Successful Women
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कृष्णा सोबती, साहित्यकार

Successful Women: डार से बिछुड़ी, जिंदगीनामा, ए लड़की, मित्रो मरजानी, हमहशमत- कृष्णा सोबती की मुख्यकृतियां हैं। कृष्णा सोबती ने नारी को कुंठित राष्ट्र को अभिभूत कर सकने में सक्षम अपसंस्कृति के बल-संबल के साथ ऐसा उभारा है कि साधारण पाठक हतप्रभ हो सकते हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताजगी दी है। कृष्णा सोबती उपन्यासकार के अतिरिक्त एक कहानी लेखिका के रूप में भी प्रसिद्ध रही हैं। इनकी धूम आठवें दशक के पूर्व से ही रही है। साहित्य अकादमी पुरस्कार, साहित्य शिरोमणि सम्मान, शलाका सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, साहित्य कला परिषद पुरस्कार, कथा चूड़ामणि पुरस्कार, महत्तर सदस्य, साहित्य अकादमी से सम्मानित की जा चुकी कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और सुथरी रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं।

 

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शहनाज हुसैन, ब्यूटी एक्सपर्ट

लोग पहले भी सुंदरता के हर पैमाने से वाकिफ थे, पर उनमें सुंदरता के प्रति जागरूकता पैदा करने का श्रेय शहनाज हुसैन को जाता है। शहनाज हुसैन का व्यक्तित्व 80 के दशक से अब तक उतना ही प्रभावशाली बना हुआ है। केवल पंद्रह साल की उम्र में उनकी शादी हो गई। वह पति के साथ तेहरान चली गईं। एक साल बाद बेटी नीलोफर के जन्म के बाद उनका रुझान ब्यूटी ट्रीटमेंट पर हुआ। पति ने उन्हें आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित किया। उसके बाद उन्होंने कॉस्मेटोलॉजी कोर्स किया। पढ़ाई के दौरान जब वह वाकिफ हुईं कि सौंदर्य प्रसाधनों में नुकसानदायक केमिकल्स का प्रयोग किया जाता है, तभी उन्होंने ठान लिया कि वह जड़ी-बूटी से सौंदर्य निखारेंगी। बीते 40 साल से वह खूबसूरती की दुनिया की बड़ी हस्ती हैं। 60 से ज्यादा देशों में उनके उत्पाद बिकते हैं। वह भारत की बिजनेस गुरु मानी जाती हैं। साथ ही व्यावसायिक दुनिया में गिनी चुनी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो अपने दम पर खड़ी हैं। शहनाज हुसैन ग्रुप अब भारत, दुबई और लंदन में फैल गया है। आज उनके उत्पाद भारत के डेढ़ लाख स्टोर्स में बिकते हैं।

रितु कुमार, फैशन डिजाइनर

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फैशन डिजाइनर रितु कुमार के चर्चे हिंदुस्तान से लेकर सात समंदर पार तक हैं। रितु कुमार ने भारतवासियों का फैशन से परिचय उस समय कराया, जब इस बारे में कोई खास जानकारी लोगों को हासिल नहीं थी। करीब चालीस साल पहले बंगाल के एक छोटे से गांव में फैब्रिक डिजाइनिंग से करियर शुरू करने वाली रितु का नाम आज विश्व के नामचीन डिजाइनरों में शुमार है। रितु ने हिंदुस्तान में बुटीक परंपरा की नींव रखकर एक नई सभ्यता का उद्घोष किया है। साथ ही भारतीय परिधानों में नए रंग भरकर भारत की पारंपरिक पोशाक साड़ी और लहंगे को विश्वस्तर पर ख्याति दिलाई है। रितु कुमार स्वीकारती हैं कि भारत में 1960 का दौर लड़कियों को फैशन क्षेत्र में जाने की अनुमति नहीं देता था। परिवार के सहयोग से करियर बना पाई। उनका कहना है कि विजन और एक्सपेरिमेंट के मेल ने ही उन्हें आज बुलंदी पर पहुंचाया है।

