Hindi Motivational Story: अपने पिता के कांपते हाथ देखकर ना जाने क्यों आशी का विश्वास भी कांप रहा था. आशी ने अपने पापा दीपक को सदा एक चट्टान की तरह देखा था, अडिग और मजबूत. अपने पापा के सहारे ही तो आशी अपने झूठे और मक्कार पति मनुज को छोड़ कर इस घर मे आ गई थी.
आशी के जीवन मे कितने ही उतार चढ़ाव आए मगर अपने पापा का हाथ थामकर आशी ने हर रास्ते को पार किया था. आशी आज भी अपने पापा को दफ्तर मे चल रही राजनीति के बारे मे अवगत कराना चाहती थी, वो बताना चाहती थी कि कैसे आशी उस दलदल मे फंस कर छटपटा रही हैं. वो इस नौकरी को छोड़ कर, घर पर ही कुछ करना चाहती हैं.
मगर अपने पापा के कांपते हाथ को देखकर आशी को ऐसा प्रतीत हुआ कि आशी के पापा इस जीवन की भागदौड़ मे बहुत पीछे छूट गए हैं. ये पापा आशी को बहुत अनजाने से लगे, क्या इतने वर्षो तक वो एक धोखे मे जी रही थी और अब जीवन अपनी पूरी नंगी सच्चाई के समक्ष उसे मुहँ चिढ़ा रहा था.
पापा आशी को उदास देखकर बोले “क्या बात हैं आशी, दफ्तर की कोई परेशानी हैं क्या?”
“बड़ी उदास लग रही है, चल तुझे चाय बना कर पिलाता हूं “
आशी भी बिना बोले पापा के पीछे पीछे चली गई. पापा जब चाय छान रहे थे तो चाय उनके कांपते हाथों के कारण फिर से छलक उठी. आशी को एकाएक लगा जैसे शायद उसकी नींद आज खुली हैं.
वो अब तक एक खुशफहमी मे जी रही थी कि उसके ऊपर एक छत हैं मगर आज इस भरभराती छत को देखकर आशी को लगा कि अब समय आ गया हैं कि उसे इस छत के लिए कुछ करना पड़ेगा.
आशी ने बिना अधिक सोचे पापा के पसंदीदा लौकी के कोफ्ते बनाए. पापा पहला निवाला तोड़ते ही एक दम छोटे बच्चे बन गए थे और खाते हुए पुराने दिनों की यादों मे गुम हो गए थे.
“पता हैं बेटा आज ऐसा लगा मानो तेरी मम्मी यहीँ कहीँ हो, बिल्कुल ऐसे ही कोफ्ते तेरी मम्मी भी बनाती थी”
आज शायद वर्षों बाद पापा और आशी ने बहुत देर तक बात करी .पापा की आवाज जिससे पहले पूरा घर थर थर कांपता था,अब भीगा हुआ और थोड़ा सा धीमा सुनायी पड़ रहा था. आशी जब अपने पति के घर से आयी थीं तब वो 34 वर्ष की थी ,मम्मी अपने कैंसर से जूझ रही थी और पापा रिटायर्ड हो चुके थे. इसी कशमकश में आशी ने अपनी शादी के पांच वर्ष काट दिए थे मगर जब पानी सर से ऊपर चला गया तो आशी को मजबूरन वापिस आना पड़ा. आशी को समझ नहीं आ रहा था वो क्या किफ़ायत दे?
मगर आशी के पापा ने अपना हाथ फिर से उसके सिर पर रख दिया था और एक ढ़ाल की तरह आशी के साथ खड़े रहे थे.
