हूँ, इन सफेदपोशों की मसरूफियत के बारे में सोचकर।
अगले पल मुझे उस बूढ़े खूसट अफसर पर गुस्सा आता है। रिटायर होने में दो साल रहे गए हैं साले के, पर फिर भी ऐसी रंगरेलियाँ! ईश्वर भी कितनी बेइंसाफी करता है कि उसकी मेहरबानियों के पात्र सिर्फ ये लखपति और करोड़पति ही होते हैं। कभी उसकी कोई कृपापात्र हमारे जैसों पर नहीं हो सकती? क्या हम उसके सगे नहीं हैं? पता नहीं गुस्से के साथ-साथ मुझे रश्क-सा क्यूँ आने लगता है। भीतर बहुत जलन-सी महसूस होती है। अब समझ में आ रहा है कि जब हम लोग नैतिक मूल्यों, समाज से खारिज हो रहे आदर्शों और फलाने-ढिंगाने की दुहाई दे-देकर हो-हल्ला मचाते हैं तो कहीं न कहीं हमें गुस्सा इस बात का होता है कि साला वह क्यों खा गया, उसकी जगह यह सब मुझे क्यों नहीं मिल रहा?
हमारी बेटी डिम्पी के एडमिशन कालोनी के ही एक बढ़िया स्कूल में हो गया। पाशी भी इसी सकूल में नौकरी करने की बात कई बार कर चुकी है। मैंने भी अपनी जान-पहचान के लोगों से इस बारे में बात की है, शायद कहीं कोई जुगाड़ बन जाए। चन्द्रमुखी भी वापस लौट आई है। बहुत उदास और पीली जर्द हुई वह आते ही पाशी के गले लग कर सिसक पड़ी थी-‘लगता है, मेरी माँ अब थोड़े ही दिन की मेहमान है। मन तो नहीं करता था आने को, पर घर।’ पता नहीं क्यों ‘घर’ कहते हुए उसकी जीभ अटक गई। मेरी और पाशी की नजरें भी आपस में मिलीं, पर घबरा कर झुक गई। चन्द्रमुखी ने माना हमारे चेहरों पर से कुछ पढ़ लिए था। लेकिन फिर बात को टालते हुए बोली-
‘मैं थोड़ा फ्रैश हो लेती हूँ, फिर बातें करेंगे।’ कहते हुए वह चली गई। मैंने पाशी को अच्छी तरह समझा दिया था कि वह भावुकता में ऐसी कोई बात न कर बैठे जिससे उनके घर में क्लेश पड़ जाए।
अगले दिन मेरा अवकाश था। पाशी सेवेरे-सवेरे तैयार होकर किसी स्कूल में इंटरव्यू देने चली गई। आजकल यही उसकी मसरूफियत है। डिम्पी भी स्कूल गई हुई है। मैं बेफिक्र-सा घर में बैठा हूँ। अचानक चन्द्रमुखी अन्दर आ गई। हमारे घर में आने के लिए उसे कभी दस्तक देने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी क्योंकि घर में इस समय सिर्फ पाशी ही होती है। पर आज पाशी की जगह मैं था। बनियान उतार कर मैंने कूलर चला रखा था और सामने टी.वी. पर कोई फिल्म चल रही थी। मेरे हाथ में रिमोट था, पर ध्यान फिल्म में बिलकुल नहीं था, अपितु मेरा दिमाग किसी गणित में उलझा हुआ था। बेध्यान होकर यूँ ही रिमोट के बटन दबाए जा रहा था। चैनल बदले जा रहे थे और मेरे खयालों के घोड़े सरपट दौड़ रहे थे। मेरी खोपड़ी के अन्दर का शैतान, शैतानी भरी योजनाएँ घड़ रहा था। पर इन शैतानी योजनाओं का ताना-बाना इतनी सूक्ष्मता और कलात्मकता से बुनता कि मेरी एक-एक हरकत क्लासिक स्पर्श बन जाए। जैसे कोई बुत-तराश कोई खूबसूरत मूर्ति तराशता है। छैनियों की नाजुक चोट से। अब मेरी कलात्मकता का इम्तिहान था। मैं मुस्करा पड़ा।
चन्द्रमुखी अन्दर तो आ गई, पर ठिठक कर द्वार में ही खड़ी हो गई। मैंने भी शर्मिन्दा-सा होने का नाटक करते हुए सामने टंगी स्लीवलैस टी-शर्ट पहन ली। ‘आ जाओ आ जाओ-प्लीज बैठो, खड़ी क्यों हो?’ मैंने कुर्सी की ओर इशारा किया और शीशे के सामने अपने बालों में ब्रश मारते हुए चोर निगाहों से उसकी तरफ देखा। वह झिझकती हुई-सी कुर्सी पर बैठ गई।
