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क्या है वेस्टिबुलर डिसफंक्शन? जानें लक्षण और उपचार: Vestibular Dysfunction
Vestibular Dysfunction

Vestibular Dysfunction : बाॅलीवुड के एक्टर वरुण धवन इन दिनों अपनी आने वाली फिल्म भेड़िया के प्रमोशन में लगे हुए हैं। प्रोमोशन के दौरान उन्होंने अपनी एक बीमारी के बारे में खुलासा किया कि वो वेस्टिबुलर डिसफंक्शन के शिकार हो चुके हैं। इसमें इंसान का संतुलन बिगड़ जाता है लेकिन कड़ी मेहनत करके उन्होंने अपने आपको इससे बाहर निकाला।

क्या है वेस्टिबुलर डिसफंक्शन?

वेस्टिबुलर डिसफंक्शन एक तरह का कान का डिसऑर्डर है जो कान के अंदरुनी हिस्से में होता है। हमारा कान सुनने में ही मदद नहीं करता, शरीर का बैलेंस मेंटेन करने में भी अहम भूमिका अदा करता है। अंदरूनी कान में वेस्टिब्यूल सिस्टम मौजूद होता है। जिसमें तीन कैनाल, यूट्रिकल, सेक्यूल व अन्य सूक्ष्म संरचनाएं स्थित होती हैं जिनमें ओटोलिथ यानी कैल्शियम कार्बोनेटयुक्त द्रवयुक्त छोटे-छोटे कण मौजूद होते हैं। इनके समुचित संचरण से वेस्टिब्यूल सिस्टम ठीक तरह काम करता है , आंखों और मांसपेशियों के साथ तारतम्य बनाए रखता है और दिमाग को समुचित संदेश भेजता है। जिसकी प्रतिक्रियास्वरूप व्यक्ति के शरीर-दिमाग के बीच बैलेंस बनाए रखने और शारीरिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने में मदद करता है।

लेकिन जब व्यक्ति के एक या दोनों कान के बैलेंसिंग वेस्टिब्यूल सिस्टम में किसी तरह की समस्या हो, तब यह ठीक से काम नहीं करता है। ओटोलिथ कण अपने नियत स्थान यूट्रिकल से भटककर दूसरी असामान्य जगह, पिछली घुमावदार कैनाल में पहुंच जाते है। इससे वेस्टिब्यूल सिस्टम मस्तिष्क को गलत संदेश भेजने लगता है और व्यक्ति को कई तरह की परेशानियां होने लगती है। सिर को घुमाना, ऊपर या नीचे करना, बिस्तर पर करवट लेना, लेटी हुई अवस्था से एकदम बैठने या उठने आदि पर ये उत्तेजित हो जाते हैं।

Vestibular Disfunction
Vestibular dysfunction is a type of ear disorder

सिर व गर्दन की पोजिशन में बदलाव होते ही चक्कर महसूस होते हैं। मरीज ठीक तरह खड़ा भी नहीं हो पाता। इसे वेस्टिबुलर हाइपोफंक्शन डिसऑर्डर कहते हैं। वेस्टिबुलर डिसफंक्शन मरीज के शरीर के बाएं या दाएं हिस्से को या दोनों को इस तरह से बाधित कर सकती है जिससे उसे एक तरफ ;एकतरफा डिसफंक्शन या सिर के दोनों किनारों ;द्विपक्षीय डिसफंक्शन पर हो सकता है। द्विपक्षीय वेस्टिबुलर डिसफंक्शन वाले व्यक्ति एकतरफा वेस्टिबुलर डिसफंक्शन वाले लोगों की तुलना में अधिक गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। इसमें व्यक्ति को चक्कर आना या पोस्टुरल अस्थिरता के एपिसोड बार-बार हो सकते हैं।

वेस्टिबुलर डिसफंक्शन के लक्षण और कारण

वेस्टिबुलर डिसफंक्शन के लक्षण

  • चक्कर आना,
  • मतली या उल्टी आना
  • भीड़भाड़ वाले जगहों या अंधेरे कमरे में चलने में कठिनाई
  • आसपास की चीजों के तेजी से चलने का अहसास होना

