How to Handle Teenagers
How to Handle Teenagers

Summary: किशोरावस्था में ज़िद का असली कारण

13 साल के बाद बच्चे दिमागी विकास, हार्मोनल बदलाव, पहचान की खोज, स्वतंत्रता की चाह और सामाजिक दबाव के कारण ज़िद्दी दिखते हैं। सही संवाद और समझदारी से यह व्यवहार संभाला जा सकता है।

How to Handle Teenagers: 13 साल, यह सिर्फ एक उम्र नहीं बल्कि बच्चों का ट्रांजिशन फेज है। जिसमें बच्चा किशोर अवस्था में प्रवेश करता है। माता-पिता अक्सर इस उम्र में बच्चों में बहुत से बदलाव देखे हैं। जैसे, बच्चा पहले से ज्यादा जिद्दी हो गया है, बातें नहीं मानता, मनमानी करता है इत्यादि। आखिर इस उम्र में क्या होता है जो बच्चे में इतना बदलाव आता हैं। आईए जानते हैं इस लेख में। साथ ही जानेंगे माता-पिता किस तरह इस उम्र के बच्चों को संभाले।

13 से 19 साल में बच्चों के अंदर दिमागी और हार्मोनल रूप से काफी बदलाव होते हैं। जिसका असर बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ता है।

दिमाग का विकास: इस उम्र के बच्चों के दिमाग का प्रीफ्रंटल कोरटेक्स जो सोचने, समझने, विचारने और तर्क का कार्य करता है धीमा हो जाता है। जबकि अमिग्डाला (Amygdala) जो दिमाग का वह हिस्सा है जो भावनाओं को कंट्रोल करता है तेजी से विकसित होता है। यही कारण है कि इस उम्र में बच्चों के अंदर डर, गुस्सा और जिद्द की भावना बढ़ती है। साथ में बढ़ता है उनके अंदर अहम की भावना जैसे ‘मैं बिल्कुल सही हूं’।

हार्मोनल बदलाव: टीनएज में बच्चों में एस्ट्रोजन, टेस्टोस्टेरोन और ग्रोथ हार्मोन का स्तर तेजी से बदलता है। जिसका असर उनके मूड और बर्ताव दोनों पर देखा जाता है।

How to Handle Teenagers
Big changes in teenage years

सामाजिक बदलाव: इस उम्र में बच्चा आसानी से अपने दोस्तों की बातों में आ जाता है। खुद को अच्छा और इंटेलिजेंट दिखाने का दबाव बच्चा महसूस करने लगता है। यही कारण है कि वह अपनी अलग पहचान बनाने की जिद्द में कई बार गलत संगत या लत में पड़ जाता है।

स्वतंत्रता की खोज: इस उम्र में बच्चा खुद को बड़ा समझने लगता है और वह चाहता है उसे भी सुना जाए। उसकी बातों को या उसे महत्वपूर्ण समझा जाए। ऐसा न होने पर बच्चा जिद्द करता है।

माता-पिता क्या ना करें: ‘यह मत करो, यह मत कहो’, इस तरह बच्चे को हर समय कंट्रोल करने की कोशिश ना करें। इसे बच्चा अपने अहम पर हमले की तरह देखा है, परिणाम स्वरुप वह और जिद्दी हो सकता है।

‘तुम इसकी तरह क्यों नहीं बनते’ माता-पिता का इस तरह का तुलनात्मक व्यवहार बच्चों को भावनात्मक रूप से कमजोर करता है।

‘तुम हमेशा गलती ही करते हो, कभी कुछ अच्छा नहीं कर सकते’ बच्चे को इस तरह का डांटना उसके जिद्द को बढ़ाता है।

माता-पिता क्या करें: जब बच्चा गुस्से में हो या जिद्द कर रहा हो तो उसे डांटने या समझने की बजाय खुद को शांत रखें। गुस्सा कम होने पर उससे बात करें। जाने वह क्यों जिद्द कर रहा है।

उसकी भावनाओं को ना कहने की बजाय समझे।

उसके छोटे-छोटे काम उसे खुद करने दे। हर समय ऑर्डर देने की बजाय विकल्प दें कि तुम ये या फिर ये कर सकते हो।

बच्चों की निजी स्पेस का ख्याल रखें। बच्चों के साथ मिलकर उनका टाइम टेबल बनाएं। स्क्रीन टाइम कंट्रोल करना क्यों जरूरी है। यह समझाते हुए धीरे-धीरे उस पर कंट्रोल करें।

निशा निक ने एमए हिंदी किया है और वह हिंदी क्रिएटिव राइटिंग व कंटेंट राइटिंग में सक्रिय हैं। वह कहानियों, कविताओं और लेखों के माध्यम से विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करती हैं। साथ ही,पेरेंटिंग, प्रेगनेंसी और महिलाओं से जुड़े मुद्दों...