sabhyata ka janm
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गली में शोर-शराबा बढ़ने लगा। ऊँची-ऊँची आवाजें आने लगी। गंदी गली-गलौच होने लगी। एक दूसरे को मारने के लिए लाठियाँ बाहर निकल आयीं। अब उसके आराम में खलल पड़ने लगा तो वह भी बाहर निकल कर नजारा देखने लगा।

महेश और राजू को झगड़ते देख उसका माथा ठनका। रोज का टंटा। छोटी-मोटी बातों को लेकर प्रतिदिन तोप-तलवार। कभी नाली के पानी को लेकर तो कभी कुत्ते-बिल्ली की टट्टी को लेकर महाभारत मच जायेगा। आज महेश ने राजू की दीवार पर थूक दिया था। बस शुरू हो गई जंग। भगवान जाने कब होगा इन पड़ोसियों का फैसला। वह सोचने लगा।

भीड़ बढ़ने लगी। दो-तीन लोग बीच-बचाव के लिए झगड़े में कूद पड़े। दोनों पक्षों को समझाया जाने लगा। किन्तु लोग महेश को जितना समझाते वह उतना ही आग बबूला हो रहा था। बार-बार लोगों की पकड़ से छूटकर लाठी तान रहा था। ‘मादरचो… छोडूंगा नहीं… जमीन में सरका दूँगा… तू है क्या मेरे सामने…’ तभी महेश का बूढ़ा बाप महेश को घर में खींचते हुए दांत पीसकर बुदबुदाया- “तू कब समझेगा रे महेश?’ परसों ही तो तेरे घर में लड़की पैदा हुई है। माँ-बेटी की गालियाँ बकते हुए तुझे शर्म नहीं आती? पता नहीं कब तू सुधरेगा…”

उसने महसूस किया। धीरे-धीरे महेश की आक्रमकता ढीली पड़ने लगी थी।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)