वेस्टिबुलर सिस्टम के खराब होने के ये कारण होते हैं-

बिनाइन पेरोक्सीमल पोजीशनल वर्टिगो (बीपीपीवी)- यह समस्या मरीज को अचानक होती है। जब भी वो करवट लेते हैं, गर्दन हिलाते हैं या पाॅश्चर बदलते हैं तो उन्हें अचानक चारों ओर सब कुछ घूमता हुआ महसूस होता है। वो ठीक से खड़ा नहीं हो पाता, चल नहीं पाता जिससे मरीज बहुत घबरा जाता है। कई बार इसके साथ उसे उल्टी का अहसास भी होता है।

लैब्रिंथिनाइटिस- कान के अंदर वायरल इंफेक्शन होने से कान में सूजन आ जाती है। इसमें मरीज को अचानक चक्कर आते हैं, हियरिंग लाॅस हो जाता है या कान में आवाज आ सकती है।

मेनिएरे डिजीज- जिसमें मरीज को हियरिंग लाॅस, चक्कर आना और कान में आवाज आना जैसी समस्याएं होती हैं। मरीज को कई बार कान की नस के सेल्स में पानी भर जाने से कान बंद होने की शिकायत भी रहती है जिसे ओरल फुलनेस कहा जाता है।ऽ वेस्टिबुलर न्यूरोनाइटिस-कान के अंदरूनी हिस्से में एक तरह का ट्यूमर है, जो कान के वेस्टिबुलर सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है। जिसकी वजह से चक्कर आना या हियरिंग लाॅस की समस्या भी होती है।

कब जाएं डाॅक्टर के पास– अगर आपको बहुत ज्यादा चक्कर आते हैं, बैलेंस बिगड़ा हुआ है, या बार-बार चक्कर आएं, तो इसे नज़रअंदाज न करें। इसे सिर्फ शारीरिक कमजोरी न समझें। लक्षण दिखने पर डॉक्टर को इसके बारे में दिखाना उपयोगी होता हैए क्योंकि कई स्थितियां वर्टिगो का कारण बन सकती हैं।

Vestibular Disfunction
If you feel extremely dizzy, out of balance, or have frequent dizziness, don’t ignore it

वेस्टिबुलर डिसफंक्शन डायग्नोज

ईएनटी विशेषज्ञ सबसे पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री से पता लगाते हैं कि मरीज को किस तरह की समस्या है। जैसे- चक्कर कितनी देर तक रहता है, कैसे ठीक होता है, पाॅश्चर या करवट बदलने पर आता है या नहीं, चक्कर के साथ कान में किसी तरह की आवाज आती है, चलने में दिक्कत होती है।

मरीज के वेस्टिबुलर टेस्ट किए जाते हैं जिससे पता चलता है कि चक्कर आने का मुख्य कारण सेंट्रल यानी ब्रेन से जुड़ा है या पेरिफरल यानी कान से जुड़ा है। आमतौर पर पोजीशन बदलने, करवट बदलने या लेटने से चक्कर आते हैं या निरंतर बढ़ते हैं-यह कान से संबंधित कारणों से होता है। इसे बीपीपीवी बीमारी कहा जाता है। डिक्सोलबाय टेस्ट किया जाता है जिसमें मरीज को लेटाया जाता है। यह देखा जाता है कि उसे किस पाॅश्चरल पोजिशन में चक्कर आ रहे हैं।

अगर चक्कर आने के साथ शरीर के किसी भाग में सुन्नपन महसूस होना, कमजोरी, पैर लड़खड़ाना, आवाज का तुतलाना, सिर में तेज दर्द होना जैसे लक्षण ब्रेन से जुड़ा होता है। मरीज को न्यूरोलाॅजिस्ट के पास भेजा जाता है। ऐसी स्थिति गंभीर होती है और डायगनोज के लिए मरीज का एमआरआई किया जाता है।

मरीज की ओडियोमीटरी कराई जाती है जिससे उसके हियरिंग लेवल का पता चलता है जो ट्यूमर या मेनिएर डिजीज में आने वाले चक्कर के साथ सुनने में परेशानी हो सकती है। ट्यूमर का पता लगाने के लिए मरीज का एमआरआई भी कराया जाता है।

