Hindi Kahani: ठीक है वक़ील साहब, आप कल आ जाय, हम बैठकर बात करते हैं”पापा ने कह तो दिया, पर सच यही था कि अभी भी वो अनिर्णय की स्तिथि में थे। कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें इस स्थिति में क्या निर्णय लेना चाहिए? पेशानी पर सलवटें और मुख पर झल्लाहट स्पष्ट थी, “ऐसी स्तिथि आएगी कभी सोचा नहीं था!”
“ससुराल में कुल चार लोग फिर भी ये लड़की ससुराल में ऐड़ज़स्ट क्यों नहीं कर पायी ?”
मस्तिष्क में आज रात होनेवाली रूप रेखा चलचित्र की भाँति दौड़ने लगी थी। मै जानती थी माँ और पापा मेरे घर छोड़ कर आने के लिए मुझे ही दोषी ठहराएँगे। इस बार तो दोषारोपण कुछ ज़्यादा ही होगा क्योंकि,अब मैंने वो घर हमेशा के लिए छोड़ दिया है। बल्कि लेकिन इसके अतिरिक्त मेरे पास चारा ही क्या था। स्वावलंबी बनने की सामर्थ्य मुझ में नहीं थी,इसीलिए मुझे आश्रित होना पड़ रहा है।
अच्छा है आप लोगों ने मुझ से प्रश्न नहीं किया वरना मेरा जवाब सुनकर दुखी ही होते!सच तो यह है कि,मुझ जैसी मूर्ख और अनपढ़ लड़की ,राजन के लायक ही नहीं थी। लोग अक्सर उपहास करते हुए कहते,
“पता नहीं क्या सोचकर इन लोगों ने अनपढ़ लड़की के साथ अपने बेटे का रिश्ता तय कर दिया”
“आज के ज़माने में ऐसे मूर्ख लोग भी हैं जो सोचते हैं कि लड़की को नहीं पढ़ाना चाहिए”
आप लोगों से एक प्रश्न पूछती हूँ। “क्या सारा क़सूर मेरा ही है?”
मैंने राजन को अपनी समस्त कलाओं द्वारा रिझाने का प्रयास किया,लेकिन मेरे पति ने मुझ से प्रेम करना तो दूर,मेरे प्रति कभी करुणा भी नही दर्शाई। वो तो अपनी पत्नी का नाम तक मुझे देने में हिचकिचाते रहे।

हर रोज़ बदल बदल कर नयी नयी लड़कियों का आगमन घर में हुआ करता । हँसी मज़ाक़ चलता ,रंग रलियाँ मनायी जाती। विवश और लाचार बनी मै ,आया की भाँति नाश्ता बना बना कर उन तक पहुँचाया करती थी। कभी प्रतिवाद करने का साहस भी जुटाती तो ,अंधाधुँध लात घूसों से मेरे पति ,निर्ममता पूर्वक मुझ पर प्रहार करने लगते। आज भी उसकी जलन और दाग़ मेरे शरीर पर मौजूद हैं। आपकी कोमलांगी लाड़ली की आत्मा और शरीर किस तरह घायल है,क्या आप देख सकेंगे?
मेरी पढ़ाई के लिए आपके पास रूपए पैसे की कमी थी,ऐसी बात नहीं है। कमी थी तो केवल इच्छा और संकल्प की,क्योंकि मै एक लड़की थी। जिस समय मुझे आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता थी उस समय आपने मुझे उससे वंचित रखा पर वीरेंद्र भैया को पुत्र होने के नाते प्रदान किया। बच्ची थी,बुद्धि न होने के कारण सही ग़लत का ज्ञान नहीं था,आमोद प्रमोद ही भाता था,पढ़ाई कठिन लगती थी,शायद इसीलिए पढाई में मन नहीं लगता था । लेकिन मन तो पढ़ाई में वीरेंद्र भैया का भी नहीं लगता था,फिर भी आप लोगों ने जिस तरह उन्हें ,ज़बर्दस्ती पढ़ाई की ओर उन्मुख किया। उतनी ही ज़िम्मेदारी मेरे प्रति क्यों नहीं महसूस की!मेरे व्यक्तित्व विकास की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया?मेरे बालहट को मेरी स्वेच्छा कहकर टाल दिया?अज्ञानता की भीड़ में यूँ ही भटकने के लिए क्यों छोड़ दिया?
