Bhram Story: 50 वर्षीय सत्यप्रकाश जिनको लोग सत्तू जी कहकर बुलाते थे अपने परिवार, पड़ोसी, और दोस्तों में चहेते थे। सत्तू जी पत्नी, पुत्र, बहू और पोते के साथ सरल और शांत जीवन जीते थे। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद अपने जीवन को बोरिंग और थका हुआ नहीं रखा बल्कि वह तब भी सुबह जल्दी उठकर सैर पर जाते और योगा करते थे। पौष्टिक हल्का नाश्ता, दोपहर में पूरा खाना और रात में बहुत हल्का खाना खाते थे। भोजन के बाद पत्नी के साथ सैर करने जाते थे। सत्य प्रकाश जी अपनी सेहत का बहुत कायदे और अच्छे से ध्यान रखते थे। इसी कारण उनकी सेहत बहुत अच्छी थी, कोई बीमारी या कष्ट नहीं था उन्हें।
मन को खुश रखने के लिए पोते के साथ खेलते थे और उसे पढ़ाते थे। यहां तक कि अपनी पत्नी और
बहू के साथ खाना बनवाने और बाकी कामों में भी मदद करते थे। सुबह शाम पूजा करना धार्मिक
ग्रंथ जैसे रामायण, भगवत गीता भी पढ़ते थे। मंदिरों में दान धर्म, आश्रम में पैसे और सामान भी दान
करते थे। दूसरों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। जितना हो सकता था सबकी मदद करते।
कोरोना के टाइम भी अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा पड़ोसियों की तकलीफ बांटने और गरीबों की
मदद करने में निकाल दिया था।
इन सब अच्छे कामों की वजह से सत्तू जी को लोग बहुत दुआ देते थे। कोई कहता,”जुग जुग जियो”
तो कोई उन्हें 100 वर्ष से ऊपर की आयु का वरदान देता था। दोस्त- रिश्तेदार भी मज़ाक में
कहते,”अरे भाई सेहत का इतना ध्यान और इतने आशीर्वाद! क्यों 200 साल तक दुनिया में रहने का
इरादा है क्या?”
यूं तो सत्य प्रकाश जी उनकी बातें सुनकर हंस देते पर धीरे-धीरे उनके मन को यह विश्वास होने लगा
था कि उनकी उम्र 100 साल तक तो जाएगी उससे पहले मृत्यु उनके पास भी नहीं आ सकती।
परंतु विधाता नहीं हमारे लिए क्या सोच रखा है और क्यों यह तो वही जानते हैं। बहुत से लोग इस
बात को समझते हैं और बहुत से नहीं पर कुछ ऐसे भी हैं जो समझना ही नहीं चाहते। सत्य प्रकाश जी
भी उनमें से एक थे। वह प्रभु को मानते जरूर थे, लेकिन यह भूल गए थे कि उनकी मर्जी के आगे वह
कुछ भी नहीं है……
सोमवार की रात 8:30 बजे सत्तू जी भोजन के बाद टहलने निकले। उस दिन उनकी पत्नी साथ नहीं
गई थी, उनके पैरों में बहुत दर्द था। वह हमेशा की तरह क्लॉक टावर वाली रोड पर टहलने गए। वहां
दूर से देखा तो कुछ लोग आपस में लड़ रहे थे, थोड़ी देर बाद जाकर समझ आया कि दो गुटों में लड़ाई
हो रही है। सत्तू जी नज़रअंदाज करके आगे निकल ही रहे थे कि एक लड़के ने दूसरे गुट के लड़के पर
गोली चला दी। वह लड़का तो झुक गया लेकिन गोली सत्तू जी को लग गई और उनकी वहीं मृत्यु हो
गई। दोनों गुट के लड़के घबरा कर वहां से भाग गए। बाद में परिवार वालों ने बड़े दुख के साथ सत्य
प्रकाश जी का दाह संस्कार करा।
सत्तू जी चलते जा रहे हैं दूर बहुत दूर…. नीला रंग दिखता है और थोड़ा धुआं धुआं सा। बहुत दूर
चलने के बाद वह दरवाजे के पास जाकर रुकते हैं जिसके बाहर राजदरबार जैसे पोशाक में एक
