‘नहीं मां! इसमें तेरा कोई दोष नहीं।’ कमल ने हाथ पकड़कर मां को सांत्वना दी और बोला‒ ‘तुम तो देवी हो, साक्षात् देवी। यदि यह संसार ऐसी देवी की पूजा नहीं करता तो इसमें तुम्हारा नहीं इस संसार का दोष है। तुम मेरे लिए जीवित थीं अब मैं तुम्हारे लिए जीवित रहूंगा। मैं भूल जाऊंगा कि सरोज नाम की कोई लड़की मेरे जीवन में भी आई थी। काश!’ कमल ने उस घड़ी को दोष दिया जब सरोज से उसकी अंतिम भेंट हुई थी, मगर खैर जब लड़की होकर सरोज उस घटना को महत्व नहीं दे रही है तो भला वह क्यों उसे लेकर बैठा रहे। उसने बात जारी रखी‒ ‘तुम भी भूल जाओ कि सरोज को तुमने बहू बनाने का सपना देखा था, सपने कभी पूरे नहीं होते।’

 राधा को कमल की बातें सुनकर संतोष भी मिला और चोट भी पहुंची। संतोष इसलिए मिला कि कमल ने उसकी मजबूरी का अनुमान लगाकर उसे क्षमा कर दिया था, चोट इसलिए पहुंची कि अपने दुर्भाग्य में कारण वह अपने बेटे की ख़ुशी नहीं पूरी कर सकी। सरोज उसकी पत्नी नहीं बन सकी, उसका दिल अपने बेटे का दर्द जानकर तड़प उठा परंतु वह कर भी क्या सकती थी? दुर्भाग्य उसे कठपुतली के समान नचा रहा था, उसने विजयभान सिंह को नफरत से कोसा। कमबख्त की आत्मा सदा भटकती रहे, मरता मर गया परंतु दूसरों पर अपने अत्याचार का बोझ सदा के लिए डाल गया है।

 ‘सब्र से काम लो बेटा!’ राधा ने भीगे स्वर में कहा, ‘भगवान एक दिन सब ठीक कर देंगे।’

 ‘भगवान!’ ‒ कमल ने तिरस्कृत भाव से कहा। होंठों पर एक कटु मुस्कान उभर आई, आंखें छलक पड़ीं। उसने अपनी दृष्टि दूसरी ओर फेर ली जहां खिड़की के बाहर वृक्ष की एक डाल पर एक नीड़ था, वीरान नीड़। कई दिनों से यह किसी भी पक्षी का ठिकाना नहीं था। उसने सोचा अब भगवान भी क्या कर सकता है? राजा विजयभान सिंह यदि जीवित होते तो वह अपने अधिकार के लिए एक बार तो अवश्य ही अपना सिर उठाने का साहस कर सकते थे। जब जड़ ही कट जाए तो पौधे की आशा कैसी? 

 कई दिन बीत गए। रामगढ़ की सरहद पर एक बड़ा बोर्ड लगा था‒ पटेल नगर का निर्माण। सरकार ने इसका नया नाम पटेल नगर ही रखकर कॉन्ट्रेक्ट्स बर्मन एंड कंपनी को शहर बनाने की अनुमति दे दी थी। कमल का बनाया हुआ नक्शा सरकार ने सराहते हुए अनुमोदित किया था तथा प्रस्ताव में रखा पूरा शुल्क देना भी स्वीकार कर लिया था।

 रामगढ़ में काम जारी था। क्षेत्र बंटे हुए थे, जहां दिन-रात ट्रकों पर ईंट और पत्थर, गिट्टियां तथा चूना, सीमेंट के बोरे तथा छड़ें, लोहे की सीखचिंयां तथा गार्डर आने लगे थे। जगह-जगह कैम्प लगे थे। मज़दूरों की गिनती बढ़ती ही जाती थी। मज़दूरों के डेरे अलग थे। काम सुबह से शाम तक होता फिर समीप की नदी में मज़दूर स्नान करने के बाद बाहर ही आग जलाकर अपना खाना बनाने में व्यस्त हो जाते। नए खोदे हुए कुओं का पानी यहां के अफसरान के नहाने के काम आ जाता था, अफसरान में यहां सभी थे‒ आर्कीटैक्ट, इंजीनियर, अगणित दूसरे कार्यकर्ता।

