‘मां!’ कमल ने कहा ‘पागल हो गई हो क्या?’ और राधा अपनी ही स्थिति पर तड़प उठी थी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो वह कोई सपना देख रही थी। सपने में ही चलकर वह यहां तक चली आई थी। अंधकार में वह इधर-उधर घूरने लगी थी।

 ‘कम-से-कम हमारे लिए ही अपना ख़्याल रखो मां।’ कमल ने उसे सांत्वना देते हुए कहा था‒ ‘सरोज को देखो, कई दिन से उसकी अवस्था गंभीर है, यदि उसके दिल को कोई ठेस पहुंच गई तो मेरा क्या होगा? मैं नहीं रहूंगा तो फिर तुम क्या करोगी मां, जिसके लिए तुमने अपना जीवन तक नरक बना डाला है। मां! भूल जाओ पिताजी को, वह यदि जीवित होते तो क्या तुम्हारा नाम सुनते ही चले नहीं आते? हमने उनकी तलाश में क्या कुछ नहीं किया? उनके कान में तो यदि तुम्हारी पुकार की भनक भी पड़ जाती तो वह पंख लगाए उड़कर चले आते।’

 राधा की सिसकियां मद्धिम पड़ गईं।

 सरोज ने उसे एक ओर से कमर में हाथ डालकर सहारा दिया, दूसरी ओर से कमल ने उसे पकड़ा और धीरे-धीरे चलते हुए वे हवेली में प्रविष्ट हो गए। राधा जब पलंग पर लेटी तो उसके बाद एक पल भी उसे नींद नहीं आ सकी।

 सुबह के जब छः बजे तो राधा पलंग से उठ खड़ी हुई, नहाई न मुंह धोया, नाश्ता भी नहीं किया और हवेली की सबसे ऊंची मंजिल पर जा पहुंची। सुबह का वातावरण खुला और बहुत सुहाना था। यद्यपि सूर्य उदय हो चुका था, परंतु किसी बादल की ओट लिए छिपा फिर रहा था। बदला-बदला-सा मौसम था। ठंडी नम हवाएं उसकी खुली, अर्ध सफ़ेद लटों को बिखराकर चली जाती थीं। फिर भी उसके मन को संतोष नहीं मिल रहा था। ऐसा लगता था मानो रात में उठे तूफान का शोर अब भी बाकी है, फिर भी वह दूर-दूर तक नज़र उठाकर देखती‒गिरे हुए सूखे वृक्ष के उस पार जो पिछली रात की वर्षा और तूफान का शिकार हो चुका था, उस वृक्ष से उसके जीवन की कितनी सारी यादें संबंधित थीं, फिर भी उसने इस ओर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। उसकी आंखें तो आशाओं से रास्तों पर बिछी हुई थीं‒शायद उसका साजन आज ही आ गया‒शायद!! जाने क्यों रात की घटना के कारण उसे विश्वास हो चला था कि आज वह अवश्य आएंगे‒वह। उसके साजन राजा विजयभान सिंह, कमल के पिता।

 सहसा हवेली के पिछले भाग से जहां कुछ ही दूर पर मज़दूरों के कैम्प के उस पार ताड़ के लंबे-लंबे वृक्ष लगे थे, वहां से उड़कर जब कुछेक बड़े-बड़े गिद्ध हवाई जहाज के समान अपने पंख फैलाए हवेली के ऊपर से गुज़रे तो इनकी सनसनाहट से राधा का ध्यान बंट गया। उसने देखा, एक ही नहीं कई-कई गिद्ध एक के बाद एक, बहुत तेजी के साथ पंख फैलाए कुछ दूर जाकर नीचे उतरते जा रहे हैं, वह कोठे पर और किनारे आई, बहुत गौर से उसने देखा…दूर, बहुत दूर, एक जगह पर गिद्धों का झुरमुट बढ़ता जा रहा है। जाने क्यों उसके दिल की धड़कनें बहुत तेज हो गईं।

 तभी नाश्ते के लिए कमल मां को लेने के लिए ऊपर पहुंचा।

 ‘मां! चलो न, नाश्ता तैयार हो गया है और तुमने अभी तक स्नान भी नहीं किया।’ उसने उसे कमर से थाम लिया।

 परंतु राधा का ध्यान उसी ओर रहा। उसने पूछा, ‘बेटा! वहां इतने ढेर सारे गिद्ध क्यों एकत्र हैं?’

 ‘मां! कोई जानवर मर गया होगा…’ उसने भी दूर दृष्टि दौड़ाई।

 ‘जानवर?’