‘पाशी कहाँ है?’ उसने पूछा तो मैने हँसकर आजकल स्कूलों में होने वाले उसके इंटरव्यू के बारे में उसे बता दिया। अब वह थोड़ा नार्मल होकर बैठ गई।
‘मुझे बताना चाहिए था न, मैं तो बड़े आराम से उसको किसी भी सकूल में एडजस्ट करा सकती हूँ।’
फिर हम छोटी-छोटी बातों में मसरूफ हो गए। चन्द्रमुखी प्लेट में मुरब्बा लेकर आई थी। शायद उसके मायके के शहर की सौगात थी। मैंने आंवले का एक छोटा-सा टुकड़ा उठा कर मुँह में डालते हुए कहा, ‘बहुत मीठा है।’ मेरी नजरें उसकी नजरों से जा मिली। वह शरमा कर हँस पड़ी। ‘और लो न’ और मैंने ले लिया। फिर एक और। मुझे लगा कि अवर बहुत अच्छा है और इसका सही उपयोग करना चाहिए। क्लासिकल स्पर्श बड़े नर्म और हल्के ब्रश से दिए जाते हैं। मैंने उसके हाथ में से प्लेट स्वयं उसके सामने कर दी, ‘आप भी लो न’ वह खिलिखिलाकर हँस पड़ी। ‘वाह जी, बड़े चालक हो तुम तो मेरी ही चीज से मेरी मेहमान नवाजी? भई वाह प्रोफेसर साहब, तुम तो बड़े कंजूस निकले।’ उसका प्यार भरा उलाहना मेरी नसों में खून की रवानी बढ़ा गया। मैं मुस्कराता हुआ रसोई में से ‘सुंड’ (पिसी हुई सोंठ की पंजीरी) कटोरी भर लाया।
‘लो जी, हमारी ओर से यह सौगात, पर देखना यह बड़ी गरम चीज होती है कही।’ मैंने जानबूझ कर बात को अधूरा छोड़ा और उसके चेहरे के भाव परखने लगा। पर उसने बड़ी चतुरता से बात टालते हुए कहा, ‘अरे इतर्न गर्म मौसम में सुंड? कहीं पाशी दोबारा।’
नहीं-नहीं जी, तौबा करो। हमसे तो एक ही ठीक से नहीं संभाला जाता। दरअसल पाशी को कुछ दिनों से डेट के समय बड़ी दर्द होने लग गई थी। किसी ने उसे यह देसी इलाज बताया था। बस, इसीलिए।’
वह हँस पड़ी। मैं अपने तीर आजमाने लग पड़ा।
आप बताओ, मायके में सब ठीक-ठाक था? माँ जी का क्या हाल है अब?’
‘हाँ जी, माँ तो ठीक रही। तुम बताओ, मेरे पीछे सब कुछ ठीक रहा?’
‘हाँ जी, ठीक रहा, पर सब कुछ नहीं। मेरा मतलब….मेरा मतलब हमने आपके साथ वायदा किया था कि आपके घर की हिफाजत करेंगे पर।’ मैंने शर्मिन्दा-सा होने का स्वांग भर कर अटक-अटक कर कहा। मुझे यकीन था कि चन्द्रमुखी घबरा कर पूछेगी कि क्या हुआ? और फिर धीरे-धीरे उसे सारा किस्सा सुनाऊँगा। फिर वह जब सिसकने लगेगी तो उसे दिलासा दूंगा उसके आँसू पोचूंगा। फिर शायद इसीलिए मेरे शैतान मन ने पाशी को चन्द्रमुखी से कुछ भी बताने से रोक दिया था। यह सब कुछ मैं स्वयं, अपने ढंग से उसे सुनाना चाहता था। उसी कलात्मक ढंग से। अगर सब कुछ जान कर उसने टूटना ही था तो उसे संभालने वाला भी तो कोई चाहिए था। और मैं इस काम के लिए स्वयं को अधिक माहिर समझता था। परन्तु, चन्द्रमुखी न तो उछली, न हैरान हुई।
‘मैं सब जानती हूँ। तुम्हें भी मेरी तरह धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी।’ वह उठ कर जाने लगी तो मैंने आहिस्ता से उसका हाथ पकड़ लिए। उसने पलटकर मेरी ओर देखा तो मैंने अपने चेहरे पर बड़ी मासूमियत सजा कर दुःख भरे स्वर में कहा, ‘मेरे से आपका यह दु:ख यह अकेलापन यह घंटे घंट करके जहर पीने की सजा देखी नहीं जाती। आप क्यों सह रहे हो यह सब? क्यों नहीं अपने हालात से विद्रोह करते?’