रात को खाने-पीने से छुट्टी होने के बाद कुछेक अफसर एकत्र होकर ताश खेलने में लग जाते, कुछ दूसरे खेल, मेहनती लोगों को तुरंत विश्राम की आवश्यकता पड़ जाती थी। हवेली को यहां के सभी काम करने वालों ने पहले- दूसरे दिन ही देखकर संतोष कर लिया था। सभी की अपनी अलग-अलग राय थी, परंतु किसी को इसका ताला तोड़कर आंतरिक भाग देखने की ज़रा भी आज्ञा नहीं थी, क्योंकि इसका उत्तरदायित्व कमल के ही ऊपर था। तीन माह का नोटिस पूरा होने के बाद जब इसका कोई भी वारिस नहीं होगा, तब सरकार स्वयं इसकी नीलामी अपनी देखरेख में करेगी।

 यहां पर काम करने वालों की व्यवस्था के साथ अपना लाभ भी उठाने के लिए आसपास के देहातियों ने अपनी छोटी-छोटी दुकानें खोल ली थीं। शाम को इन दुकानों पर एक अच्छा-ख़ासा मेला-सा दिखाई देने लगता है।

 कमल का कैम्प हवेली से कुछ ही दूरी पर स्थित था। राधा को उसने दिल्ली में ही छोड़ दिया था। राधा ने अपने दिल में बसे भय के कारण उसे रोकना भी चाहा था, परंतु कहने का साहस नहीं कर सकी। उसे ज्ञात था कि दिल्ली में कमल का दिल और वीरान हो जाएगा।

 सरोज के बिछड़ जाने के गम में वह यूं भी खोया-खोया रहने लगा था। देर से घर लौटता तो राधा उठकर उसको खाना परोस देती। कभी वह चुपचाप खा लेता था तो कभी स्पष्ट शब्दों में इनकार भी कर देता था। राधा कुछ न कहती। उसके चिड़चिड़ेपन का कारण जानती थी और यह भी जानती थी कि यह सब उसके दुर्भाग्य का ही फल है। फिर मन-ही-मन वह जी भरकर उस घड़ी को कोसती जब राजा विजयभान सिंह की दृष्टि उस पर पहली बार पड़ी थी। राधा और कमल के बीच एक विचित्र-सी ख़ामोशी थी जिसे राधा ने कभी एक तनाव में प्रतीत किया तो कभी सरोज की जुदाई का फल महसूस किया। सरोज के बिछुड़ जाने का उसे उतना ही दुःख था जितना कमल को और इसीलिए जब कमल ने रामगढ़ के लिए विदा होते समय उसके चरण छुए तो वह उसे जाने को मना नहीं कर सकी। साथ चलने की इच्छा की तो कमल ने भर्राए स्वर में आशा प्रकट की‒

 ‘मां!’ उसने कहा था, ‘तुम यहीं रहो, शायद सरोज मुझे पूछने आ जाए।’……..

 

……..राधा की सिसकियां उभर गई थीं। उसके बेटे को सरोज पर कितना विश्वास था। वह कैसे उसे समझाती कि ऐसे लोगों को कोई पसंद नहीं करता जो समाज के माथे पर कलंक समझे जाते हैं।

 और कमल अपनी मां को कैसे विश्वास दिलाता कि सरोज उसे प्यार करती है। वह उसे कभी नहीं छोड़ सकती। वह कैसे बताए कि सरोज उसके जीवन के सूत्र से इस प्रकार बंध चुकी है कि छोड़ना चाहकर भी नहीं छोड़ सकेगी। यही एक आशा थी जिसने उसके जीवन के सूनेपन में एक ज्योति जला रखी थी।