अर्पणा कौर, चित्रकार

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जीवन के छह दशक से अधिक देख चुकी अर्पणा कौर ने जीवन के कई रंग देखे हैं। समकालीन चित्रकारों में जो समसामयिकता इनमें हैं, वह किसी में नहीं है। कूची और रंगों को जब वह कैनवस पर उकेरती हैं, तो हर कोई कायल हो जाता है। दिल्ली में साल 1975 में उन्होंने पहली एकल प्रदर्शनी आयोजित की। कम लोग आए, पर वे निराश नहीं हुईं और रंग और कूची से बड़े कैनवस की ओर निरंतर बढ़ती गई। 1984 के दंगों ने उन पर बहुत असर डाला, जिसे उन्होंने ‘वल्र्ड गोज ऑन सिरीज में उतारा। इस श्रृंखला के कारण उन्हें 1986 में ‘ट्राइनाले अवार्ड मिला। इसी तरह वृन्दावन की विधवाओं के हालात पर उन्होंने ‘विडोज ऑफ वृन्दावन सिरीज पेंट की। जब वह छोटी थीं, तब उन्होंने एक चित्र बनाया जिसका शीर्षक दिया- मां। वह आज खुलकर बताती हैं कि उन्होंने ‘मां शीर्षक वाली पेंटिंग लीजेंडरी कलाकार अमृता शेरगिल की कृतियों से प्रेरित होकर चित्र बनाया था।

शोभना नारायण, कथक नृत्यांगना

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कत्थक नृत्यांगना व भारतीय ब्रांड एम्बेसडर डॉ. पद्यश्री शोभना नारायण महिलाओं के लिए आज आईकॉन बन चुकी हैं। स्वभाव से नम्र, सूरत से भोली, आंखों में आगे बढऩे की चाह और मुस्कराहट में मासूमियत इनकी पहचान है। कोलकाता की साधना बोस के अलावा मुंबई के गुरु कुंदनलाल और दिल्ली के पंडित बिरजू महाराज से नृत्य की शिक्षा ग्रहण की है। शोभना की विशेषता है कि वह नृत्य में नित नए प्रयोगों के साथ ही नारी सशक्तीकरण के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहती हैं। बकौल शोभना नारायण, जब वह पहली बार अपने ससुराल मुजफ्फरपुर गईं, तो महिलाओं की हालत से रूबरू हुईं। बीते कुछ समय से शोभना नारायण देश में घूम-घूम कर कथक नृत्य का प्रचार-प्रसार कर रही हैं और नई प्रतिभाओं को तलाश रही हैं।

अलका रघुवंशी, इंटीरियर डिजाइनर

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जानी मानी पत्रकार, चित्रकार और इंटीरियर डिजाइनर अलका रघुवंशी ने यूं तो अपने करियर की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की, पर कला के प्रति उनका रुझान बचपन से ही था। कृष्ण भगवान को अराध्य मानने वाली अलका के जीवन में बहुत उथल पुथल रही। पारिवारिक जीवन में आई विसंगतियों को उन्होंने एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और आज कला की दुनिया में सशक्त हस्ताक्षर हैं। इंटीरियर डिजाइन की मिसाल खुद उनका घर है। इस सजावट के लिए उन्होंने देशी-विदेशी कलाओं का सहयोग तो लिया ही है, साथ ही वास्तुशास्त्र का गहन ज्ञान भी हासिल किया। वह कहती हैं कि चित्रकारी में रंग संवाद करते हैं और आपकी भावनाओं को भी व्यक्त करते हैं। सुख-दुख अवसाद उल्लास सब रंगों द्वारा ही व्यक्त होते हैं। हमारा घर और आसपास सब खुशियों से भरा रहे, इसीलिए रंगों और वास्तु-ज्ञान का तालमेल होना चाहिए। अलका कहती हैं कि स्त्री भी रंगों की तरह है। उसके भावों में छिपे हैं वे सारे रंग, जो हमें कैनवास पर नजर आते हैं। मैंने उसी स्त्री को अपने चित्रों में भी उकेरा है। वह शक्ति है, वह संबल है।