चन्द्रमुखी की आँखें भर आईं और मैंने दिलासा देते हुए धीरे से उसे अपने सीने से लगा लिए। मुझे उम्मीद थी कि वह झटके से अलग होकर कमरे में से बाहर चली जाएगी और बाद में मुझे शर्मिन्दगी जाहिर करने के पता नहीं कितने स्वांग भरने पड़ेंगे। पर यहाँ तो परिस्थिति ही मेरी सोच के उलट हो गई। चन्द्रमुखी मेरे सीने से लगकर आँसू बहा रही थी और उसके हाथ मेरी कमरे के इर्द-गिर्द अनजाने ही कस गए थे। मेरे होंठों पर चिर परिचित मुस्कान थीं। अपने आप को पहली सफलता पर मुबारकबाद देने वाली मुस्कान! मैंने उसके बालों पर अपने होंठ रख दिए। पीठ पर कोमलता से हाथ फेरा और अपनी आंखें उसके सामने रगड़ते हुए उदासी भरे स्वरं में बोला, ‘चलो छोड़ा हौसला रखो। जहाँ इतनी जिन्दगी कट गई, बाकी भी कट जाएगी। वैसे मैं आपके हौसले की दाद देता हूँ। इतना दुख कोई औरत चुपचाप सह जाए और उफ्फ न करे, आप जैसों को ही संत कहा जाता है। आप सचमुच महान हो।’ और मैंने एक बार उसे थोड़ा कसकर सीने से लगा लिया।
मैंने आपको बताया न कि मैं जल्दबाजी में कभी कुछ नहीं करता। चन्द्रमुखी को सोने के पिंजरे में से निकाल कर अपनी बाँहों के घेरे तक लाने के लिए मुझे स्वयं को बहुत निखारना-संवारना पड़ा।
उसकी ही सिफारिश पर पाशी को एक प्राइवेट स्कल में नौकरी मिल गई। आजकल बच्चों के पेपर चल रहे थे जिस वजह से मेरी छुट्टियाँ थीं। पाशी अपने स्कूल में बिजी थी। डिम्पी अपने स्कूल और मैं घर में। पाशी को खुश रखने के लिए मैं नाश्ते से लेकर लंच तक का सारा खाना अपने हाथों से बनाकर रखता। किचन की टाइलें रगड़-रगड कर चमका देता। बर्तन चमका कर रैक में सजा देता। पाशी को आते ही ताजा फलों का जूस पेश करता तो वह निहाल हो जाती। कभी-कभी हैरानी में मखौल-सा भी कर जाती कि पति अगर पत्नी की बढ़-चढ़कर सेवा करनी शुरू कर दे तो समझो उसकी नीयत में कोई खोट आ गया है। मैं हँस कर टाल जाता।
चन्द्रमुखी दिन में अब अक्सर ही मेरे पास आ जाती। हम कभी फिल्म देखते, कभी ताश खेलते और कभी चैस। मैं कभी कोई उतावलापन, कोई बेहदापन जाहिर नहीं होने देता था। बेशक मन में बहत सी बेहदगियाँ उथल-पुथल मचातीं, पर मैं कमाल के जब्त के साथ अपने को संभाल लेता। मैं चाहता था कि जो भी हो, वह चन्द्रमुखी की तरफ से ही हो। मैं यह भी चाहता कि वह अपने जब्त के सारे बंधन तोड़कर स्वयं टूट कर बिखर जाए और फिर मेरी सांत्वना प्राप्त करने के लिए तडप कर मेरी बाँहों में ढेर हो जाए। और फिर सब कछ एक ही झटके के साथ न होकर, आहिस्ता-आहिस्ता, स्टैप वाई स्टैप, पूरी खूबसूरती और नजाकत के साथ हो, न कि जल्दबाजी या जाहिलपने के साथ। मैं धीरे-धीरे अकेले में उसके संग उसके पति की बेवफाई की बातें छेड़ कर उसको यह भी बता देता था कि जब वह घर में नहीं होती तो कोई न कोई स्वीट डिश उसके पति के लिए होम-डिलीवरी की तरह घर पहुँच जाती है। वह आह भर कर उदासीनता के साथ कहती कि यह तो कुछ भी नहीं। उसने कई बार इसी कमरे में, जहाँ पर अब हम किराये पर रहते हैं, अपने अफसर पति को बेगानी औरतों के साथ नाजायज हालत में देखा है।
‘आपके घर में होते हुए भी?’ मैंने हैरान होकर पूछा।
‘हाँ, दरअसल उन्होंने यह कमरा बनाया ही बाहरी लोगों से मेल-मुलाकात के लिए था। दफ्तर के काम से आए लोगों से वह यहीं मिलते थे। इन लोगों से मेरा किसी प्रकार का सम्पर्क होने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता था। नौकर ही चाय-पानी लेकर जा सकता था। वह तो मैंने सभी नौकरों को कभी पैसे, कभी कपड़े, कभी दीवाली-ईद पर गिफ्ट देकर अपने विश्वास में ले रखा था, तभी वे डरते-झिझकते मुझे ये सब बताते। पर जब उन्हें अहसास हो गया कि मेरी तुच्छ हस्ती से उन्हें कोई खतरा नहीं तो वे बेखौफ होकर मुझे सब कुछ बता देते। कई बार सीढ़ियाँ उतरते-चढ़ते मैं खुद बड़े अपमानजनक नजारे देखती पर।’
