Hindi Katha: एक बार की बात है, राजा कार्तवीर्य अपनी रानियों के साथ नर्मदा नदी में जल-क्रीड़ा कर रहे थे। तब खेल -ही-खेल में उन्होंने अपनी सहस्र भुजाओं से नर्मदा का प्रवाह रोक लिया। संयोगवश वहाँ से कुछ दूरी पर ही लंकापति रावण का शिविर लगा था। वह सेना सहित वहाँ विश्राम कर रहा था । कार्तवीर्य द्वारा नर्मदा का मार्ग रोके जाने से उसका जल किनारे तोड़ता हुआ आस-पास भरने लगा। शीघ्र ही रावण का शिविर भी जल में डूब गया। क्रुद्ध होकर रावण ने अपने दूतों को इसका कारण जानने के लिए भेजा।
दूतों ने लौटकर सूचना दी “महाराज ! कुछ दूरी पर ही राजा कार्तवीर्य जल-क्रीड़ा कर रहे हैं। उन्होंने ही अपनी सहस्र भुजाओं से नर्मदा का मार्ग बाधित कर दिया है और इसी कारण हमारा शिविर जल में डूब गया है।’
दूतों की बात सुनकर रावण क्रोध से तिलमिला उठा – “दुष्ट कार्तवीर्य को अपनी सहस्र भुजाओं पर बड़ा अहंकार हो गया है। इसलिए उसने लंकापति रावण से वैर करने का दुःसाहस किया। उसे इस अपराध का दण्ड हम अवश्य देंगे। “
यह कहकर दैत्यराज रावण कार्तवीर्य के पास जा पहुँचा और उन्हें ललकारते हुए बोला – ” दुष्ट ! आज तूने लंकापति रावण का तिरस्कार किया है। अपनी सहस्र भुजाओं के बल पर तू स्वयं को अजेय समझ रहा है। अभी तक तुझे कोई पराजित नहीं कर सका, लेकिन आज तेरा सामना शक्तिशाली रावण से है, जिसने अपनी इन दो भुजाओं से ही भगवान् शिव सहित कैलाश को उखाड़ लिया था । यदि तू क्षत्रिय है तो आ मेरे साथ युद्ध कर । तेरी इन सहस्र भुजाओं को आज मैं छिन्न-भिन्न कर डालूँगा।”
क्षत्रिय-पुत्र कार्तवीर्य शत्रु की ललकार सहन न कर सके और उन्होंने धनुष उठाकर रावण से युद्ध आरम्भ कर दिया। रावण ने उन पर अनेक दिव्य अस्त्रों से वार किया, किंतु उन्होंने केवल पाँच बाणों से ही अहंकारी रावण को उसकी सेना सहित मूर्च्छित कर अपने धनुष की प्रत्यंचा से बाँध लिया और अपनी राजधानी माहिष्म पुरी में लाकर बंदी बना लिया।
‘परम पराक्रमी राजा कार्तवीर्य ने शक्तिशाली रावण को पराजित कर सेनासहित बंदी बना लिया’, यह समाचार शीघ्र ही चारों ओर फैल गया। तीनों लोकों में वीरवर कार्तवीर्य की जय-जयकार गूँज उठी। उनका बल-पौरुष देखकर देवगण भी उनकी प्रशंसा करने लगे।
जब पुलस्त्य ऋषि ने अपने पौत्र रावण के बंदी बनाए जाने का समाचार सुना तो वे बड़े दुखी हुए। वे कार्तवीर्य के पास आए और बोले – ” राजन ! दैत्यराज रावण ने आपके प्रति जो अपराध किया है, आप उसे क्षमा करें। आप परम दयालु हैं। आपने सदा याचकों की इच्छा पूर्ण की है। मैं भी आज याचक बनकर आपके पास आया हूँ। कृपया मेरी इच्छा पूर्ण करें।
पुलस्त्य ऋषि के कहने पर कार्तवीर्य ने रावण को मुक्त कर दिया।
