Manto story in Hindi

Manto story in Hindi: मुस्तकीम ने महमूदा को पहली बार अपनी शादी पर देखा। आरसी मुसहफ़1 रस्म अदा हो रही थी कि अचानक उसे दो बड़ी-बड़ी, असाधारण रूप से बड़ी आंखें दिखायी दीं। वे महमूदा की आंखें थीं जो अभी तक कुंवारी थीं।

मुस्तकीम औरतों और लड़कियों के झुरमुट में घिरा था। महमूदा की आंखें देखने के बाद उसे जरा अनुभव न हुआ कि आरसी मुसहफ़ की रस्म कब शुरू और कब खत्म हुई। उसकी दुल्हन कैसी थी, यह बताने के लिए उसे मौका दिया गया, मगर महमूदा की आंखें उसको दुल्हन और उसके बीच एक काले मखमली पर्दे की भांति बाधक हो गयीं।

उसने चोरी-चोरी कई बार महमूदा की ओर देखा, उसकी हमउम्र लड़कियां सब चहचहा रही थीं। मुस्तकीम से बड़े जोरों पर छेड़खानी हो रही थी, मगर वह अलग-थलग खिड़की के पास घुटनों पर ठोड़ी जमाए खामोश बैठी थी। उसका रंग गोरा था, बाल तख्तियों पर लिखने वाली स्याही की भांति काले तथा चमकीले थे। उसने सीधी मांग निकाल रखी थी जो उसके अंडाकार चेहरे पर बहुत जंचती थी। मुस्तकीम का अनुमान था कि उसका कद छोटा है, अतः जब उठा तो उसका प्रमाण भी मिल गया।

उसका लिबास बहुत साधारण था। दुपट्टा जब उसके सिर से ढलका और फर्श तक जा पहुंचा तो मुस्तकीम ने देखा कि उसका सीना बहुत ठोस और मज़बूत है। भरा-भरा जिस्म, तीखी नाक, चौड़ी पेशानी, छोटा-सा मुंह और आंखें‒ जो देखने को सबसे पहले दिखायी देती थीं।

  1. एक प्रथा, जिसके अनुसार दुल्हन के अंगूठे में एक बड़े शीशे वाली अंगूठी पहनाते हैं जिसमें दूल्हा को दुल्हन की सूरत दिखाई जाती है।

मुस्तकीम अपनी दुल्हन को घर ले आया। दो-तीन मास बीत गए। वह खुश था इसलिए कि उसकी पत्नी सुंदर तथा सुघड़ थी, लेकिन वह महमूदा की आंखें न भूल सका था। उसे ऐसा महसूस होता था कि उसके दिल व दिमाग पर छा गयी है।

मुस्तकीम को महमूदा का नाम मालूम नहीं था। एक दिन उसने अपनी बीवी कुलसुम से यों ही पूछा‒ ‘‘वह लड़की कौन थी जो, हमारी शादी पर जब आरसी मुसहफ़ की रस्म अदा हो रही थी‒ एक कोने में खिड़की के पास बैठी थी?’’

कुलसुम ने जवाब दिया‒ ‘‘मैं क्या कह सकती हूं? उस वक्त कई लड़कियां थीं। मालूम नहीं आप किसके बारे में पूछ रहे हैं?’’

मुस्तकीम ने कहा‒ ‘‘वह…वह, जिसकी बड़ी-बड़ी आंखें थीं।’’

कुलसुम समझ गयी‒ ‘‘ओहो, आप का मतलब महमूदा से है! हां, वाकई उसकी आंखें बहुत बड़ी हैं, लेकिन बुरी नहीं लगतीं। गरीब घराने की लड़की, बहुत कम बोलने वाली और शरीफ। कल ही उसकी शादी हुई है।’’

मुस्तकीम को सहसा एक धक्का लगा‒ ‘‘उसकी शादी हो गयी कल?’’

‘‘हां, मैं कल वहीं तो गयी थी। मैंने आपसे कहा नहीं था कि मैंने उसे एक अंगूठी दी है।’’

‘‘हां-हां, मुझे याद आ गया, लेकिन मुझे यह मालूम नहीं था कि तुम जिस सहेली की शादी पर जा रही हो, वही लड़की है, बड़ी आंखों वाली। कहां शादी हुई है उसकी?’’