“पर अपने कभी विरोध नहीं किया? आखिर पत्नी हो आप उनकी। मेरे हाथ उसे सांत्वना दे रहे होते और वह अपना दुख खंगालती रहती।’ वह सख्त अफसर ही नहीं, सख्त पति भी हैं। मेरी इतनी हैसियत नहीं और न ही हिम्मत कि में उनके सामने जुबान खोलूँ। इसलिए मैंने सारा जहर अपने अन्दर ही संभाल लिया।
चन्द्रमुखी अपने जहर को संभाल कर रखने की बात कर रही है और मैं सोच रहा हूँ कि क्या अब वही जहर अपनी हदों से उछल कर बाहर बिखर जाने के लिए उतावला हो रहा है? और क्या मैं उसी जहर को शिव की तरह पी कर अपना कंठ नीला कर लेने की मुर्खता नहीं कर रहा? फिर मुझे इस मूर्खता में कोई महानता या त्याग नजर नहीं आ रहा। अपितु यह मेरा फितूर या यह कहूँ कि अनन्तकाल से मर्द के अन्दर के अहंकार का कमीनापन ही है कि हमदर्दी के नाम पर अपनी पत्नी के होते हुए चतुराई के साथ ऐसी औरत जिसके बच्चे मेरी उम्र से थोड़े ही छोटे होंगे, के साथ…पल भर के लिए मुझे ग्लानि हुई। पर तभी मुझे यह अहसास हो आया कि जिस औरत के बारे में सोच कर मैं हीनभावना महसूस कर रहा हूँ, वह तो स्वयं एक मछली की तरह सूखी रेत पर नहीं, वरन मेरी गोद में छटपटा रही थी।
उन्माद के इन क्षणों में हमें घड़ी की ओर देखने का भी होश न रहा कि अचानक सीढ़ियों पर ठक-ठक की आवाज हुई। पाशी की हाई हील की सैंडिल की विशेष ठक-ठक भला मैं कैसे न पहचान लेता? ‘पाशी!’ घबराहट के साथ मेरे मुँह से निकला और चन्द्रमुखी किसी गेंद की तरह उछल कर कुर्सी पर जा बैठी। आनन-फानन में उसने अपना मुँह, कपड़े, बाल लिपिस्टक आदि यथाशक्ति संवार लिए। पर नंगा जैसे अपने ही नंगेज से शर्मासार हो जाए, हम दोनों की ऐसी ही हालत थी। हमारे कमरे का दरवाजा पहले कभी बन्द नहीं रहता था, पर आज वह बन्द था। शुक्र था कि कुंडी नहीं लगाई थी। हम दोनों अन्दर और पाशी बाहर दरवाजे पर हैरानी की मूरत बनी खड़ी थी। चन्द्रमुखी ने शीघ्रता से अपने घर से बना कर लाए बैंगन के पकौड़ों वाली प्लेट उठा ली जिसकी तरफ अब तक हमारा ध्यान ही नहीं गया था।
‘आज नौकर से बैंगन के पकौड़े बनवाए थे, सोचा एक साथ बैठकर खाते हैं। वही लेकर इधर आ गई थी।’ चद्रमुखी ने यद्यपि सहज होने की कोशिश की थी लेकिन उसकी आवाज की लर्जिश को मैं महसूस कर रहा था। पाशी ने मुस्करा कर एक पकौड़ा प्लेट में से उठा लिए। मुझे लगा जैसे पाशी की नजर एक पल के लिए चन्द्रमुखी के बालों पर अटकी है, पर शायद यह मेरा वहम ही हो।
‘मैं चाय बना कर लाती हूँ।’ कहते हुए पाशी किचन में चली गई। मैंने और चन्द्रमुखी ने एक दूजे की ओर देखकर ईश्वर को याद किया कि उसने आज हम दोनों की इज्जत रख ली।
उस रात मैंने महसूस किया कि पाशी रात भर करवटें लेती रही थी। बार-बार वह उठकर बैठ जाती। कभी बाथरूम में जाती और कभी फ्रिज में से पानी का गिलास भर कर पीती।
‘क्या बात है पाशी? तू ठीक तो है?’ मैं भी उठ बैठा।
‘पता नहीं क्यों बेचैनी-सी हो रही है। सिर में अजीब सा दर्द हो रहा है जैसे बी.पी. लो हो गया हो।’ उसने सिर को दोनों हाथों से दबाते हुए कहा।
‘बी.पी. लो?’ मैंने हैरानी से पूछा, क्योंकि पाशी बी.पी. हाई बताती तो हैरानी वाली बात नहीं थी, पर लो उसके बाद भी कई बार पाशी को मैंने सिर हाथों में लेकर दबाते देखा। जब रहा न गया तो पूछ ही बैठा कि आज इस मर्ज ने उसे क्यों घेर लिए है।
‘पता नहीं कल परसों भी स्कूल में बहुत तेज सिरदर्द हुआ था। डॉक्टर को भी बताया। उसने कहा कि मेरा बी.पी. लो है। दवा खाने पर ठीक हो गया था, पर।’
“पर पाशी तूने मुझे बताया नहीं।’ मैंने शिकायत की।
‘यह कोई इतनी बड़ी बताने वाली बात नहीं थी। सिरदर्द तो आम ही होते रहते हैं। इसमें ढिंढोरा पीटने वाली कौन सी बात थी।’ पाशी उठकर टेबलेट ढूंढने लग पड़ी।
मैं कॉफी बनाकर लाता हूँ। लो बी.पी. में रेस्ट करों।’ कहते हुए मैं किचन में जाने लगा तो उसने रोक लिए।’ आधी रात को कॉफी पीकर बाकी रात नींद कहाँ आएगी। मैंने टेबलेट ले ली है न। रिलीफ मिले तो नींद भी आए।’
