सीमा खिड़की से आती गुनगुनी धूप का आनन्द लेने के लिए खिड़की के पास बैठी थी। नई दिल्ली के इस नये घर में, वह अपने पति और बेटे के साथ हाल ही में शिफ्ट हुई थी। सीमा यूं ही कुछ सोच रही थी, कि तभी उसकी नजर पास से गुजरते बच्चों की टोली पर गई। बच्चे, एक बहुरूपिये के पीछे भाग रहे थे। सीमा का बेटा नमन भी उनमें से एक था। सीमा खुश थी, कि नमन ने बहुत जल्द नये दोस्त बना लिये थे।

सीमा एकटक उस बहुरूपिये को देखने लगी। सिर पर जोकरनुमा टोपी, रंग-बिरंगे कपड़े, चेहरे पर ढेर सारा मेकअप, जिससे उसका चेहरा पहचानना मुश्किल था। बहुरूपिया अजीब-अजीब हरकतें करता, जिसे देख कर बच्चे लोट-पोट हो जाते। सीमा ने ध्यान से बहुरूपिये की आंखों में देखा, तो वह सन्न रह गई। उसे ना जाने क्यों बहुरूपिया जाना-पहचाना सा लगा।

वह घर से बाहर निकल आई और छुपकर बहुरूपिये को देखने लगी। काफी पास से देखने के बाद, उसे महसूस हुआ कि वह इस बहुरूपिये को पहचानती है। पर… आखिर कौन? वह दिल्ली में नई है और पहली बार ही यहां आई है। सीमा ने फिर से एक बार बहुरूपिये की बड़ी-बड़ी आंखों में ध्यान से देखा, ‘आकाश…! बहुरूपिये को पहचानते ही सीमा जैसे अपने होश खो बैठी। सीमा बहुरूपिये से कुछ पूछ पाती, तब तक वह नाचता-गाता वहां से चला गया।

सीमा को यकीन नहीं हो रहा था, कि वह बहुरूपिया आकाश ही था। आकाश और सीमा मुंबई में, एक ही कॉलेज में, साथ-साथ पढ़ते थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी। सीमा, मन-ही-मन आकाश को पसंद भी करती थी, पर आकाश तो शैलजा पर फिदा था। उसके लिए शैलजा ही उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी। शैलजा भी आकाश से उतना ही प्यार करती थी। दोनों का प्यार पूरे कॉलेज में मशहूर था। दोनों पढ़ाई पूरी करने के बाद शादी करने वाले थे। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया, कि आकाश की ये हालत हो गई। उसे, बहुरूपिया बनना पड़ा।

सीमा को अपने मन में चल रहे सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं मिल रहा था। और वह आकाश की इस हालत की वजह जानने के लिए बेचैन हो उठी।
सहसा उसे ख्याल आया, कि उसके कॉलेज की एक सहेली स्वीटी, दिल्ली में ही थी। शायद, स्वीटी को इसका कारण पता हो। सीमा ने तुरंत स्वीटी का नंबर मिलाया। स्वीटी शहर में ही थी और वह अगले दिन उससे मिलने के लिए राजी भी हो गई।

दूसरे दिन सीमा बेसब्री से स्वीटी के आने का इंतजार कर रही थी, कि तभी डोर बेल बज उठी। सीमा ने जाकर दरवाजा खोला, स्वीटी को देखते ही, सीमा ने उसे गले लगा लिया। दोनों सहेलियां कॉलेज के बाद आज ही मिल रही थी। स्वीटी भी सीमा से मिलकर काफी खुश थी।

दोनों सहेलियां देर तक गप्पें करती रहीं। एक दूसरे की शादी-शुदा जिंदगी के बारे में पूछती-बताती रही। कुछ देर बाद सीमा ने वह बात छेड़ ही दी, जिसे जानने के लिए वह अत्यधिक व्याकुल थी। ‘स्वीटी, तुम्हें आकाश याद है। जो कॉलेज में हमारे साथ ही पढ़ता था।

‘हां, अच्छी तरह से। पर, तुम उसके बारे में क्यों पूछ रही हो। वह भी कॉलेज खत्म होने के छह सालों के बाद। स्वीटी ने अपनी जिज्ञासा जाहिर की। स्वीटी की बात का कोई जवाब देने के बजाए, सीमा ने स्वीटी को आकाश की वह तस्वीर दिखाई, जो उसने कल ही खींची थी। स्वीटी हक्की-बक्की सी आकाश की उस तस्वीर को देखने लगी। आकाश के साथ क्या बीता था, ये वह अच्छी तरह जानती थी। पर इन सबके बाद आकाश की ऐसी दुर्दशा होगी, ये उसने कभी नहीं सोचा था।