 ‘हां, मां!’ वह बोला, ‘शायद पिछली रात की तूफानी वर्षा के कारण उसे कहीं शरण नहीं मिल सकी होगी।’

 राधा कुछ न बोली। धड़कनों पर काबू पाने का प्रयत्न करने लगी तो जाने क्यों अपने आप ही उसकी आंखें छलक आईं, जानवर? जानवरों का इस बंजर इलाके में बिना वर्षा के भी फंस जाना बहुत साधारण बात है।

 ‘आओ चले मां… इतना अधिक नहीं सोचा करते।’ कमल ने उसकी पलकें पोंछी, ‘तुम्हें मेरी सौगंध जो अब तुम ज़रा भी खोई-खोई रहीं। क्या तुम्हें अपने बेटे के लिए बहू के स्वास्थ्य तथा जीवन का ज़रा भी ध्यान नहीं?’

राधा न चाहते हुए मुस्करा दी। मुस्कराते समय उसे ऐसा लगा मानो किसी ने उसके होंठों में सुइयां चुभो दी हों। कमल के साथ होकर वह सीढ़ियां उतर आई।

 आज सारे दिन वह कोठे पर नहीं गई। केवल कमल और सरोज से बातें करती रही। स्वतंत्रता दिवस होने के कारण आज उसकी भी छुट्टी थी। उस सारे दिन राधा ने अपने आपको पूर्णतया ख़ुश रखने का प्रयत्न किया। बहू का स्वास्थ्य गंभीर था इसलिए उसे एक भी काम नहीं करने दिया। आज इस देश का सबसे बड़ा त्योहार था इसलिए उसने तरह-तरह के पकवान बनाकर बहू और बेटे को खिलाए। जाने क्यों कमल की बातों पर उसे अब विश्वास हो चला था कि अब उसके पिता नहीं रहे, होते तो वे जानते ही पंख फैलाए उड़ते चले आते कि राधा ने उन्हें क्षमा कर दिया है। वह उनकी प्रतीक्षा कर रही है।

 शाम सुनसान थी…ख़ामोश‒मज़दूर तथा अन्य कार्यकर्ता अभी तक रामगढ़ नहीं लौटे थे। शायद कल सुबह पहुंचेंगे। रात में आने की कम ही आशा की जाती थी। सरोज तथा मां को लेकर कमल टहलने के लिए निकल पड़ा। आज दिन-भर वर्षा नहीं हुई थी। धूप ऐसी निकली थी कि शरीर में चुन्ने काटने लगी थी, शाम का वातावरण ठंडा और सुंदर था। दूर-दूर तक नील गगन बहुत धीमे-धीमे डूबते सूर्य की लालिमा समेटने का प्रयत्न कर रहा था।

 कमल आज बहुत प्रसन्न था। सरोज भी प्रसन्न थी कि मां ने अब ख़ुश रहने का प्रयत्न आरंभ कर दिया है। कमल सरोज का हाथ पकड़े बहुत प्यार से टहलता हुआ आगे बढ़ रहा था। छोटी-छोटी बातों पर भी दोनों खिलखिला पड़ते थे। उनकी चहक सुनकर राधा का मन प्रफुल्लित हो उठा था। अपनी आयु का विचार करके वह उनसे कुछ पीछे ही रह गई थी। कमल और सरोज आपस में बातें करते समय इतना खो गए कि उन्हें यह भी पता नहीं चला कि मां पीछे छूट गई है। वे आगे ही बढ़ते जा रहे थे।

 सहसा राधा की दृष्टि एक ओर उठी तो उसका दिल बहुत ज़ोर से धड़का। सड़क के कुछ ही दूर नागफनी के एक पौधे की आड़ से हटकर, एक हड्डियों का ढांचा पड़ा हुआ था…किसी जानवर का…शायद किसी इंसान का ही यह ढांचा हो। उसने कमल और सरोज को देखा, वे उससे बहुत आगे टहलते हुए निकल गए थे। राधा के पग अपने आप ही इस ढांचे की ओर उठ गए। एक अज्ञात ताकत थी, एक अज्ञात कशिश थी, जिसने उसके दिल की धड़कनों के साथ उसके शरीर, उसके पगों को भी अपनी ओर खींच लिया था। कुछेक कौवे उस ढांचे का बचा-खुचा मांस अब नोंच-नोंच कर खा रहे थे। उनके समीप पहुंचते ही ये किनारे फुदककर खड़े हो गए। राधा के नथुनों में एक दुर्गंध पहुंची, परंतु अपनी नाक पर उसने रूमाल या आंचल नहीं रखा। कुछ ही दूर खड़े होकर अपने आप ही उसकी दृष्टि नागफनी के पौधे पर पड़ी। उसने देखा, कांटों में कहीं-कहीं लंबे-लंबे अर्ध सफ़ेद बाल फंसे हुए हैं। उसके पग लड़खड़ा गए। वह उनके समीप पहुंची‒और समीप। उसने देखा, यह किसी इंसान का ढांचा है। शायद कोई फकीर था जो पिछली रात तूफान का शिकार होकर फंसा रह गया। शायद कोई अज़नबी था जिसे यह भी नहीं मालूम था कि रात के समय रामगढ़ का रास्ता अपनाना ख़तरे से खाली नहीं है। झुककर उसने देखा…हड्डियों के जोड़ों में जहां कहीं नाममात्र भी मांस बचा था, वहां ढेर सारी सुर्ख चींटियां तथा चींटे लिपटे हुए हैं। मक्खियां भनक रही थीं। गिद्ध और कौवों ने शायद मांस खाते समय इनका वस्त्र भी निगल लिया था। केवल कहीं-कहीं ही इधर-उधर कपड़ों के छोटे-बड़े टुकड़े कीचड़ में सने बिखरे पड़े थे।

