Kids story in hindi: फागुन गाँव की निम्मा परी को भला कौन नहीं जानता? वह रोज हाथों में खुरपी और फावड़ा लिए, बुधना के साथ खेतों में काम करने जाती है। गाँव के बच्चे-बड़े किसी से भी पूछो, वह प्यार से निम्मा परी की ओर इशारा करके बता देगा, “देखो, देखो, वह रही निम्मा परी। अपने पति बुधना के साथ हँस-हँसकर बातें करती हुई जा रही है।”
औरतें कहतीं, “पति-पत्नी में ऐसा प्यार हमने तो कभी नहीं देखा, जैसा बुधना और निम्मा परी में है। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते हैं। एक के पैर में काँटा चुभ जाए तो दूसरा दर्द से अकुला जाता है।”
शुरू में लोगों को बड़ा अजीब लगा था। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले निपट साधारण और काले भुजंग मजदूर बुधना में परी को ऐसा क्या भा गया कि गाँव और शहर में इतने बड़े-बड़े सेठ-साहूकारों के होते हुए भी उसने बुधना को ही शादी के लिए चुना। पर इतने दिनों तक उन्हें प्यार से साथ रहते देख, समझ गए कि परी का मन रूप, रंग, दौलत या पैसा नहीं, सच्चा मन देखता है। फिर बुधना का मन तो सुच्चे मोती जैसा है, जिसने कभी किसी का बाल बराबर दिल नहीं दुखाया।
पर यह निम्मा परी बुधना के पास आई कैसे? फागुन गाँव में जाकर कभी पूछो, तो पता चलेगा कि वहाँ की औरतें आज भी बड़ा रस ले-लेकर इसका वर्णन करती हैं।
बात आज से कोई बीस बरस पुरानी है। या शायद इससे भी कुछ पुरानी हो, क्योंकि पुरानी बातों में कभी-कभी पंख लग जाते हैं और उनका कुछ ओर-छोर पता नहीं चलता। तो खैर, असल बात तो निम्मा परी की ही चल रही है ना! सुनाता हूँ, सुना ही देता हूँ वह कहानी। …
हुआ यह कि एक बार परीलोक में रहते-रहते निम्मा परी का जी उचाट हो गया। वह थी भी कुछ अलग सी। और परियों से तो बिल्कुल ही अलग। ज्यादातर परियों को तो बस, नाच-गाना ही अच्छा लगता था। वे रात-दिन उसी का अभ्यास करतीं और गाने का सुर बाँधा करती थीं। निम्मा परी ने भी सीख लिया थोड़ा-बहुत, पर ज्यादा नहीं। इसकी बजाय उसे आसपास की दुनिया में घूमना और वहाँ के लोगों के बारे में जानना अच्छा लगता था। वह बहुत बातें सोचा करती थी। खासकर धरती के लोगों की बातें। उनका किस्म-किस्म का रहन-सहन, खान-पान, बोलना-चालना। उनके किस्से-कहानियाँ। उनके हँसी–मजाक और सुख-दुख की अजब कहानियाँ। धरती से लौटकर आई परियाँ इस बारे में बड़ी मजेदार बातें सुनाती थीं और निम्मा परी आँखें फाड़े, बड़ा रस ले-लेकर सुना करती थी।
एक बार की बात, निम्मा परी सोचने लगी, ‘ओहो, बड़ी अजीब है यह परियों की दुनिया। यहाँ जो चीज जैसी है, हमेशा वैसी ही बनी रहती है। इससे तो धरती लाख गुना अच्छी है, जहाँ फूल कभी खिलते हैं तो कभी मुरझाते हैं। लोग आज दुखी हैं तो कल सुखी भी नजर आते हैं। कभी लोग रूठते हैं तो मान भी जाते हैं। चीजें बदलती हैं, मगर इस बदलाव में कितना सुख है। इससे जीवन में कम से कम हलचल तो रहती है। वरना एक जगह खड़ा-खड़ा पानी तो सड़ जाता है। नदी सुहानी है, सुंदर है, पर इसीलिए तो कि वह कल-कल बहती है। सुंदरता समय के साथ बहने में है। रुके रहने में भला क्या मजा?’
आखिर ऊबकर निम्मा परी ने अपनी माँ स्वप्नपरी से कहा, “माँ-माँ, मैं जरा धरती पर घूमने जा रही हूँ।”
सुनकर माँ का दिल सिहर सा गया। बोलीं, “ना-ना बेटी, ऐसा न करना। धरती पर तो बड़ी मुसीबतें हैं…!”
