Life Lesson: धन की लालसा आपको चैन से जीने नहीं देती। जरा सोचिए यदि आपसे थोड़ा-सा भी धन खो जाता है तो आपकी रातों की नींद उड़ जाती है और मन में हाय-हाय मची रहती है या अचानक कोई व्यक्ति आपको लाखों रुपये देने को तैयार हो जाए तो भी आपकी रातों की नींद उड़ जाएगी।
हम सोचते हैं कि अरबपति बहुत अमीर होते हैं परन्तु हम यदि एक सौ रुपए का उधार लेते हैं तो अरबपति व्यक्ति के ऊपर एक लाख या दस लाख का उधार होता है। अब दोनों में से कौन अधिक गरीब हुआ और कौन अधिक अमीर? कहना बड़ा मुश्किल है। धन की कमी कभी भी, किसी भी समय व स्थान पर हो सकती है।
आपके पास कितना धन है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। बहुत बड़ी-बड़ी कम्पनियां जो करोड़ों में कमाती हैं, वे भी कर्जे में डूब जाती हैं। ऐसा होता है कि नहीं? इसलिए धन के लिए इतनी चिन्ता क्यों? हम तो केवल भरोसा रखें कि ‘जितना भी मेरे लिए आवश्यक है, उतना मुझे अवश्य मिल जाएगाÓ इस भाव से यदि हम पूरी तरह सौ प्रतिशत काम करते हैं तो फिर जितना हमें मिलना है, मिलता है और जितना खर्च होना है, खर्च होता है।
धन की लालसा आपको चैन से जीने नहीं देती। जरा सोचिए यदि आपसे थोड़ा-सा भी धन खो जाता है तो आपकी रातों की नींद उड़ जाती है और मन में हाय-हाय मची रहती है या अचानक कोई व्यक्ति आपको लाखों रुपये देने को तैयार हो जाए तो भी आपकी रातों की नींद उड़ जाएगी। ऐसे मुफ्त में आने वाले धन के लालच में आप बहुत से काम ऐसे भी करने को राजी हो जायेंगे, जो आप वैसे कभी नहीं करते।
उसके लिए आप कुछ न कुछ कारण भी जुटा लेंगे और फर्क भी जुटा लेंगे। उन्हीं कामों को वैसे कभी भी आप नहीं करते, जो अब इस धन की लालसा में कर सकते हैं। बहुत ही अमीर व्यक्ति तो अपने मित्रों पर भरोसा भी नहीं कर पाते, क्योंकि उन्हें यही पता नहीं लगता कि वे सब सचमुच उनके मित्र हैं भी या उनके पैसे या पद के कारण उनसे जुड़े हुए हैं?
एक बार भारत के जाने-माने विद्वान ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के जीवन में ऐसा ही हुआ। उन्हें वाइसराय ने घर पर खाने का न्यौता दिया था। यह ब्रिटिश राज के समय की बात है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर अपनी साधारण धोती-कमीज पहने खाने के लिए गए, परन्तु उन कपड़ों में तो उनको भीतर घुसने नहीं दिया गया, उन्हें घर वापस जाकर कोट-पैन्ट पहन कर दोबारा आना पड़ा। खाने की मेज पर उन्होंने खाने की वस्तुओं को अपने कोट को खिलाना शुरू कर दिया- ‘लो-लो, खाओ-खाओ। आनन्द से खाओ। स्वादिष्ट तो है न?’ इत्यादि।
वाइसराय और दूसरे सभी व्यक्ति यह देखकर हैरान-परेशान हो गए कि यह क्या हो रहा है। कोट-पैन्ट को खाना खिलाया जा रहा है। विद्यासागर बोले, ‘हां, यह सब खाना तो इन कपड़ों के लिए ही है, क्योंकि बिना इनके मुझे तो भीतर भी नहीं आने दिया गया। सो इन्हीं कपड़ों को खाना देना चाहिए, न कि मुझे।’
इस वित्तेष्णा को अपने जीवन में देखें और जाचें। यह वित्तेष्णा हमें जीवन में बहुत नीचे गिरा सकती है। थोड़े से धन की लालसा, ‘यह चार-पांच सौ, हजार रुपए, क्या फर्क पड़ता है, चलो अपने पास रख लो’, हमें कहां से कहां ले जाती है- अपने भीतर इसे जांचना बहुत आवश्यक है। चीन में एक कहावत है, ‘दूसरों को दो, और तुम्हें सारा मिल जाएगा, और यदि तुम मु_ïी बन्द रखोगे तो तुम्हारे हाथ और छोटे हो जाएंगे और तुम्हें उतना ही कम मिलेगा। अंत में, तुम्हारे पास दर्द करती हुई तुम्हारी छोटी-छोटी उंगलियां ही रह जाएंगी।’ भारत में ऐसा माना जाता है कि जितना अधिक तुम्हारे मां-बात ने दूसरों को दिया, उससे भी कई गुना अधिक आज तुम्हारे जीवन में तुम्हें मिल रहा है। इसलिए वित्तेष्णा से ऊपर उठना बहुत आवश्यक है।