‘स्वीटी, आकाश के साथ ऐसा क्या हो गया, जिसकी वजह से उसे बहुरूपिया बनना पड़ा। और आकाश, वह तो मुंबई में ही था ना, फिर अचानक, दिल्ली कैसे आ गया? वह भी, इस रूप में। सीमा ने फिक्र के साथ स्वीटी से पूछा। स्वीटी ने एक लम्बी सांस लेते हुए बोलना शुरू किया, ‘कॉलेज खत्म होने के साथ ही, जैसे, आकाश के जीवन से खुशियां भी खत्म हो गई। शैलजा के प्यार में बेइंतहा पागल आकाश, शैलजा से शादी करना चाहता था। पर शैलजा ने उसे साफ- साफ शब्दों में कह दिया था, कि जब तक वह कोई अच्छी-सी नौकरी नहीं ढूंढ लेता, तब तक वो शादी नहीं करेगी।

एक अच्छे कॉलेज से डिग्री और मेहनती होने के बावजूद आकाश को कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। इस दरम्यान वह जब भी शैलजा से मिला, उसने उसके सामने अपनी वही बातें दोहराईं। आखिरकार ऊपर वाले को आकाश पर तरस आ गया और उसे नौकरी मिल गई। आकाश के सपनों को जैसे पर लग गये। इससे पहले वह कभी इतना खुश नहीं हुआ था। अपनी खुशी को दोगुना करने के लिए वह सीधा ये खबर सुनाने के लिए शैलजा के घर गया। शैलजा के घर के ड्रॉइंग हॉल में कदम रखते ही आकाश ठिठक गया। वहां शैलजा की किसी दूसरे लड़के के साथ सगाई की रस्में चल रही थी।

दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था और शैलजा, उसके चेहरे पर शिकन का कोई भी भाव नहीं था। साफ झलक रहा था, कि ये सगाई उसकी मर्जी से हो रही थी। शैलजा अपनी सगाई की रस्मों में इतनी मगन थी, कि उसे वहां आकाश की उपस्थिति का आभास ही नहीं हुआ। आकाश मूक बना कुछ देर तक यूं ही सब कुछ देखता रहा। जैसे खुद को यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था, कि ये सच नहीं हो सकता। पर हकीकत के आगे सपनों की कोई बिसात नहीं थी। आकाश की दुनिया उजड़ चुकी थी। जिस ह्रश्वयार की वह आज तक दुहाई देता रहा था, जिस शैलजा के साथ वह शादी के सपने देखता था, उसी ने उसे धोखा दिया था, उसके साथ बेवफाई की थी।

दोनों सहेलियां बिल्कुल शांत थी। इस चुप्पी को सीमा ने तोड़ा, ‘आकाश फिर दिल्ली कैसे पहुंचा? और वह, बहुरूपिया कैसे बन गया? स्वीटी ने फिर से आकाश की अधूरी दास्तान सुनानी शुरू कर दी, ‘शैलजा के बिना, आकाश अपनी सुध-बुध खो चुका था। उसे अपना जीवन बोझ सा लगने लगा था। मुंबई की हर एक चीज उसे शैलजा की याद दिलाती थी। उसने किसी तरह खुद पर काबू पाया और दिल्ली आ गया। यहां उसने जल्द ही एक नई जॉब ढूंढ़ ली।

आकाश खुद को सारा दिन काम में व्यस्त रखता था। जिससे उसे शैलजा की याद, कम से कम आए। अभी आकाश ठीक से संभला भी नहीं था, कि उसकी किस्मत ने उसे फिर से दगा दे दिया। संयोग से आकाश और शैलजा के पति एक ही कम्पनी में काम करते थे। आकाश जहां पूरी सच्चाई, मेहनत और लगन से अपना काम करता था, वहीं शैलजा के पति बेईमानी और धोखेबाजी करके नित कम्पनी के हिसाब-किताब में गड़बड़ी किया करते थे।

आखिरकार, एक दिन कम्पनी के अधिकारियों को, शैलजा के पति के हिसाब-किताब में की गई गड़बडिय़ों का पता लग गया। कम्पनी के आला अधिकारियों ने पुलिस बुलाकर शैलजा के पति को जेल भिजवा दिया। शैलजा के पति पर गबन का गंभीर आरोप लगा। शैलजा पूरी तरह से टूट चुकी थी। उसे अपने पति के बचाव का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। तब वह आकाश के घर गई।

आकाश को लगा, शायद शैलजा को अपनी गलती का एहसास हो गया है, इसलिए वह उससे माफी मांगने आई होगी। पर उसकी उम्मीद से विपरीत शैलजा ने उसके सामने कुछ और ही मांग रख दी। शैलजा ने कहा, ‘आकाश, मैं मानती हूं, कि मेरे पति बहक गए थे और उन्होंने कम्पनी के अकान्ट्स में गड़बड़ी की, पर ये सब उन्होंने सिर्फ मेरी खुशियों के लिये किया। मेरी अनकही जरूरतों को भी पूरा कर सकें इसलिए किया।

