Vindhyachal ka maan mardan
Vindhyachal ka maan mardan

Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है – सम्पूर्ण पर्वतों में विंध्याचल पर्वत को एक श्रेष्ठ और विशाल पर्वत के रूप में पूजा जाता था । अनेक प्रकार के वृक्षों ने विंध्याचल को सुशोभित कर रखा था । पुष्पों से लदी हुईं लताओं एवं वल्लरियों पर अनेक रंग-बिरंगे आकर्षक पक्षी कूकते रहते थे । मृग, वराह, सिंह, खरगोश, वानर आदि अनेक वन्यपशु विंध्याचल पर निर्भय होकर विचरते थे । अनेक नदियों और झीलों ने उसे हरा- भरा बना रखा था । देवता, गंधर्व, अप्सरा और ऋषि, मुनि – विंध्याचल का आकर्षण सभी को अपनी ओर खींचता था ।

एक दिन देवर्षि नारद ‘नारायण-नारायण’ का जप करते हुए आकाश-मार्ग से जा रहे थे । तभी उनकी दृष्टि विंध्याचल पर पड़ी । विंध्य की सुंदरता ने उन्हें भी मोहित कर दिया और कुछ देर वहाँ विश्राम करने के उद्देश्य से वे विंध्य के पास पहुँचे । नारद को देख विंध्याचल ने उनका भरपूर स्वागत किया । सुंदर आसन प्रदान कर उन्हें फल अर्पित किए और उनकी स्तुति की । विंध्य के अतिथि-सत्कार से नारद बहुत प्रसन्न हुए ।

सेवा-सत्कार के बाद विंध्याचल हाथ जोड़कर बोले – “मुनिवर! आपके शुभ चरणों से मेरा घर पवित्र हो गया । जैसे जगत् के कल्याण के लिए सूर्यदेव भ्रमण करते हैं वैसे ही आपका भ्रमण देवताओं को अभय प्रदान करता है । नारदजी! आप इस समय कहाँ से आ रहे हैं? यदि उचित समझें तो अपने मन की बात मुझे बताने की कृपा करें ।”

किध्याचल की बात सुनकर देवर्षि नारद बोले – “पर्वतराज ! इस समय मैं श्रेष्ठ सुमेरुगिरि से आ रहा हूँ । वहाँ मैंने इन्द्र, अग्नि, यम, कुबेर, वरुण और सम्पूर्ण लोकपालों के असंख्य भवन देखे हैं । हे विन्धय वहाँ मैंने अनेक प्रकार के स्वादिष्ट और दुर्लभ भोग पदार्थ देखे हैं । कलकल बहती नदियाँ वहाँ मधुर संगीत उत्पन्न करती हैं । सुमेरुगिरि स्वर्ग के समान सुंदर है । जैसे देवताओं में इन्द्र को श्रेष्ठ माना जाता है, वैसे ही पर्वतों में सुमेरुगिरि को उत्तम और ऐश्वर्ययुक्त पद प्राप्त है । उसकी तुलना किसी अन्य पर्वत से नहीं की जा सकती ।”

इस प्रकार देवर्षि नारद ने अनेक प्रकार से सुमेरुगिरि की प्रशंसा की । जिसे सुनकर विंध्याचल के हृदय में सुमेरु के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न हो गई । कुछ समय वहाँ विश्राम करके देवर्षि नारद तो ब्रह्मलोक पधार गए, किंतु विंध्य पर्वत का मन चिंता से भर गया । कामना और ईर्ष्या से सद्बुद्धि नष्ट हो जाती है और मन में पाप उत्पन्न हो जाता है । ईर्ष्यावश विंध्य की बुद्धि भी पापग्रस्त हो गई । वे सोचने लगे – ‘देवर्षि नारद व्यर्थ ही सुमेरुगिरि की इतनी प्रशंसा करते हैं । मेरे शिखर पर भी अनेक देवता सुशोभित होते हैं । सुमेरु पर्वत केवल इसलिए स्वयं को श्रेष्ठ मानता है क्योंकि सूर्य आदि ग्रह-नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं । यदि मैं अपने ऊँचे शिखरों से सूर्य के मार्ग को रोक दूँ, तो वह सुमेरुगिरि की परिक्रमा नहीं कर सकेगा और तब निश्चय ही उसका (सुमेरु) अभिमान खण्डित हो जाएगा ।’

