सब्जीपुर में कोई सबसे ज्यादा नाजुक था तो टमाटरलाल। ऐसे प्यारे-प्यारे लाल-लाल गाल कि रास्ता चलते कोई भी प्यार से नोंच लेता और हँसकर कहता, “कहो टमाटरलाल, हाउ डू यू डू?”
टमाटरलाल बेचारे ऐसे नाजुक थे कि कोई कितने ही प्यार से चुटकी काटे, उनके गालों पर झट निशान बन जाते और खून बहने लगता था। मगर फिर भी दिलखुश थे टमाटरलाल। सो मुसकराकर कहते, “अच्छा हूँ भैया, अच्छा हूँ! तुम्हारी दया से राजी-खुशी हूँ।”
एक दिन सब्जीपुर के बड़े मैदान में सारे लोग गेंद खेल रहे थे। टमाटरलाल भी शामिल थे। खेल चल रहा था गेंदतड़ी का। जिसके हाथ में गेंद आती, वह दूसरों पर दे मारता। टमाटरलाल बेचारे बड़े बच-बचकर, सहम-सहमकर खेल रहे थे कि कहीं जोर की चोट न लग जाए। जानते थे कि एक जोर की गेंद आ लगी तो बिलबिलाकर जमीन पर आ गिरेंगे और चारों खाने चित हो जाएँगे।
मगर बचते-बचाते भी एक ऐसी गेंद आकर लगी टमाटरलाल को, वाकई वही हुआ, जो नहीं होना था। टमाटरलाल न सिर्फ जमीन पर चित आ पड़े, बल्कि उनकी साँस भी रुकी-रुकी जान पड़ी।
आलूराम-कचालूराम ने झट दवा का इंतजाम किया, मगर बेचारे टमाटरलाल इस कदर बेहाल थे कि किसी दवा का कोई असर ही नहीं। आलूराम बोले, “हाय-हाय, यह तो गए!”
कचालूराम बोले, “मेरा प्यारा दोस्त! हाय, जाने क्या इसे हो गया? ऐसी नाजुकी भी ठीक नहीं।”
बड़ी मुश्किल से आलूराम-कचालूराम, लौकीदेवी, पुदीना दीदी और धनिया चाची ने मिलकर सेवा-टहल की। पानी-वानी छिड़का। यहाँ तक कि कृत्रिम साँस भी दी, तब कहीं जाकर टमाटरलाल को होश आया।
दो-चार दिन तक तो टमाटरलाल की हालत बड़ी पतली रही। किसी से बात करने में भी उन्हें शर्म आती थी। घर से बाहर निकलने में जान निकलती थी। मगर फिर आना ही पड़ा। घर में अकेले बैठे-बैठे बोर हो रहे थे तो सोचा, “चलो, चलकर बैंगन राजा से ही मिल लेता हूँ। वहाँ जाकर दो-चार दोस्त और मिल जाएँगे तो जरा बातों में मन बहलेगा।”
टमाटरलाल घर से चलकर बैंगन राजा के पास आ तो गए, मगर उनका चेहरा ऐसा मुरझाया हुआ था कि देखकर बैंगन राजा चौंके। बोले, “हाय-हाय, टमाटरलाल, यह क्या! तुम तो पहचाने ही नहीं जा रहे हो।”
बैंगन राजा के कहने पर धनिया चाची दौड़ी-दौड़ी गईं और ठंडे पानी का जग भर लाईं। टमाटरलाल ने मुँह-हाथ धोए, थोड़ा सा पानी पिया, तब हालत कुछ सँभली।
बैंगन राजा बड़े गौर से टमाटरलाल की ओर देख रहे थे। कुछ सोचकर बोले, “देखो भई, टमाटरलाल! बुरा न मानना भैया, बड़ी देर से मैं तुम्हारी मुसीबत देख रहा हूँ। यहाँ सब्जीपुर में तुम्हें हर कोई पीट रहा है और तुम पिट रहे हो। जो चाहे तुम्हें यहाँ से वहाँ पटक देता है। जो भी चाहे फटकारे और जो भी चाहे कुचल दे। मैं देख रहा हूँ कि हर कोई तुम्हारा मजाक उड़ाता है। फिर भैया, नाजुक शरीर के भी हो। तो देखो, बुरा न मानो तो एक सलाह दूँ?”
