……………. राजेश ने अपनी जेब से रूमाल निकालकर हाथ पोंछा, मानो किसी गंदे पशु को उसके हाथ छू गए हों। फिर उसने राधा को देखा, राधा उसी प्रकार भयभीत-सी खड़ी उसे देख रही थी, उसकी दृष्टि की चुभन उसने अचानक ही अपने मुखड़े पर प्रतीत की तो मानो सपने से जागी।
‘यह अच्छा नहीं हुआ।’ वह कांपकर बोली‒ ‘वह बहुत भयानक व्यक्ति है। अब वह हमारा जीना कठिन कर देगा।’
‘तो फिर आप लोग यह जगह क्यों नहीं छोड़ देते?’ राजेश ने अपने मन की बात कही‒ ‘मैं आप लोगों को बहुत अच्छा घर सस्ते में दिला दूंगा।’
‘नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।’ राधा बोली‒‘यह जगह छोड़ना हमारे बस की बात नहीं। यहां कोई अधिक पूछताछ नहीं करता कि कमल का पिता कौन है? यहां तो केवल एक बृजभूषण ही बदमाश है, परंतु दूसरी जगहों पर तो अगणित ऐसे गुंडे मिलेंगे, जिन्हें मेरी उपस्थिति रात-रातभर सोने नहीं देगी। मैं यहीं रह लूंगी। अब दोनों ही ओर से ताला लगाकर रखूंगी, बाहर झांकूंगी भी नहीं।’ राधा ने कांपते-कांपते एक ही सांस में कह दिया।
‘आप निश्चिंत रहिए।’ राजेश के होंठों पर एक निराश मुस्कान उभरी और गुम हो गई। ‘अब वह यहां कभी नहीं आएगा, इस मोहल्ले में तो क्या इस शहर में भी दिखाई नहीं पड़ेगा।’
राधा ने उसे गौर से देखा।
‘मैं ठीक कह रहा हूं।’ राजेश बोला‒ ‘आपकी रक्षा करने में मुझे एक विचित्र-सी प्रसन्नता का आभास हो रहा है।’
राधा तब भी कुछ नहीं बोली, उसकी बातों पर उसने गौर किया। कितना सज्जन पुरुष है यह! कितना अच्छा! देवता समान। यदि यह नहीं होता तो उसको जाने कितनी और भी कठिनाई का सामना करना पड़ता।
राजेश ने आगे बढ़कर आंगन का दरवाज़ा बंद किया। ‘अंदर जाने वालों को आज्ञा लेनी पड़ेगी।’ फिर वह अंदर की ओर पलटा, कुर्सी पर बैठते हुए स्वयं ही बोला‒‘क्या एक कप चाय आप मुझे नहीं पिलाएंगी?’
राधा लज्जा से ज़मीन में गड़ गई। चाय तो वह उसे स्वयं भी पिलाना चाहती थी, परंतु उसके समक्ष अपनी स्थिति का ज्ञान करके वह ऐसा साहस नहीं कर पाती थी। उसके कहते ही वह झट रसोई में पहुंच गई। राजेश ने बढ़कर बच्चे को गोद में उठा लिया, प्यार से उसे चूमा। फिर पहले कमरे में उछालता हुआ ले आया। दरवाजे के समीप कुर्सी पर बैठकर उसने बच्चे को फिर चूमा। राधा उसे कनखियों से देख रही थी, वह झट उठी। एक मोटा कपड़ा दूसरे कमरे से उठा लाई और राजेश की गोद में बच्चे के नीचे बिछा दिया।
राजेश मुस्कुराए बिना नहीं रह सका।
दिन-पर-दिन और सप्ताह-पर-सप्ताह बीते‒लगभग एक वर्ष बीतने को आया। राधा का बेटा बैठते-बैठते अपने छोटे-छोटे पंजों पर चलना सीख गया। चाऊं-चाऊं करते-करते मां-मां करने लगा, मुस्कराता तो कमल के समान ही उसका मुखड़ा खिल उठता। आंखों की पलकें अपने पिता के समान लंबी और घनी थीं, परंतु मां के समान तीखी और अनोखी चमक से भरपूर, बच्चे को कोई भी देखता तो मन करता गोद में उठा ले। बच्चे के रूप में शाही बड़प्पन की झलक थी, जिसे राधा देखती और देखती रह जाती।
