भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
Mukti Story: अस्पताल की खिड़की से उन्मुक्त गगन में उड़ते पक्षियों को सुनीता ध्यान से देखते हुए सोच रही थी ‘काश इन पक्षियों की तरह मेरा भी जीवन होता। मैं भी निश्चित होकर अपने पखों में हवा भर कर उड़ान भरती।’ सुनीता की आँखों से आँसू झलक गए। इतने में सुमित ने आवाज लगाई, सुनीता! मुझे पानी पिला दो। सुनीता ने जग से पानी भरा और सुमित को दिया। सुमित ने सुनीता से पूछा, “क्या देख रही थी तुम बाहर।” सुनीता ने कहा, “कुछ नहीं, बस खुला आसमान और उड़ते पक्षियों को निहार रही थी।”
सुनीता पानी देकर चेयर पर बैठ गई। सुमित ने पानी पीया और लेट गया। सुनीता ख्यालों में खो गई। उसे याद आने लगी सुहाग रात वाली रात। उस दिन वो बैड पर बैठी सुमित का इंतजार कर रही थी। रूम के बाहर रिश्तेदारों की हंसी-ठिठोली की आवाजें आ रही थीं। सुमित अपने दोस्तों के साथ छत पर बैठा था। रात लगभग दो बज गए थे, सुमित का कोई ठिकाना नहीं था। कुछ ही देर में समित दरवाजे से अंदर आया। सुमित लगभग होश में नहीं था, लड़खड़ाते कदमों से वो बमुश्किल बैड तक पहुंचा। बैड पर बैठने से पहले ही वो लुढ़क गया। जैसे ही वो गिरा मानो सुनीता के सारे अरमान चकनाचूर हो गए।
बचपन से जो राजकुमार वाली कहानियाँ सुनी थीं, वो सब झूठ लगने लगी थीं। अब उसे यकीन हो गया था कि जो फिल्मों में दिखाया जाता है वो केवल फिल्म का ही हिस्सा होता है, जीवन का नहीं। जीवन की सत्यता उसके सामने पड़ी थी। सुनीता ने उठ कर दरवाजा बंद किया। जमीन पर पड़ा निढाल सुमित उसके अरमानों की अर्थी के समान लग रहा था। रात भर वो खिड़की से बाहर तारे गिनती रही। अमावस्या की रात होने से तारें भी बहुत चमक रहे थे। रात खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। एक-एक पल उसे सदियों के समान लग रहा था। घड़ी की टिक-टिक मानो उसे चिढ़ा रही थी। अमावस्या की रात तो खत्म हो गई और सूरज निकल आया किन्तु उसके जीवन की अमावस्या की रात शुरू हो गई। रात भर वो सो नहीं पाई थी। सोती भी कैसे?
बाहर हलचल हो उसके पहले ही वो स्नान कर कमरे से बाहर निकल गई। सीधे घर के मंदिर में पहुंची। भगवान को स्नान कर उनका श्रृंगार किया। श्रृंगार इतना अच्छा किया कि ठाकुरजी जीवंत लगने लगे। आँखों में तेज आ गया था। सुनीता हाथ जोड़कर उनकी आँखों में आंखे डाल कर निःशब्द थी मानो उनसे पूछ रही थी, क्या भरोसे का यही परिणाम मिलता है।
बहू! बहू! करती हुई सुनिता की मां कमरे से बाहर आई और बोली जल्दी से चाय ले आओ। सुनीता उठी और किचन की ओर चल पड़ी। किचन में वो सबके लिए चाय नाश्ता बनाने में व्यस्त हो गई। कुछ देर में वो नाश्ता बना कर डायनिंग टेबल पर ले आई। सुनीता ने सबको नाश्ता लगाया। सुनीता की ननद वैशाली ने सुनीता की आँखों की ओर देखा और छेड़ने लगी क्या बात है भाभी, लगता है भैया ने रात भर सोने नहीं दिया। सुनीता क्या बोलती, सच ही तो था उसके भैया ने ही तो रात भर उसे सोने नहीं दिया। चेहरे पर झूठी मुस्कान लिए वो अपने कमरे की ओर चली गई।
कमरे में उसे वही जानी पहचानी बू आ रही थी जिससे वो बचपन से नफरत करती थी। उसने सोचा था कि शादी के बाद उसे इस बू से मुक्ति मिल जाएगी, पर ऐसी किस्मत कहाँ? इतनी देर में मां का फोन आया, ‘बेटा कैसी हो? मां, बहुत अच्छी, बिल्कुल घर जैसा ही लग रहा है, यहाँ। मां बहुत खुश हुई, सोचा चलो बेटी बहुत खुश है। इतनी देर में सुमित उठ गया। सुनीता ने सुमित को चाय लाकर दी। सुमित ने चाय पी और बाथरूम की ओर चला गया। सुनीता शादी के रीति-रिवाजों और रात भर जागने की सुनीता की आँखें लग चुकी थी।
