………………………..सुबह के पौ फटने से पहले वातावरण बिलकुल स्वच्छ हो चुका था। नीले-नीले बादल अंधकार की चादर सरकाते हुए क्षितिज पर झलक पड़े थे। छोटे-छोटे पक्षियों ने आकाश में कलाबाजियां लगाना आरंभ कर दिया था। राजा विजयभान सिंह ने एक जगह खड़े होकर दम साधा और देखा‒दूर-बहुत दूर‒उनकी हवेली खुले आकाश का मुंह चूमे धुंधली-धुंधली दिखाई पड़ रही है। हवेली के सामने ही वह सूखा-सा वृक्ष था, परंतु शायद इस समय वह गिर पड़ा है। रात की तूफानी हवा और वर्षा के आगे वह टिक नहीं सका। उनके मुखड़े पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई। एक ही झटके में उन्होंने चाहा कि लपककर हवेली पहुंच जाएं, परंतु…परंतु अचानक ही उसके पग लड़खड़ा गए। उन्होंने महसूस किया उनकी ताकत उन्हें ज़वाब दे रही है। एक बार फिर उन्होंने इसे समेटने का प्रयत्न किया, परंतु होंठ केवल भिंचकर ही रह गए। वह विफल रहे, मानो अब उनके शरीर में गर्म रक्त की एक बूंद भी नहीं बची। उनका गला सूख गया, दिल बैठने लगा। वह लड़खड़ाए…उन्होंने एक पग आगे बढ़ाया परंतु फिर वहीं एक नागफनी के पौधे से कुछ दूर हटकर गिर पड़े। बड़ी कठिनाई से उन्होंने अपनी गर्दन हवेली की ओर घुमाई। पौ फट रही थी। सूखे वृक्ष के उस पार हवेली की ऊपरी मंजिल स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। उनके दिल को सख्त ठेस लगी। नदी के किनारे भी आकर वह डूब गए। उनकी अंगुलियां फैलीं…फिर मुट्ठियां भिंच गईं। होंठों को उन्होंने सख्ती से काटा परंतु ऐसा महसूस हुआ मानो यहां भी जान नहीं रही। बड़ी-बड़ी घनी पलकों में आंसू छलक आए। होंठ खुल गए। उन्हें गहरी-गहरी सांसें आने लगीं‒गहरी और सूखी-सूखी सांसें। कीचड़ से लथपथ तथा आसपास गड्ढ़ों में पानी होने के पश्चात् भी उन्हें एक बूंद पानी देने वाला कोई नहीं था और वह इसके लिए तरसते रह गए।
उनकी नज़रों के सामने क्षितिज पर उनकी वास्तविकता घूम गई। शानदार हवेली‒राजमहल‒आगे-पीछे सिपाही‒पहरेदार‒हरे-भरे खेत-खलिहान‒और इन्हीं के बीच उनकी राधा से पहली भेंट‒फिर दूसरी भेंट जब वह भरे मंडप से उठाकर लाई गई थी। उन्होंने उसे राजमहल की सबसे ऊंची मंजिल पर ले जाकर इस इलाके को दूर-दूर तक दिखाया था, अपने प्यार की ख़ातिर सब कुछ उसके कदमों में रख देना चाहा था, परंतु अपने आपको गिराकर उसने एक बार भी इन वस्तुओं को लेने की इच्छा प्रकट नहीं की थी। उनकी आंखों के सामने वह दृश्य भी घूम गया जब मंगनी के दिन उसे ढूंढते-ढूंढते वह कृष्णानगर में भटकते हुए पहुंच गए थे और तब घुटनों के बल झुकते हुए उन्होंने उसके आगे अपनी पलकों की झोली फैला दी थी, उससे क्षमा की भीख मांगी थी। शायद उस पल राधा का दिल उसके प्रति सहानुभूति से भर भी गया था। शायद वह उन्हें क्षमा कर देती। शायद अपने आपको उनकी रक्षा में हवाले करने को वह तड़प भी उठी परंतु…परंतु जाने क्यों बहक गई थी‒बहककर उसने रातों-रात कृष्णानगर छोड़ दिया था।