 कमल ने इस हवेली को कई बार देखा था। सीढ़ियां चढ़कर वह कई बार कोठे पर भी गया था। वहां के वातावरण में खोकर वह बहुत घृणा से अपनी मां पर हुए अत्याचार का अनुमान लगाता तो उसकी आंखें छलक आतीं। कोई उसके मुखड़े पर निरंतर छाई रहने वाली उदासी का कारण नहीं जानता था। उसने स्वयं अपनी वास्तविकता छिपा रखी थी। हवेली के अंदर बरामदे में तथा इधर-उधर पहुंचने योग्य जगहों में उसने कई बार उस कहकहे की तलाश की थी, जो उसने पहली बार अपनी मां के साथ सबसे ऊंची मंजिल पर खड़े हुए सुना था। वह देखना चाहता था, उसके समान यह बर्बाद आदमी कौन है जो पागलों के समान घूमता रहता है। उसे विश्वास था कि यह कोई अवश्य ही ऐसा दीवाना है जो विजयभान सिंह के हाथों लुट जाने के बाद अपने मस्तिष्क का संतुलन खो बैठा है। बदले की भावना लिए वह इन दीवारों से अपना सिर टकराता है। शायद उस दीवाने से मिलकर उसके अपने दिल को भी कुछ शांति मिल सके। अपने से अधिक दुखियों को देख लेने से मन का बोझ कुछ कम हो जाता है।

 एक शाम उसे मां का पत्र मिला। रामगढ़ के इस इलाके में चिट्ठी- पत्री आने का कोई साधन नहीं था, इसलिए यहां के सभी कार्यकर्ताओं के पत्र समीप के डाकखाने में आकर रखे रहते थे। कॉन्ट्रेक्ट्स बर्मन एंड कंपनी की मार्फत आए सभी पत्रों को इनका एक व्यक्ति जाकर वहां से स्वयं ले आता था। पत्र की छंटाई कैम्प के एक दफ्तर में होती। इसके पश्चात् ही पत्र कार्यकर्ताओं में बांटे जाते थे। क्रमशः इस प्रकार देर हो जाया करती थी। आज की डाक में कमल को अपनी मां का व्यक्तिगत पत्र पाने में देर हो गई। उसने पत्र खोला। पढ़ा तो मानो किसी ने उसकी छाती पर अगल-बगल रखी मज़दूरों की कुदाल मार दी हो। उसकी जान ही निकल गई। उससे सहन नहीं हो सका तो उसने अपने होंठों को दांतों द्वारा इस सख्ती से काटा कि वहां से रक्त निकल पड़ा। पीड़ा आंसुओं से निकले या रक्त से, सहन करने की शक्ति तो मिल ही जाती है। पत्र की पंक्तियों पर उसे विश्वास ही नहीं हुआ।

मां ने लिखा था कि सरोज की शादी एक जागीरदार के लड़के के साथ तीन तारीख की निश्चित हो गई है। तीन तारीख! आज तो चार तारीख है, उसके दिल को सख्त चोट पहुंची। वह रो दिया, तड़प उठा। सरोज तो अब तक अपने ससुराल जाने की तैयारी कर रही होगी। बड़ी कठिनाई से उसने पत्र की आगे की पंक्तियां पढ़ीं। मां ने उसे प्यार से सांत्वना देते हुए अनुरोध किया था कि वह अब उसे भूल जाए। उसकी आशा छोड़ दे। भगवान ने चाहा तो उसे एक-से-एक लड़कियां मिलेंगी। आगे की पंक्तियों में मां ने उसके पास आकर रहने की इच्छा प्रकट की थी। अपने ढेर सारे आशीर्वाद द्वारा उसने पत्र का अंत किया था। उसके होंठों से एक आह उभरी। पत्र को उसने फाड़कर फेंक दिया और सोचा कि अब मां को तो बुला ही ले। वहां जिस उम्मीद पर रखा था वह ही अब जाती रही तो क्या लाभ? मां बिना उसका जी भी नहीं लगता था। सरोज से उसे ऐसी आशा ज़रा भी नहीं थी। एक नारी अपना सब कुछ उसे सौंपने के बाद भी दूसरे की बांहों में पत्नी बनकर समा जाना स्वीकार करेगी, वह यह कभी सोच भी नहीं सकता था। अपने प्रेमी को धोख़ा दिया ही, अब अपने पति को भी धोख़ा दे रही है। घृणा से उसने थूक दिया‒सरोज के नाम पर, उसके प्यार पर, प्यार के विश्वास पर जिससे उसे एक बहुत भारी चोट पहुंची थी।

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