निम्मा की जिद देख उसकी माँ ने डरकर कहा, “अरे बेटी, क्या अकेली जाओगी? धरती पर तो सुना है, सब तरह के लोग रहते हैं। बड़े दुष्ट लोग भी वहाँ हैं। मैंने सुना है, वहाँ अखबार बड़ी उलटी-सीधी खबरों से भरे रहते हैं। पता नहीं, क्या-क्या हो रहा है वहाँ? … ऐसे में किसी ने तुम्हारे पंख चुरा लिए या छड़ी चुराकर तुम्हें कोठरी में बंद कर दिया तो क्या होगा? धरती पर अकेले जाना तो ठीक नहीं, बेटी।”
निम्मा हँसकर बोली, “माँ, आप डरती क्यों हैं? हर जगह बुरे लोग हैं तो अच्छे भी। अगर ऐसे ही डरकर रहे तो घर से निकला मुश्किल होगा।”
निम्मा की माँ कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं, “अच्छा बेटी, नहीं मानती हो तो परीरानी से इजाजत ले लो।”
निम्मा दौड़ी-दौड़ी गई परीरानी रूपमंजरी के पास। वे उस समय शीशे के आगे बैठी फूलों से श्रृंगार कर रही थीं और हौले-हौले कोई पुराना गीत गुनगुना रही थीं। निम्मा ने धरती पर जाने की इच्छा प्रकट की तो परीरानी को भी थोड़ा अजीब लगा। चेहरे पर बड़ा सख्त सा भाव। उन्होंने कुछ देर प्यार से समझाया, पर निम्मा परी की बहुत उत्सुकता देखी तो बोलीं, “ठीक है निम्मा। जाना ही है तो वहाँ बहुत देर न करना। जल्दी लौट आना।”
बस, निम्मा को तो जैसे मुँहमाँगी मुराद मिल गई। अगले ही पल वह पंख फैलाए धरती की ओर उड़ती जा रही थी, उड़ती जा रही थी। धरती के लोगों के प्यार और सरलता के बारे में उसने और परियों से तरह-तरह की बातें सुनी थीं। पर आज तो उसे खुद धरती को देखने का सुख मिलने वाला था। उसे परियों से सुनी इतनी दिलचस्प बातें याद आ रही थीं कि लगा, वह असल में नहीं, सपने में उड़ी जा रही है। उसे रोमांच सा हो आया।
और फिर वह धरती पर पहुँची तो लगा, परियों की बातें सच थीं, पर फिर भी यहाँ की सुंदरता का वर्णन तो किसी ने नहीं किया। आहा, कितनी सुंदर है यह धरती! कितने सुंदर लहलहाते खेत। हवा में झूमते- इतराते फूल, मीठे-मीठे फल। सुंदर पहाड़, हरी-भरी घाटियाँ और दूर-दूर तक फैली छतनार दरख्तों की कतारें। चिड़ियों की मीठी चहकार, कुहु कुहु… कुहुक….. चिरपों… चिरपों… चिरपों…! सचमुच, सुंदरता तो यह होती है। भला परीदेश के लोग यह क्या जानें?
*
किसी जादू की तरह पल भर में ही धरती की अनोखी सुंदरता ने उसे विभोर कर दिया। खेत की मिट्टी और फसलों की महक को उसने महसूस किया। ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों का गर्वीला अट्टहास सुना। कल-कल करती नदियों के सुरीले गाने के साथ सुर मिलाकर गाया। और फिर एकाएक उसके मुँह से निकला, “आहा, धरती के क्या कहने!… आहा-आहा, धरती के क्या कहने!”