वह लेट गई थी। मैं भी कुहनियों के बल लेटकर उसका माथा सहलाने लगा। उसका माथा सहलाते हुए मेरा मन भटकने लगा। दो आकार आपस में एकीकृत होते दिखाई देने लगे। पाशी चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखी पाशी। मैंने दिमाग को झटक कर अपना ध्यान हटाने की कोशिश की। पाशी शायद सो चुकी थी। मुझे अपना शरीर थका-टूटा-सा महसूस हो रहा था और ऐसी स्थिति में भी अपनी आदत के अनुसार मैं मन ही मन हँस पड़ा था अपनी इस थकवट के बारे में सोचकरं थकावट हो भी क्यों न? दो-दो शिफ्टों में काम करना कोई सरल भी तो नहीं होता।
सयाने लोग सच ही कहते हैं कि मुजरिम बेशक कितना भी चालाक क्यों न हो, पर जाने-अनजाने अपने जुर्म के निशान किसी न किसी तरह छोड़ ही जाता है। मैं मैथ्स का एक अनुभवी ट्यूटर हूँ इसलिए हर वक्त जोड़-घटाव, गुणा-भाग की ही योजनाएँ बनाता रहता हूँ। पर कभी-कभी ये जोड़-घटाव, गुणा-भाग अपने आप में इस तरह गुत्थम-गुत्था हो जाते हैं कि सारा फार्मूला ही गलत सिद्ध हो जाता है। डिम्पी के पेपर खत्म हो चुके हैं और आजकल वह घर पर रहती है। पाशी को स्कूल के बच्चों का रिजल्ट बनाने के लिए रूटीन से स्कूल जाना पड़ता है। मेरा भी नया सैशन अभी शुरू नहीं हुआ, इसलिए घर पर ही रहता हूँ।
डिप्पी टी.वी. पर कार्टून देखने में मस्त है। मैं कुछ सोचकर उठ जाता हूँ, ‘डिप्पी, बहुत देख लिया टी.वी.। अब थोड़ा आराम कर, आँखें खराब हो जाएँगी। मैंने रिमोट हाथ में ले लिए तो वह मचल उठी, ‘पापा, अभी तो इलेवन ओ क्लॉक हुआ है। प्लीज ये टौम एंड जैरी वाला कार्टून खत्म कर लेने दो, फिर मैं सो जाऊंगी।’ मैंने हिसाब लगाया। अभी यह कार्टून आधे घंटे का और शेष था।
‘दीप, तेरा फोन है।’ चन्द्रमुखी की शहद भरी आवाज आती है। मैं डिम्पी की ओर देखता हूँ। डिम्पी बेटा, इलेवन थर्टी पर टी.वी. बन्द कर देना। मैं फोन सुनने ऊपर जा रहा हूँ ठीक है।
‘ठीक पापा।’ कह कर डिम्पी फिर चूहों-बिल्लियों में मस्त हो गई।
चन्द्रमुखी के कमरे में ए.सी. फुल स्पीड पर है। लॉबी में गरमी होने के कारण वहाँ फोन सुनने के बजाय वह मुझे अपने ठंडे कमरे में ही फोन सुनने के लिए बुला लेती है। मैंने देखा, वह बड़े ही रिलैक्स मुड में पलंग पर लेटी हुई है। दुपट्टा अलग पड़ा है। बाल शायद उसने अभी-अभी धोये हैं। शेम्पू और कंडीशनर की महक मुझे जैसे इशारे कर रही है। मैंने एक नजर उसकी तरफ देखा। हल्की ग्रे शेड की लिपिस्टिक उसकी सांवली रंगत पर फब रही है। मैं फोन पर बात तो कर रहा हूँ, पर हाथ मेरे कहीं और व्यस्त हो जाते हैं। ऐसे अवसर पर वक्त को पता नहीं कैसे पंख लग जाते हैं। चन्द्रमुखी का नौकर भी बाजार गया हुआ है। जाते हुए गेट ऊपर से बन्द करके चला गया है। इसलिए बाहर से आने वाला कोई भी व्यक्ति कुण्डी हिला कर आसानी से गेट खोल सकता है। पर इस समय हमारा ध्यान उधर कहाँ?
ध्यान हमारा तभी उखड़ता है जब अपने कमरे में से पाशी द्वारा चीखकर पुकारा गया मेरा नाम हमारे कानों में गूंजता है। क्षणांश, हम घबरा उठते हैं और फुल ए.सी. में भी मेरे माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठती हैं। मैं माथा पोंछते हुए अपने कमरे की तरफ दौड़ता हूँ। पाशी क्रोध में मेरी ओर देखती हुई पूछती है कि मैं डिम्पी को अकेला छोड़कर वहाँ क्या कर रहा था। ‘मेरा फोन आया था डार्लिंग, वही सनने गया था।’ पहली बार आज मेरे मुँह से पाशी के लिए ‘डार्लिंग’ शब्द निकलता है। चन्द्रमुखी के लिए तो सम्बोधन ही यही है।
‘कितने बजे गए थे दीप?’ वह तीखी नजरों से सवाल करती है। मेरी नजर घड़ी पर से होती हुई डिम्पी के चेहरे पर पड़ती है तो मुझे झटका-सा लगता है। डिम्पी का चेहरा रो-रो कर सुजा हुआ था। पता नहीं कितनी देर वह रोती रही है। मैं पाशी के सवाल को नजरअंदाज कर डिम्पी को पुचकारने के लिए उसे बाँहों में उठा लेता हूँ, क्या हुआ मेरे बच्चे को रो क्यों रही है?’