 

 

 सहसा राधा का दिल बहुत ज़ोर से धड़का। इतनी ज़ोर से मानो इस प्रकार यह धड़ककर सदा के लिए ही ठंडी हो जाएगी। धड़कनें बंद हो जाएंगी। उसका गला सूख चला। होंठ ही नहीं शरीर भी कांपने लगा। उसकी आंखें मानो पथरा गईं। दृष्टि एक ही कोण पर चिपककर रह गई। एक ही जगह पर, जहां डूबते सूर्य की लालिमा में एक सफ़ेद वस्तु चमक रही थी। ढांचे की दोनों बांहें फैली हुई थीं। छितरी हुई अंगुलियों के समीप ही एक अंगूठी। राधा को चक्कर-सा आ गया। यह धरती, यह आकाश, सब कुछ अचानक ही डगमगा गया। अंगूठी के वह और समीप आई‒बिलकुल समीप। घुटनों के बल झुककर अपने कांपते हाथ से यह अंगूठी उठा ली। इसे गौर से देखा…‘राधा’‒मानो हड्डी का ढांचा पुकार उठा। ‘राधा’‒मानो ढांचे की एक-एक हड्डी, एक-एक अंग के होंठों से यह आवाज़ उठ पड़ी हो। राधा‒यही एक नाम एक अंगूठी पर अंकित था। वह तड़प उठी, आंखों में आंसू छलक आए। आंसुओं की एक बूंद जब इस अंगूठी पर गिरी तो शब्द ‘राधा’ इसमें डूब गया और उसने देखा, इसके स्यान पर रूप उभर आया है। एक दृश्य जागृत हो उठा था। जब पहली बार वह राजा विजयभान सिंह से खलिहान में मिली थी। वह दृश्य भी तस्वीर बनकर सामने आया, जब राजा विजयभान सिंह ने उसे हवेली की सबसे ऊंची मंजिल पर ले जाकर अपने प्यार की ख़ातिर रामगढ़ का सारा इलाका उसके कदमों में रख देना चाहा था और वह आखिरी भेंट जब राजा विजयभान सिंह के रूप में होते हुए उन्होंने उसके दो मीठे शब्दों को प्राप्त करने के लिए उसके आगे घुटने टेक दिए थे। किस कदर मिन्नत की थी, क्षमा के लिए। उसका दिल फट गया। उसने दिल की गहराई से इच्छा की कि यह धरती फट जाए और वह इसमें समा जाए। यह आकाश उसके सिर पर गिर पड़े। दर्द उससे सहन नहीं हो रहा था। वह कितनी कठोर है, निर्दयी है, पापी है, जिसने एक नारी होकर भी अपने अभिमान में डूबकर एक ऐसे देवता को क्षमा नहीं किया जो उसके बेटे का पिता था।

 वह तड़पकर रो पड़ी। जी चाहा लपककर हड्डी के ढांचे से लिपट जाए, अपनी जान दे दे, ये गिद्ध और कौवे उसका मांस भी नोंच-नोंचकर खा जाएं, चींटियां-चींटे उसके ढांचे में भी इस प्रकार लिपटी रहें, वह प्यार के जोश में, जोश के पागलपन में शायद हड्डी के ढांचे पर गिर भी पड़ती, परंतु ज्यों ही ऐसा करने के लिए खड़े होकर उसने आगे बढ़ना चाहा कि तभी एक आवाज़ उसके कान में पड़ गई।

 ‘मां!’ कमल बहुत दूर खड़ा उसे अचानक ही रुक जाने के कारण आवाज़ दे रहा था, ‘आओ न मां… साथ-साथ चलो।’