कुछ देर तो निम्मा परी यों ही विमूढ़ सी खड़ी रही। फिर यों ही आसपास के दृश्यों का नजारा लेते हुए, घूमने निकल पड़ी। नदी के किनारे लाल-पीले वनफूलों की झाड़ियाँ ही झाड़ियाँ थीं। खिलखिलाकर हँसती हुईं। कुछ दूर आम, अमरूद, जामुन और शिरीष के पेड़ों की कतारें ही कतारें। बीच में टेढ़ी-मेढ़ी पतली सी पगडंडी। निम्मा उसी पर चल रही थी। चलती जा रही थी।… नदी के पानी को छूकर आई हवाएँ उसके मन में मीठी सिहरन पैदा कर रही थीं।
चलते-फिरते वह एक गाँव में पहुँची। वह गाँव तो सुंदर था ही, नाम भी वैसा ही सुंदर, फागुन। सरसों की हुमचती फसलें और चारों ओर हवा में नाचते रंग-बिरंगे फूल ही फूल। फूलों की उस घाटी के बीच फागुन गाँव ऐसा लगता था, जैसे पूरा गाँव खुद में ही एक अनोखा फूल हो, जो धरती फोड़कर निकल आया है।
निम्मा को लगा, फागुन गाँव के साथ-साथ बहती नदी कल-कल गीत गाती हुई, पूरे गाँव को दुलार रही है। बिल्कुल माँ की तरह। … नदी किनारे दूर-दूर तक रेत बिखरी हुई थी। वहाँ ईंटों के बड़े- बड़े चट्टे लगे थे। विशाल डील-डौल और कसरती बदन वाला एक युवक उन ईंटों को सिर पर ढो-ढोकर पास के खेत में ले जा रहा था।
निम्मा ने देखा कि सिर पर आठ-दस ईंटें ढोकर ले जा रहे उस मजदूर के सारे शरीर से पसीना चू रहा है। उसके काले शरीर पर पसीने की बूँदें ऐसी लग रही थीं जैसे मोती झिलमिला रहे हों। शरीर ऐसा सीधा तना हुआ, जैसे पहाड़ की कोई चट्टान हो।
निम्मा ने देखा तो देखती रह गई। ‘अरे, कितना सुंदर मनुष्य है! सुंदरता तो यह होती है।’ उसके मुँह से निकला, धरती का बेटा!
हर बार ईंटें उठाकर ले जाने से पहले वह युवक अपने माथे पर छलक आए पसीने को अँगोछे से पोंछ लेता था और फिर ईंटें ढोने के अपने काम में जुट जाता था।
निम्मा परी दूर से देख रही थी कि जब- जब वह अपने माथे से पसीना पोंछकर मुसकराते हुए फिर अपने काम में जुटता है तो उसका माथा अनोखे ढंग से चमकने लगता है। उसकी आँखों में बिल्कुल छोटे बच्चे जैसी निर्मलता झलकने लगती है।
निम्मा को लगा, एकदम स्वस्थ और कसरती शरीर वाला यह शख्स बड़ा चुस्त, फुर्तीला है, पर उतना ही सीधा-सरल भी है। इसके भीतर बिल्कुल एक बच्चे जैसा दिल है।
अब तो परी से रहा न गया। वह धीरे-धीरे चलती हुई वहीं जा पहुँची, जहाँ बुधना ईंटें उठा-उठाकर सिर पर रख रहा था। उसने पूछा, “भई, क्या तुम यहीं रहते हो? तुम्हें मैं क्या कहकर बुलाऊँ…? मतलब, नाम…? फिर कुछ सकुचाकर बोली, “मैं… मैं निम्मा हूँ, निम्मा…!”
“निम्मा…! कौन निम्मा…?” वह सीधा सा मजदूर पसोपेश में। चेहरे पर बड़ी हैरानी कि यह कौन स्त्री है? इतनी सुंदर कि चारों ओर उससे उजाला सा फैल रहा है। दूर तक महक सी उड़ रही है। वह हँसकर बोला, “हाँ-हाँ, यहीं रहता हूँ मैं। फागुन है हमारे गाँव का नाम और मुझे सब बुधना कहते हैं। पर तुम कौन हो जी और क्यों पूछ रही हो? तुम आसपास की तो नहीं लगती हो मुझे। तो फिर हो कौन और आई कहाँ से हो?”
निम्मा परी मुसकराई। बोली, “मैं तो राहगीर हूँ, बुधना। दुनिया घूमने निकली हूँ। यहाँ की सुंदरता देखी तो ठिठककर खड़ी हो गई। सचमुच बड़ा अनोखा है तुम्हारा गाँव।”
बुधना हँसा। बोला, “अच्छा है कि तुमको हमारा गाँव पसंद आया। लगता है, तुम शहर की हो। शहर के नफीस लोगों को गाँव कम ही पसंद आता है। हम तो जी, सीधे-सादे लोग हैं। बस मेहनत करते हैं और जीते हैं। ज्यादा लंबी-चौड़ी बातें करना हमें नहीं आता।”
निम्मा परी हँसकर बोली, “अरे वाह, इतनी अच्छी बातें तो कर लेते हो और भला बातें करने में क्या होता है? और जिंदगी की सुंदरता तो इसी में है कि मेहनत करके खाना और जीना। ऐसी सच्ची खुशी तो गाँव में ही मिल सकती है। शहरों में भला कहाँ ऐसी सादगी और सुंदरता? … अब तुम ही देखो, जैसा अच्छे डील-डौल वाला शरीर तुम्हारा है, देखने में जैसे बाँके लगते हो, शहर में कितने नौजवान होंगे ऐसे?”