‘पापा, इलेवन ओ क्लॉक आप आंटी के घर गए थे। मैं कार्टून देख रही थी कि अचानक टी.वी. में से निकलकर टीम एंड जैरी वाला टीम ‘चूहा’ कमरे में दौड़ने लगा पापा! कभी टी.वी. के पीछे, कभी कुर्सी के पीछे वह बेड पर भी चढ़ने लगा था पापा!’ वह फिर हिचकियाँ भरने लग गई तो पहली बार मेरे अन्दर का शैतान मासूम-सी बेटी के सामने अपराधी बन कर खड़ा हो गया। दोनों हाथ कानों को लगा कर ‘सॉरी बेटा वो दरअसल’ मैं कुछ बोलने ही जा रहा था कि पाशी ने बाथरूम में घुस कर जोर से दरवाजा बन्द कर लिए था। अन्दर से फुल शॉवर में से पानी की तेज फुहार के गिरने की आवाज मेरे मन को बेचैन कर रही थी। मैं डिम्पी को बाँहों में उठाकर बाजार में आ गया। इस वक्त स्थिति को टालने के लिए इससे अच्छा हल मुझे नहीं सूझा था।
पर पाशी यूँ खामोशी के साथ बाथरूम में शॉवर के नीचे क्यों चली गई? सामान्य औरतों की भांति उसे मेरे पर चीखना-चिल्लाना चाहिए था। सड़क पर चलते हुए एकाएक बचपन का एक दृश्य मेरी आँखों के सामने घूम गया। छोटा ही था मैं उस समय। हम सभी घर के किसी रिश्तेदार के विवाह में गए हुए थे। मेंहदी की रात थी। हर तरफ हंगामे जैसी हालत। ढोल बज रहा था। भंगड़ा पड़ रहा था कि अचानक रंग में भंग पड़ गई। मेरे डैडी ने यार-दोस्तों के साथ मिल कर देसी दारू खूब चढा ली थी और रिश्ते में लगती अपनी किसी भाभी को छेड़ बैठे। खूब शोर मचा। मम्मी तो गुस्से में कितने ही महीने मायके में जा बैठी थी। फिर धीरे-धीरे यह बात भी निकल पड़ी कि डैडी का उस भाभी के साथ तब से चक्कर चल रहा था, जब से वह ब्याह कर इस गाँव में आई थी। पर डैडी का सब्र छलक पड़ा था विवाह के ढोल-ढमाकों में देसी ठर्रा पीकर। मम्मी बड़ी मुश्किल से सौ-सौ शर्ते रखने के बाद मायके से वापस लौटी थी। मुझे याद है, मम्मी ने आते ही बरामदे में खड़े होकर हम चारों बहन-भाइयों को बाँहों में समेटते हुए गुस्से में कहा था ‘दीपे के डैडी, यह न सोचना कि मैं बुद्ध हूँ और कुछ जानती नहीं। मैं तो शुरू से जानती थी इस पकती हुई खिचड़ी के बारे में। पर मैं अपने छोटे-छोटे बच्चों की खातिर चुप रही। पर अब मैं आखिरी बार तुम्हें सुना रही हूँ, अगर दोबारा ऐसी कोई हरकत हुई तो मैं अदालत में जाकर फैसला करवाऊँगी। बचपन का यह सीन याद करके मेरा शैतान मन गुस्सा या शर्मिन्दा होने के बजाय अपनी आदत अनुसार फिर मुस्करा पड़ा। आज अगर मम्मी-डैडी जिन्दा होते और उन्हें मेरी बेहूदगियों का पता चलता तो क्या होता? डैडी शायद मूंछों ही मूंछो में मुस्कराते हुए कहते- ‘शेर का बेटा शेर ही निकला साला।’ और मम्मी उस दिन की तरह ही कमर पर दोनों हाथ टिका कर गरजते हुए कहतीं-चंदरे (दुष्ट)! तूने साबित कर दिया कि तू किस बाप का पुत्तर है?’ इस दृश्य की कल्पना करते ही मेरा मुँह से जैसे ठहाका निकल गया। कोई किस बाप का बेटा है. भला यह बेचारा बाप कैसे दावा कर सकता है। वह तो बस माँ ही दावा कर सकती है जिसे स्वयं पता होता है। अच्छा है, मगर आज जैसा लगा, डी.एन.ए. टेस्ट पहले नहीं होता था, नहीं तो इस सृष्टि पर हर पल ही भयानक उथल-पुथल होती रहती।