नासिरा शर्मा, साहित्यकार
कई भाषाओं की जानकार हिंदी की समर्थ लेखिका नासिरा शर्मा जब भी कलम उठाती हैं, तो उसकी धमक महसूस होती है। महिला विमर्श और अधिकारों के लिए यदि आलोचना सहनी पड़े, तो नासिरा कभी पीछे मुड़कर नहीं देखतीं। वह कहती हैं- स्त्री का मतलब? संबंधों में उलझा एक ऐसा हाड़-मांस का शरीर जिसे हर पल अस्तित्वविहीन होकर पुरुष और परिवार के लिए समर्पित रहना है? आज स्त्री ने खुद अपनी इस परिभाषा को बदला है। स्त्री पुरुष से मुक्त होकर अपने आप को नए सिरे से गढ़ रही है, नई पहचान बना रही स्त्री का मुक्ति के लिए संघर्ष करना आज की स्त्रीवादी कविता की पहचान है। कविता ही क्यों कहानी, उपन्यास और आत्मकथा में भी महिला ने अपनी आवाज बुलंद की है। साल 2008 में उपन्यास कुइयांजान के लिए यू.के. कथा सम्मान से इन्हें सम्मानित किया जा चुका है। ज्योति नायक, महिला उद्यमी लिज्जत पापड़ को कौन नहीं जानता? बीते कई दशक से जसवंती बेन ने इसे एक ब्रांड बना दिया है। वर्तमान में इसकी अध्यक्ष हैं ज्योति नायक। महिला स्वावलंबन की बात हो, तो ज्योति नायक अग्रिम पंक्ति में शुमार होती हैं। बताते हैं कि जसवंती बेन और सात अन्य महिलाएं बेरोजगार थीं। सब ने मिलकर 1959 में लगभग सौ रुपये का ऋण लेकर पापड़ बनाने का काम शुरू किया और उद्योग का नाम दिया- श्री महिला गृह उद्योग। वर्तमान में देश में 62 वर्कशॉप्स में तड़के ही काम शुरू हो जाता है। दाल का आटा गूंध कर उसमें मसाले मिलाए जाते हैं। एक साथ सैकड़ों महिलाएं अपनी तरक्की के लिए थाप देती हैं। वर्तमान अध्यक्ष ज्योति नायक के अनुसार, लिज्जत उद्योग में वही लोग तरक्की पा सकते हैं, जिन्होंने सबसे निचले स्तर से शुरू कर पापड़ बनाए हों। काम करने वाली अधिकतर महिलाएं गरीब, अशिक्षित हैं और अपने परिवारों की आमदनी बढ़ाती हैं। हालांकि, घर पर पापड़ बनाए जाने की तकनीक के साथ-साथ इन पापड़ों की गुणवत्ता का ध्यान भी रखा जाता है। अब लिज्जत पापड़ अन्य देशों को भी निर्यात किए जाते हैं।

भारती तनेजा, ब्यूटी एक्सपर्ट

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ब्यूटी व मेकअप इंडस्ट्री को नया आयाम देने वाली फेमस कॉस्मेटोलॉजिस्ट व ऐस्थेटीशियन भारती तनेजा, पिछले 3 दशक से कामयाबी की नित नई दास्तां लिख रही हैं। पूरी दुनिया को खूबसूरत बनाने का ख्वाब देखने वाली भारती ने 30 साल पहले शुरूआत की और आज वो 50 से भी ज्यादा उपलब्धियां हासिल कर चुकी हैं। उनका कहना है कि उन्हें शुरू से ही विश्वास था कि उनकी एजुकेशन और नॉलेज जब मिलेगी, उस दिन सौंदर्य की दुनिया को नया आयाम मिलेगा। इसी कारण उन्होंने आयुर्वेद, मैगनैटोथैरेपी व अरोमाथैरेपी में डिग्री हासिल की। भारती अपने लेखों व ब्यूटी बुक के जरिए लोगों को बेहतरीन ब्यूटी टिप्स देने के साथ ही एल्पस एकेडमी के जरिए दुनिया को कई ब्यूटी एक्सपर्ट भी दे रही हैं। देश को गोल्ड फेशियल से रूबरू करवाने के कारण उन्हें ‘गोल्डन लेडी ऑफ इंडिया के नाम से भी जाना जाता है। विज्ञान के साथ सौंदर्य के फ्यूजन में गहरा विश्वास रखने वाली भारती तनेजा ने भारत में पर्मानेंट मेकअप तकनीक भी ईजाद की है। सौंदर्य की दुनिया में ऐसी कामयाबी हासिल करने के कारण उन्हें 5 बार वुमैन एचीवर अवार्ड से भी नवाजा गया है।

