आमिर खान को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं
है। मि. परफेक्शनिस्ट के नाम से मशहूर आमिर
अपनी हर भूमिका में जान डाल देते हैं। हाल ही में
उनकी फिल्म ‘पीके’ रिलीज हुई, जिसने सिर्फ 3 दिन
में 90 करोड़ का बिजनेस करके नया रिकॉर्ड बनाया।
‘पीके’ की रिलीज के बाद आमिर से मुंबई ब्यूरो की
गरिमा की मुलाकात के अंश’पीके’

‘पीके’की सफलता के लिए बहुत-बहुत बधाई। इस फिल्म के माध्यम से
आप दर्शकों को क्या संदेश देना चाहते थे?

हमारी फिल्म का सीधा-सादा संदेश है कि उस भगवान पर विश्वास करें जिसने यह
दुनिया बनाई है। भगवान पर विश्वास करना ठीक है लेकिन अंधविश्वास करना सही नहीं
है। आज समाज में बहुत सारे धर्मगुरु हैं जो गरीब, जरूरतमंद, डरे हुए लोगों का फायदा
उठाते हैं, उनसे बचना चाहिए। लेकिन हर गुरु गलत नहीं होता है, जो अच्छे गुरु हैं वह
अच्छी बातें सिखा रहे हैं, उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए।

आप किस धर्म पर आस्था रखते हैं?

मैं दरअसल इंसानियत के धर्म को मानता हूं। मुझ पर मेरी अम्मी का असर ज्यादा है।
बचपन से ही मैं अपनी अम्मी से इंस्पायर होता रहा हूं। अपनी अम्मी के साथ मैं हज पर
भी गया हूं। जब मैं रीना (पहली पत्नी) के साथ था, तब रीना की मम्मी पूजा-हवन
कराती थी, पुजारी आते थे, हम सब मिलकर बैठते थे।
‘पीके’ और परेश रावल की फिल्म ‘ओ माय गॉड’ में काफी समानता है।

इस बारे में क्या कहेंगे?

मैंने ‘ओ माय गॉड’ नहीं देखी है। फिल्म की थीम एक हो सकती है लेकिन दोनों फिल्में
एकदम अलग हैं। एक ही थीम पर कई फिल्में बन सकती हैं जैसे रोमांस या बदला लेने
पर, शिक्षा पर। लव स्टोरी पर तो पचासों फिल्म बनती हैं। हमारी फिल्म ‘पीके’ का ह्रश्वलाट
है कि एक एलियन पृथ्वी पर आया और उसका रिमोट कंट्रोल गुम गया। बस उसी की
तलाश में वह विभिन्न लोगों से मिलता है और इंसान के तौर-तरीकों को समझने की
कोशिश करता है। एलियन के गोले में भाषा नहीं है तो वह अंतर्मन की बात पढ़ लेता है।

फिल्म की स्क्रिह्रश्वट में आपका कितना इनपुट था?

फिल्म की स्क्रिह्रश्वट पूरी की पूरी राजकुमार हिरानी और अभिजीत की है। हां दो बातें मैंने
कही थीं, एक एलियन भोजपुरी भाषा बोले और दूसरा उसका पान खाना।
हर फिल्म के प्रोडक्शन में आप काफी दखलअंदाजी करते हैं। इस फिल्म की

मेकिंग में आपका कितना हाथ है?

यह बिल्कुल गलत आरोप है। मैं पूरी तरह से डायरेक्टर के कहे अनुसार काम करता हूं।
मैं हमेशा बेहतरीन डायरेक्टर्स को फॉलो करता हूं इसलिए हर फिल्म में मेरे काम में
नयापन नजर आता है। अगर अपनी सोच लगाऊंगा तो सब फिल्में एक सी लगेंगी।
आप किसी भी अवॉर्ड फंक्शंस में नहीं जाते हैं और ना ही अवॉर्ड लेते हैं।

क्या आपको अवॉर्ड पर विश्वास नहीं है?

मुझे हर बार दर्शकों से अवॉर्ड मिलता है और मेरे लिए यही सबसे बड़ा रिवॉर्ड है। मैंने तो
अपनी फिल्मों को नेशनल अवॉर्ड के नामांकन के लिए भी भेजना बंद कर दिया है। मुझे
वाकई बाहरी अवॉर्ड्स में कोई रुचि नहीं है। जिन दर्शकों के लिए हम फिल्म बनाते हैं, वे
इसे पसंद करें, बस यही बहुत है।