Hindi Kahani: बरसों बाद आज फोन की बजने वाली बेसुरी घंटी आज बहुत ही ज्यादा प्यारी लग रही थी।
“दीपाली…जल्दी से फोन उठा ले ना…पता नहीं क्या करती रहती है?”
“हाँ मां अभी उठाते हैं…यह कहकर दीपाली फोन की ओर भागी।
“हैलो…कौन…?प्रणाम बड़े चाचा….!”दीपाली के इतना बोलते हुए पीछे आकर उसकी मां मीना देवी आकर खड़ी हो गई।
“किका फोन है दीपाली…?”
“मां बड़े चाचा का है!”दीपाली के कहने पर मीना देवी ने दीपाली से फोन ले लिया और फोन हाथ में लेकर बोली
” जी कहिए?”
उधर से बहुत ही रुंधी हुई आवाज आने लगी
“अब तो हम भाई कहलाने के लायक भी नहीं रहे….फिर तुमसे कैसे उम्मीद करें छोटी बहू…!!!
हम तो माफी के लायक भी नहीं रहे…!!!”आने वाली आवाज रूंध गई थी और ‘वह’ सिसकने लगे थे।
उनकी आवाज सुनकर मीना देवी द्रवित हो गई। उन्होंने धीरे से कहा
“बड़े भईया, आप रो रहे हैं…!!!!”
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“हाँ छोटी बहू,अपने घर आंगन से हम अपने ही छोटे भाई को बेदखल कर निकाल दिए…उसके ऊपर बेबुनियाद इल्जाम लगाया, उसे जेल तक भेज दिए….न जाने कौन सा नशा हमपर चढ़ गया था…हम न जाने ऐसा कैसे कर गए…अब हम तुम सबसे मिलकर माफी मांगना चाहते हैं…एक बार आ जाओ यहां हमारे पास…!”
“ बड़े भईया…अभी तो यह यहां नहीं हैं लेकिन…अब वहां आना संभव नहीं….इन्होंने तो कसम खा लिया था….!!”
मीना देवी की बात काटते हुए उसके जेठ महिपाल सिंह ने गिड़गिड़ाते हुए फिर से कहा
”छोटी बहू….,सचमें हम माफी मांगने के लायक नहीं…न ही माफ करने के लायक हैं…पर प्रकृति ने हमें इतनी बड़ी सजा दे दी है फिर उसके आगे और क्या हो सकता है…देखो हम अपने दोनों पैरों से अपाहिज हो गए हैं…दोनों बच्चे पढ़लिख कर भी…आवारा… अब जेल में हैं।…अब हम क्या करें…कहाँ जाएं…मौत भी नहीं मिलती है…!!…एक बार मेरे मरने से पहले आ जाओ…!”
फोन रखने के बाद मीना देवी की आंखों में आंसू थे। अपनी मां की आंखों में आंसू देखकर दीपाली घबराते हुए पूछी
“मां क्या हुआ क्यों रो रही हो?”
“कुछ नहीं तुम जाकर अपना काम करो!”
“ मगर ऐसा क्या हुआ माँ?”
“ कहा ना कि तुम जाकर काम करो।” मीना देवी ने दीपाली से डपटकर कहा।
दीपाली के जाने के बाद मीना देवी पुरानी यादों में खो सी गईं।
बहुत ही हँसता खेलता सा ससुराल था उनका।
उनके पति से लगभग दस साल बड़े उनके जेठ थे।
उनकी आंखों के आगे चलचित्र की तरह पुरानी यादें घूम गई, जब वह दुल्हन बनाकर उस घर में उतरीं थीं।
उनकी सास और बड़ी जेठानी ने आरती उतार कर उनका स्वागत किया था।
मुंह दिखाई मे सासुमां और जेठानी ने उन्हें सूप भरकर गहने चढ़ाया था।
अल्हड़ सी किशोरी मीना देवी गहने और कपड़े देख कर खुशी से खिल उठी थी।
तब भी उनकी जेठानी ने ही उन्हें अपने आंचल तले बहुत ही सटाकर बहुत ही प्यार से घर गृहस्थी की पाठ भी पढ़ाया था।
सालभर में वह दो जुड़वां बच्चों की मां भी बन गई।
तीनों को पालते हुए चार साल बीते नहीं कि नन्ही सी दीपाली उनकी गोद में आ गई।
महिपाल सिंह और उनके छोटे भाई विनीत सिंह यानी कि मीना देवी के पति, दोनों ही मिलकर अपने पुश्तैनी खेती बारी का काम करते थे।यही उनकी आजिविका का साधन भी थी।
महिपाल सिंह के दो बेटे थे।दोनों ही पढ़ाई में अच्छे थे।
साथ ही मीना देवी के दोनों बेटे भी अब स्कूल जाने लगे थे।
सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन न जाने क्या हुआ… अचानक ही महिपाल सिंह की नीयत खराब होने लगी। वह विनीत जी को उल्टा पुल्टा सीख देते थे। हर छोटीछोटी बात पर डांट फटकार लगाया करते।
जब भी खेती अच्छी नहीं उतरती थी सारे इल्जाम विनीत पर ही लग जाता।
धोखे से उन्होंने सारी जमीन पर अपना साइन करवा लिया। मीना देवी के सारे गहने हड़प लिया।
उसपर मीना और विनीत पर गहनों की चोरी के इल्जाम लगाकर अपने भाई को जेल भिजवा दिया।
विनीत पर तो ठगी करने और जमीन हड़पने के भी झूठे आरोप लगाए।
पुलिस का मुंह उन्होंने पैसों से बंद कर दिया था।
घर में तनातनी था।पति जेल में, बच्चे छोटे।मीना देवी रो रोकर अपने ससुराल और बच्चों के आगे अपने और अपने पति की बेगुनाही की भीख मांग रही थी।
दीपाली तो उसे समय छोटी सी थी, अबोध बच्ची लेकिन दोनों बच्चे बड़े थे। वह अपराधी की तरह अपने बड़े चाचा के आरोप को सिर झुका कर सुन रहे थे।
मीना देवी का हृदय उन दोनों को देखकर रो पड़ता था लेकिन उनकी बात सुनने और समझने वाला कौन था?