 राधा ने आंसू पीने का प्रयत्न किया तो उसकी हिचकियां बंध गईं। हिचकियों पर काबू पाने का प्रयत्न किया तो होंठ कांपने लगे। मन करता था वह चीख़-चीख़कर अपनी छाती पीट ले, अपने बाल नोंच डाले, परंतु फिर मन पर मानो पत्थर रख लिया, यदि कमल को अपने पिता के बारे में जानकर सदमा पहुंचा तो सरोज भी सहन नहीं कर सकेगी। यह सदमा कमल के लिए भयानक होगा तो सरोज के लिए अत्यंत हानिकारक, वह पहले ही बहुत कमज़ोर हो चली है, फिर जाने क्या हो जाए? उसने देखा कमल और सरोज उसी की ओर बढ़ रहे हैं तो अपने होंठों को दांतों से काटती हुई वह सड़क पर हो ली। मुस्कराने का प्रयत्न करती हुई आगे बढ़ने लगी तो कमल और सरोज ठहरकर उसकी प्रतीक्षा करने लगे। राधा के कानों में शाम की तेज होती हवाओं ने स्वर बिखेरा तो उसने सुना। राजा विजयभान सिंह कह रहे थे‒यह अंगूठी अब तभी मेरी अंगुली से उतरेगी जब तुम मुझे क्षमा कर दोगी और जब इसे वापस स्वीकार करके तुम अपनी अंगुली में पहन लोगी, तो मैं समझूंगा कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए प्यार का स्थान बन चुका है। राधा ने बहुत आहिस्ता से छिपाकर अंगूठी अपनी एक अंगुली में पहन ली।

 ‘क्या बात है मां?’ कमल ने उसके गंभीर मुखड़े पर छाई कृत्रिम मुस्कराहट को देखकर पूछा, ‘तुम फिर उदास हो गईं? आज दिन-भर तुम बहुत ख़ुश थीं।’

 सब्र के पश्चात भी राधा की आंखें छलक आईं, भर्राए स्वर में उसने कहा, ‘बेटा! आख़िर धीरे-धीरे करके ही तो घाव भरेगा।’ और फिर उसने बहू का हाथ थाम लिया, बोली, ‘चलो।’

 उस शाम धुंधलका गहरा होने के पश्चात ही वे टहलकर वापस लौटे तो उस रात जब कमल और सरोज अपने कमरे में सो रहे थे तो राधा चुपके से बाहर निकली। बिना किसी स्वर के उसने जीप गाड़ी के पीछे रखा हुआ पेट्रोल टिन उठाया और तेज पगों से हड्डी के ढांचे के पास पहुंची। फूट-फूटकर रोते-बिलखते हुए उसने टिन खोला और सारा पेट्रोल हड्डी के ढांचे पर छिड़ककर आग लगा दी। फिर दौड़ती-भागती हवेली में पहुंचकर हांफने लगी। कुछ पल दम लेने के बाद वह हवेली की ऊपरी मंजिल पर पहुंची तो उसने देखा, बहुत दूर उसके अरमानों की चिता जल रही थी। शोले दिल के अंदर सुलगती आग के समान बार-बार भभक उठते थे। काफी देर के बाद जब ये शोले बुझ गए तो उसने एक गहरी सांस ली और सीढ़ियां उतरकर अपने कमरे में पहुंच गई। जाते-जाते उसने देखा, कमल और सरोज अपने कमरे में अभी तक सो रहे हैं।

 दूसरी सुबह तड़के ही जब मज़दूर रामगढ़ लौटे तो उन्हें रास्ते में एक स्थान पर कुछ राख और किसी पशु की हड्डी के अर्द्ध जले टुकड़े दिखाई पड़े। आसपास की सारी धरती जलकर भूरी-भूरी हो गई थी, परंतु कोई यह नहीं जान सका कि ऐसा क्यों हुआ? ऐसा कौन-सा भेद था जो किसी ने एक जानवर को यूं छिपाकर जला दिया? लोग हैरान थे‒ लोग अब भी हैरान हैं। क्रमशः काम करते समय इनके मध्य इस भेद का वर्णन भी छिड़ जाता है। लोग अनेक प्रकार की अपनी राय भी प्रकट करने लगते हैं, परंतु वास्तविकता केवल राधा जानती है, जिसके रास्ते में उसके कदमों तले उसके साजन ने फूल की पंक्तियां बिछाई थीं, परंतु उसने बदले में उसे क्या दिया?

क्या दिया उसने अपने साजन को, अपने प्रीतम को ‒ कांटों का उपहार।

 

इन्हें भी पढ़ें –

कांटों का उपहार – पार्ट 50

कांटों का उपहार – पार्ट 51

कांटों का उपहार – पार्ट 52

कांटों का उपहार – पार्ट 53

कांटों का उपहार – पार्ट 54

 

नोट- कांटों का उपहार के पिछले सभी पार्ट पढ़ने के लिए जाएं –

कांटों का उपहार – पार्ट 1