ishwar ke darshan
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सुबह का समय था। दीनबंधु सी ‘एफ’ ऐडरूज कराची की सड़कों पर टहल रहे थे। एक नौजवान उनके पास आया। तपाक से पूछ बैठा- “क्या ईश्वर की कल्पना कोरी बकवास नहीं है?”

वे मुस्वफ़ुराकर बोले “बिल्कुल नहीं!”

नवयुवक के गले में हल्की रंजिश खनक उठी- “यदि उसका अस्तित्व है, तो हम उसे देख क्यों नहीं पाते?”

ऐंड्रज ने शांत स्वर में कहा- ‘ईश्वर दर्शन के लिए दृष्टि को उदार बनाना पड़ता है, भाई!’

नवयुवक ने पुनः प्रश्न- “किया- ‘ईश्वर के दर्शन आपने किये हैं?’ दीनबंधु ने सोत्साह उत्तर दिया- ‘मैं तो प्रतिदिन ईश्वर दर्शन करता हूँ!’ युवक ने आग्रह किया- ‘क्या आप मुझे उसका साक्षात्कार करा देंगे?’ ऐडरूज बोले- ‘क्यों नहीं? आज शाम को मुझसे मिलो।’

यथासमय वह नवयुवक दीनबंधु से मिलने आया। उसे साथ लेकर वे ईश्वर दर्शन को निकल पड़े।

चलते-चलते ऐडरूज एक भंगी की झोपड़ी के सामने ठिठक गये। वहाँ एक मातृहीन किशोर तपेदिक से पीड़ित था। उसका वृद्ध पिता उसकी सेवा में संलग्न था। दीनबंधु उन दोनों की ओर संकेत करते हुए बुदबुदाने लगे- ये ही मेरे ईश्वर हैं!” और अगले ही क्षण दीनबंधु सी ‘एफ’ ऐडरूज स्वभावानुसार ‘ईश्वर सेवा’ में जुट गये!

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)