Gachwaha Community: सदा सुहागन रहो… यह एक वाक्य हर सुहागिन, मिलने वाले आशीर्वाद में सुनने की कामना रखती है। इसलिए तो करवाचौथ का व्रत भी हमारे देश में काफी प्रधानता से मनाया जााता है। आज भी किसी गांव में कोई महिला सुहागिन मरती है तो उसे देखने और उसके पैर छूने के लिए पूरी गांव की महिलाएं जमा हो जाती है और पैर छूकर यही आशीर्वाद मांगती है कि वह भी सुहागिन ही मरे। सुनकर, यह सब कितना अजीब लगता है। लेकिन सच है। अब आपको इससे भी अजीब बात बताते हैं जिसको पढ़कर आप कुछ पल के लिए तो शॉक ही रह जाएंगी।
आज हम ऐसे गांव के बारे में चर्चा करेंगे, जहां कि सुहागिन महिलाएं अपनी पति की रक्षा के लिए 5 महीने तक का विधवा जीवन जीती हैं।
पढ़कर अजीब लगा ना ?
हमें भी यह सुनकर अजीब लगा था क्योंकि आज तक तो हम सुनते आए थे कि 16 शृंगार करने से पति की आयु बढ़ती है। लेकिन इस अजीब गांव में सुहागिनों को 16 श्रृंगार करने की ही मनाही है।

कौन सा है यह समुदाय
इस अनोखा रिवाज को गछवाहा समुदाय की महिलाओं द्वारा निभाया जाता है। ये महिलाएं अपने समुदाय के रिति-रिवाजों को लंबे समय से मानते हुए आ रही हैं। गछवाहा समुदाय की सुहागिन महिलाएं सदा सुहागिन रहने की कामना करते हुए और अपने पति की लंबी उम्र के लिए 5 महीने तक विधवाओं जैसा जीवन जीती हैं। इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होता है कि भारत में कोई ऐसा समुदाय है जिसकी महिलाएं शादीशुदा होते हुए भी विधवाओं जैसा जीवन जीती हैं। क्योंकि भारत में विधवा होना प्राचीन काल से ही अशुभ माना जाता रहा है जिसके निवारण के लिए उस समय के रुढ़िवादी सतीप्रथा जैसी प्रथा चलाए हुए थे। खैर सती प्रथा पर कभी और बात करेंगे, आज चर्चा सुहागिन महिलाओं के विधवा जीवन जीने पर करते हैं।

गछवाहा समुदाय की कुलदेवी हैं तरकुलहा देवी
यह समुदाय उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से का रहने वाला है। इस समुदाय का मुख्य काम ताड़ी(ताड़ के पेड़ से निकलने वाला पेय पदार्थ) उतारने का है। इस समुदाय के पुरुष वर्ष में लगभग 5 महीनों तक लगातार ताड़ के पेड़ से ताड़ी उतारते हैं(यह ताड़ के पेड़ का रस होता है)। इसी दौरान इनकी पत्नियों द्वारा इनकी लंबी उम्र के लिए विधवा जीवन जीने का रिवाज निभाया जाता है। इनकी पत्नियां इन 5 महीनों के दौरान ना तो सिंदूर लगाती हैं और ना ही किसी तरह का कोई श्रृंगार करती हैं। इस दौरान हंसी-ठिठोली भी नहीं की जाती है और महिलाएं उदासी में ये महीने बिताती हैं।
इस समुदाय की कुलदेवी तरकुलहा देवी हैं। जब गछवाहा समुदाय के आदमी ताड़ी उतारने का काम करते हैं, उस समय इनकी पत्नियां अपने श्रृंगार का सामान तरकुलहा देवी के मंदिर में रखती हैं। यह मंदिर पूर्वी यूपी के गोरखपुर जिले में स्थित है।

50 फीट के होते हैं ताड़ के पेड़
पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर ताड़ी का सेवन किया जाता है जिसके कारण गछवाहा समुदाय का यह मुख्य पेशा है। ताड़ के पेड़ 50 फीट या उससे अधिक लंबे होते हैं और ताड़ी उतारते समय थोड़ी सी लापरवाही इंसान को मौत के मुंह में धकेल देती है। इस कारण ही वहां की महिलाएं इस रिवाज को पूरी श्रद्धा से निभाती हैं।
सावन की नाग पंचमी के दिन भरी जाती है मांग
सावन के मौसम में पड़ने वाले नागपंचमी के दिन यह दोबारा अपनी मांग भरती हैं। इस दिन तरकुलहा मंदिर में पूजा-अर्चना की जाती है। फिर महिलाएं प्रसाद में माता पर चढ़ाए गए सिंदूर से अपनी मांग भरती हैं। समुदाय के लोग अपनी क्षमता के अनुसार मंदिर में पशुओं की बलि भी चढ़ाते हैं।
आधुनिकता यहां भी पड़ा असर
आधुनिकता का यहां भी असर पड़ा है और नई पीढ़ियां इस तरह के रिति-रिवाजों के साथ-साथ ताड़ी उतारने के काम को भी ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं। लेकिन यह उसी तरह से है जिस तरह से करवा चौथ को शहरों में रहने वाले लोग नहीं निभाते हैं। लेकिन वहीं दूसरी और आज भी करवा चौथ काफी धूम धाम से महिलाएं मनाती है इसका खुद का एक बाजार है।