‘रेत के टीलों पर खुशियों के महल नहीं बनाए जाते शैलजा। जो खुशियां दिल से नहीं जुड़ी होती, वो रेत की तरह हवा में उड़ जाती है और हमें पता भी नहीं चलता। खैर, तुम अपने यहां आने का कारण बताओ। आकाश ने एक तर्क के साथ ही, शैलजा से वहां आने का कारण पूछा। शैलजा बोली, ‘आकाश, मैं चाहती हूं कि तुम मेरे पति की मदद करो।

‘पर, ये कैसे मुमकिन है शैलजा। कम्पनी के अधिकारियों ने खुद उसके अकान्ट्स में गड़बड़ी पाई है। मुझे तुम्हारे प्रति पूरी सहानुभूति है शैलजा, पर ये मामला कम्पनी के उसूलों का है। आकाश ने शैलजा के लिए अपनी फिक्र जताने के साथ उसे सच्चाई बताई। ‘लेकिन, अगर तुम चाहो, तो ये सब मुमकिन है आकाश। शैलजा दृढ़ निश्चय के साथ बोली।

‘वो कैसे शैलजा? आकाश ने शैलजा की बात को ठीक से समझने के लिए पूछा।
‘आकाश, बीते दिनों तुमने अपने काम से कम्पनी को काफी मुनाफा पहुंचाया है। कम्पनी में, आज तुम्हारी अच्छी रेप्यूटेशन है। तुम उनके बेस्ट इम्प्लाईज में से एक हो। अगर तुम, मेरे पति के सारे जुर्म अपने सर ले लो, तो हो सकता है, कि वे तुम्हारी सजा टाल दें और हो सकता है, कि तुम्हारी पहली गलती समझकर, तुम्हें नौकरी से भी न निकालें। शैलजा ने अपने पति को आरोपों से बाहर निकालने का, एक अनोखा हल आकाश को सुझाया।

शैलजा की कही बात, आकाश के दिल में तीर की तरह चुभी थी। जिस शैलजा को वह प्यार करता था, उसने आज उसके प्यार की कीमत मांगी थी, उसके गम को कई गुना बढ़ा दिया था। ‘जाओ शैलजा, कल तुम्हारे पति तुम्हारे साथ होंगे। अपना सारा दर्द, अपने अंदर समेट कर, आकाश ने कहा। दूसरे दिन, आकाश ने खुद जाकर कम्पनी के अधिकारियों के सामने, सारा जुर्म अपने सर ले लिया। आकाश द्वारा ऐसा जुर्म किए जाने पर हैरान तो हुए, पर आकाश को माफ करने की बजाए, वे गुनहगार को सजा देने के अपने नियम पर डटे रहे और पूरा मामला अदालत के सामने रख दिया।

इधर शैलजा के पति इस जुर्म से पूरी तरह से रिहा हो चुके थे और शैलजा निर्दोष आकाश का साथ देने के बजाए, हमेशा-हमेशा के लिए उसे छोड़कर, अपने पति के साथ विदेश चली गई। अदालत ने आकाश को पांच साल की सजा सुनाई। आकाश ने अपने लिए कोई वकील भी नहीं किया था, जो उसे सजा से बाहर निकालने में मदद करता या उसकी सजा कम ही करा देता। वह तो जैसे सजा पाना चाहता था, शैलजा से प्यार करने की सजा।

आकाश ने पांच साल जेल में बिताए। नौकरी पहले ही जा चुकी थ॥ ऊपर से जेल से रिहा हुए इंसान को, लोग शक की नजर से देखते थे। इस वजह से, उसे दूसरी नौकरी मिलने में भी काफी कठिनाई हो रही थी। आकाश पेट की भूख, किसी तरह बर्दाश्त कर रहा था, पर लोगों की घूरती नजरों का सामना, वह नहीं कर पा रहा था, इसलिए, दुनिया के बीच रहने और खुद को छुपाने के लिए वह बहुरूपिया बन गया।

आकाश की दर्द भरी दास्तां सुनकर, सीमा की आंखें छलछला उठी थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था, कि किसी के प्यार का अंजाम, ऐसा भी हो सकता है।
स्वीटी की भी आंखें नम थी। उसे देखकर साफ झलक रहा था, कि उसे ये सब बताने में कितनी तकलीफ हुई होगी। 

‘हे…ऐ…ए…ए! अचानक, बाहर बच्चों का शोर सुनाई दिया। ऐसा बच्चे तब करते थे, जब बहुरूपिया वहां आता था। सीमा और स्वीटी तेजी से बहुरूपिया आकाश को देखने के लिए खिड़की के पास पहुंच गई। आकाश अपने रंग-बिरंगे कोट की जेबों में से, हर बच्चे को कोई न कोई उपहार दे रहा था। सभी बच्चे अपना-अपना उपहार पाकर काफी खुश थे। थोड़ी ही देर में आकाश और बच्चों की आवाज, धीमी होती चली गई। आकाश के जाने के काफी देर बाद तक, दोनों सहेलियां खिड़की के पास ही बैठी रही। स्वीटी गुमसुम थी। सीमा ये तय नहीं कर पा रही थी, कि बहुरूपिया कौन था? ‘आकाश या…शैलजा।