aalasi gadha
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

एक गाँव में चिंतन नामक व्यक्ति था। उसने अपना व्यापार चलाने के लिए एक गधा खरीदा, उस गधे का नाम बाली रखा। हर दिन गाँव से शहर को कपास बेचने जाता था। कपास के आठ थैले बाली के ऊपर लाद कर जाता था। घर आते ही बाली को पेट भर खिलाता था। क्योंकि बाली एक चिंतन के व्यापार का बड़ा हिस्सा था। उसकी बहुत देखभाल करता था।

हर दिन नगर जाते समय बीच में एक नदी पड़ती थी। एक दिन चिंतन को कपास की कीमत कम मिली, निराश मन से लौट रहा था। रास्ते में उसका मित्र कुंदन मिला। क्यों चिंतन बहुत निराश मन से लौट रहे हो, व्यापार ठीक से नहीं हुआ क्या? तो चिंतन ने कहा, व्यापर में कीमत ठीक नहीं मिली। यह सुनकर मित्र ने सुझाव दिया। कपास के बजाय नमक का व्यापार आजकल ज्यादा चल रहा है, वही कर लो। तो गधा सोचने लगा पहले ही यह भार उठा कर थक जा रहा हूँ, ऊपर से यह व्यक्ति नमक का सुझाव दे रहा है, कपास की तुलना में नमक के थैले का भार तो ज्यादा होता है। दूसरे दिन मालिक ने नमक के आठ थैले बाली के ऊपर लादे और चलने लगा। बीच में नदी आई। नदी में पानी ज्यादा था। भार लेकर चलते-चलते बाली का पैर फिसल गया और बाली नदी में बैठ गया। किसी तरह चिन्तन ने खींचकर बाहर निकाला।

नमक के थैले भीग गए, चिंतन बाली को कहने लगा, तू तो बच गया ठीक हुआ। मगर नमक काम का नहीं रहा कहकर चिंतन थैले वहीं पर फेंक कर दोनों घर वापस आये। बाली सोचने लगा इस भार से छुटकारा मिला। दूसरे दिन फिर उसी तरह बाली के ऊपर नमक के थैले रखकर नगर जाने लगा। रास्ते की नदी में उस दिन पानी कम था। चिन्तन बाली को लेकर जाने लगा। बाली कहने लगा कि हे भगवान! आज पानी कम है अभी नगर तक जाना पड़ेगा, यह सोच कर बाली नदी में बैठ गया। फिर से चिंतन वह थैले छोड़कर घर वापस आया। तीसरे दिन भी बाली ने उसी प्रकार किया तो चिंतन सोचने लगा कि कहीं बाली जान-बूझकर तो नहीं कर रहा है? यह दिन-ब-दिन बहुत आलसी होता जा रहा है। चिंतन ने इस बार एक उपाय किया। उसने बाली के ऊपर नमक की जगह कपास के थैले लाद दिए और उसे नगर की ओर ले चला। नदी आते ही बाली फिर से रोज की तरह पानी में बैठ गया और सारा कपास भीग गया, कपास का भार और अधिक हो गया।

बाली को उस दिन दुगना भार उठाकर नगर तक जाना पड़ा। बाली ने आते वक्त सोचा कि यह मालिक मुझे छोड़ने वाला नहीं है। आज के बाद मैं कभी भी नदी में नहीं बैलूंगा। फिर रोज बाली पहले की तरह आलस छोडकार चिंतन के साथ नगर जाने लगा। इससे मालिक को और गधे दोनों को फायदा हुआ। उसी तरह इंसान को भी आलस्य छोड़कर मेहनत करते रहना चाहिए।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’