Good Eating Habits
Good Eating Habits

Good Eating Habits: हमारे देश के तकरीबन 80 प्रतिशत पेरेंट्स बच्चे के खाने को लेकर परेशान रहते हैं। उनका बच्चा कई बार खाना पूरा नहीं खाता और प्लेट में झूठा छोड़ देता है। पेरेंट्स को लगता है कि अगर वो खाना पूरा नहीं खाएंगे तो उन्हें सही न्यूट्रीशन नहीं मिलेगा और उनका विकास ठीक तरह नहीं हो पाएगा। बच्चे का पेट भरने के लिए पेरेंट्स चाॅकलेट और बिस्कुट जैसे वैकल्पिक चीजें भी खाने को देते हैं। लेकिन ऐसा करने से बच्चे अपनी बाॅडी के सिग्नल्स नहीं समझ पाते और उन्हें ओवर इंटिंग करने की हैबिट बन जाती है। ओवर इंटिंग के कारण बच्चे हेल्दी वेट मेंटेन नहीं कर पाते और भविष्य में ओबेसिटी जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं।

अमूमन 1-3 साल के बच्चे अपनी बाॅडी सिग्नल्स को समझना शुरू कर देते हैं। उन्हें समझ आने लगता है कि उन्हें कब भूख लग रही है, कब उनका पेट भरा है, उन्हें खाने में क्या पसंद है, क्या नापसंद। इसलिए पेरेंट्स को जबरदस्ती खिलाने के बजाय बच्चों को अपनी भूख लगने के नेचुरल संकेतों को समझने देना चाहिए। वैज्ञानिकों ने साबित किया है कि पहले दो वर्षों में बच्चे का जितना विकास होता है, उतना पूरी जिंदगी नहीं होता। इसलिए स्वस्थ विकास के लिए क्लीन प्लेट इटिंग की जगह बचपन से ही बच्चे में हेल्दी इटिंग के रूल्स फोलो करने की आदत डालनी चाहिए।

 मील टाइम करें फिक्स

बच्चे को दिन में नियत समय पर 3 मेन मील (ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर) में भरपेट खाने के बजाय दो मिनी मील खाने की आदत डालनी चाहिए। ब्रेकफास्ट-लंच के बीच मिड डे मील और लंच-डिनर के बीच इवनिंग में हेल्दी स्नैक्स देने चाहिए। उन्हें ब्रेकफास्ट स्किप न करने और डिनर सोने से करीब 3 घंटा पहले करने की आदत डालें। ध्यान रखें कि 2 मील के बीच में कम से कम 3 घंटे का अंतराल जरूर रखें। जिद के बावजूद इन-बिटवीन मील यानी चिप्स, बिस्कुट, चाॅकलेट जैसी चीजें खाने को न दें। इससे बच्चे का पेट भर जाएगा और वह मेन मील नहीं खा पाएगा।  

खाने में दें हर चीज

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बच्चे को पोष्टिक तत्वों से भरपूर बैलेंस डाइट देने की आदत डालनी चाहिए। 6 महीने की उम्र तक बच्चे को आमतौर पर मां का दूध पिलाया जाता है, उसके बाद 8 महीने में काॅम्प्लीमेंटिड या फार्मूला मिल्क आहार देना शुरू किया जाता है। अगर यह आहार बच्चे को 4-5 महीने में शुरू कर दिया जाए, तो कई बच्चे खाना खाने से कतराने लगते हैं। शुरुआत में बच्चे को पतली दाल, खिचड़ी। उसके बाद सेमी-साॅलिड और साॅलिड फूड में घर में बना हर तरह का खाना खिलाना चाहिए। कोई भी नया फूड एक-एक करके ही बच्चे को खिलाना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को बचपन से घर के खाने का टेस्ट डेवलेप हो जाता है और उसे हर चीज खाने की आदत पड़ जाती है।