सुनकर बुधना के चेहरे पर चमक आई, पर वह थोड़ा शरमा भी गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या कहे।
थोड़ी देर बाद निम्मा बोली, “अच्छा, एक बात बताओ। फागुन क्यों पड़ा तुम्हारे गाँव का नाम?”
*
“हम क्या जानें?” बुधना बोला, “हम तो दादी-नानी से यही सुनते आए हैं कि बड़े ईमानदार और मेहनत करने वाले लोग यहाँ पीढ़ियों से रहते आए हैं। वे मेहनत से जी नहीं चुराते। उनके पसीने के मोती धरती पर गिरते हैं, इसलिए धरती अपनी सुंदरता का पूरा खजाना उनके लिए खोल देती है। बाकी जगहों पर तो महीने-दो महीने के लिए कोई फूल खिलता है तो कोई चार महीने के लिए। पर फागुन गाँव में तो बारहों महीने फूल खिलते हैं। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल ही फूल, जैसे धरती पर इंद्रधनुष उतर आया हो। तो फूलों की ऐसी बहार है यहाँ कि इसका नाम खुद-ब-खुद फागुन पड़ गया।”
सुनकर निम्मा परी को अच्छा लगा। उसने पूछा, “अच्छा बुधना, तुम काम क्या करते हो?”
बुधना हँसकर बोला, “नाम तो मेरा बुधना यानी बुद्ध है। पर लगता है, असली बुद्धू तुम हो। देख नहीं रही हो, मैं मजदूर हूँ। ईंटें ढोता हूँ। खेत में रामचरना किसान अपने लिए एक कमरा बनवा रहा है। उसी के लिए ईंटें ले जा रहा हूँ। अच्छा, अब चलूँ। तुम तो इतना भी नहीं देखती कि मेरे सिर पर दस ईंटों का बोझ है। खड़े-खड़े गरदन दुखने लगी।… क्यों, आया समझ में?”
“तो लाओ, कुछ मुझे दे दो।” निम्मा परी बोली, “बातें करते हुए चलेंगे तो तुम्हें इतना बोझा भी नहीं पता चलेगा।”
“तुम… तुम उठाओगी बोझा?” बुधना को इतनी हैरानी हुई कि वह आँखें फाड़े निम्मा परी की ओर देखता रह गया।
“लो जी, इसमें क्या बात है? तुम उठा सकते हो तो मैं क्यों नहीं? मैं भी थोड़ा भार तो उठा ही सकती हूँ।” निम्मा परी बोली।
“अच्छा, तो एक ईंट ले लो।” बुधना हँसकर बोला, “तुम्हारे लिए यही काफी है।… पर हाँ, कहीं हाथ-पैर न तोड़ लेना अपने।”
“नहीं, आधी ईंटें तो मैं उठाऊँगी ही।” निम्मा जिद करती हुई बोली।
“बड़ी जिद्दल हो जी। लगता है, कभी किसी का कहना नहीं मानती हो। तो लो, तुड़वाओ अपने हाथ-पैर…!” गुस्से में बुधना ने सारी ईंटें नीचे जमीन पर रख दीं।
आखिर निम्मा ने भी सिर पर कपड़े का मुँड़ासा बाँध, चार ईंटें उठा लीं और हँसती, बातें करती हुई बुधना के साथ चल दी।
ईंटों का बड़ा सा चट्टा था वहाँ। हजारों ईंटें, जिन्हें उठा-उठाकर ले जाना था। कुछ ईंटें रामचरना के खेत में पहुँचानी थीं। कुछ इससे भी आगे कच्ची सड़क पर। वहाँ जमीन समतल करके ईंटों का खड़ंजा बिछाना था।
बुधना और निम्मा दोनों ने मिलकर काम किया। पूरे दिन दोनों जुटे रहे। बुधना बीच-बीच में चोरी-चोरी निम्मा को देख लेता। कैसी अजब है यह शहरी छोरी। बिना बात ईंटें उठा-उठाकर हलकान हो रही है। न जाने इसके जी में क्या है?