उपचार

एसिम्टोमैटिक यानी बीमारी के आधार पर उपचार किया जाता है। अगर मरीज को पाॅश्चरल वर्टिगो है तो उसके लिए मरीज को एपलीज मैन्योवर पाॅश्चरल एक्सरसाइज कराई जाती है। बीपीपीवी वर्टिगो में कान के अंदर पाए जाने वाले पार्टिकल्स के असंतुलन से होता है, उन्हें सेट करने के लिए वेस्टिबुलर रिहेबलिटेशन थेरेपी एक्सरसाइज कराई जाती हैं। ये एक्सरसाइज डाॅक्टर के निरीक्षण में कराई जाती हैं।

Vestibular Disfunction
Vestibular Rehabilitation Therapy

मरीज को कान में होने वाला प्रेशर और चक्कर कम करनेे की दवाइयां दी जाती हैं। इनसे मरीज का बैलेंसिंग सिस्टम मजबूत होता है और मरीज की स्थिति में सुधार आता है। आमतौर पर रिकवरी में 6-12 सप्ताह लग जाते हैं।

एमआरआई की रिपोर्ट में मरीज के कान में कोई ट्यूमर का पता चलता है, तो उसे रिमूव करने के लिए सर्जरी करनी पड़ती है। साथ ही मरीज को पानी अधिक पीने और कम नमक वाला संतुलित और पौष्टिक आहार का सेवन करने की हिदायत दी जाती है।

कैसे रखें ध्यान?

स्थिति में सुधार होने के बाद भी मरीज अगर दवाई ले रहे हैं। फिर भी उन्हें कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए ताकि अचानक चक्कर आने पर मरीज को नुकसान हो सकता है जैसे-

  • बहुत ज्यादा चक्कर आने की स्थिति में बैड से उठकर बाथरूम तक भी अकेले मत जाएं। ऐसा न करने पर आप गिर भी सकते है और आपको चोट लग सकती है।
  • किसी भी तरह की रिस्की एक्टिविटी नहीं करनी चाहिए जैसे- गाड़ी चलाना, अकेले सड़क पार करना, कहीं अकेले जाना।
  • मरीज की सारी मूवमेंट बहुत धीरे-धीरे होनी चाहिए। अगर जमीन से कुछ उठाना हो तो मरीज को आगे झुकने के बजाय बैठकर या स्काॅट पोजीशन में या बहुत धीरे-धीरे उठाएं। बैड से उठते समय भी ध्यान रखें कि झटके से न उठें। धीरे-धीरे उठें। नाॅर्मल होने के लिए कुछ सेकंड के लिए बैठे रहें। धीरे-धीरे खड़े हो और कुछ सेकंड खड़े रहें। उसके बाद धीरे-धीरे चलें। इससे चक्कर आने की संभावना कम रहती है।
  • हैवी मशीन या आग-अंगारों के पास काम करना, गहरे पानी में न जाना, ऊंचाई पर जाना अवायड करें क्योंकि अगर मरीज को अचानक चक्कर आ जाते हैं तो उसके गिरने और दुर्घटनाग्रस्त होने की संभावना बनी रहती हैं।
  • भीड़भाड़ वाली जगह न जाएं क्योंकि इससे घबराहट हो सकती है और चक्कर आ सकते हैं। अगर जाना जरूरी है तो मरीज को कोशिश करनी चाहिए कि भीड़ में बार-बार गर्दन घुमाकर इधर-उधर ज्यादा न देखें। दूर के किसी ऑब्जेक्ट पर ध्यान केंद्रित करें और उसी की ओर बढ़ें।
  • सोते समय रात को बैडरूम लाइट जरूर जलाकर सोएं। संभव हो तो सपोर्ट रखें ताकि गिरने की समस्या से बचा जा सकें।
  • ऐसे मरीज जिन्हें चक्कर आ रहे हों, उन्हें वेस्टिबुलर रिहेबलिटेशन एक्सरसाइज नियमित रूप् से करनी चाहिए। ये एक्सरसाइज बहुत आसान होती हैं जिन्हें वे कही भी और किसी भी समय कर सकते हैं। एक्सरसाइज करने से मरीज का बैलेंसिंग सिस्टम मजबूत रहता है और मरीज को परेशानी नहीं होती।
  • मरीज को अगर कहीं जाना हो, तो अपने साथ चक्कर कम करने की दवाई हमेशा अपने साथ रखनी चाहिए ताकि एमरजेंसी में दवाई ले सकें।

(डाॅ नेहा सूद, सीनियर ईएनटी स्पेशलिस्ट, बीएलके अस्पताल, दिल्ली)

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