उनकी फूलती सांसें धीमी पड़ गईं। शरीर निष्क्रिय था परंतु आंखों की कोई कड़ी मस्तिष्क के द्वारा अब भी काम कर रही थी, इसलिए उन्होंने हकीकत के बाद एक सपना भी देखा। राधा उनके समीप बैठी है‒बिलकुल समीप। वह राजा विजयभान सिंह हैं और राधा उनकी पत्नी, इस इलाके की महारानी। उसके सुडौल शरीर तथा सुंदर मुखड़े पर महारानियों के वस्त्र कितने ज्यादा खिल रहे हैं। राधा कितनी सुंदर है‒इतनी अधिक सुंदर कि उसे निरंतर देखते रहने के बाद भी उनका मन नहीं भर रहा है। राधा उन्हें देखकर मुस्कराती है तो रामगढ़ के चप्पे-चप्पे पर बहार छा जाती है। यहां की प्रजा उनके सामने सम्मान में झुक-झुक जाती है। दूर-दूर के राजा-महाराजा राधा के रूप के कारण उनसे डाह करने लगे हैं।
इस विचार ने, इस सपने ने उनके होंठों पर एक मुस्कान बिखेरनी चाही, परंतु जैसे वहां जान ही नहीं थी। होंठ खुले तो खुले ही रह गए। पलकों से आंसुओं ने गालों पर आकर होंठों की प्यास बुझाना चाही तो हवा के दबाव ने इनका रुख बदलकर उलझी हुई दाढ़ी में भटका दिया। फिर उन्हें एक हिचकी आई‒बहुत ही हल्की-सी कि उनके कान इसका स्वर भी नहीं सुन सके। शायद कान के परदे भी शून्य पड़ चुके थे। फिर छाती में जाने कहां छिपा रक्त का एक अंतिम कतरा होंठों पर आकर फैल गया।
उनकी आंखें खुल गईं‒पलकों पर आंसुओं की बड़ी-बड़ी बूंदें सुबह की शबनम के समान अटकी हुई थीं। बड़ी-बड़ी काली पुतलियों के दर्पण पर उन्होंने अंतिम बार प्रतीत किया‒क्षितिज पर बड़े-बड़े पक्षी उड़ रहे हैं‒गिद्ध और कौवे उनके समीप आते जा रहे हैं‒और बस कुछ भी इसके आगे महसूस नहीं कर सके वे।
आज पंद्रह अगस्त है‒15 अगस्त, 1970 ईस्वी‒भारत का तेईसवां स्वतंत्रता दिवस।
कमल को स्वस्थ हुए महीनों बीत चुके थे। स्वस्थ होकर उसने अपना काम भी संभाल लिया था। कांट्रेक्टर बर्मन एंड कंपनी को उससे बड़ी-बड़ी आशाएं थीं। कमल को जीवन में सब कुछ मिल चुका था। मां‒सरोज, अपने आपको अच्छी संतान कहने का विश्वास‒गर्व, परंतु एक ख़ुशी, एक ऐसी ख़ुशी जो पिता की कमी पूरी न कर सकती, वह उससे अभी कोसों दूर थी, अपने पिता से वह गले भी तो नहीं मिल सका। परंतु तेईस वर्ष से उसने पिता को राजा विजयभान सिंह के रूप में देखा तक नहीं था और इसीलिए वह उदासी और भी बढ़ जाती थी।
सरोज मां-बेटों को देखती। उनका गम बांटने के बाद भी कम नहीं होता था। फिर भी उसकी अवस्था को देखकर कभी-कभी कमल को मुस्कराते रहना पड़ता था। राधा भी कभी-कभी मुस्कराने पर मजबूर थी, मजबूर इसलिए क्योंकि शीघ्र ही सरोज मां बनने वाली थी। एक बार अचानक ही बस उसे चक्कर आया था तो कमल घबरा उठा था। डॉक्टर को दिखाने पर चेतावनी मिली थी कि यदि ऐसी अवस्था में वह ख़ुश नहीं रहेगी तो शरीर पर ही नहीं, मस्तिष्क पर ही नहीं, वरन् दिल पर भी प्रभाव पड़ सकता है। कमल घबरा उठा था, मां को बताकर आशा की थी कि उनका अपना गम सरोज के दिल पर कभी घात बनकर प्रभाव नहीं डालेगा। बहू की ख़ुशी, बहू के स्वास्थ्य के लिए, राधा जी-जान से निछावर होने को तत्पर थी‒ बहू की प्रसन्नता ही उसके अपने बेटे की प्रसन्नता थी।