और निम्मा बार-बार साड़ी का फेंटा कसती। सिर पर ईंटें उठाकर सधे कदमों से बुधना के साथ चलती। सोच रही थी, आज धरती पर पहला ही तो दिन है। आज ही गिर गिरा गई, तो धरती को जी भरकर देखने का सपना कैसे पूरा होगा?
शाम होते-होते दोनों ने मिलकर ईंटों का पूरा चट्टा उठाकर, सारी ईंटें वहाँ पहुँचा दीं, जहाँ जरूरत थी।
राजमिस्त्री शंकर ने बुधना को इतने उत्साह से काम करते देखा तो बोला, “आज तो बुधना, तुमने कमाल कर दिया।”
इस पर बुधना ने निम्मा की ओर देखकर इशारा किया। बोला, “ये मैम न होतीं तो इतना काम न हो पाता। देखने में तो बड़ी नाजुक हैं, पर भई, जिगरा बड़ा है। मैं थक गया, पर ये नहीं थकीं। साथ-साथ ईंटें ढोकर लाती रहीं।”
सुनकर राजमिस्त्री शंकर ने सिर उठाकर निम्मा की ओर देखा। चौंककर बोला, “अरे…!” अचरज के मारे उसकी आँखें निकली पड़ रही थीं। “अरे मैमजी, आपने क्यों तकलीफ की?” कहते हुए भी उसे सचमुच यकीन नहीं था कि बुधना के साथ यह सुंदर सी युवती भी इतनी सारी ईंटें ढोकर लाई है।
निम्मा ने मुसकराकर कहा, “मैं देखना चाहती थी, मेहनत करने में कितना सुख-आनंद है।”
*
अब तो सारे गाँव में पता चल गया कि एक बड़ी सुंदर अनोखी मैम आई है, जिसने बुधना के साथ मिलकर सारे दिन ईंटें ढोई हैं।
लोग हैरान होकर जानना चाहते थे कि कौन है यह? लेकिन पूछने की किसी की हिम्मत न हो। रात हुई तो खूब बड़ी-बड़ी तलवार कट मूँछों वाले जमींदार जोगा सिंह ने वहाँ आकर बातों-बातों में कहा, “ये मैम चाहें तो हमारे घर आकर रुक जाएँ। वहीं खाना खाएँ। आराम करने के लिए बढ़िया बिस्तर लगवा दूँगा। … कोई परेशानी न होगी।”
सुनकर निम्मा चुप। एकदम चुप्प…! कुछ देर बाद उसने धीरे से बुधना से पूछा, “मैं रात तुम्हारे घर रुकूँ तो तुम्हें कोई मुश्किल तो नहीं आएगी?”
बुधना बोला, “मुश्किल तो क्या आएगी? जैसे हम झोंपड़ी में रहते हैं, तुम भी रह लेना। पर वहाँ जमींदार साहब की ऊँची हवेली जैसा आराम कहाँ? और फिर पता नहीं, मेरी बुढ़िया माँ की मोटी-मोटी रोटियाँ तुम्हें अच्छी लगेंगी कि भी नहीं?”
निम्मा बोली, “क्यों, तुम खा सकते हो तो मैं क्यों नहीं?”
आखिर बुधना निम्मा परी को अपने साथ घर ले आया। बोला, “अम्मा, आज रात ये यहीं रुकेंगी। कहती हैं कि तुम्हारी अम्मा के हाथ की मोटी-मोटी रोटियाँ खाकर देखूँगी। कैसी लगती हैं?”
