तुम जानते हो संन्यासी यह लाल रंग ही क्यों पहनते हैं? कोई और क्यों नहीं। जैसे जब सूर्य अस्त हो रहा होता है। जब करीब-करीब छुप जाने केटाइम में होता है तो सूर्य का भी रंग लगभग ऐसा ही हो जाता है। निकलते वक्त भी ऐसा है और छिपते वक्त भी बिल्कुल ऐसा है। अग्नि का लाल चिह्न, आग की पहचान। जैसे मुर्दे को हम जलाते हैं चिता में तो आग की लपटें लाल ही रंग की होती हैं। संन्यासी ने चुनाव किया लाल रंग पहनने का तो उसके पीछे यह मनोविज्ञान था कि वह यह माने कि यह जो मेरे बदन में कपड़ा है वह जब-जब रंग नजर आएगा, तब-तब उसे यह ख्याल रहे कि संसार के लिए तो मैं मर चुका। मैं संसार के लिए जीवित नहीं। मृत्यु में हूं मैं। जिसे निरंतर अपनी मृत्यु याद है वही संन्यासी है।

हम जिंदगी जीने के हजारों उपाय करते हैं पर हम अपनी मौत के विषय में कभी भी नहीं सोचते है। ऐसे, जैसे मौत कभी आनी ही नहीं। नहीं आनी क्या? नहीं आएगी क्या? किसकी नहीं आएगी? कौन बचा है मौत से? जो जन्मा है सो मरेगा।

जो उपजयो सो बिनस है परो आज के काल 

नानक हर गुण गाए ले छाड़ सगल जंजाल।

बोले-जो पैदा हुआ है सो मरेगा। जो जन्मा है वह नष्ट होगा। जो उत्पन्न हुआ है उसका नाश होगा। तो तेरा भी शरीर पैदा हुआ है। क्या यह नहीं जाएगा? क्या यह नहीं मरेगा। 

हम लोग मौत के बारे में न तो सुनना चाहते हैं। न तो हम मौत के बारे में कोई चर्चा करना चाहते हैं। और तो मौत की बात को भी अशुभ मानते हैं। बोलो भी मत। इसलिए तो तुम्हारे श्मशान घाट शहर से बाहर होते हैं। ताकि उधर जाना भी तब हो जब कोई मर जाए ओर उसका अंतिम संस्कार करना हो तभी हम श्मशान घाट में पैर धरें। उसके पहले न जाना पड़े मुझको।

कुछ ऐसा है जो शरीर के मर जाने पर भी बचता हो? महत्त्वपूर्ण है कि नहीं? हम जीने का इतना इंतजाम कर रहे हैं। हम खाने का इतना इंतजाम कर रहे हैं। रात सोने से पहले, बोले-चने भिगो दो। बोले-क्यों? बोले-सुबह खाएंगे। मायने तुम्हें कितना भरोसा है कि रात की नींद के बाद भी सुबह जगना होगा ही। देखो, कितना विश्वास है आदमी को। आदमी बीज बोता है जमीन में। पेड़ लगता है और सोचता है फल खाऊंगा मैं इसके। कितना विश्वास है। क्या गारंटी है कि तुम जिओगे तब तक?।

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