मम्मी की मृत्यु होने पर भी वो आशी को संभालते रहे, उन्होंने आशी के सामने कभी भी अपना दुख उजागर नहीं किया था. दिन, महीनों में और महीने साल मे परिवर्तित हो गए थे, आशी का तलाक हो गया था. आशी अपनी नौकरी में व्यस्त हो गई थी. अकेले होने की असुरक्षा भावना उसके अंदर इतनी अधिक रोपित थी कि वो बस पैसा कमाने और बचाने की मशीन बन कर रह गई थी. वो अधिक से अधिक पैसा बचा कर रखती ताकि आशी का बुढ़ापा सुरक्षित रहे. घर का पूरा ख़र्च आशी के पापा उठाते थे. वो अपनी सीमित पेंशन मे ये कैसे कर पा रहे हैं, ये आशी ने कभी भी जानने की कोशिश नहीं करी थी. एक आध बार भैया ने दबी जुबान मे आशी को समझाना चाहा तो उन्हें लालची, पत्थर दिल और भी ना जाने किस किस उपाधि से नवाजा गया था. इसलिए एक शहर मे रहने के बाद भी वो कभी कभी ही आते थे.
मन ही मन आशी अपनी बातों को सही मानते हुए. सोचती “मैं तो अकेली हूँ, मेरा बुढ़ापा कैसे कटेगा? पापा के पास तो मैं हूँ और फिर भैया भी तो हैं “
इस पूरी प्रक्रिया में आशी इतनी स्वार्थी हो गई थी वो खुद भी कहाँ जान पायी थी.
मगर आज आशी को पहली बार लगा कि इस घर की छत कांप रहीं हैं, कमजोर हो रही हैं. अब समय आ गया हैं कि इस जर्जर होती छत को नयी छत का सहारा मिले.
अगले दिन दफ्तर में आशी ने मन लगाकर काम किया.खुद को छत बनाने की प्रक्रिया से गुज़रते हुए आशी के अंदर तेजी से बदलाव आने लगे. दफ्तर की राजनीति के बजाय आशी ने काम पर ध्यान देना शुरू कर दिया था.
अब दफ्तर के काम से आशी को कोई शिकायत नहीं रही थीं. आशी ने जीवन को अब सब्र और शुक्रिया की नजर से देखना शुरू कर दिया था. दूसरों की जिंदगी मे झाँकना के बजाय आशी ने अपनी जिंदगी पर काम करना शुरू कर दिया था.
आशी के पापा अब उसके पापा नहीं बल्कि उसके एक छोटे बच्चे बन गए थे. पापा जिद करके अपनी पसंद के खाने बनवाते, कभी दोनों पापा बेटी शनिवार की रात देर तक ढेरों पुरानी बातें करते.
चार महीने मे ही पापा के स्वस्थ्य मे तेजी से सुधार आ गया था.
भाई और भाभी अब आशी के खुशगवार मूड को देखकर हफ्ते मे एक चक्कर लगा देते थे.
धीरे धीरे आशी को भी महसूस होने लगा था कि जिंदगी इतनी भी बुरी नहीं हैं जितना वो अब तक महसूस कर रही थी. हर एक के जीवन मे अपने अपने हिस्से के सुख और दुख होते हैं.
एक रोज़ आशी अपने दफ्तर का काम कर रही थी कि पापा उसके पास आ कर बैठ गए और बोले “मैने और समर्थ ने बहुत सोच समझ कर ये घर तेरे नाम कर दिया हैं .
“मुझे मालूम हैं हर लड़की का अपने घर का सपना होता है, ये घर अब तुम्हारा हैं “
आशी कुछ बोल नहीं पायी बस उसकी आखें गीली थी. मन ही मन वो सोच रही थी कि उसने अपने पापा के लिए आज तक क्या किया हैं?
मगर वो हमेशा एक मजबूत ढाल की तरह उसके साथ खड़े रहे हैं. यहाँ तक की आज उन्होंने अपनी छत भी उसके नाम कर दी हैं.
घर भी वही हैं, लोग भी वही हैं बस अब आशी इस घर की छत को मजबूत कर रही थी अपनी हिम्मत से और अपनी लगन से. पापा अब एक बच्चे की भूमिका मे थे जो रोज आशी से बाहर खाने की जिद करते थे और आशी एक माँ की तरह उन्हें बहलाती और घर पर ही खाना खाने की हिदायत देती थी.
बरसात के मौसम से पहले ही आशी ने घर की छत की अच्छे से मरम्मत करवा दी थी ताकि कैसी भी बरसात या आँधी तूफान आए, घर की छत हमेशा स्वाभिमान के साथ घर को मजबूती से संभाले रखे.