मोनिका शुक्ला, संवाद लेखिका

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पेशे से थीं साफ्टवेयर इंजीनियर, मगर कुछ कर गुजरने के जज्बे ने बना दिया लेखिका। लेखिका का खिताब पाने वाली मोनिका बतौर डायलॉग राइटर कई जाने-माने शो में काम कर चुकी हैं। इसके अलावा अपने हौसलों के दम पर अपना लक्ष्य पाने का इरादा रखने वाली मोनिका मुंबई मायानगरी में नेपथ्य प्रोडक्शन्स को बखूबी संभाल रही हैं। वह कहती हैं कि मन को संतुष्टि नहीं मिल रही थी, कुछ मिसिंग था। लिखने का शौक था, धीरे-धीरे कैसे लाइन चेंज कर ली, पता ही नहीं लगा। सबसे पहले, मैंने दिल्ली की एक कंपनी में बतौर कॉपी राइटर और विजुअलाइजर काम करना शुरू किया। उसके बाद मुझे अपना लक्ष्य साफ नजर आने लगा। सपनों को सच करने के लिए दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हुई, जहां मैंने कई बड़े ऐड प्रोजेक्ट किए। यहां मैंने ‘सारथी, ‘जस्सी जैसी कोई नहीं, ‘मैं ऐसी क्यों हूं और ‘जो इश्क की मर्जी आदि सीरियल्स के लिए बतौर डायलॉग राइटर काम किया।

चित्रा मुदगल, साहित्यकार

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आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य की बहुचर्चित और सम्मानित लेखिका हैं चित्रा मु दगल। चित्रा मुदगल के अब तक तेरह कहानी संग्रह, तीन उपन्यास, तीन बाल उपन्यास, चार बाल कथा संग्रह, पांच संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उपन्यास ‘आवां आठ भाषाओं में अनूदित तथा देश के 6 प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत है। बकौल चित्रा मुदगल, विद्रोह, संघर्ष और कायरता, मनुष्य को ये सभी चीजें घर से वातावरण से ही मिलती हैं। मुझे भी घर के माहौल ने विद्रोही बनाया। तथाकथित स्त्रीवादी विचारक ये नहीं सोचते कि वो जिस विमर्श की बात कर रहे हैं उसमें स्त्री की स्वीकार्यता भी जरूरी है। वे भूल जाते हैं कि स्त्री का मस्तिष्क भी है। वे अपने लिए रास्ते तलाश कर मंजिल तक पहुंच सकती है। तमाम नापाक इरादों को पीछे छोड़कर स्त्री को आगे बढऩा चाहिए। चित्रा मुदगल की पहली कहानी स्त्री-पुरुष संबंधों पर थी, जो 1955 में प्रकाशित हुई। 2003 में उपन्यास ‘आवां के लिए तेरहवां व्यास सम्मान पाने वाली देश की प्रथम लेखिका हैं। इसके अतिरिक्त चित्रा मुद्गल को उदयराज सिंह स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। डॉ. कपिला वात्सयायन राष्ट्र के प्रति सेवा, संस्कृति, कला तथा शिक्षा के क्षेत्र में एक असाधारण व्यक्तित्व हैं डॉ. कपिला वात्स्यायन। विशेष रूप से आदिवासी कला के क्षेत्र में अपने योगदान और समर्पण के बूते वह अपने आप में एक संस्था बन गई हैं। वे पद्म विभूषण का राष्ट्रीय अलंकरण प्राप्त एक महान कर्मयोगी हैं, जो हृदय की पूरी भावना के साथ काम करती हैं। अन्य कई संस्थाओं के अलावा देश की एक बड़ी संस्था इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र स्थापित करने का श्रेय भी डॉ. कपिला वात्स्यायन को जाता है। कपिला वात्स्यायन भारतीय कला की प्रमुख विद्वान हैं। डॉ. वात्स्यायन ने शिक्षा सुविधाओं के विस्तार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. वात्स्यायन को डॉ. एस राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. केएल श्रीमाली, प्रो. वीके आरवी राव, डॉ. सीडी देशमुख, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. कर्ण सिंह और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी के साथ काम करने का मौका मिला। उन्हें पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है।

