gulam ke gulam
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सिकंदर भारत से लौट रहा था। उसे याद आया कि उसकी जनता ने उसे अपने साथ एक भारतीय योगी को लाने के लिए कहा था। उसने देखा’ कि एक जंगल में एक योगी पेड़ के नीचे ध्यानमग्न बैठे हुए हैं। सिकंदर शांति से उनके सामने जाकर बैठ गया।

कुछ देर बाद जब योगी ने अपनी आंखें खोलीं, तो सिकंदर ने योगी से कहा- क्या आप मेरे साथ यूनान चलना पसंद करेंगे? मेरे महल का एक भाग आपके लिए निर्धारित रहेगा और आपकी सेवा में हर समय सेवक तैयार रहेंगे। योगी ने मुस्कराते हुए कहा कि मेरी कोई आवश्यकताएं नहीं है और न ही मेरी यूनान जाने की कोई इच्छा है। योगी के इस तरह इनकार कर देने पर सिकंदर नाराज हो गया।

वह क्रोधित हो गया और अपनी तलवार निकालते हुए उसने योगी से कहा- क्या तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े भी कर सकता हूँ? मैं विश्व विजेता सिकंदर हूँ योगी ने पुनः शांत भाव से मुस्वफ़ुराते हुए कहा तुम सिर्फ मेरे शरीर को काट सकते हो। दूसरी बात तुमने यह कही है कि तुम विश्व- विजेता हो। मेरे विचार से तुम केवल मेरे गुलाम के गुलाम हो।

सिकंदर यह सुनकर हैरानी में पड़ गया और बोला कि वह कुछ समझा नहीं। तब योगी ने उसे समझाया कि क्रोध मेरा गुलाम है क्योंकि यह पूर्णतः मेरे नियंत्रण में है। लेकिन तुम क्रोध के गुलाम हो और बड़ी आसानी से तुम क्रोधित हो जाते हो। इसलिए तुम मेरे गुलाम के गुलाम हुए।

सारः विचारों को शक्ति के आगे शारीरिक शक्ति निरर्थक है।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)