यह याद रखें कि एसटीडी रोग किसी एक समुदाय या आर्थिक स्तर केलोगों को नहीं होते। वे हर आयु, जाति,वर्ग, आय, छोटे देहातों व बड़े शहरों में रहने वाले स्त्री-पुरुषों में से किसी को भी हो सकते हैं। प्रमुख एसटीडी रोग हैं:-

गोनोरिया : गोनोरिया को काफी समय से भ्रूण की कंजक्टिवआइटिस अंधता व गंभीर संक्रमण का कारण माना जाता रहा है, जोकि संक्रमित गर्भनाल की वजह से उसे हो सकता है। इसी वजह से पहली ही भेंट में गर्भवती महिलाओं की जांच की जाती है। अगर किसी महिला को इस रोग का काफी खतरा हो तो गर्भावस्था में,बाद में भी इसकी जांच की जा सकती है। यदि गोनोरिया का संक्रमण पाया जाए तो एंटीबायोटिक्स की मदद से इसका इलाज करने की कोशिश की जाती है। इसके बाद एक और कल्चर किया जाता है ताकि वह स्त्री संक्रमण से पूरी तरह सुरक्षित हो जाए। अतिरिक्त सावधानी के तौर पर हर नवजात की आंखों में एक एंटीबायोटिक डाला जाता है। इस इलाज को कम से कम एक घंटे तक टाला जा सकता है।

सिफलिस : चूंकि इस रोग की वजह से कई जन्मजात विकृतियां पैदा हो सकती हैं इसलिए सबसे पहले इसकी जांच का प्रबंध किया जाता है। यदि संक्रमित महिला को चौथे महीने से पहले ही एंटीबायोटिक चिकित्सा दे दी जाए, तो भ्रूण को नुकसान से बचाया जा सकता है क्योंकि उसी समय संक्रमण भ्रूण तक पहुंचता है। एक अच्छी खबर यह है कि पिछले कुछ सालों में मां से शिशु को होने वाले इस संक्रमण में कमी आई है।

क्लामाइडिया : 26 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में सिफलिस व गोनोरिया की अपेक्षा क्लामाइडिया के मामले ज्यादा सामने आते हैं। यदि यह संक्रमण भ्रूण तक पहुंच जाएं तो मां व शिशु दोनों के लिए खतरा बन सकता है। यदि आपके पहले कई सेक्स पार्टनर रह चुके हों तो स्क्रीनिंग और भी जरूरी हो जाती है क्योंकि ऐसे मामलों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है। आधी से अधिक महिलाएं इस संक्रमण के लक्षण नहीं पहचान पातीं। अतः जांच के बिना इसका इलाज भी नहीं हो पाता। गर्भावस्था से पहले या इसके दौरान क्लामाइडिया का सही तरीके से इलाज हो जाए तो काफी हद तक इसके संक्रमण(निमोनिया, आंखों के गंभीर संक्रमण) से बचा जा सकता है। वैसे तो गर्भधारण से पहले ही इलाज हो जाना चाहिए ताकि मां का संक्रमण शिशु तक न पहुंच सके।जन्म के बाद नियमित रूप से नवजात के लिए जिस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल किया जाता है, वह उसे क्लामाइडिया और गोनोरिया संक्रमण से बचाता है।

 

ट्राइकोमोनाइसिस : ट्राइकोमोनाइसिस का सबसे बड़ा लक्षण यही है कि इसके संक्रमण में योनि से हरे रंग का बुरी गंध वाला स्राव होता है। आधे से अधिक रोगग्रस्त महिलाओं को इसके लक्षण का पता ही नहीं चलता। हालांकि इस रोग से कोई गंभीर परेशानी नहीं पैदा होती, किंतु इसके लक्षणों से बेचैनी हो सकती है। गर्भावस्था में उन्हीं महिलाओं का इलाज किया जाता है, जिसके लक्षण साफ दिखाई देते हैं।

एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनेडेफिशियेंसी वायरस) संक्रमण : वैसे सभी महिलाओं की गर्भावस्था के आरंभ में ही एच-आई-वी संक्रमण की जांच होनी चाहिए। उनका इसका कोई पिछला इतिहास हो या न हो! इसकी वजह से ही एड्स होता है, जो न केवल मां बल्कि शिशु के लिए भी हानिकारक है। इलाज के बिना ही, मां शिशु को जन्म दे तो करीब 25 प्रतिशत शिशुओं में यह संक्रमण विकसित हो सकता है (जीवन के पहले 6 महीनों में रोग की पुष्टि हो सकती है)। हालांकि इसके इलाज के बारे में काफी जागरूकता आ गई है। लेकिन जिस भी गर्भवती महिला की जांच पॉजिटिव हो, उसे दोबारा जांच भी करानी चाहिए। जांच काफी सही होती है लेकिन कई बार वायरस न होने के बावजूद पॉजिटिव नतीजे आ जाते हैं। यदि दूसरी जांच भी पॉजिटिव आए तो संक्रमित मां को एंटायरट्रोवायरल दवाएं दी जाएं तो शिशु को संक्रमण होने का खतरा घट जाता है। यदि सी-सैक्शन की मदद से प्रसव किया जाए तो भी संक्रमण का खतरा घटता है।

यदि आपको लगता है कि आप किसी भी एसटीडी रोग से ग्रस्त हैं तो अपने चिकित्सक की राय से जांच कराएं। जांच पॉजिटिव आए तो जरूरत पड़ने पर पूरी चिकित्सा कराएं। इस चिकित्सा से न केवल आपका बल्कि शिशु का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा।

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