दरबान खड़ा है। उनको देखकर दरबान कहता है,” आइए सत्य प्रकाश जी, स्वर्ग में आपका स्वागत
है”। सत्य जी सकपका कर उसे देखते हैं और पूछते हैं,” यह कौन सी जगह है भाई?” दरबान बताता
है,” यहां मरने के बाद अच्छे इंसान आते हैं। आप बहुत सत्पुरुष हैं, इसलिए आप का यहां स्वागत है।
सत्तू जी गुस्से में उसे डांटते हैं,”तेरा दिमाग खराब है, मैं जिंदा हूं तुझे दिख नहीं रहा।”दरबान कहता है,”
भ्रम से बाहर आइए और गौर से देखिए यह धरती नहीं आकाश है और आप मरने के बाद यहां स्वर्ग
के दरवाजे पर खड़े हैं। आप की गोली लगने से मृत्यु हो गई थी। परिवार ने तो दाह संस्कार भी कर
दिया है।”
सत्तू जी उनसे पूछते हैं,” सच बताइए मैं मरा नहीं हूं ना, यह केवल एक सपना है, मैं अभी भी
अस्पताल के बेड पर जीवित हूं?” प्रभु जब सत्तू को उसकी मृत्यु का सच बताते हैं तो वह कहते हैं,”मैं
हमेशा से तन और मन से खुश रहा, हर किसी ने मुझे लंबी उम्र का आशीर्वाद दिया और मैंने सत्कर्म
करे ताकि मैं लंबी उम्र जी सकूं। फिर क्यों मुझे इतनी जल्दी बुला लिया?”
प्रभु कहते हैं,” देखो सत्यप्रकाश तुम्हारे अच्छे कर्म आने वाले जन्म में उसका फल देंगे। लोगों के
आशीर्वाद हैं जो तुम्हें अगले जन्म में अच्छे साथी मिलेंगे। लंबी उम्र की कामना तो तकरीबन हर
मनुष्य को होती है और उसके लिए वह बहुत से उपाय भी करते हैं, लेकिन वह यह नहीं जानते कि
जन्म एवं मृत्यु के बारे में पहले से ही लिखा जा चुका है। तुम्हारी अकस्मात मृत्यु पिछले जन्म का फल
है। पिछले जन्म में तुम ने अपने साथी की गोली मारकर हत्या कर दी थी और उसका तुम्हें यही फल
मिला है।”
सत्तू जी पूछते हैं,” लेकिन प्रभु यह फल कुछ और साल बाद भी तो मिल सकता था, अभी क्यों?”
प्रभु ने कहा,” तुमने भी तो इसी उम्र में अपने दोस्त का कत्ल किया था।”
“लेकिन मैं मरना नहीं चाहता अभी, आप कोई और रास्ता निकाल दो। प्रभु हंसकर कहते हैं,” पुत्र!
जन्म पहला और मृत्यु अंतिम सत्य है जो बदला नहीं जा सकता। तुम्हें अपनी मृत्यु को स्वीकारना
होगा।” तब प्रभु सत्तू जी को भगवद गीता में भगवान कृष्ण द्वारा बताए गए मृत्यु के ज्ञान के बारे में
बताते हैं। भगवान कृष्ण द्वारा एक श्लोक उसको सुनाते हैं जिसको सुनकर सत्तू जी के मन में जो
मृत्यु को लेकर डर था वह खत्म हो जाता है। प्रभु कहते हैं:
“जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येथे न त्वं शोचितुमर्हसि।। अर्थातः जिसने
जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म भी निश्चित है।”
सत्यप्रकाश जी को एहसास होता है कि जिस भगवद गीता को कई बार पढ़कर भी जीवन के
अंतिम सत्य को समझ नहीं पाए थे, आज उस जीवन मृत्यु का उन्हें पूर्ण ज्ञान हो गया था। उनके मन
में अब हर बात का भ्रम खत्म हो चुका था और पूरे मन से उन्होंने अपनी मृत्यु को स्वीकार किया। प्रभु
की आज्ञा लेकर उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया और चल दिए अपने अंतिम सत्य- मृत्यु से अगले सत्य- जन्म की ओर……।
