Overview:कैंसर की शुरुआत और हर स्टेज की पूरी कहानी, डॉक्टर ने किया कन्फ्यूजन क्लियर
कैंसर धीरे-धीरे शरीर में पनपने वाली गंभीर बीमारी है, जिसकी शुरुआती पहचान मुश्किल होती है। डॉक्टरों के अनुसार यह अलग-अलग स्टेज में बढ़ता है—पहले चरण में यह सीमित रहता है, जबकि चौथे चरण में पूरे शरीर में फैल जाता है। समय रहते जांच और सही इलाज से मरीज की जिंदगी बचाई जा सकती है। इसलिए नियमित चेकअप और छोटे-छोटे लक्षणों को नजरअंदाज न करना बेहद जरूरी है।
Cancer Stages and How It Starts: कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसे सुनते ही मन में डर पैदा हो जाता है। डर की वजह भी साफ है—यह बीमारी शरीर की साधारण कोशिकाओं से शुरू होकर धीरे-धीरे अन्य अंगों तक फैल सकती है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि कैंसर अपनी शुरुआती अवस्था में कोई बड़े लक्षण नहीं दिखाता। इस वजह से अक्सर लोग इसे हल्के में ले लेते हैं और समय पर इलाज नहीं कर पाते।
दरअसल, कैंसर तब शुरू होता है जब कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव (म्यूटेशन) आ जाता है। ये कोशिकाएँ मरने की बजाय लगातार बढ़ती रहती हैं और एक असामान्य गांठ या ट्यूमर बना लेती हैं। यही ट्यूमर आगे चलकर आसपास के अंगों या खून और लसीका के जरिए दूर-दूर तक फैल सकता है।
डॉ. सुरेन्द्र कुमार दाबस (Director – Surgical Oncology, Max Healthcare) बताते हैं कि कैंसर को अलग-अलग चरणों (Stages) में समझना बेहद जरूरी है। इससे यह पता चलता है कि बीमारी किस स्तर पर है और इलाज किस तरह करना है। शुरुआती स्टेज पर पकड़ में आने वाला कैंसर आसानी से ठीक हो सकता है, जबकि आगे बढ़ने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।
शरीर में कैसे होती है कैंसर की शुरुआत?

कैंसर की शुरुआत सामान्य कोशिकाओं से होती है। हर कोशिका का एक जीवन-चक्र होता है—वह बनती है, बढ़ती है और तय समय पर खत्म हो जाती है। लेकिन जब डीएनए (DNA) में बदलाव यानी म्यूटेशन हो जाता है, तो यह चक्र टूट जाता है। अब कोशिकाएँ मरने की बजाय लगातार बढ़ती और विभाजित होती रहती हैं। यही असामान्य वृद्धि आगे जाकर ट्यूमर का रूप ले सकती है। कई बार यह कोशिकाएँ शरीर की इम्यूनिटी को धोखा देकर खून और लसीका ग्रंथियों (Lymph Nodes) के जरिए दूसरे अंगों तक फैल जाती हैं। इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस (Metastasis) कहते हैं। डॉ. सुरेन्द्र कुमार दाबस बताते हैं कि धूम्रपान, शराब, असंतुलित आहार, मोटापा, केमिकल्स, रेडिएशन और परिवार में कैंसर का इतिहास इसके बड़े कारण हो सकते हैं। यही वजह है कि कैंसर की जड़ें बहुत गहराई से जुड़ी होती हैं और यह धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लेता है।
स्टेज 0 और I: शुरुआती संकेत और इलाज की उम्मीद

स्टेज 0 को कार्सिनोमा इन साइटू (Carcinoma in situ) कहा जाता है। इसमें कोशिकाएँ असामान्य जरूर होती हैं, लेकिन वे अपनी जगह से बाहर नहीं निकली होतीं। अगर इस स्तर पर कैंसर की पहचान हो जाए तो यह सबसे आसान स्टेज मानी जाती है। स्टेज I में ट्यूमर छोटा होता है और केवल उसी स्थान तक सीमित रहता है, जैसे ब्रेस्ट या प्रोस्टेट में एक छोटी गांठ। इस अवस्था में मरीज को खास लक्षण महसूस नहीं होते और कैंसर केवल स्क्रीनिंग टेस्ट या जांच से पता चलता है। डॉक्टर दाबस बताते हैं कि इस स्टेज पर अगर इलाज हो जाए तो सफलता दर 90% से ज्यादा होती है। इलाज के लिए अक्सर सर्जरी या हल्की रेडिएशन काफी होती है।
स्टेज II और III: बढ़ती चुनौती और फैलाव का खतरा
स्टेज II में ट्यूमर का आकार बढ़ जाता है और आसपास के ऊतकों या लिम्फ नोड्स तक पहुंच सकता है। कभी-कभी मरीज को गांठ, सूजन, थकान या हल्का दर्द महसूस होने लगता है। स्टेज III में बीमारी और गंभीर हो जाती है क्योंकि अब कैंसर अपनी जगह से निकलकर पास के अंगों और लिम्फ नोड्स में फैल चुका होता है। यह अवस्था ज्यादा कठिन मानी जाती है क्योंकि ट्यूमर का आकार बड़ा और आक्रामक हो सकता है। इस स्टेज पर इलाज के लिए डॉक्टर आमतौर पर सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडिएशन का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करते हैं। डॉ. दाबस का कहना है कि इस स्तर पर समय पर इलाज शुरू करना बेहद जरूरी है, वरना बीमारी स्टेज IV में प्रवेश कर सकती है।
स्टेज IV: जब कैंसर हो जाता है एडवांस्ड
स्टेज IV कैंसर को एडवांस्ड या मेटास्टेटिक कैंसर कहा जाता है। इसमें कैंसर अपनी जगह से निकलकर शरीर के दूसरे अंगों जैसे लिवर, फेफड़े, हड्डियां या ब्रेन तक पहुंच जाता है। यह सबसे गंभीर अवस्था मानी जाती है क्योंकि यहां इलाज पूरी तरह से कैंसर को खत्म करने के बजाय उसे नियंत्रित करने और मरीज को आराम देने पर केंद्रित होता है। डॉक्टर इस स्टेज में कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या हार्मोन थेरेपी जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं। डॉ. दाबस के मुताबिक, इस अवस्था में मरीज को जीवन की क्वालिटी बनाए रखने और तकलीफ कम करने पर जोर दिया जाता है, ताकि जीवन को यथासंभव लंबा किया जा सके।
समय पर पहचान क्यों है जरूरी?
कैंसर का सबसे बड़ा सच यही है कि इसकी शुरुआती पहचान मरीज की जिंदगी बचा सकती है। अगर बीमारी स्टेज 0 या I पर पकड़ में आ जाए तो इलाज आसान, सस्ता और ज्यादा सफल होता है। जबकि बाद के स्टेज पर यह महंगा और कॉम्प्लेक्स हो जाता है। यही कारण है कि डॉक्टर दाबस हमेशा रेगुलर हेल्थ चेकअप और स्क्रीनिंग टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। किसी भी असामान्य गांठ, सूजन, लम्बे समय तक रहने वाली खांसी, थकान, या अचानक वजन कम होने को हल्के में नहीं लेना चाहिए। परिवार में अगर पहले किसी को कैंसर रहा हो तो और भी सतर्क रहना जरूरी है। समय पर पहचान ही वह चाबी है जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार बन सकती है।