सुनते ही बुढ़िया की पोपली हँसी दूर तक बिखर गई। बोली, “मैं ऐसी रोटियाँ थोड़े ही खिलाऊँगी इसे, जैसी हम खाते हैं। ऐसी मोटी-मोटी रोटियाँ इसके गले से थोड़े ही उतरेंगी। मैं जमींदार बाबू के घर से थोड़ा घी-बूरा और कुछ सामान ले आती हूँ। इसे अच्छा सा घी में तर चूरमा बना दूँगी। वह खाया जाएगा।”
इस पर निम्मा जो वहाँ खड़ी थी, बड़े कोमल स्वर में बोली, “नहीं अम्माजी, नहीं। आप तकलीफ मत कीजिए। मैं तो वहीं खाऊँगी, जो आपके घर में बनता है।”
“तो रुको, जरा पड़ोस के भुलुआ के घर से घी तो ले आने दो। घर में एक बूँद घी नहीं है।” बुधना की अम्मा ने अचकचाकर कहा।
“अम्मा, जैसा खाना आप रोज खाती हैं, मैं भी वैसा ही खाऊँगी। घी नहीं है, तो कोई बात नहीं। मेरे लिए आप जरा भी दिखावा मत कीजिए। नहीं तो मुझे जरा भी अच्छा नहीं लगेगा।” निम्मा ने उन्हें रोकते हुए कहा।
तब तक बुधना झटपट नहाकर आ गया था। अम्मा ने बाजरे की मोटी-मोटी रोटियाँ सेकीं, उसमें थोड़ा नमक-मिर्च डाल दिया। साथ में प्याज और हरी मिर्च थी। गुड़ की एक डली और आम का अचार भी।
बुधना और निम्मा खाने बैठीं तो बुधना तो गप-गप खाता गया। पर निम्मा का सी-सी करते बुरा हाल था। इतनी मिर्चें उसने पहले कभी खाई नहीं थीं। अम्मा के कहने पर उसने गुड़ खाकर पानी पिया तो अच्छा लगा। फिर खुशी-खुशी उसने भी दो रोटियाँ खाईं और खाने के बाद बोली, “वाह, बड़ा अच्छा लगा! अम्मा, ऐसा बढ़िया खाना तो मैंने कभी नहीं खाया। आपके खाने में बड़ा स्वाद है।”
फिर तो निम्मा बुधना के घर ही ठहर गई। धीरे-धीरे घर के सारे काम उसने सीख लिए। आटा मलना, चूल्हा जलाना। नदी से पीने के लिए घड़े भर-भरकर पानी लाना। रसोई और घर के कामों में अम्मा की मदद करके उसे बहुत अच्छा लगता। यहाँ तक कि अम्माजी से दाल-सब्जी छोंकना भी उसने सीख लिया।
फिर एक दिन जब अम्मा रोटी सेंकने के लिए तैयार हुई तो हँसकर बोली, “अम्मा, आज फुलके मैं बनाऊँगी। आप आराम से बैठकर खाना।”
“तू… तू बनाएगी निम्मा…! फुलके …?” अम्मा को यकीन नहीं हो रहा था। पर निम्मा ने जब रोटियाँ बनाई तो वे गोल-गोल भले ही न हों, पर उनमें ऐसी मिठास थी कि अम्मा के मुँह से असीसों पर असीसें निकल रही थीं। बुधना भी बड़े मजे में खा रहा था।
“अरे बेटी, तूने कब सीख लिया…?” अम्मा को जैसे अब भी यकीन न हो रहा हो।
“आपको देख-देखकर सीख लिया, अम्माजी!” निम्मा बोली, “आपको अच्छी लगीं मेरे हाथ की बनी रोटियाँ तो अब रोज मैं ही सेंका करूँगी।”
“अच्छी…? अरे पागल, ऐसी बढ़िया रोटियाँ तो गाँव में कोई नहीं बनाता। हम तो रोट बनाते हैं, रोट! और तेरी रोटियाँ तो ऐसी पतली-पतली थीं कि फूल की तरह तवे पर नाच रही थीं।”
सुनकर निम्मा के चेहरे पर तृप्ति की उजास सी छा गई।
बुधना हँसकर बोला, “ना अम्मा ना, इसको रोटियाँ ना बनाने देना। वरना ये बनाती जाएगी, मैं खाता जाऊँगा। सुबह से शाम हो जाएगी, पर पेट नहीं भरेगा।”
इस पर निम्मा खिलखिलाकर हँसी तो साथ-साथ अम्माजी भी हँसने लगीं।
जल्दी ही निम्मा ने अम्माजी से गाँव के गीत सीख लिए और बड़े सुर में गाने लगी। साथ ही किसी तिथि-त्योहार पर दीवारों पर चित्र माँड़ना और द्वार के आगे सुंदर रंगोली बनाना भी। उसे लगता, ‘अरे वाह, धरती पर तो हर दिन नया है। हर दिन त्योहार। धरती पर चाहे कितनी परेशानियाँ हों, पर मन तो उड़ा-उड़ा सा फिरता है। ऐसा सुख भला परियों के देश में कहाँ?’