कुलसुम ने गिलौरी बनाकर अपने पति को देते हुए कहा‒ ‘‘अपने अज़ीज़ों में। खाविंद उसका रेलवे वर्कशॉप में काम करता है, डेढ़ सौ रुपये माहवार तनख़्वाह है। सुना है, बेहद शरीफ आदमी है।’’

मुस्तकीम ने गिलौरी कल्ले के नीचे दबायी‒ ‘‘चलो अच्छा हो गया। लड़की भी जैसा कि तुम कहती हो शरीफ है।’’

कुलसुम से न रहा गया। उसे आश्चर्य हो रहा था कि उसका पति महमूदा में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है? उसने कहा‒ ‘‘ताज्जुब है कि आपने उसे एक नजर देखने पर याद रखा।’’

मुस्तकीम ने कहा‒ ‘‘उसकी आंखें कुछ ऐसी हैं कि आदमी उन्हें भूल नहीं सकता। क्या मैं झूठ बोल रहा हूं?’’

कुलसुम दूसरा पान बना रही थी। थोड़ी-सी फुर्सत के बाद वह अपने पति से कहने लगी‒ ‘‘मैं तो इसके बारे में कुछ नहीं कह सकती। मुझे तो उसकी आंखों में कोई आकर्षण दिखायी नहीं देता। मर्द न जाने किन निगाहों से देखते हैं।’’

मुस्तकीम ने यही उचित समझा कि इस विषय पर अब आगे बातचीत नहीं होनी चाहिए। इसलिए उत्तर में वह मुस्कराकर उठा और अपने कमरे में चला गया। इतवार की छुट्टी थी। सदा की भांति उसे अपनी पत्नी के साथ मैटिनी शो देखने जाना चाहिए था, मगर महमूदा का जिक्र छेड़कर उसने दिमाग को बोझिल बना लिया था।

उसने आरामकुर्सी में लेटकर तिपाई पर से एक किताब उठायी जिसे वह दो बार पढ़ चुका था। उसने पहला पन्ना निकाला और पढ़ने लगा, परंतु अक्षर गड़मड़ होकर महमूदा की आंखें बन जाते। मुस्तकीम ने सोचा, शायद कुलसुम ठीक कहती थी कि उसे महमूदा की आंखों में कई आकर्षण नजर नहीं आता, हो सकता है किसी और मर्द को भी नजर न आए। एक सिर्फ मैं हूं जिसे दिखायी दिया है पर क्यों? मैंने ऐसा कोई इरादा नहीं किया था, मेरी कोई इच्छा नहीं थी कि वह मेरे दिल-व-दिमाग पर छा गयी, इसमें न उन आंखों का दोष है, न मेरी आंखों का जिनसे मैंने उन्हें देखा।

इसके बाद मुस्तकीम ने महमूदा के विवाह के बारे में सोचना आरंभ किया, हो गयी उसकी शादी, चलो अच्छा हुआ। लेकिन दोस्त यह क्या बात है कि तुम्हारे दिल में हल्की-सी टीस उठती है, क्या तुम चाहते हो कि उसकी शादी न हो? सदा कुंवारी रहे क्योंकि तुम्हारे दिल में उससे शादी करने की इच्छा तो कभी उत्पन्न नहीं हुई, तुमने उसके बारे में कभी एक क्षण के लिए भी नहीं सोचा कि यह जलन कैसी? इतनी देर तुम्हें उसे देखने का कभी विचार नहीं आया, पर अब तुम क्यों उसे देखना चाहते हो? और यदि कभी उसे देख भी लो क्या कर लोगे? बोलो ना, क्या करोगे?

मुस्तकीम के पास इसका कोई जवाब नहीं था। असल में उसे मालूम ही नहीं था कि वह क्या चाहता है? यदि कुछ चाहता भी तो क्यों चाहता है?