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं!” टमाटरलाल अब थोड़े सहज हो गए थे। बैंगन राजा की बात उन्हें भी ठीक लग रही थी।
बैंगन राजा लंबी भूमिका बनाकर अब कह रहे थे, “देखो भई टमाटरलाल, गौर से सुनो मेरी बात। यहाँ सब्जीपुर में एक से एक जबर हैं। कटहलराम को ले लो या फिर कद्दूमल को। लौकीदेवी या फिर गोभीकुमार, सब एक से एक हट्टे-कट्टे और सेहतमंद। वो अगर तुमसे जोर का हाथ भी मिलाएँ तो भैया टमाटरलाल, तुम तो इतने में ही पिचक जाओगे, बल्कि जान बचानी मुश्किल हो जाएगी। सो अगर चाहो, तो मैं तुम्हें एक रास्ता बता सकता हूँ।”
“वो क्या…!” सुनते-सुनते टमाटर इस कदर उत्तेजित हो गए थे कि उछल पड़े और उछलने से बेचारों के पैरों में ऐसी चोट आई कि लगा सूज गए हैं।
“धीरज रखो, धीरज रखो टमाटरलाल!” बैंगन राजा बोले, “मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि अलग-अलग रहोगे तो तुम कुचले जाओगे। तो ऐसा क्यों नहीं करते कि तुम सबमें मिलकर रहो।”
“मिलकर यानी…?” टमाटरलाल अब भी कुछ समझ नहीं पा रहे थे।
“मिलकर यानी…सबमें मिलकर!” बैंगन राजा कुछ सोचते हुए बोले, “असल में भई टमाटरलाल, मैं कहना यह चाह रहा हूँ कि तुम हर सब्जी में क्यों नहीं शामिल हो जाते? चाहो तो अलग रहने की बजाय तुम हर सब्जी का स्वाद बढ़ा सकते हो। और लोग सबके साथ-साथ तुम्हें भी याद करेंगे, बल्कि औरों से ज्यादा करेंगे। आलू के साथ मिलकर तुम आलू-टमाटर हो सकते हो। लौकी के साथ मिलकर लौकी-टमाटर और दालों में दाल का तड़का। क्यों, मैंने ठीक कहा न?”
“अरे, वाह!” टमाटरलाल खुशी से उछल पड़े। जोश की लहर में आकर बोले, “बैंगन राजा, अजी बैंगन राजा, आपने तो मेरे दिल की बात कह दी। अब न मुझे कोई चोट पहुँचाएगा और न खिल्ली उड़ाएगा। मैं…मैं सबमें शामिल जो रहूँगा!”
उस दिन के बाद से किसी ने टमाटरलाल को दुखी और अकेला नहीं देखा। कभी वह आलू के साथ प्यार से कंधे पर हाथ रखकर चलते दिखाई देते, तो कभी लौकीदेवी की सभा में सबसे आगे बैठे नजर आते। और दालों से तो उनकी बड़ी पक्की और अटूट दोस्ती थी। वे इस कदर सब्जीपुर में हर किसी से मिल गए कि लोग कहते, “जहाँ टमाटरलाल, वहाँ तो कमाल, बस कमाल और दोस्ती का धमाल!”
कहते हैं, तब से सब्जीपुर में सभी सब्जियों का स्वाद बढ़ गया। मानो टमाटरलाल की यह ड्यूटी थी कि कोई सब्जी फीकी, बेस्वाद न रहे। और अगर कहीं किसी को कोई फीकापन नजर आए, तो सब लोग एक सुर में कहने लगते थे, “भई, आए नहीं टमाटरलाल। वरना हो जाता कमाल—दोस्ती के स्वाद का धमाल!”
यह सुनकर टमाटरलाल इतने खुश हो जाते हैं कि ‘ठी…हा, ठी…हा…हा-हा-हा!’ करके हँसते हुए फौरन बैंगन राजा की लाख टके की सलाह के बारे में सोचने लगते हैं, जिसके बाद सब्जीपुर में उनकी शान और रुतबा कुछ और बढ़ गया था।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