हेल्दी फूड के लिए करें प्रोत्साहित

आमतौर पर बच्चे घर के खाने के बजाय फास्ट फूड या जंक फूड के सेवन के लिए हमेशा तत्पर रहते है जिससे भविष्य में कई समस्याएं होने का अंदेशा रहता है। इसलिए जरूरी है कि पेरेंट्स बचपन से ही उन्हें हेल्दी फूड खाने के महत्व को बराबर समझाते रहें। हैल्दी और फिट रहने के लिए रोजाना पौष्टिक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार लेनी चाहिए। हर मील में सभी फूड ग्रुप का सेवन करना जरूरी है। इसके लिए उन्हें खाने की प्लेट को 4 हिस्से में बांटने और इसे मेन मील (यानी ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर) में जरूर लागू करने की आदत डालने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

बच्चे को बताना चाहिए कि प्लेट के एक-चैथाई हिस्से में कार्बोहाइड्रेट से भरपूर साबुत अनाज, दूसरे एक-चैथाई हिस्से में प्रोटीन रिच खाद्य पदार्थ, तीसरे हिस्से में मौसमी फल-सब्जियां, सलाद और एक-चैथाई से कम हिस्से में कैल्शियम रिच दूध और दूध से बनी चीजें होनी चाहिए। यानी खाने की प्लेट में एनर्जी गिविंग (कार्बोहाइड्रेट), बाॅडी बिल्डिंग (प्रोटीन, कैल्शियम) और प्रोटेक्टिव (विटामिन और मिनरल) फूड शामिल करने के लिए समझाना चाहिए। इससे उन्हें हेल्दी डाइट का सेवन करने की आदत बचपन से ही पड़ जाएगी।

 माइंडफुल इटिंग की डालें आदत

 जरूरी है कि पेरेंट्स बच्चों के रोल माॅडल बनें। माइंडफुल इटिंग पर जोर दें। अनहेल्दी लाइफस्टाइल की बदौलत अगर पेरेंट्स खुद अनहेल्दी डाइट ( प्रोसेस्ड, पैक्ड, फास्ट, जंक, ओवरकुक या फ्राइड फूड) खा रहे हैं, तो कम उम्र से ही बच्चे की इटिंग हैबिट का पैटर्न भी वैसा ही हो जाता है। अगर पेरेंट्स डाइट पर फोकस करेंगे, तो बच्चे को न्यूट्रीशियन ज्यादा मिलेगा और कोई समस्या नहीं होगी। पौष्टिक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार खाने की आदत डालने के लिए उन्हें छोटे साइज की प्लेट में खाना देना चाहिए। जिसमें उसे प्लेट-पोर्शन का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इससे बच्चे माइंडफुल इटिंग करेगा यानी अपनी भूख को ध्यान में रखकर थोड़ी मात्रा में सभी चीजें लेगा और प्लेट में झूठन छोड़ने की आदत से भी बचेगा।  

फोर्स-फीडिंग के लिए न करें मजबूर

आमतौर पर पेरेंट्स बच्चे को प्लेट में डाला गया खाना खत्म करने पर ज़ोर देते हैं। इसके लिए वे चाॅकलेट, चिप्स जैसे रिवार्ड के तौर पर देते हैं। कई पेरेंट्स बच्चे को उसे टीवी या मोबाइल दिखाते हुए जबरदस्ती खिलाते हैं। कभी-कभी तो बच्चे के भूखा रह जाने के अंदेशे से उसकी पसंदीदा चीजें खिलाने में बच्चे को ओवरइटिंग करने पर मजबूर करते हैं। जोकि गलत है।

भूख एक सहज प्रवृत्ति है। बच्चे के स्वस्थ विकास के लिए फीड ऑन डिमांड आधार पर ही खिलाना बेहतर है। मां-बाप को ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा क्या खाए यानी बच्चे का आहार पौष्टिक और संतुलित हो। कितना खाए- यह बच्चे पर छोड देना चाहिए। अगर बच्चा खाना नहीं खा रहा है, तो उसे जबरदस्ती नहीं खिलाना चाहिए। जब कभी वो एक मील पूरा नहीं खा रहा है, तो संभव है कि दूसरे मील में उसे भूख लग जाएगी और वह ठीक तरह खा लेगा। फोर्स-फीडिंग कराने से बच्चे के उल्टी करने या अपच होने की संभावना रहती है। दूसरे ओवरइटिंग से अतिरिक्त पोषक तत्व फैट में बदलकर शरीर में अवशोषित होने लगते हैं जो मोटापा और अन्य बीमारियों का सबब भी बन सकते हैं।