महमूदा की शादी हो चुकी थी और वह भी केवल एक दिन पहले, यानी उस समय जबकि मुस्तकीम पुस्तक पढ़ रहा था, महमूदा निश्चय ही दुल्हन के लिबास में या तो अपने मायके में या अपनी ससुराल में शरमाई-लजाई बैठी थी। वह खुद शरीफ थी, उसका पति भी शरीफ था, रेलवे वर्कशॉप में नौकर था और डेढ़ सौ रुपये मासिक वेतन पाता था। बड़ी खुशी की बात थी। मुस्तकीम की हार्दिक इच्छा थी कि वह खुश रहे‒ आजीवन सुखी रहे। लेकिन उसके दिल में जाने क्यों एक टीस-सी उठती जो उसे व्याकुल कर देती थी।

मुस्तकीम अंत में इस नतीजे पर पहुंचा कि यह सब बकवास है । उसे महमूदा के बारे में बिलकुल कुछ नहीं सोचना चाहिए। दो वर्ष व्यतीत हो गए। इस दौरान में उसे महमूदा के बारे में कुछ मालूम न हुआ और न उसने कुछ मालूम करने का प्रयत्न किया, यद्यपि वह और उसका पति बम्बई (अब मुम्बई) में डोंगरी की गली में रहते थे। मुस्तकीम हालांकि डोंगरी से बहुत दूर माहिम में रहता था, लेकिन अगर वह चाहता तो बड़ी आसानी से महमूदा को देख सकता था।

एक दिन कुलसुम ही ने उससे कहा‒ ‘‘आपकी उस बड़ी-बड़ी आंखों वाली महमूदा के नसीब बहुत बुरे निकले।’’

चौंककर मुस्तकीन ने चिंतित स्वर में पूछा‒ ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

कुलसुम ने गिलौरी बनाते हुए कहा‒ ‘‘उसका खाविंद एकदम मौलवी हो गया है।’’

‘‘तो उससे क्या हुआ?’’

आप सुन तो लीजिए। वह हर वक्त मज़हब की बातें करता रहता है, लेकिन वही ऊटपटांग किस्म की। वज़ीफे करता है, चिल्ले काटता है, महमूदा को मजबूर करता है कि वह भी ऐसा ही करे। फकीरों के पास घंटों बैठा रहता है। घर-बार से बिलकुल खाफिल हो गया है। दाढ़ी बढ़ाई है, हाथ में हर वक्त तस्बीह होती है, काम पर कभी जाता है कभी नहीं जाता। कई-कई दिन गायब रहता है। वह बेचारी कुढ़ती रहती है। घर में खाने को कुछ होता नहीं, इसलिए फाके करती है और जब उससे शिकायत करती है तो आगे से जवाब मिलता है‒ फाकाक़शी अल्लाह तबारक ताली को बहुत प्यारी है।’’ कुलसुम ने सब कुछ एक सांस में कहा।

मुस्तकीम ने पनदनियां से थोड़ी-सी छालियां उठाकर मुंह में डालीं‒ ‘‘कहीं दिमाग तो नहीं चल गया उसका?’’

कुलसुम ने कहा‒ ‘‘महमूदा का तो यही ख्याल है। ख्याल क्या उसे तो यकीन है। गले में बड़े-बड़े मनकों वाली माला डाले फिरता है, कभी-कभी सफेद रंग का चोला भी पहनता है।’’

मुस्तकीम गिलौरी लेकर अपने कमरे में चला गया और आराम-कुर्सी में लेटकर सोचने लगा, यह क्या हो गया ऐसा पति तो बड़ा दुःखदायी होता है। गरीब किस मुसीबत में फंस गयी। मेरा ख्याल है कि पागलपन के कीटाणु उसके अंदर शुरू ही से मौजूद होंगे जो अब एकदम उभर आए हैं, लेकिन सवाल यह है कि अब महमूदा क्या करेगी? उसका तो यहां कोई रिश्तेदार भी नहीं। कुछ लोग शादी करने लाहौर से आए थे और वापिस चले गए थे। क्या महमूदा ने अपने मां-बाप को लिखा होगा? नहीं, नहीं उसके मां-बाप तो जैसा कि कुलसुम ने एक बार कहा था, उसके बचपन में ही मर गए थे। शादी उसके चाचा ने की थी। डोंगरी में शायद उसकी जान-पहचान का कोई हो। लेकिन नहीं जान-पहचान का कोई होता तो वह फांके क्यों मारती? कुलसुम क्यों न उसे अपने यहां ले आएं? पागल हुए हो मुस्तकीम, होश के नाखून लो।

मुस्तकीम ने एक बार फिर इरादा किया कि महमूदा के बारे में नहीं सोचेगा, इसलिए कि उससे कोई लाभ नहीं होगा, बेकार मगज़मारी की।

बहुत दिनों के बाद कुलसुम ने एक रोज उसे बताया कि महमूदा का पति, जिसका नाम जमील था, करीब-करीब पागल हो गया है।

मुस्तकीम ने पूछा‒ ‘‘क्या मतलब?’’