किरण राव, फिल्म निर्देशक

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अभिनेता आमिर खान की बेहतरीन फिल्म ‘लगान आज भी लोगों को याद है। इसकी सहायक निर्देशक थीं किरण राव। किरण राव ने कहा कि वह पहले मुख्यधारा की फिल्मों को बुरी फिल्मों का पर्याय मानती थीं। लेकिन बीतते समय के साथ उनकी सोच बदलती गई। आज वह एक सफल फिल्म निर्माता, पटकथा लेखक और निर्देशक बन चुकी हैं। किरण राव ना केवल देखने में फिट हैं, बल्कि जेहनी तौर पर भी खूब ऊर्जा और फुर्ती से भरी रहती हैं। वे बताती हैं कि लोग वैसी फिल्में बनाते हैं, जैसी उन्हें बनाना पसंद है। कोई यह सोच कर फिल्म बनाने नहीं निकल पड़ता कि मुझे लोगों की सोच बदलनी है। ये भारत के दर्शकों के लिए बनाई जाती हैं। ‘पीके इस लिहाज से जरूर अलग बनी थी। ‘धोबी घाट एक ऐसी फिल्म थी जो फेस्टिवल के लिहाज से बनी थी। हालांकि मैंने फेस्टिवल को मन में रखकर स्क्रिह्रश्वट नहीं लिखी थी। मैं बस उस तरह की एक फिल्म बनाना चाहती थी और भारत में ऐसी फिल्में नहीं बन रही थी। इसलिए मैंने उम्मीद नहीं की थी कि भारतीय दर्शक उससे जुड़ेंगे। हां, यह सौ फीसदी सच है कि आमिर के कारण लाभ मिला।

हेमा जमनाल, इंटीरियर डिजाइनर

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दिल्ली के पंचसितारा होटल अशोक स्थित सागर रत्ना रेस्टोरेंट के मनभावन इंटीरियर की परिकल्पना है इंटीरियर डिजाइनर हेमा जमनाल की। ऐसे न जाने कितने ही घर, ऑफिस, होटल और रेस्टोरेंट इनकी परिकल्पना से संवरे हैं। कीर्ति नगर, दिल्ली स्थित नवाब फर्नीचर और उसकी सहयोगी कंपनी एच एस आहुजा एसोसिएट्स में होम डेकोर, ऑफिस फर्नीशिंग से लेकर इनोवेटिव इंटीरियर कांसेह्रश्वट्स तक की सारी जिम्मेदारी हेमा ही संभालती हैं। वैसे, इंटीरियर डिजाइनिंग इनका शौक भले ही था, करियर विकल्प नहीं। हेमा इंजीनियरिंग करना चाहती थीं, लेकिन किस्मत में कुछ और ही था। जब हेमा ने इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स किया था, तब इक्का-दुक्का लड़कियां ही इसे प्रोफेशन बनाती थीं। लेकिन उनके डेडिकेशन ने उन्हें स्थापित इंटीरियर डिजाइनर की श्रेणी में ला खड़ा किया। हेमा कहती हैं कि जब मैं इस क्षेत्र में आई थी, तब लोग इंटीरियर के प्रति बहुत जागरूक नहीं थे, उन्हें समझाना पड़ता था। मगर, आज स्थितियां बदली हैं। आज लोग खुद हमसे पूछते हैं कि इंटीरियर में नया ट्रेंड क्या है! अब तो इतना काम है कि फुर्सत नहीं मिलती।

शुभा मुदगल, गायिका

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शुभा मुदगल भारत की प्रसिद्ध हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, खयाल, ठुमरी, दादरा और प्रचलित पॉप संगीत गायिका हैं। इन्हें साल 1996 में सर्वश्रेष्ठ गैर-फीचर फिल्म संगीत निर्देशन का नेशनल अवार्ड ‘अमृत बीज के लिए मिला था। ‘अलिमोरे अंगना दरस दिखायो और ‘रुमझुम बाजे नयन पैजनिया जैसे गानों से लोगों के बीच में अपनी खास पहचान बनाने वाली शुभा मुदगल संगीत क्षेत्र के अलावा यह ‘अनहद और ‘सहमत जैसी सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़ी हुई हैं। शुभा मृदगल ने 90 के दशक में फोक, फ्यूजन में कई प्रयोग किए हैं। हालांकि, वे कहती हैं कि मैंने 90 के दशक में नई संगीत विधा अपनाई थी जो एक प्रयोग मात्र था। क्लासिकल संगीत हमेशा से मेरी विशेषता है। शास्त्रीय संगीत के अस्तित्व को कोई खतरा नहीं है। उसके कदम लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं और उसको बढ़ावा देने वाली संस्थाएं कलाकारों को लगातार प्रोत्साहन भी दे रही हैं।