xsइस बीच निम्मा को बुधना अच्छा लगने लगा और बुधना की माँ को निम्मा पसंद आ गई।
एक दिन बुधना की माँ ने निम्मा से कहा, “देख निम्मा, तू कहीं छोटे मुँह बड़ी बात न समझना, पर मेरा तो बड़ा मन करता है कि तू इसी घर में रहे। मेरा बुधना बड़ा भोला है। इसे तू अच्छी तरह सँभाल लेगी।”
“अम्मा, मैं तो यही कहना चाहती थी पर हिम्मत नहीं हो रही थी। बेटा बहुत अच्छा है आपका।” कहते-कहते निम्मा शरमा गई।
“हाँ, बेटी।” बुढ़िया बोली, “डील-डौल तो देखो, एकदम पठान जैसा है। पर मन से बिल्कुल बच्चा है।”
*
जब बुधना और निम्मा के विवाह की बात सुनी तो फागुन गाँव में हलचल मच गई। किसी-किसी ने बुधना को समझाया, “अरे बुधना, ये मैम तेरे साथ नहीं रहने वाली। चार दिन रहेगी, फिर उड़कर वहीं चली जाएगी, जहाँ से आई है। तू हाथ मलता रह जाएगा।”
पर बुधना ने कहा, “मेरा जी नहीं मानता। मैंने जितनी इससे बातें की हैं, लगता है, इसका मन हीरे जैसा है। बाहर से जितनी सुंदर है, मन उससे कहीं ज्यादा सुंदर है।”
कइयों को इस शादी से जलन भी हो रही थी। कुछ लड़कियों ने निम्मा परी को समझाया। कहा, “निम्मा परी, अगर तुम्हें धरती के आदमी से ही शादी करनी होती तो फिर यहाँ तो इतने अच्छे-अच्छे लोग पड़े हैं। इससे तो जमींदार के बेटे मुंगेरीलाल से ही शादी कर लेतीं। जानती हो जमींदार के पास सतखंडा हवेली है। और वहाँ हर तरह का आराम है। नौकर-चाकर हैं, किसी चीज की कमी नहीं। हर रोज बढ़िया से बढ़िया पकवान और बग्घी पर सैर-सपाटा। बुधना के पास रहकर तो बस ईंटें ही ढोनी पड़ेंगी। या फिर मजदूरी…! तुम कैसे कर पाओगी?”
सुनकर निम्मा परी कुछ बोली नहीं, बस मुसकरा दी और कहने वाली लड़कियाँ खुद-ब-खुद लज्जित हो गई।
अब तक बुधना को पता चल गया था कि निम्मा परीलोक से आई है और धरती पर रहना चाहती है। पर यह बात उसने अम्मा के सिवा किसी को नहीं बताई थी। और अम्मा सुनते ही हँस पड़ी थीं। बोलीं, “मैं तो पहले ही दिन समझ गई थी कि फूल जैसे हाथ-पैरों वाली यह लड़की धरती की नहीं हो सकती।… पर मेहनत करने और सीखने का जैसा जिगरा इसमें है, मैंने तो किसी और में देखा नहीं।”
कुछ दिन बाद शादी होनी थी। निम्मा ने सकुचाते हुए बुधना से कहा, “देखो बुधना, मुझे तो तुम्हारा घर जैसा है, वैसा ही पसंद है। मेरे लिए तो तुम्हारी झोंपड़ी भी स्वर्ग है। मेहनत कर लूँगी और खुशी-खुशी तुम्हारे साथ रहूँगी। हाँ, पर तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो। मैं परीलोक जाकर वहाँ से कुछ बेशकीमती रत्न और मणियाँ ले आती हूँ।”
सुनकर बुधना उदास हो गया। बोला, “तुम तो कह रही थीं कि बुधना, तुम मेहनत करते हो तो तुम्हारे शरीर पर जो पसीना झिलमिलाता है, मुझे वे मोती के कण लगते हैं।…बताओ निम्मा, क्या तुम परीलोक से जो रत्न और मणियाँ लाओगी, वो उससे भी ज्यादा कीमती होंगे?”
