Sunny Deol on Being Star Kid: सनी देओल ऐसा नाम है जो ही कानों में पड़ता है तो आंखों के सामने एक फौलादी चेहरा, दमदार आवाज़ और सीने पर हाथ मारते हुए ‘ढाई किलो का हाथ’ कहने वाला एक सच्चा एक्शन हीरो आ जाता है। लेकिन पर्दे पर लहराता ये हीरो असल जिंदगी में भी उतना ही संघर्षशील, ज़मीन से जुड़ा और ईमानदार है। उनकी कहानी सिर्फ एक स्टार किड की नहीं, बल्कि एक मेहनती इंसान की है जिसने हर चुनौती का डटकर सामना किया।
स्टार किड होना कोई गारंटी नहीं
बहुत लोग मानते हैं कि स्टार किड्स की ज़िंदगी आसान होती है और काम उनके लिए रेड कारपेट की तरह बिछा होता है। लेकिन सनी देओल इस भ्रम को तोड़ते हैं। वह साफ कहते हैं कि, “जब मैं अपने भाई बॉबी को लॉन्च करना चाह रहा था, कोई भी डायरेक्टर मेरे साथ काम नहीं करना चाहता था।” उनकी नाराज़गी इतनी बढ़ गई थी कि उन्होंने लोगों को “पाजी” कहना बंद कर दिया। सनी का ये गुस्सा किसी घमंड से नहीं, बल्कि रिश्तों की अहमियत न समझने वालों से था। फिर बड़ी मुश्किल से राजकुमार संतोषी ‘बरसात’ के लिए राज़ी हुए और बॉबी की शुरुआत हुई।
बेताब से शुरू हुआ एक्शन, पीठ में दर्द तक पहुंचा
सनी का एक्शन ही उनकी पहचान है। लेकिन यह पहचान अचानक नहीं बनी। ‘बेताब’ फिल्म के सेट पर जब एक घोड़ा बेकाबू हो गया और कोई भी एक्शन मास्टर उसे काबू में नहीं कर पा रहा था, तब सनी खुद आगे बढ़े और कहा, “एक बार मैं कोशिश करूं।” उन्होंने घोड़े पर काबू पाया, और वहीं से उनके एक्शन करियर की शुरुआत हो गई। सनी खुद बताते हैं कि इस सफर में उन्हें कई चोटें लगीं, चार बार सर्जरी तक करानी पड़ी, पीठ में आज भी दर्द रहता है। लेकिन काम के प्रति उनकी लगन ऐसी थी कि दर्द पीछे छूटता गया और मेहनत आगे बढ़ती गई।
ईमानदारी ही असली शक्ति है
सनी का मानना है कि ईमानदारी से किया गया काम कभी बेकार नहीं जाता। चाहे सफलता मिले या नहीं, एक संतोष जरूर मिलता है जो असली खुशी देता है। वे कहते हैं, “आप गुस्से में नहीं रहते, शिकायत नहीं करते। आप आगे बढ़ते हैं।” यह सोच उन्हें नकारात्मकता से दूर रखती है। वे हमेशा खुद को नई शुरुआत के लिए तैयार रखते हैं।
अगली पीढ़ी को सीख
अपने बेटे करण देओल को वे यही सिखाते हैं कि अच्छा इंसान बनो, मेहनत करो, और ज़मीन से जुड़े रहो। सनी का कहना है, “हमारे परिवार में सबने अपनी-अपनी लड़ाई लड़ी है। पापा (धर्मेंद्र) पंजाब से आए, खुद को साबित किया। मैं भी चाहता हूं कि मेरा बेटा अपने दम पर आगे बढ़े।” सफलता के लिए कोई शॉर्टकट नहीं होता… सनी इस बात को न सिर्फ मानते हैं, बल्कि जीते भी हैं। “हर बार, लगातार… खुद को काम में झोंकना ही पड़ता है।”
गलतियों से सीखना ज़रूरी है
सनी देओल का करियर चाहे जितना सफल रहा हो, लेकिन वे अपनी गलतियों को भी खुले दिल से स्वीकार करते हैं। फिल्म ‘डर’ के साथ उनका अनुभव बेहद कड़वा रहा। वे कहते हैं, “मैंने उस फिल्म में काम करके सबसे बड़ी गलती की थी। मुझे झूठ से नफ़रत है।” इस अनुभव ने उन्हें इतना आहत किया कि उन्होंने फिर कभी यश चोपड़ा के साथ काम नहीं किया। सनी देओल की जिंदगी सिखाती है कि स्टारडम सिर्फ ग्लैमर का खेल नहीं है। उसमें पसीना, धैर्य, और गहरी आत्म-साक्षात्कार की ज़रूरत होती है। दिल साफ हो, इरादे मजबूत हों, और आप अपने काम से प्यार करते हों तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको सफल होने से नहीं रोक सकती।