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एक वर्ष के अंदर राधा की आर्थिक स्थिति भी संभल गई, उसके स्वास्थ्य में निखार आ गया। बाबा के स्वास्थ्य पर भी काफी प्रभाव पड़ा। यही नहीं उसके मोहल्ले की हालत भी सुधर गई। वह सड़क जो कभी वर्षों से कच्ची थी, जहां वर्षा होते ही पानी एकत्र हो जाता था, कीचड़ में कई-कई दिन बदबू छाई रहती थी, अब बिलकुल साफ़-सुथरी और पक्की थी। सड़क के उस पार नई-नई दुकानें खुल गई थीं। मोहल्ले की लड़कियां अब स्वतंत्र होकर इधर-उधर आ-जा सकती थीं, क्योंकि बृजभूषण का कहीं भी पता नहीं था। बृजभूषण राधा को उस दिन के बाद वास्तव में कभी नज़र नहीं आया, जिस दिन राजेश से उसकी मुठभेड़ हुई थी। मोहल्ले वालों में यह बात प्रचलित थी कि वह अपराध करने के बाद भी सदा बच जाता था, इस बार पुलिस ने उसे बिना ज़ुर्म के ही पकड़कर ख़ूब तबीयत से मारा, फिर किसी राजा की इच्छा पर उसे जबरदस्ती इल्जाम लगाकर बंद कर दिया गया है। जमानत भी नहीं हुई और जब मुकदमा समाप्त हुआ तो उसे सात वर्ष की सख्त कैद दे दी गई।
इस एक वर्ष के अंदर राजेश राधा के घर हर पंद्रह दिन में एक बार तो अवश्य ही आता रहा, आते ही वह बच्चे को गोद में उठा लेता, उसे प्यार करने लगता। उसके लिए अब वह कुछ-न-कुछ वस्तुएं भी लाने लगा था। आरंभ में राधा को यह बात उचित नहीं लगी थी, परंतु बाद में वह उन्हें लेने पर मजबूर हो गई थी। प्यार से दी हुई वस्तु लेने से इनकार करना भी कठिन है। राजेश ने बच्चे को खिलौनों तथा अच्छे वस्त्रों से भर दिया, बच्चा राजेश को देखते ही उसकी गोद में पहुंच जाने को अपने नन्हे-नन्हे हाथ फैला देता था।
इस एक वर्ष में बाबा हरिदयाल ने लगभग बीस मूर्तियां बनार्इं, छोटी भी और बड़ी भी। मूर्तियां बनाते-बनाते उसका हाथ इतना साफ़ हो चला था कि अब उसका विचार था वह अपनी एक छोटी-सी दुकान खोल लेगा। राजेश ने उसकी मूर्तियों के दाम पांच सौ रुपये से लेकर हज़ार रुपए तक दिए। बाबा हरिदयाल को विश्वास था कि उसकी बनाई मूर्तियां विदेश में ख़ूब नाम कमा रही हैं। वह अपने गुण से बहुत संतुष्ट था, ख़ुश था।
एक शाम राजेश ने अपनी टैक्सी सड़क के किनारे राधा के दरवाजे पर रुकवाई। वह हमेशा टैक्सी से ही आता था। अपनी गाड़ी का उपयोग उसने शुरू से ही बंद कर दिया था। ऐसा न हो कि ‘रामगढ़ स्टेट’ पढ़कर लोगों को उसकी वास्तविकता मालूम हो जाए। उसने टैक्सी वाले को पैसे दिए, एक बड़ा पैकेट उठाया और दरवाज़ा खटखटाया। कमल के लिए वह सदा ही कुछ-न-कुछ लाता रहता था। टैक्सी चली गई तो उसने सड़क के वातावरण पर गौर किया। दुकानों में खड़े लोग आज उसे विचित्र ही दृष्टि से देख रहे थे। हर आने-जाने वाला उसे देखकर अपनी गति धीमी कर देता। औरतों की आंखें संदेहपूर्ण थीं। दरवाज़ा खुला तो उसने अंदर प्रवेश किया। राधा पीछे हट गई। उसने राधा को देखा, आज वह कुछ अधिक ही उदास थी और परेशान भी। अन्य दिनों के समान उसे देखकर वह मुस्कराई भी नहीं।
‘क्या बात है राधा देवी?’ उसने पूछा।
‘एक सप्ताह पहले बाबा का स्वर्गवास हो गया।’ राधा का गला रुंध गया।
‘राधा!’ राजेश चीख़ते-चीख़ते रह गया। पैकेट हाथ से छूटते-छूटते बचा।
‘सामने बनिए की दुकान पर वह कुछ सामान लेने गए थे कि किसी ने कुछ कह दिया।’
‘क्या…?’