इरोम शर्मिला, सत्याग्रही

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कभी मिली नहीं, लेकिन गांधी के रास्ते पर चलकर अपनी मांग को लेकर बीते डेढ़ दशक से इरोम शर्मिला उपवास पर हैं। कुछ दिन के लिए जबरन उपवास तुड़वाया जाता है और फिर उपवास की राह। मणिपुर की इस लौह महिला की मांग है कि आम्र्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट को हटाया जाए। इरोम शर्मिला के कई परिचय हैं। वे इरोम नंदा और इरोम सखी देवी की प्यारी बेटी हैं। वह बहन विजयवंती और भाई सिंघजित की दुलारी है, जो कहती है कि मौत एक उत्सव है, अगर दूसरों के काम आ सके। उन्हें योग के अलावा प्राकृतिक चिकित्सा का अद्भुत ज्ञान है। वे एक कवि भी हैं, लेकिन आम मणिपुरी के लिए वह इरोम शर्मिला न होकर ‘मणिपुर की लौह महिला है। महात्मा गांधी की तरह ही शर्मिला ने भी अन्याय के खिलाफ अहिंसा को अपना हथियार चुना। तब से अब तक वहां न जाने कितने प्रदर्शन हुए हैं और न जाने कितने लोगों ने जान दी है, मगर एक्ट नहीं हटा। सरकार की ओर से 2004 में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जीवन रेड्डी को जांच के आदेश दिए। वर्ष 2005 में उन्होंने अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें एक्ट को हटाने की सिफारिश की गई, मगर आर्म फोर्सेस के दबाव में सरकार ने रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

नंदिता दास, अभिनेत्री

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अभिनेत्री, निर्देशक, समाज सेविका और बाल फिल्म परिषद की अध्यक्ष नंदिता को उनके काम के लिए कई राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। नोकिया अवार्ड में अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘फिराक के लिए भी सम्मान मिला। पेंटर पिता जतिन दास और लेखिका मां वर्षा से उन्हें बहुत कुछ विरासत में मिला है। उन्होंने करियर की शुरूआत जन्नतया मंच से की। नंदिता दास कमर्शियल फिल्मों की ओर नहीं भागीं और हमेशा महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज बन कर उभरीं। फिल्म ‘फायर के वक्त उन्हें मार देने की धमकी तक मिली। बेहद मुश्किल दौर से गुजरीं नंदिता। वह बताती हैं, ‘मेरे माता-पिता ने कहा कि ऐसे काम मत करो। जब आप समाज की आवाज बनना चाहती हों, तो परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है। नंदिता दास भारत की दूसरी महिला हैं, जिन्हें वर्ष 2005 में कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में ऐश्वर्या राय के बाद जूरी के रूप में बुलाया गया।

सईं परांजपे, फिल्म निर्देशिका

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हिंदी सिनेमा में बहुआयामी प्रतिभा की धनी, उत्कृष्ट, कल्पनाशील और गहन दृष्टि संपन्न फिल्मकार निर्देशक सई परांजपे की फिल्में जादू का शंख, स्पर्श, चश्मे बद्दूर, कथा, दिशा, पपीहा, साज, भागो भूत, चकाचक, सुई, अंगूठा छाप, चूडिय़ां भारतीय जनमानस में अलग- अलग कालखण्ड में अनेक मर्मस्पर्शी स्मृतियों के साथ अंकित हैं।