यह विचार कर विंध्यगिरि ने उसी क्षण अपने शिखरों को आकाश तक फैला लिया । सूर्य के मार्ग को अपने शिखरों से रोककर विंध्याचल सूर्योदय की प्रतीक्षा करने लगे । प्रात: सूर्यदेव अपनी किरणों से अंधकार को दूर करने लगे । आकाश उनकी किरणों से प्रकाशित हो गया । सरोवर में कमल खिलने लगे । प्राणी अपने-अपने कार्यों में तत्पर हो गए । लेकिन तभी सूर्यदेव का आगे का मार्ग अवरुद्ध हो गया । उनके मार्ग में अनेक पर्वत शिखर दिखाई देने लगे ।

जब उन्हें ज्ञात हुआ कि विंध्याचल ने उनके मार्ग को रोक लिया है । वे चिंतित होकर उनसे बोले – “विंध्यगिरि आपने अपने शिखरों से आज मेरा मार्ग क्यों रोक लिया? अपने इन शिखरों को मेरे मार्ग से हटाने का कष्ट करें, जिससे कि मैं सृष्टि को प्रकाश देने के अपने नियम का पालन कर सकूँ ।”

सूर्य की बात सुनकर विंध्याचल अहंकारपूर्ण शब्दों में बोले – “दिनकर! मेरे शिखर अब नीचे नहीं हो सकते । यदि ये तुम्हारा मार्ग रोक रहे हैं तो तुम अपना मार्ग बदल लो, लेकिन इनकी ऊँचाई अब कम नहीं हो सकती ।”

सूर्यदेव बोले – “हे विंध्य गिरि! देवर्षि नारद से सुमेरु की प्रशंसा सुनकर तुम्हारे मन में उसके प्रति ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हो गया है और यही कारण है कि तुम यह दु:साहस कर रहे हो । याद रखो, दूसरों के प्रति दया और प्रेम की भावना रखकर ही कोई प्रशंसा का पात्र बनता है । सुमेरु ने न तो कभी किसी के साथ दुर्व्यवहार किया है और न ही ईर्ष्यावश किसी के कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की है । उसमें सभी मानवीय गुण विद्यमान हैं, यही कारण है कि वह समस्त प्राणियों द्वारा प्रशंसनीय है । सुमेरु के यही गुण उसे अन्य पर्वतों से श्रेष्ठ बनाते हैं । यदि तुम यह सोचते हो कि इस कार्य से तुम्हें यश प्राप्त होगा और तुम सुमेरु को अपमानित कर सकोगे, तो यह तुम्हारा भ्रम है । बल्कि यह कार्य तुम्हें जगत् में लोकनिंदा का पात्र बना देगा ।”

सूर्यदेव की बात सुनकर अहंकारी विंध्याचल क्रोधित हो गए और कड़कते हुए बोले – “सूर्य! तुम जानते हो, किसे परामर्श दे रहे हो? मैं सुमेरु से अधिक बलशाली और श्रेष्ठ पर्वत हूँ । मेरे इन शिखरों के सामने वह सौंदर्यहीन है । तुमने मुझे परामर्श देने का दु:साहस किया है । इसलिए अब मैं तुम्हें आगे बढ़ने का मार्ग कदापि नहीं दूँगा ।”

विंध्यगिरि के अहंकार के कारण जब सूर्य को आगे बढ़ने का मार्ग नहीं मिला तो वे उसी स्थान पर रुक गए । उनके आगे न बढ़ने से प्रकृति का नियम भंग हो गया । जगत् में हाहाकार मच गया । रात्रि जानकर पश्चिम तथा दक्षिण के प्राणी निद्रा में डूबे हुए थे, जबकि पूर्व और उत्तर के प्राणी सूर्य के तेज ताप से जलने लगे थे । सृष्टि में चारों ओर मानो विनाशकाल उत्पन्न हो गया । हवन, पूजन, यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण आदि बंद हो गए । जगत् में अव्यवस्था फैल गई । तब देवगुरु बृहस्पति के परामर्श से इन्द्रादि देवगण ब्रह्माजी के साथ भगवान् विष्णु की शरण में पहुँचे और उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे । उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उनसे वहाँ आने का कारण पूछा ।