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‘यही कि..कि…’ राधा की आंख छलक आईं। कहने में उसे शर्म आ रही थी। उसने बड़ी कठिनाई से कहा‒‘यही कि तुम्हारी मूर्तियां तो कोई पचास रुपए में भी नहीं ख़रीदेगा। पांच सौ, हज़ार देकर मूर्ति ख़रीदने वाला केवल तुम्हारी बेटी के कारण ही…’ राधा फूट-फूटकर रो पड़ी।
राजेश की मुट्ठियां भिंच गईं। होंठों को काटकर उसने बाहर देखा, दरवाजे के उस पार, बनिया उसे देखते हुए अपनी मूंछों को ताव दे रहा था। राजेश बल खाकर रह गया।
‘इसी बात पर बाबा को तैश आ गया।’ राधा ने अपने को संभालकर कहा‒‘बात इतनी बढ़ी कि सारा मोहल्ला एकत्र हो गया। सभी ने उस बनिए का पक्ष लिया तो बाबा अपमान सहन नहीं कर सके। घर आकर मुझ पर ही बरस पड़े। मैं निर्दोष थी, फिर भी चुप रही। बकते-बकते अपने आप ही बाबा को छाती में बहुत सख्त दर्द उठा, फिर होंठ भिंच गई। आंखें पलटने लगी और तभी वह गिरकर हमेशा के लिए ख़ामोश हो गए। मैंने फादर को कुछ भी नहीं बताया, परंतु एक-न-एक दिन तो वह बाबा की मृत्यु का कारण जान ही जाएंगे। वह उन्हीं की कृपा थी कि बाबा का अंतिम संस्कार हो गया, वरना इस ओर के रहने वाले तो हमें अब देखना भी पसंद नहीं करते हैं।’
राजेश कुछ न बोला, मन-ही-मन मोहल्ले के लोगों पर झल्लाने लगा। वह उसी की कृपा थी, जिसके कारण इस मोहल्ले का नक्शा बदला हुआ था। यह सड़क महापालिका ने उसी के इशारे पर तो बनाई थी। उस ओर की दुकानें वगैरह उसी के कहने पर तो खोली गई थीं ताकि राधा तथा उसके बाबा को वस्तुएं ख़रीदने के लिए दूर जाने का कष्ट न करना पड़े।
‘राजेश बाबू!’ राधा ने भीगे स्वर में कहा‒‘एक निवेदन करूं, बुरा तो नहीं मानिएगा?’
‘नहीं राधा देवी, कभी नहीं।’ उसने बिना सोचे-समझे कहा।
‘मेरी बात पूरी कर दीजिएगा?’
‘बिना एक पल गंवाए ही आपकी इच्छा पूरी करना, मैं अपना भाग्य समझता हूं।’ राजेश बोला।
‘आपको मेरे कमल की सौगंध, कृपया आप यहां आना अब सदा के लिए बंद कर दीजिए।’ राधा ने अपना मुंह दूसरी ओर फेरकर कहा।
‘राधा देवी!’ राजेश की छाती पर जैसे मोहल्ले के ही लोगों ने घूंसा मार दिया। उसने इसका विरोध करना चाहा।
राधा उसी प्रकार बिना उसकी ओर देखे बोली‒‘जब तक बाबा जीवित थे, आपके आने पर कभी हमने एतराज़ नहीं किया। मोहल्ले वालों ने कई बार मुझ पर कीचड़ भी उछालना चाहा, परंतु हम आपके दिल को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे। अब बाबा नहीं रहे, इसलिए मूर्तियां भी नहीं बनेंगी। इसलिए अब आपका यहां आने का काम भी क्या रह गया? आपने हमारे लिए बहुत किया, मेरे बच्चे को सुंदर खिलौने-कपड़े दिए, इसलिए हम आपके आभारी हैं। अब आप हमें क्षमा कीजिए। मैं नहीं चाहती मेरा बेटा बड़ा होकर मेरे प्रति गलत बातों का शिकार हो।’……..
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