मृदुला गर्ग, साहित्यकार

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हिंदी की लोकप्रिय लेखिकाओं में से एक हैं मृदुला गर्ग। कोलकाता में जन्मी मृदुला गर्ग ने अर्थशास्त्र में एम.ए किया, किंतु रुझान हिंदी साहित्य में रहा। व्यास सम्मान सहित कई महत्वपूर्ण पुरस्कारों से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग ने बिना स्त्रीवादी आंदोलन का सहारा लिए लगभग 40 साल पहले अपने लेखन से सशक्त और स्वंतत्र लेखिका की छवि बनाई थी। अब भी वह लगातार लेखन और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। वह कहती हैं कि हमारे परिवार में साहित्य के प्रति लगाव बहुत ज्यादा था। हमें साहित्य पढऩे की प्ररेणा मां से मिली। 32 साल की उम्र में लिखना शुरू किया था। मेरी पहली कहानी ‘रुकावट सारिका में 1972 में छपी थी। उसके बाद ‘हरी बिंदी और ‘डेफोडिल जल रहे हैं छपी। औरतें अपनी पहचान ढूंढने की कोशिश में रहती हैं, जबकि आदमी अच्छे हों या बुरे, यही मानते हैं कि वे मुकम्मल हैं। इसलिए अपनी कमियों को नहीं आंकते। उसके हिस्से की धूप में दूसरा पति परिपक्व नहीं है मगर ‘चित्तकोबरा में प्रेमी परिपक्व व्यक्ति है। कठगुलाब में विपिन में स्त्रीसुलभ गुण हैं। चित्तकोबरा के बाद अनित्या लिखा जो ऐतिहासिक उपन्यास है।

टेरी थॉमस, वैज्ञानिक

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पहले माना जाता रहा होगा रक्षा अनुसंधान और विज्ञान को पुरुषों का क्षेत्र। लेकिन, जब से टेसी थॉमस ने अपना लोहा मनवाया, हर कोई इन्हें ‘अग्निपुत्री कहने लगा। आखिर कहें भी क्यों न!

मीरा नायर, फिल्म निर्देशक

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समाज में रूढिवादी वर्जनाओं को तोड़कर महिलाओं के हक की बात कर मीरा नायर ने कई बेहतरीन फिल्में लोगों को दीं। मीरा नायर ने शुरू में टीवी के लिए चार वृत्तचित्र बनाए। इसके बाद उन्होंने ‘सलाम बॉम्बे, ‘मॉनसून वेडिंग, ‘दि नेमसेक, ‘कामसूत्र ए टेल ऑफ लव ‘मिसिसिपी मसाला और ‘वैनेटी फेयर जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। भुवनेश्वर में जन्मी अमेरिकी फिल्म निर्देशिका मीरा नायर एक साहसी फिल्मकार हैं, जो किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानतीं। मीरा नायर की शुरुआती शिक्षा शिमला में हुई। बाद में आगे की पढ़ाई के लिए वे अमेरिका चली गईं। 1988 में सलाम बांबे जैसी बेहतरीन फिल्म से अपने करियर की शुरुआत करने वाली मीरा ने जल्द ही विश्व सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बना ली। इस फिल्म के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया। इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में गोल्डेन कैमरा अवार्ड के साथ ही भारत में सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीतने का गौरव पाया।

तनुजा चंद्रा, फिल्म निर्देशक

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तनुजा चंद्रा ने टेलीविजन की दुनिया में कदम रखा था- ‘जमीन-आसमान सीरियल से। उसके बाद ‘मुमकिन जैसे सफल धारावाहिक से अपनी साख बनाई। यही साख उनके सफलता की सीढ़ी बनीं। जब यश चोपड़ा ने ‘दिल तो पागल है बनाने की सोची, तो उसकीे पटकथा की जिम्मेवारी तनुजा चंद्रा के कंधों पर आई। फिल्म सुपरहिट रही। तनुजा चंद्रा भी शख्सियत बन गईं। फिल्मकार महेश भटट की एसोसिएट रही तनुजा चंद्रा पटकथा के साथ-साथ निर्देशन में हाथ आजमाती रहीं। उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर भले ही हिट न रहीं हों, लेकिन सिने समीक्षकों ने फिर भी उन्हें सराहा। ‘जख्म, ‘दुश्मन, ‘तमन्ना, ‘संघर्ष, ‘सुर-द मेलोडी ऑफ लाइफ, ‘फिल्म स्टार, ‘जिंदगी रॉक्स जैसी फिल्मों ने तनुजा चंद्रा के नाम को और अधिक रोशन किया।