तब इन्द्र बोले – “प्रभु ! सुमेरुगिरि से ईर्ष्या के कारण विंध्य पर्वत ने सूर्य का मार्ग रोक लिया है । सूर्य का कर्त्तव्य है कि वह पूर्व से उदय होकर पश्चिम में अस्त हो जाए । जिससे कि प्राणियों को समान रूप से उनकी किरणों का लाभ प्राप्त होता रहे । किंतु विंध्य की इस धृष्टता से सूर्य के कर्त्तव्य में विघ्न उत्पन्न हो गया है । जगत् में अव्यवस्था फैल गई है । इसलिए दयानिधान! हम आपकी शरण में हैं । आप शरणागत की सहायता करने की कृपा कीजिए ।”

भगवान् श्रीहरि बोले – “देवताओं ! परम तपस्वी अगस्त्य मुनि इस समय काशी में विराजमान हैं । वे सम्पूर्ण जगत् की जननी देवी जगदम्बा के अनन्य उपासक हैं । उन पर माता जगदम्बा की विशेष कृपा है । केवल वे ही विंध्य पर्वत के उत्कर्ष को रोक सकते हैं । अतः तुम सब शीघ्र ही काशी जाओ और अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करके उनकी सहायता प्राप्त करो । मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य परम दयालु और मुनि हैं । जगत् के कल्याण के लिए वे कोई उपाय अवश्य करेंगे ।” इस प्रकार भगवान् विष्णु के परामर्श से इन्द्र, ब्रह्मा, शिव और बृहस्पति सहित सभी देवगण काशी की ओर चल पड़े ।

काशी पहुँचकर उन्होंने गंगा के पवित्र तट पर स्नान किया । तत्पश्चात् वे सभी श्रीहरि का नाम जपते हुए अगस्त्य मुनि के पवित्र आश्रम पर पहुँचे । उस समय अगत्स्य मुनि माता जगदम्बा के ध्यान में लीन थे । तब देवगण उनके निकट ही विराजमान हो गए । जब उनका ध्यान टूटा तो इन्द्रादि देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया । महर्षि अगस्त्य ने देवताओं से वहाँ आने का कारण पूछा । तब इन्द्र ने उन्हें विंध्याचल की धृष्टता के विषय में बताकर उनसे सहायता करने का अनुरोध किया ।

महर्षि अगस्त्य देवताओं की सहायता करने के लिए सहर्ष तैयार हो गए । यह देखकर देवताओं में हर्ष की लहर दौड़ गई और उनसे आज्ञा लेकर वे अपने लोकों को लौट गए । जगत्-कल्याण के लिए अगस्त्य मुनि भगवान् विश्वनाथ, कालभैरव और सिद्धि विनायक को नमस्कार करके काशी से चल पड़े । उनकी पत्नी लोपामुद्रा उनके साथ थीं । अपने योगबल से वे शीघ्र ही विंध्य के निकट पहुँच गए ।

तप के प्रभाव से मुनि अगस्त्य के शरीर से सैकड़ों सूर्यों के समान दिव्य तेज निकल रहा था । अगस्त्य मुनि को वहाँ देख विंध्य भयभीत हो गए । उन्होंने शीघ्रतापूर्वक अगस्त्य मुनि की स्तुति की और अपने उन्नत शिखरों को उनके चरणों में झुका दिया । वे बार-बार झुककर भक्तिभाव से अगस्त्य मुनि को प्रणाम करने लगे । विंध्याचल को नतमस्तक होते देखकर महर्षि अगस्त्य ने कहा – “हे वत्स! तुम्हारे शिखर बहुत ऊँचे हैं । मैं बूढ़ा इन पर चढ़ने में असमर्थ हूँ । इसलिए जब तक मैं लौट न आऊँ तब तक तुम ऐसे ही लेटे रहना ।”

विंध्याचल ने नम्रतापूर्वक अगस्त्य मुनि की बात स्वीकार कर ली और उसी स्थिति में झुका रहा । तब अगस्त्य मुनि उस पर चढ़कर दक्षिण दिशा की ओर चले गए । मार्ग में उन्हें शैल पर्वत दिखाई दिया । उन्होंने वहाँ अपना आश्रम बना लिया और सदा के लिए वहीं रहने का निश्चय कर लिया । अगस्त्य मुनि की प्रतीक्षा में विंध्य पर्वत उसी प्रकार झुका रहा और इस प्रकार सूर्यदेव के पश्चिम दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग पुन: खुल गया ।

ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)