कुलसुम ने जवाब दिया‒ ‘‘मतलब यह कि अब रात को एक सेकंड के लिए नहीं सोता। जहां खड़ा है, बस वहीं घंटों खामोश खड़ा रहता है। महमूदा गरीब रोती रहती है। मैं कल उसके पास गयी थी। बेचारी का कई दिन का फांका था। मैं बीस रुपये दे आयी, क्योंकि मेरे पास इतने ही थे।’’

मुस्तकीम ने कहा‒ ‘‘बहुत अच्छा किया तुमने। जब तक उसका पति ठीक नहीं होता कुछ-न-कुछ दे आया करो, ताकि गरीब को फाकों की नौबत तो न आए।’’

कुलसुम ने कुछ सोच-विचार के बाद विचित्र स्वर में कहा – ‘‘असल में बात कुछ और है।’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘महमूदा का ख्याल है कि जमील ने महज एक ढोंग रचा रखा है। वह पागल-वागल हरगिज नहीं। बात यह है कि वह।’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘वह औरत के काबिल नहीं। यह कमजोरी दूर करने के लिए वह फकीरों और संन्यासियों से टोने-टोटके लेता रहता है।’’

मुस्तकीम ने कहा‒ ‘‘यह बात तो पागल होने से ज्यादा अफ़सोसजनक है। महमूदा के लिए तो यह समझो कि घरेलू जिदंगी एक बला बनकर रह गई है।’’

मुस्तकीम अपने कमरे में चला गया और महमूदा की दुर्दशा के बारे में सोचने लगा। ऐसी स्त्री का जीवन क्या होगा जिसका पति सर्वथा निष्क्रिय है? कितनी उमंगें होंगी उसके हृदय में। उसके यौवन ने कितने कंपकंपा देने वाले स्वप्न देखे होंगे। उसने अपनी सहेलियों से कुछ नहीं सुना होगा? कितनी निराशा हुई होगी बेचारी को जब उसे चारों ओर शून्य-ही-शून्य दिखायी दिया होगा? उसने अपनी गोद हरी करने के बारे में भी कई बार सोचा होगा। जब डोंगरी में किसी के यहां बच्चा होने की सूचना उसे मिली होगी तो बेचारी के दिल पर घूंसा-सा लगा होगा। अब क्या करेगी? ऐसा न हो, कहीं आत्महत्या कर ले! दो वर्ष तक उसने किसी को यह राज़ न बताया, परंतु उसका सीना फट गया। खुदा उसके हाल पर रहम करे।

बहुत दिन गुजर गए। मुस्तकीम और कुलसुम छुट्टियों में पंचगनी चले गए। वहां ढाई महीने रहे। वापिस आए तो एक मास के पश्चात् कुलसुम के यहां लड़का पैदा हुआ। वह महमूदा के घर न जा सकी। लेकिन एक दिन उसकी सहेली जो महमूदा को जानती थी, उसे बधाई देने आयी। उसने बातों-बातों में कुलसुम से कहा‒ ‘‘कुछ सुना तुमने? वह महमूदा है ना, बड़ी-बड़ी आंखों वाली…।’’

कुलसुम ने कहा‒ ‘‘हां-हां, डोंगरी में रहती है।’’

‘‘खाविंद की बेपरवाही ने गरीब को बुरी बातों पर मजबूर कर दिया है।’’ कुलसुम की सहेली ने कहा।

कुलसुम ने बड़े दुःख-भरे स्वर में पूछा‒ ‘‘कैसी बुरी बातों पर?’’

‘‘अब उसके यहां गैर मर्दों का आना-जाना हो गया है।’’

‘‘झूठ?’’