कल्पना लाजिमी, फिल्म निर्देशक

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हिंदी फिल्मों में महिला प्रधान सिनेमा की बात हो, नारीवादी विषय को तवज्जो देने का मसला हो, या फिर समाज की अनदेखी बातों पर क्लासिक फिल्में हों, कल्पना लाजिमी का ही नाम आता है। उनकी फिल्म ‘रुदाली को भला कौन भुला सकता है, जिसने इन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिलाया। महान फिल्मकार- अभिनेता गुरुदत्त के परिवार से ताल्लुक रखने वाली कल्पना लाजिमी ने सिनेमा की बारीकियां श्याम बेनेगल से सीखीं। डॉक्यूमेंट्री और सीरियल्स के साथ ही इन्होंने ‘रुदाली के बाद ‘दरम्यान, ‘दामन, ‘क्यों जैसी फिल्में लोगों के सामने पेश कीं। प्रख्यात गायक- संगीतकार भूपेन हजारिका के साथ 40 वर्षों तक कल्पना लिव इन रिलेशन में रही हैं। कल्पना मानती हैं कि ‘धुमुहा: द स्टॉर्म के नाम से बन रही उनकी नई फिल्म, उनके द्वारा हजारिका को दी गई सच्ची श्रृद्धांजलि होगी। यह कहानी महान व्यक्ति के पीछे एक महिला के छिपे संघर्ष को प्रस्तुत करेगी।

अपर्णा सेन, फिल्म निर्देशक

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बंगाल की धरती ने हमेशा ही कला-साहित्य-संगीत के क्षेत्र में देश को एक नई राह दिखाई है। उसी बंगाल की माटी से निकलकर अपर्णा सेन ने अपनी पहचान छोड़ी है। महज 16 वर्ष की आयु में निर्देशक सत्यजित रे की फिल्म ‘तीन कन्या में अपर्णा सेन को मौका मिला। 70 के दशक में उन्होंने कई बंगाली फिल्मों में काम किया। 1981 में अपर्णा ने ‘चौरंगी लेन का निर्देशन किया। इस फिल्म की काफी प्रशंसा हुई और बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड भी उन्हें मिला। इसके बाद उन्होंने ‘पारोमा, ‘सती, ‘युगांत, ‘अमोदनी, ‘उनिशे अप्रैल, ‘तितली, ‘मि. एंड मिसेज अय्यर जैसी कई फिल्मों का निर्देशन किया। हाल के दिनों में उनकी नई फिल्म ‘द जैपनीज वाइफ को लेकर लोगों की उत्कंठा बनी रही। इनकी पुत्री कोंकणा सेन भी अपनी मां की तरह अपनी कला का झंडा गाड़ रही हैं।

नीलिमा मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता 

Successful Women

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

समाज की सूरत तब ही बदलती है, जब हमारे बीच से कोई अलख जगाता है। नीलिमा चन्द्रशेखर मिश्रा ने ऐसी ही ज्योति जलाई, जिसके प्रकाश से गरीब आदिवासी, किसान और महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हो रही है। साल 2011 में रेमन मैगसायसाय अवॉर्ड से सम्मानित नीलिमा मिश्रा महाराष्ट्र के जलगांव स्थित बहादरपुर (परोला) गांव में रहकर आसपास के किसानों-मजदूरों और महिलाओं को उनका बुनियादी हक दिलाने के लिए सालों से संघर्षरत हैं। उनके ही प्रयास से नन्दूरबार जिले के गरीब आदिवासियों की जमीन उन्हें वापस दिलाने का सिलसिला शुरू हुआ था। अपने लिए तो सब जीते हैं, लेकिन नीलिमा ने विवाह न कर गरीब-महिलाओं को ही अपना परिवार माना। बकौल नीलिमा, यह तो तय था कि सामाजिक क्षेत्र में जाना है। 1995 में पुणे में डॉ. एसएस कलबाग की संस्था के साथ काम का सिलसिला शुरू हो गया और दोस्तों की बात सच हो गई। नन्दूरबार जिले में काम करने का अनुभव अलग था। झुग्गी बस्तियों में रहने वालों को अपनी जमीन गिरवी रख कर साहूकारों के उत्पीडऩ का सामना करना पड़ता था।