kuber-putron ko shraap mahabharat story
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धनपति कुबेर के नलकूबर और मणिग्रीव नामक दो पुत्र थे। उनकी गिनती भगवान शिव के अनुचरों में होती थी। अतः देवगण भी उन दोनों का आदर-सम्मान करते हुए उनके छोटे-मोटे अपराधों को क्षमा कर देते थे। इससे धीरे-धीरे उनके मन में अहंकार उत्पन्न हो गया। वे अपने समक्ष देवगण को शक्तिहीन, तुच्छ और असहाय समझने लगे। देवताओं का तिरस्कार करना ही उनका प्रिय खेल बन गया। वे दोनों कैलाश के एक सुंदर उपवन में निवास करते थे।

एक बार वे दोनों मदिरा के मद में चूर होकर अनेक सुंदर अप्सराओं के साथ गंगा नदी में स्नान कर रहे थे। दैववश भ्रमण करते हुए देवर्षि नारद वहां आ निकले। अप्सराएं देवर्षि नारद का प्रभाव भली-भांति जानती थीं। अतः लज्जित होकर उन्होंने वस्त्र पहन लिए, किंतु अहंकारी नलकूबर और मणिग्रीव, देवर्षि नारद को तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देखकर जल में क्रीड़ाएं करते रहे।

जब कुबेर-पुत्रों ने अप्सराओं को जल से बाहर जाते देखा तो वे हंसते हुए बोले‒”अरे! तुम सब कहां जा रही हो? अभी हमारा मन जल-क्रीड़ा से नहीं भरा। यदि तुम नारद से भयभीत हो तो निर्भय हो जाओ। यह निर्लज्जों की भांति कहीं भी चला आता है, किसी के भी विश्राम में बाधा डाल देता है। वास्तव में यह ब्रह्मचारी का वेश धारण करने के बाद भी काम से पीड़ित है। एक बार तो इसने भगवान विष्णु का स्वरूप मांगकर विवाह करने का प्रयास भी किया था, किंतु अपने ध्येय में असफल हो गया था। इसलिए अब अपनी काम-भावना को शांत करने के लिए इसी प्रकार ऐश्वर्य-भोगियों के आस-पास विचरण करता है।”

जब देवर्षि नारद ने देखा कि दोनों कुबेर-पुत्र विषय-भोग से अंधे और मदिरापान से उन्मत्त हो रहे हैं, अहंकार उनके सिर चढ़कर बोल रहा है तो वे उन्हें शाप देते हुए बोले‒ “दुष्टों! जो मनुष्य विषयों में आसक्त होकर उनका सेवन करते हैं, उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। भगवान शिव के प्रिय भक्त कुबेर के पुत्र होने के बाद भी तुम दोनों श्रीमद् से अंधे हो रहे हो। इन्द्रियों के अधीन होने के कारण तुम्हारा ज्ञान और विवेक नष्ट हो गया है। तुम अहंकारी हो गए हो। तुम्हें स्वयं के नग्न होने का आभास नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें वृक्ष-योनि में जन्म लेने का शाप देता हूं। इससे तुम्हारा मद् समाप्त हो जाएगा, किंतु वृक्ष-योनि में जाने के बाद भी तुम्हें भगवान विष्णु की स्मृति बनी रहेगी। सौ वर्षों बाद जब भगवान श्रीकृष्ण अवतरित होंगे, तब उनके द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा और तुम पुनः अपने लोक में चले जाओगे।” इस प्रकार शाप देकर देवर्षि नारद वहां से चले गए। उनके शाप के कारण नलकूबर और मणिग्रीव‒दोनों एक ही साथ अर्जुन नामक वृक्ष हो गए और ‘यमलार्जुन’ नाम से प्रसिद्ध हुए। यमलार्जुन वृक्ष गोकुल में नंद के घर में लगा हुआ था।

एक बार माता यशोदा ने बालक कृष्ण की शरारतों से तंग आकर उन्हें ऊखल से बांध दिया। तब श्रीकृष्ण ने यमलार्जुन का उद्धार करने का निश्चय किया। अपने प्रिय भक्त नारद की वाणी को सत्य सिद्ध करने के लिए वे ऊखल को घसीटते हुए उस ओर चल दिए, जहां यमलार्जुन वृक्ष बने खड़े थे।

श्रीकृष्ण दोनों वृक्षों के बीच में से निकलकर दूसरी ओर चले गए, किंतु ऊखल तिरछी होकर उनमें अटक गई। तब उन्होंने अपने पीछे बंधी ऊखल को जैसे ही खींचा, वैसे ही पेड़ों की जड़ें उखड़ “गईं और वे तड़तड़ाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े। तभी उन वृक्षों में से दो तेजस्वी देव निकले। उनके तेज से चारों ओर प्रकाश फैल गया। ये दोनों कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे।

उन दोनों ने मस्तक झुकाकर श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और स्तुति करते हुए बोले‒ “प्रभु! आपकी लीलाएं ऐसी हैं, जिन्हें मनुष्य तो क्या देवता और ऋषि-मुनि भी नहीं जान सकते। भगवन! हम आपके चरणों के दास हैं। आप हमें अपनी शरण में स्वीकार कीजिए। देवर्षि नारद का हम पर बड़ा अनुग्रह था, जो हम जैसे दुराचारियों को आपके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अब आप आज्ञा दीजिए, जिससे हम अपने लोक लौट जाएं। साथ ही आपके श्रीचरणों का स्मरण हमारे मन में बना रहे। हमारी वाणी सदा आपका गुणगान करे।”

भगवान की लीला बड़ी विलक्षण है। नलकूबर और मणिग्रीव की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण हंसते हुए बोले‒”वत्स! मैं पहले से ही जानता था कि तुम श्रीमद् में अंधे हो रहे हो और तुम्हारे पवित्र मन में पाप और दुराचार उत्पन्न हो गया है, इसलिए तुम्हें सद्मार्ग पर लाने के लिए मेरी ही माया से प्रेरित होकर देवर्षि नारद ने तुम्हें शाप दिया था और आज समस्त पाप नष्ट हो जाने से जब तुम पहले की भांति निर्मल और पवित्र हो गए तो मैंने तुम्हारा उद्धार कर दिया। पुत्रो! जिन भक्तों का मन सदैव मुझमें लगा रहता है और जो संसार के समस्त प्राणियों में छोटे-बड़े का भेदभाव नहीं रखते, उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। पुत्रो! तुम अब अपने लोक की ओर प्रस्थान करो। साथ ही तुम्हें मेरी अनन्य भक्ति प्राप्त होगी, जिससे संसार का बंधन सदा के लिए नष्ट हो जाता है।”

तत्पश्चात् वे दोनों भगवान श्रीकृष्ण की परिक्रमा कर अपने लोक को लौट गए।