कुलसुम की सहेली का दिल धक-धक करने लगा। कुलसुम की सहेली ने कहा‒ ‘‘नहीं कुलसुम, मैं झूठ नहीं कहती। मैं परसों उससे मिलने गयी थी, दरवाजे पर दस्तक देने ही वाली थी कि अंदर से नौजवान मर्द जो मेमन मालूम होता था, बाहर निकला और तेज़ी से नीचे उतर गया। मैंने उससे मिलना मुनासिब न समझा और वापिस चली आयी।’’

‘‘यह तुमने बहुत बुरी ख़बर सुनायी। खुदा उसे गुनाह के रास्ते से बचाये रखे! हो सकता है वह मेमन उसके खाविंद का कोई दोस्त हो।’’ कुलसुम ने खुद को धोखा देते हुए कहा।

उसकी सहेली मुस्करायी‒ ‘‘दोस्त चोरों की तरह दरवाजा खोलकर भागा नहीं करते।’’

कुलसुम ने अपने पति से बात की तो उसे बहुत दुःख हुआ। वह कभी नहीं रोया था, लेकिन कुलसुम ने जब उसे यह दर्दनाक ख़बर बतायी कि महमूदा पाप-मार्ग पर जा रही है तो उसकी आंखों से आंसू आ गए। उसने उसी समय निश्चय कर लिया कि महमूदा उनके यहां रहेगी। अतः उसने अपनी पत्नी से कहा‒ ‘‘यह बड़ी भयानक बात है। तुम ऐसा करो, अभी जाओ और महमूदा को यहां ले आओ।’’

कुलसुम ने बड़े रूखेपन से कहा‒ ‘‘मैं उसे अपने घर में नहीं रख सकती।’’

‘‘क्यों?’’ मुस्तकीम के स्वर में विस्मय था।

‘‘बस मेरी मर्जी! वह मेरे घर में क्यों रहे? इसलिए कि आपको उसकी आंखें पसंद हैं।’’ कुलसुम के बोलने का ढंग बहुत विषैला और व्यंग्यपूर्ण था।

मुस्तकीम को बहुत क्रोध आया, किंतु वह उसे पी गया। कुलसुम से बहस करना व्यर्थ था। अब केवल यही हो सकता था कि वह कुलसुम को निकालकर महमूदा को ले आए। पर वह ऐसा कदम उठाने के बारे में सोच ही नहीं सकता था। मुस्तकीम की नीयत बिलकुल नेक थी और उसे खुद इसका एहसास था। असल में उसने किसी गंदे दृष्टिकोण से महमूदा को देखा ही नहीं था। हां, उसकी आंखें उसे बेहद पसंद थीं, इतनी कि वह बयान नहीं कर सकता था।

वह पाप के मार्ग पर अग्रसर हो चुकी थी और उसने सिर्फ कुछ कदम उठाए थे; उसे विनाश के गड्ढे से बचाया था। मुस्तकीम ने कभी नमाज़ नहीं पढ़ी थी, कभी रोज़ा नहीं रखा था, कभी खैरात नहीं दी थी। खुदा ने उसे कितना अच्छा मौका दिया था कि वह महमूदा को गुनाह के रास्ते से घसीटकर ले आए और तलाक वगैरह दिलवाकर उसकी किसी और से शादी कर दे। मगर वह यह सबाब का काम नहीं कर सकता था, इसलिए कि वह अपनी बीवी का दबेल था।

बहुत देर तक मुस्तकीम का अतःकरण उसे झिड़कता रहा। एक-दो बार उसने यत्न किया कि उसकी पत्नी सहमत हो जाए, पर जैसा कि मुस्तकीम को मालूम था, ऐसा प्रयत्न निरर्थक था।

मुस्तकीम का विचार था कि और कुछ नहीं तो कुलसुम महमूदा से मिलने जरूर जाएगी। मगर उसे निराशा हुई। कुलसुम ने उस रोज़ के बाद महमूदा का नाम तक न लिया।