माँ याद है मेरे संबंध में आप क्या कहती थीं,
“क्या किया जाय जब उसकी इच्छा ही पढ़ने की नहीं है। ठीक है,अभी हमें सुख दे रही है,भविष्य में कुशल ग्रहणी बनेगी”
और पापा आप?आप तो मोटी रक़म देकर अपने भावी दामाद को मूर्ख बनाने की उम्मीद लेकर बैठे थे। देख लीजिए,आज दहेज तो डूबा ही साथ साथ आपकी लाड़ली बेटी के जीवन को भी ले डूबा। “
दहेज के बल पर बेटी को विदा करने तथा पुत्र को साथ रखने की धारणा ने ही लड़कियों को आज नारकीय जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य किया है। अच्छा होगा यदि लड़कियों को भी शिक्षित होने का सही अधिकार प्रदान किया जाय। उनसे भी कुछ प्राप्ति की आशा रखी जाय। यह विचार कि “लड़की का कुछ लेना नहीं चाहिए,वो कुछ नहीं कर सकती “सोचकर उसे लाचार और असमर्थ न बनायें। “
“उसे भी बुढ़ापे का सहारा बनने का मौक़ा दें। लड़कियाँ किसी मायने में लड़कों से कम नहीं हैं। पुत्रवत्त संरक्षण करने की क्षमता लड़कियों में भी है,केवल उपयुक्त अवसर देकर उनकी अंतर्निहित शक्तियों को प्रज्ज्वलित कर दें। असक्षम हम दिखते मात्र हैं पर हैं नहीं। हमें कमज़ोर बनाया गया है वस्तुतः हम कमज़ोर नहीं हैं। किस काल और किन परिस्थितियों को समाज में हमारे अतिरिक्त शक्ति के अभ्यास और परिचालन पर रोक लगा दी पता नहीं। पर इतना तो सच है कि निरंतर विस्तार पा रहे मानव समाज द्वारा नारी उत्थान विषयक चिंतन में शिथिलता आने के कारण ही आज नारी कमज़ोर और समाज पुरुषवाद से घोषित हुआ है।
मै केवल इतना कहूँगी कि नारी मात्र बौद्धिक क्षेत्र में ही नहीं,बल्कि शारीरिक शक्तियों में भी किसी पुरुष से कम नहीं है। अंतर्निहित शक्तियों के अभ्यास और परिचालन के अभाव में ही वो आज कमज़ोर और असमर्थ कहला रही है।
आप लोगों को ,समानता की खोज में पराकाष्ठा की सीमा छूने वाला कथन लग रहा होगा । लेकिन ग़ौर करेंगे तो सत्य स्वयं प्रग़ट हो जाएगा। मूल्याँकन की दृष्टि से भी यदि परिश्रमी नारी और भोगी पुरुष की शक्तियों का हम तुलनात्मक अध्ययन करेंगे तो पाएँगे कि ,नारी की क्षमता ने ही उस नारी को सक्षम बनाया है। जातिगत और लैंगिक भिन्नता से कोई सबल और निर्बल नहीं होता। ये अंतर तो प्रकृतिदत्त ही है ,उसमें हम क्या कर सकते हैं। नारी स्वयं के अंतर्निहित शक्तियों के परिचालन के अभाव में ही असमर्थ और आश्रित बनी है। उन्हें केवल अवसर प्रदान करने की आवश्यकता है। परिश्रम और लग्नशीलता का जहाँ तक प्रश्न है वो तो पुरुषों के बीच भी अलग अलग होते हैं।
माँ आपके और पापा की छोटी सी भूल और मेरी अज्ञानता ने ही मुझे इस गर्त में धकेला है। मेरे संबंध में आपने जो सपने संजोये थे वे चूर चूर हो गए हैं। मै घाव पर मलहम लगाने यहाँ आयी हूँ,ऐसा आप क़तई न सोचें। मै तो आपकी समस्या बनकर आयी हूँ। अन्यथा मै भी भैया की तरह सुखमय जीवन बिता रही होती।
आप लोगों ने जो ग़लत क़दम उठाया ,उसका प्रायश्चित तो आपको करना ही होगा। खंडहर स्वरूप आपकी बेटी जो आपके सामने खड़ी है उसे अपने पास रखकर, पढ़ा लिखा कर इतना सक्षम बनाना होगा कि वो,अपनी जीविका के साधन स्वयं जुटा सके। साथ ही यह प्रण भी करना होगा कि-मेरा उदाहरण देकर सभी अभिभावकों को सचेत कराकर उन्हें बताएँगे कि लड़कियाँ भी शारीरिक और मानसिक तौर पर लड़कों की तरह आत्मनिर्भर हो सकती हैं। अभिभावक केवल उन्हें एक स्वच्छ और सुघड वातावरण प्रदान करें ताकि वे अपने जीवन को सार्थक बना सकें।
बचपन की ज़रूरतो की पूर्ति तो अभिभावक कर सकते हैं,पर कर्म की खोज तो उन्हें अपनी योग्यता और रुचि के अनुसार स्वयं करनी है। एक राष्ट्र, विकास के क्रम में उन्हें केवल अवसर प्रदान कर सकता है। यदि लड़कियों को भी माँ-बाप की गोद से लेकर क़ानून तक ,लड़कों के समान अधिकार और अवसर प्रदान किए जायँ तो वे,अवश्य ही अपने पैरों पर खड़ी होकर,आत्म निर्भर बन पाएँगी। ये विस्मृत न करें कि लड़की एक संतान होने के साथ-साथ देश की नागरिक भी है।