बाजार से डिम्पी को छोटा-मोटा सामान लेकर देते हुए काफी समय बीत गया। वापस लौटते हुए मैं सोच रहा था कि अब शायद घर पहुँचते ही पाशी मुझ पर बरस पड़ेगी। मन ही मन मैंने उसकी ओर से किए जाने वाले प्रश्नों का कयास लगाते हुए उत्तर खोजने की कोशिश की। लेकिन यदि पाशी भी मम्मी की तरह शर्ते रखने लग पड़ी तो? खैर, घर आ गया। पर यहाँ तो सब कुछ ही मेरी सोच के उलट था। पाशी कोई टेबलेट खाकर कूलर के आगे सो गई। मैं सोचने लगा कि इन पढ़ी-लिखी माडर्न स्त्रियों की मानसिकता कैसी हो गई है? क्या स्टेटस कॉन्शस होने के कारण ही वे किसी भी असहाय स्थिति को जहर की भांति पी लेने के लिए मजबूर हैं? मुझे अपनी माँ और उस जैसी अनपढ़ औरतें अच्छी लगी जो ऐसी स्थिति में रोना-पीटना करके भड़ास निकाल लेती थी। और फिर गरज-बरस कर शान्त भी हो जाती थीं। पर आजकल की औरतें चीखने-चिल्लाने की बजाय एक घुटन भरी खामोशी का वातावरण सृजित कर टार्चर करने लग जाती हैं। मुझे याद आया, मैंने किसी पुस्तक में ‘चाइनीज मैथड ऑफ टॉर्चर’ पढ़ा था। लिखा था कि चाइना में सब से संगीन सजा के तौर पर अपराधी का सिर मुंडा दिया जाता था। बिलकुल सफाचट! फिर उसे किसी कुर्सी पर बिठाकर उसके सिर के ऊपर पानी का घड़ा इस प्रकार टांग दिया जाता था कि पानी की तुपका एक-एक करके कुछ-कुछ अंतराल पर अपराधी की गंजी खोपडी पर गिरता रहे। ठंडे बर्फ सरीखे पानी के तुपके के गिरने के बाद से अगले तुपके के बीच जो मानसिक कष्ट वह अपराधी भोगता था, वह किसी फांसी की सजा से कम नहीं था। अपितु पल-पल बाद मौत की सजा थी। क्या यह खामोशी भी उसी चाइनीज मैथड ऑफ टॉर्चर जैसी असहाय सजा नहीं?
अगले दिन पाशी ने भी छुट्टियाँ होने के कारण घर वापस जाने का फैसला कर लिए।
“पर पाशी, मेरी ट्यूशनें तो अब शुरू होने वाली है मैं किस तरह?’ परेशानी में मैं कह बैठा!
‘तुम्हें कौन मजबूर कर रहा है चलने को। तुम बेशक यहाँ रहो। बस, डिम्पी को संग लेकर जा रही हूँ।’ वह अपना और डिम्पी का सामान पैक करने चली गई। अपने कमरे में मैं अकेला रह गया और ऊपर वाले कमरे में चन्द्रमुखी। पता नहीं क्यों मुझे इस खामोशी से डर-सा लगने लग गया था और कमरे में से निकल बाहर खुली सड़कों पर मैं विचरने लगा था।
पाशी डिम्पी को लेकर चली गई थी। घर खाली-खाली लग रहा था। मैं घर से निकलकर अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला और ताजा-सा होकर नए जोश के साथ अपनी रौ में आ गया। सेवेरे हल्का-सा नाश्ता करने के बाद मैंने आराम से नहा-धोकर शेव बनाई, वैल ड्रैस होकर परफ्यूम छिड़का और टी.वी. ऑन करके बैठ गया। तभी दरवाजे पर ठक-ठक हुई। सामने चन्द्रमुखी खड़ी थी। हाथ में कलाकन्द की पलेट लिए। वह खुद भी निखरी-निखरी कलाकन्द के टकडे जैसी ही ताजा लग रही थी।
‘आज मेरी शादी की सालगिरह है।’ कहते हुए वह प्लेट रख कर चली गई। कल जाते समय पाशी उससे बड़े प्यार से मिल कर गई थी। जाते-जाते उसका चन्द्रमुखी को मेरा ध्यान रखने के लिए कहना मेरे लिए आश्चर्य भरा व्यवहार था। लेकिन फिर भी मैं इस सोच से बेपरवाह हो गया। चन्द्रमुखी के नौकर को बाहर जाते देख मैंने पूछ लिए कि किधर जा रहा है।
‘आज मेम साब की मैरिज एनवर्सरी है। उन्होंने मुझे फिल्म देखने के लिए पैसे दिए है। बाबूजी आज मैं शाहरुख खान की फिल्म देलूँगा।’ कहते हुए वह खुशी-खुशी सीढ़ियाँ उतरता चला गया।
मुझे अपनी अशिष्टता का अहसास हुआ। चन्द्रमुखी इतनी मेहनत से सज-संवर कर मुझे अपनी शादी की सालगिरह की सूचना देने आई थी, पर मैं तो उसे बधाई भी न दे सका। मैं एक बार फिर परफ्यूम का स्प्रे अपनी बगलों में करके उसके कमरे में चला गया। हमेशा की तरह वह अपने ए.सी. कमरे में लापरवाही से लेटी हुई थी, पर उसकी आंखों में उदासी थी।
‘चन्द्रमुखी’ मैंने करीब जाकर उसे छूते हुए हौले से पुकारा। उसने शिकायत भरी नजरों से मेरी ओर देखा, पर बोली कुछ नहीं।