पति के जेल जाने के बाद उनकी स्थिति एक नौकरानी की तरह हो गई थी।
दिन भर काम में जुटे रहती थीं, उस पर भी जेठ और जेठानी उनके साथ मारपीट भी किया करते थे।
इतना करने पर भी उनका दिल नहीं पसीजा तो बच्चों के साथ उन्हें घर से निकाल दिया गया। मीना देवी रो पड़ी।
ना तो उनके पास रुपए पैसे थे और नहीं पहनने को कपड़े।
तीनों बच्चों को लेकर वह घर से निकल आई। जाए तो कहां?
गांव में जितनी पढ़ाई होती है उसमें नौकरी क्या मिलेगी!
ससुराल से निकलकर वह गांव के मंदिर में पहुंची।
रो-रो कर उन्होंने पुजारिन काकी से कहा
“काकी,जब यह जेल से लौटे तब उन्हें बता देना कि हमें तो बच्चों के साथ निकाल दिया गया है। अब हम कहां जाएंगे पता नहीं? इन बच्चों को कैसे पालेंगे?”
पुजारिन काकी बहुत ही सहृदय महिला थीं। वह कई गैर सरकारी संगठनों को जानती थी जो कि मजबूर महिलाओं की मदद भी किया करते थे।
उन्होंने मीना देवी से कहा
“बहुरिया, हम कुछ लोगों को जानते हैं जो तुम्हें रोजगार दे देंगे। तुम चिंता मत करो।”
पुजारी काकी की मदद से मीना देवी को एक सिलाई केंद्र में नौकरी मिल गई ,जहां वह लड़कियों को सिलाई सिखाया करती थीं।
बहुत ज्यादा तो कमाई नहीं थी लेकिन इतनी थी कि वह अपने तीनों बच्चों को पाल रही थीं।
देखते ही देखते 5 साल बीत गए।विनीत जी को जेल से रिलीज कर दिया गया। उन्हें लेने मीना देवी गई हुई थी।उन्हें लेकर वह अपने नए जगह पर आ गई।
विनीत जी का मन अपने भाई भाभी और परिवार से फट चुका था। उनके अंदर नफरत आ गई थी।
उन्होंने मीना देवी से कहा
“मीना, मेरे पास आज तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं है। तुम्हारे गहने, कपड़े, यहां तक की हमारी जमीन भी चली गई ।
हम चाहें तो पुलिस और केस कर सकते हैं लेकिन हम अपने भैया के खिलाफ नहीं जाएंगे।
आज से हम अपनी नई जिंदगी शुरू करेंगे। हमें थोड़ा समय दो ,हम तुम्हें सब कुछ दे देंगे। तुम्हारा खोया हुआ हर चीज दिला देंगे।”
मीना देवी की आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने कहा
“क्या बात करते हैं जी, मेरे सारे गहने और सारी खुशियां तो आप हैं। आपके अलावा और कुछ भी नहीं। आप हैं तो मेरी दुनिया है।”
विनीत जी ने उन्हें गले से लगा लिया।
मीना देवी अपने सिलाई में लगीं रहीं और विनीत जी नेबहुत ही मेहनत किया। वह शुरू में दिहाड़ी में खेती करते थे।
उसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे अपना जमीन खरीदा। अपना एक छोटा सा घर बनाया और एक हंसी खुशी जिंदगी जीने लगे ।
उन्होंने अपने दोनों बेटों को ऊंची पढ़ाई करने के लिए शहर भेजा। दीपाली छोटी थी। वह तो अभी उनके साथ ही रहती थी।
“अम्मा बाबा आ गए।”
विनीत जी उन्हें खोए हुए देखकर उनसे पूछा “क्या बात है मीना, क्या कहां गुम हो?”