अब क्या हो सकता था, मुस्तकीम खामोश रहा।

लगभग दो वर्ष बीत गए। एक दिन घर से निकलकर मुस्तकीम ऐसे ही दिल बहलाने के लिए फुटपाथ पर चहलकदमी कर रहा था कि उसने कसाइयों की बिल्डिंग की ग्राउंड की खोली के बाहर महमूदा की आंखों की झलक देखी। मुस्तकीम दो कदम आगे निकल गया, फौरन मुड़कर उसने देखा‒ महमूदा ही थी। वही बड़ी-बड़ी आंखें थीं, वह एक यहूदन के साथ जो उस खोली में रहती थी, बातें करने में व्यस्त थी।

इस यहूदन को सारा माहिम जानता था। अधेड़ उम्र की औरत थी। उसका काम ऐईयाश मर्द के लिए लड़कियां उपलब्ध कराना था। उसकी अपनी दो जवान लड़कियां थीं जिनसे वह पेशा कराती थी। मुस्तकीम ने जब महमूदा का चेहरा बड़े ही बेहूदा तरीके से मेकअप किए हुए देखा तो वह गरज उठा। अधिक देर तक वह दुःखद हृदय देखने की शक्ति उसमें न थी; वहां से फौरन चल दिया।

घर पहुंचकर उसने कुलसुम से इस घटना का जिक्र न किया, क्योंकि अब जरूरत ही नहीं रही थी महमूदा अब पूर्णतया शरीर बेचने वाली औरत बन चुकी थी। मुस्तकीम के सामने जब भी उसका बेहूदा, कामोत्तेजक रूप से मेकअप किया हुआ चेहरा आता तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते। उसके अंतःकरण ने उससे कहा‒ ‘‘मुस्तकीम, जो कुछ तुमने देखा है उसका कारण तुम हो। क्या हो जाता यदि तुम अपनी बीवी की कुछ दिनों की नाराजगी बर्दाश्त कर लेते! ज्यादा-से-ज्यादा इस अर्से में वह मायके चली जाती। मगर महमूदा की जिंदगी उस गंदगी से तो बच जाती जिसमें वह इस समय धंसी हुई है। क्या तुम्हारी नीयत नेक नहीं थी? अगर तुम सच्चाई पर थे और सच्चाई पर रहते तो कुलसुम एक-न-एक दिन अपने आप ठीक हो जाती। तुमने बड़ा जुल्म किया, बहुत पाप किया।’’

मुस्तकीम अब क्या कर सकता था? कुछ भी नहीं। पानी सिर से गुजर चुका था। चिड़िया सारा खेत चुग गयी होगी। अब कुछ नहीं हो सकता था। मरते हुए रोगी को अंतिम समय ऑक्सीजन सुंघाने वाली बात थी।

थोड़े दिनों के बाद बम्बई का वातावरण सांप्रदायिक दंगों के कारण बड़ा भयंकर हो गया था। बंटवारे के कारण देश के चारों ओर विनाश और लूट का बाजार गर्म था। लोग धड़ाधड़ हिन्दुस्तान छोड़कर पाकिस्तान आ रहे थे। कुलसुम ने मुस्तकीम को मजबूर किया कि वह भी बम्बई छोड़ दे। अतः जो पहला जहाज मिला, उसकी सीटें बुक कराके मियां-बीवी कराची पहुंच गए और छोटा-मोटा कारोबार शुरू कर दिया।

ढाई बरस बाद इस करोबार में उन्नति होने लगी। इसलिए मुस्तकीम ने नौकरी का विचार त्याग दिया। एक रोज शाम को दुकान से उठकर वह टहलते हुए सदर जा निकला। जी चाहा एक पान खाए; बीस-तीस कदम के फासले पर उसे दुकान नजर आयी जिस पर काफी भीड़ थी। आगे बढ़कर वह दुकान के पास पहुंचा; क्या देखता है कि महमूदा बैठी पान खा रही है। चहेरे पर उसी किस्म का भद्दा मेकअप है, लोग उससे गंदे-गंदे मज़ाक कर रहे हैं और वह हंस रही है। मुस्तकीम के होश-ओ-हवास गायब हो गए। सोच रहा था कि वहां से भाग जाए कि महमूदा ने उसे पुकारा‒ ‘‘इधर आओ दूल्हे मियां, तुम्हें एक फर्स्ट क्लास पान खिलाएं। हम तुम्हारी शादी में शरीक थे।’’

मुस्तकीम बिलकुल पथरा गया।