सुनकर निम्मा शर्मिंदा हो गई। बोली, “मुझे माफ कर दो बुधना, मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है। यकीन करो, तुम्हारे पास जो कुछ है, उसी में हम गुजारा करेंगे और सुखी रहेंगे।”
बड़े सादे ढंग से बुधना और निम्मा परी की शादी हुई। आसपास न लट्टुओं की जगर-मगर थी, न शोर-शराबा। न ज्यादा ढोल-ढमक्का। बस, निम्मा परी ने लाल-सुनहरे गेंदे के फूलों की एक माला बुधना के गले में डाल दी। और बुधना ने भी निम्मा के गले में माला डाली। फिर अग्नि के चारों ओर सात परिक्रमाएँ कीं और लो, हो गई शादी।
गाँव वाले देख रहे थे और हैरान हो रहे थे। मन ही मन सब निम्मा की तारीफ भी कर रहे थे, जिसने कुछ ही दिनों में फागुन में सबका दिल मोह लिया था।
बुधना की माँ ने सब गाँव वालों से कहा, “अब जो रूखा-सूखा हमारे पास है, आप लोग खा लीजिए तो हमें अच्छा लगेगा।”
बुधना को लग रहा था कि कहीं खाना कम न पड़ जाए। क्योंकि आसपास के गाँवों से इतने लोग इस अनोखे विवाह को देखने आ गए थे कि चारों ओर मेला सा जुट गया था। ज्यादातर लोग ऐसे थे, जिन्हें विवाह का न्योता गया ही नहीं। तो क्या उन्हें बिना खिलाए लौटाया जाए?
बुधना के साथियों ने जो भी रूखा-सूखा भोजन था, सबको बाँटा। लोगों को वही अमृत जैसा स्वादिष्ट लग रहा था। सब ओर ऐसा खुशी और उत्साह वाला माहौल था, जैसे धरती पर कोई उत्सव मनाया जा रहा हो।
कुछ देर बाद परीलोक से निम्मा की माँ स्वप्नपरी, परीरानी रूपमंजरी और निम्मा परी की बहुत सी सखियाँ आई। बुधना ने पूरी-सब्जी और बूँदी के बढ़िया लड्डू बनवाए थे। उन्होंने वे खुश होकर खाए। सभी परियाँ बुधना और निम्मा के लिए बड़े अनमोल उपहार लाई थीं। पर निम्मा ने समझाया, “बुधना को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं है। वह सीधा-सादा, पर बड़ा खुद्दार है। आपको अगर कुछ देना ही है तो अपना आशीर्वाद देकर जाइए, ताकि हमारा जीवन खुशियों से भरा रहे।”
इस पर परीरानी, निम्मा की माँ स्वप्नपरी और निम्मा की सखी-सहेलियों ने अपने प्यार और मंगल कामनाओं की वर्षा सी कर दी। फिर बुधना और निम्मा परी की बलैयाँ लेकर सब परियाँ परीलोक लौटीं।
दो दिन शादी की धूमधाम के रहे। तीसरे दिन बुधना काम पर जाने लगा तो साथ ही निम्मा भी चल पड़ी। बुधना बोला, “अरे, यह क्या? अभी परसों ही तो हमारी शादी हुई है…!”
निम्मा बोली, “क्यों, तुम मेहनत कर सकते हो, तो मैं क्यों नहीं?”
“पहले की बात अलग है। पर अब तुम इतना भारी वजन उठाओगी तो…? जानती हो न, मजदूरी में कितनी मेहनत करनी पड़ती है!” बुधना ने समझाया।
“तुम्हारे साथ रहूँगी तो सब कर लूँगी। भारी से भारी वजन उठा लूँगी। तुम साथ तो होगे ही, बस थोड़ी मदद कर देना। तुम तो कहते हो, मेहनत करना तपस्या है। तो क्या मैं निठल्ली बैठी अच्छी लगूँगी?” निम्मा परी ने कहा।
और फिर निम्मा ने भी बुधना के साथ-साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। दोनों साथ काम करते, साथ-साथ दोपहर का खाना खा लेते। लौटते तो खेतों के बीच घूमते हुए घर पहुँचते। निम्मा रात के खाने में अम्माजी की मदद करती। और फिर रात को सोने से पहले निम्मा होंठों पर बाँसुरी रखकर बजाती तो सिर्फ बुधना ही खुश नहीं होता था, बल्कि पूरे फागुन गाँव में संगीत की लहर छा जाती।
बुधना काला था, खूब काला और निम्मा गोरी-चिट्टी, एकदम चाँदनी -सी उजली। लेकिन फागुन गाँव के लोग कहते कि इससे प्यारी जोड़ी हमने आज तक नहीं देखी।
ये कहानी ‘इक्कीसवीं सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियाँ’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – 21vi Sadi ki Shreshtha Baal Kahaniyan (21वी सदी की श्रेष्ठ बाल कहानियां)