अपने पिता को बोलते हुए देखकर दीपाली ने कहा
“आज बड़े चाचा का फोन आया था। उसी के बाद से अम्मा उदास बैठी हैं।” विनीत जी का मुंह कड़वा हो गया। उन्होंने कहा
“बड़े भैया का फोन भला क्यों आया?”
मीना देवी ने उन्हें सारी बात बताते हुए कहा
“ उन्हें लकवा मार गया है ।उनके दोनों बेटे जेल में है और वह बहुत ही ज्यादा पछतावे में हैं। हम सब से माफी मांगना चाहते हैं।”
अपने भाई को मुसीबत में देखकर विनीत जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने मीना से कहा
“मीना, महान वह होते हैं जो माफ कर देते हैं ।
जाने दो, भैया ने जो किया उसे भूल जाना ही ठीक है।
अभी वह मुसीबत में है ।हम उनसे मिलकर आते हैं।”
“आप बिल्कुल सही कहते हैं जी, हम भी यही सोच रहे थे।” मीना देवी ने कहा।
विनीत मीना दोनों अपने भाई से मिलने अपने पुश्तैनी घर पहुंचे।
आज उस घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। पहले जहां बच्चों के शोर गोल से पूरा घर गुलजार हुआ करता था, आज शमशान की तरह सन्नाटा पसरा हुआ था।
बाहर एक नौकरानी बाहर काम कर रही थी। उसने विनीत और मीना को पहचान लिया ।
उसने कहा
“बड़े बाबू तो उसे खाट पकड़े हुए हैं।”
“ हम उनसे मिलना चाहते हैं।”
“आईए…,वह उन्हें लेकर महिपाल सिंह के कमरे में आई।
महिपाल सिंह बिस्तर पर पड़े हुए थे। पूरे कमरे से बदबू आ रही थी।
अब न तो वह रइसी थी और न हीं पैसे। दोनों बेटे जेल में थे। जेठानी जी भी बीमार ही रहती थी।
कुछ जमीन बिक गई थी।गहने गिरवी रखे हुए थे। बहुत ही ज्यादा तंगहाली थी।
उन दोनों को देखते ही महिपाल सिंह की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने रोते हुए अपने हाथ जोड़ दिए और कहा
“ छोटू ,हमें माफ कर दो।हम माफी के लायक तो नहीं फिर भी मरने से पहले तुम्हारा हाय लेकर नहीं जा सकते…!!
सब कुछ हमने उजाड़ दिया …तो भगवान ने हमें उजाड़ दिया …!!!”
“भैया ऐसी बातें ना करो!” विनीत जी रोने लगे। वह दौड़ते हुए अपने भाई को गले लगा लिया और कहा…” भैया ऐसी बातें ना करो मेरे दिल में आपके लिए कोई मलाल नहीं है!”
“ नहीं छोटू देखो… आज हम बिस्तर में कैसे पड़े हुए हैं…! ना घर का ठिकाना ना बच्चों का…!!!
न जाने कौन सा नशा चढ़ गया था… अपना सब कुछ गंवा दिया…। बच्चों और बहुरिया को घर से निकाल दिया….।
भगवान ने इतनी बड़ी सजा दी…. आज हम चलने फिरने से तो लाचार हो ही गए हैं !ना जमीन है ना जायदाद।
जो चीज का घमंड था वही नहीं रहा…. बस अंतिम समय में माफी मांग रहे हैं…माफ कर दो!
भगवान की नजर से तो गिर ही चुके हैं…वह कभी क्षमा नहीं कर पाएगा हमको…!!!” महिपाल सिंह फूट-फूट कर रो रहे थे।
पीछे से उनकी पत्नी महिमा जी भी आकर रोने लगी ।
“लाला, हमें माफ कर दो, बहुरिया माफ कर दो। अपनी करनी का फल तो हमें मिल गया।”
मीना देवी ने अपनी जेठानी को अपने गले से लगा लिया और कहा
“ दीदी, माफी मांग कर हमें शर्मिंदा मत कीजिए।आप बड़ी हैं।”
उधर विनीत जी ने भी अपने भाई के आंसू पोंछकर कहा
“ भैया माफी मांग कर हमें शर्मिंदा मत कीजिए आप हमसे बड़े हैं ।”
“लाला अब इस घर में ही आ जाओ ।यहां से मत जाओ। तुम्हारे भैया अंतिम पहर में हैं… ना जाने कब सांस रुक जाए!”
“जी भाभी!” विनीत ने अनजाने में कह दिया। गहरी रात के बाद एक सुनहली सुबह होने की आस लगी थी।