कमल ने सरोज की मां से और सरोज ने कमल की मां से अपनी वास्तविकता, अपने नाजुक समय का इज़हार स्वयं कर दिया था। बदनामी से घबराकर दोनों के घरवालों ने शीघ्र ही उनका विवाह बहुत साधारणतया से कर दिया था। यदि ऐसी-वैसी कोई बात नहीं होती तो राधा यह बंधन उस समय तक नहीं बंधने देती जब तक कि राजा विजयभान सिंह स्वयं आकर इन्हें आशीर्वाद नहीं देते, उसे अपने गले से नहीं लगा लेते, उसे क्षमा नहीं कर देते। फिर राधा ने उनके लापता होते ही उनकी तलाश में देश के सभी पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञापन छपवा दिए थे, परंतु उनका कहीं भी पता नहीं था।
काश! एक बार ही उनका पता चल जाए…केवल एक बार ही…और यह आशा उस समय दृढ हो उठी थी जब एक दिन उसे लखनऊ से एक रजिस्ट्री बीमाशुदा लिफाफा मिला था जिसमें इस हवेली की वसीयत ही नहीं बल्कि राजा विजयभान सिंह की जमा की हुई सारी दौलत के कागजात भी उसके बेटे के नाम पर प्राप्त हुए थे। भेजते समय राजा विजयभान सिंह ने अपना पता स्टेट बैंक की मार्फत ही दिया था। राधा कमल को तुरंत ही लेकर स्टेट बैंक पहुंची थी, परंतु पता चला था कि वह यहां से जा चुके हैं। कहां? उनमें से किसी को नहीं मालूम था। फिर भी राधा ने आशा का दामन थामकर एक बार फिर देश के सभी पत्र-पत्रिकाओं द्वारा उनके वापस आने की भीख मांगी थी परंतु तब भी उनका पता नहीं चला था। ऐसा जान पड़ता था मानो उन्होंने निराश होकर यह देश ही नहीं, विदेश ही नहीं… सारा संसार ही त्याग दिया है। उसने उन पर जुल्म ही ऐसा किया था जो कोई भी मानव सहन नहीं कर सकता था। काश! वह एक बार भी उसके सामने आ जाते तो वह उनके चरणों में गिरकर रो पड़ती…रो-रोकर क्षमा मांग लेती।
आज पंद्रह अगस्त है परंतु पिछली सारी रात राधा को बहुत विचित्र और भयानक सपने आते रहे थे। रात को लगभग दो बजे जब उसकी आंख खुली थी तो खिड़की द्वारा उसने देखा था‒बाहर तेज हवाएं चल रही हैं, वर्षा की झड़ी लगी हुई थी। जब आज से वर्षों पहले उसने कमल को कीचड़ में जन्म दिया था, वह दिन, वह रात, जीवन की ख़ुशियों से दूर होने के पश्चात् भी आज कितने महत्त्वपूर्ण थे। वह समय उसकी यादों का एक अमिट अंग है। आज अचानक ही जब वर्षा सुबह लगभग चार-साढ़े-चार बजे रुक गई तो उसके कानों में हवा के आधार पर मानो किसी की सिसकियां उभरकर आ टकराई थीं। कोई तड़प रहा था, रो रहा था, उसे पुकार रहा था। पुकारने वाले का स्वर वातावरण के समान ही भीगा-भीगा था।
उसने बिलकुल स्पष्ट सुना…राधा मुझे क्षमा कर दो और राधा का दिल ज़ोर से धड़क उठा था। कानों पर विश्वास ही नहीं होता था। वह झट उठकर बैठ गई थी। दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गई थी। गेट भी खोल लिया था और चाहा था कि चीख़ती-चिल्लाती अपने प्रीतम को पुकारती हुई आवाज़ के सहारे अंधकार में लुप्त हो जाए, उसने पग भी बढ़ा दिए थे परंतु तभी कमल चीख़कर उसकी ओर लपक आया था। सरोज की आंखें भी खुल गई थीं। राधा के पगों में गिरकर वे दोनों फूट-फूटकर रो पड़े थे। उसकी अवस्था उन दोनों से देखी नहीं जाती थी, राधा उनको छाती से लगाकर स्वयं भी बिलख-बिलखकर रो पड़ी थी।
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