‘चन्द्रमुखी, तू सोचती होगी कि मैंने तुझे बधाई नहीं दी। पर मेरी जान, तू ही बता कि मैं तुझे बधाई कैसे दे सकता हूँ। क्यों मैं नहीं जानता कि इस शादी ने तुझे कितना दर्द दिया है? क्या मैं तेरे दर्द से अनजान हूँ?’ मेरी ये भावुक बातें चन्द्रमुखी के चेहरे पर नाराजगी की जगह उदास-सी कोमलता ले आई। उसके अधरों पर उंगली फेरते हुए मैंने कहा-‘तुझे पता है कि शादी के नाम पर ही तू मुझे सलाखों के पीछे कैद कोई मासूम हिरनी लगती है मुझे दुख होता है चन्द्रमुखी तू ये सलाखें तोड़ क्यों नहीं देती? आजाद क्यों नहीं हो जाती एकाकीपन के इस नरक कूड से? क्यों पी रही है यह जहर मेरी जान?’ मैंने स्वयं को उसकी गोद में गिरा-सा लिग था और आँखें उसकी आँखों में बने अक्स को देखने में व्यस्त हो गई थीं। उसकी नरम उंगलियाँ मेरे बालों में फिरने लगीं।
‘दीप, जिस भयानक जहर को मैंने आज तक चूंट-घूट करके अपने अन्दर जज्ब किया है, उसका तोड़ उससे भी तीखे जहर से ही होना था। इसलिए मैंने उस जहर के तोड़ के लिए दूसरे जहर का आविष्कार कर लिए। जानता है क्या?’ उसने मेरे चेहरे पर झुकते हुए पूछा। ‘बता।’
‘तू… तू है उस जहर का तोड़! उस जहर को काटने के लिए मैंने इस जहर को पी लिया। यह भी तो एक भटकन ही है न दीप? पति की प्यारी, ठुकराई हुई मैं प्रेमी की बाँहों में सुकुन खोज रही हूँ। पर मैं क्या करती दीप? कोई औरत कभी अपने पति को किसी दूसरी औरत की बाँहों में देखना सहन नहीं कर सकती। जहाँ वश न हो, वहाँ चुप रह कर ही जहर के चूंट भरने पड़ते हैं। पर कभी न कभी यह जहर अपनी सीमा से उछल कर प्रलय तो ला ही देता है। जानते हो, मैं कितनी मानसिक बीमारियाँ कितना डिप्रैशन भोगती रही थी। जब अपने पति को दूसरी औरतों के साथ खिलवाड़ करते देखती थीं हर रात उसके कपड़ों में से दूसरी औरतों के अलग-अलग परफ्यूमों की महक मुझे पागल कर देती थी। मैं भी तो उसके साथ जिन्दगी भर का ही साथ निभाती रही हूँ। फिर मुझे किस बात की सजा मिली? मैं भी तो इन्सान ही हूँ न दीप! कब तक जहर पीती रहूँ? पति की बेवफाई का दर्द मैं प्रेमी की बाँहों में भुलाने के लिए मजबूर हूँ दीप नहीं तो मेरा मानसिक तनाव यह डिप्रेशन मुझे पागल कर देगा। तुझे क्या बताऊँ, यह भटकन कितनी भयानक सजा है।’
चन्द्रमुखी पता नहीं क्या-क्या कह रही है, पर उसके द्वारा बार-बार दोहराया गया शब्द ‘डिप्रैशन’ बम बनकर मेरे जेहन में फट रहा है। “पति की बेवफाई का दर्द, मैं प्रेमी की बाँहों में भुलाने के लिए मजबूर हूँ। नहीं तो यह डिप्रेशन’ मझे लगता है. मानो कमरा एकाएक गोल-गोल घमने लग गया है। मेरे आज तक के आजमाये जोड़-घटाव, गुणा-भाग सब हवा में एक भद्दा-सा नाच नाचने लग गये हैं। कोई फार्मूला मेरे काबू में नहीं आ रहा। सब कुछ अस्त-व्यस्त और तहस-नहस सा होता जा रहा है। चन्द्रमुखी के स्थान पर मुझे पाशी नजर आ रही है। पाशी का उस दिन स्कूल से लौटकर अचानक हमें कमरे में अन्दर दरवाजा बन्द करके बैठे देखना उसका सिरदर्द गोलियाँ बी.पी. लो होना मेरा सिर फटने लगा है। क्या पाशी को भी डिप्रेशन है? तो क्या पाशी भी…????
‘पाशी!’ मैं जैसे चीख पड़ता हूँ। कोमल और रोमांटिक भावनाओं में विचर रही चन्द्रमुखी अचानक मानो बिच्छू के डंक से चौंक पड़ती है। पर मैं उसकी परवाह किए बिना वहाँ से दौड़ पड़ता हूँ। कुछ ही देर बाद, बैग में कपड़े डाल मैं कमरे में से निकलता हूँ। चन्द्रमुखी दरवाजे पर पत्थर का बुत बनी खड़ी है। कमरे में से निकलते समय मेरे हाथ खुद-ब-खुद बाहर से कमरे का दरवाजा बन्द करने के लिए उठते हैं, पर फिर कुछ सोचकर मैं दरवाजा खुला छोड़कर तेजी से गेट से बाहर हो जाता हूँ।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