मील टाइम को बनाएं फैमिली टाइम

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कोशिश करें कि मील टाइम को फैमिली टाइम बनाएं। दिन में कम से कम एक मील बच्चे के साथ जरूर करें यानी डायनिंग टेबल पर परिवार के डिजीटल डिवाइज को परे रखकर या सोशल मीडिया से दूर एक-साथ बैठकर खाना खाएं और फैमिली इंटरेक्शन करें। किसी तरह की जल्दबाजी न करके चबा-चबा कर खाएं। इससे बच्चे में गुड इटिंग हैबिट विकसित होती है। दूसरों की देखा-देखी वो नए व्यंजन खाना सीखते हैं। ऐसा न करने पर बच्चे में इमोशनल इटिंग की प्रवृत्ति बढ़ती है। वह अपनी बोरियत, अकेलेपन को दूर करने के लिए बार-बार स्नैक्स खाने को आसान जरिया मानता है। जो उसकी सेहत को नुकसान पहुंचता है।

स्वीट क्रेविंग को करें सीमित

 कोशिश करें कि बच्चे सेकंड हेल्पिंग मील न लें यानी खाने के बाद बिस्कुट या बेकरी आइटम, चाॅकलेट, टाॅफी ,केक, पेस्ट्री, आइसक्रीम जैसी मीठी चीजें न खाएं। पेरेंट्स अक्सर इन्हें जंक फूड नहीं मानते। घर में स्टोर करते हैं और बच्चे को रिवार्ड के तौर पर भी देते हैं। कई बच्चे तो पूरा पैकेट एक ही बार में खा लेते हैं। पेरेंट्स को केयरफुल रहना और बच्चों को माॅडरेशन में चीजें देनी जरूरी है। ये चीजें दिमाग में सिरोटोनिन हार्मोन रिलीज करकेे हैपी फील कराती हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा चीनी फैट में बदलकर शरीर की कोशिकाओं में जमा होती रहती है, जो बाद में ओबेसिटी, डायबिटीज और अन्य बीमारियों का कारण बनती है।  

कई विशेषज्ञ तो 2 साल से कम उम्र के बच्चों को दूध में या अन्य खाद्य पदार्थो में चीनी डालने के लिए मना करते हैं। क्योंकि पहले दो साल में बच्चे का टेस्ट डेवलेप हो रहा होता है। इस उम्र में बच्चे को चीनी देना या ज्यादा मात्रा में देना-दोनों ही गलत हैं। इस समय एडिड शूगर ज्यादा दी जाएगी, तो उनका टेस्ट वैसे ही डेवलेप हो जाता है। पेरेंट्स अगर बिना एडिड शूगर डाले बिना दूध पिलाएंगे, तो नेचुरल शूगर वाला दूध ही उन्हें अच्छा लगेगा। ऐसा न करने पर बच्चे वो ज्यादा शूगर खाने के आदी हो जाते हैं और आगे भी एडिड शूगर उसी मात्रा में लेते हैं। बेहतर है कि बच्चे को सीमित मात्रा में ही चीनी दी जाए ताकि वो ‘स्वीट टुथ’ लेकर न बड़ा हो। मीठा खाने की क्रेविंग होने लगे और कंट्रोल करना मुश्किल हो जाए।

चीट मील भी खाने दें

बेशक बच्चों को फास्ट फूड बहुत पसंद होता है। उन्हें खाने से पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। वरना उनका रुझान ऐसी चीजों पर ज्यादा रहेगा। आप 10-15 दिन में एक बार बच्चे के चीट मील खाने के लिए दे सकते हैं। कोशिश करें कि उनके फेवरेट फूड केे होममेड न्यूट्रीशन से भरपूर हेल्दी विकल्प खाने को दें जैसे-होममेड चिप्स, पिज्जा, बर्गर, पास्ता, मैक्रोनी। इससे एक तो फास्ट फूड क्रेविंग कम होगी, दूसरे उन्हें जब घर में बना हेल्दी फास्ट फूड ज्यादा नुकसान भी नहीं करेगा।  

(डाॅ शालिनी सिंघल, वरिष्ट आहार विशेषज्ञ, शालिनी डाइट एंड वेलनेस क्लीनिक, दिल्ली)