सुनीता की आँखें लग चुकी थी। इतनी देर में सुमित बाहर आया और नाश्ते की मांग करने लगा। सुनीता, सुमित के लिए नाश्ता रूम में लेकर आ गई। सुनीता को उम्मीद थी कि रात की बात पर सुमित माफी माँगेगा, पर ऐसा कछ नहीं हआ। नाश्ता कर समित कमरे से बाहर निकल गया। सनीता किचन की ओर चली गई।
दरवाजे की नॉक ने सुनीता को वर्तमान में लौटा दिया। डॉक्टर राउंड पर आए और सुनीता से बात करने लगा। डॉक्टर बोले सुनीता जी इनका लीवर बहुत डैमेज हो चुका है… अब हमें निर्णय लेना ही होगा, लीवर ट्रांसप्लांट के सिवा कोई चारा नहीं है। सुनीता स्तबद्ध थी, खर्च कैसे उठाएंगी? उसकी आँखों के सामने दो छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे नजर आने लगे थे। अभी तो उनकी पढ़ाई-लिखाई सब कुछ बची थी। डॉक्टर बोल कर कमरे से बाहर निकल गए। सुनीता उन दिनों को याद करने लगी जब वो सुमित को बहुत समझाती थी कि तुम इस शराब को छोड़ दो… पर वो था कि इतना एडिक्ट हो चुका था कि उसे शराब के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता था।
उसे अच्छे से याद है जब वो पहली बार प्रेगनेट हई थी और उसने सुमित को ये खुश खबरी दी थी। सुमित खबर सुनकर खुशी से उछल पड़ा था। सुनीता को उम्मीद जागी थी कि शायद सुमित अब अपने बच्चे के लिए शराब को छोड़ देगा। पर उसकी उम्मीद पर पानी तब फिर गया, जब वो रात को फिर शराब पीकर आया। सुनीता ने पूछा आज भी तुम शराब पीकर आ गए। अरे, सुनीता आज तो जीवन का सबसे बड़ा खुशी का दिन है। जब मैंने अपने दोस्तों से ये खुशी शेयर की तो पार्टी के लिए जिद करने लगे। सुनीता क्या समझाती, वो समझने के स्थित में ही नहीं था। सुबह उसने सुमित को बैठाया और समझाया कि अब तुम्हारी जिम्मेदारी बढ़ रही है। कल बच्चा होगा तो उसे हम क्या संस्कार देंगे। अब तुम शराब छोड़ दो। सुमित चुपचाप सुनता रहा था।
शराब, सुमित का जीवन ही बन चुकी थी। कुणाल के जन्म के समय भी वो अस्पताल में शराब पीकर ही आया था और उस दिन डॉक्टर ने उसे बहुत जोर से डांट भी लगाई थी कि तुम्हें शर्म नहीं आती तुम यहाँ भी शराब पीकर आ गए। पर वो था कि उसे कोई असर ही नहीं हुआ। वो वहाँ से चला गया और दोस्तों के साथ शराब में डूब गया। दिन-पर-दिन बीतते जा रहे थे। कुणाल स्कूल जाने लगा था। मैं फिर उम्मीद से थी। इस बार अनामिका ने जन्म लिया। लड़की होने की खुशी परिवार में सभी को थी। तीन पीढ़ियों बाद परिवार में लड़की का जन्म हुआ था। सुमित भी बहुत खुश था पर उसकी खुशी मनाने का तरीका वही था। फिर शराब की बोतल के साथ वो खुशी सेलिब्रेट करने लगा।
अब तो सुनीता का धैर्य टूट चुका था। शराब थी कि उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। मायके में थी तो पिता की शराबखोरी से परेशान थी। यहाँ आई तो सुमित से। उसे अच्छे से याद है मां, पिताजी को भी बहुत समझाती थी। किन्तु पिताजी ने भी कभी उसकी नहीं सुनी। वो भी अक्सर हर अवसर पर शराब का सहारा लेते थे। बचपन से पिताजी को बस शराब में ही देखा। उनके बाथरूम, कमरे और कपड़े सब में बस शराब की ही बू आती थी। बू, नाक में समा गई थी। हम सभी भाई-बहनों का लालन-पोषण का ख्याल मां ही रखती थी। मां को मजबूरन सिलाई का काम करना पड़ता था। पिताजी की कमाई का अधिकांश हिस्सा तो शराब को स्वाहा हो जाता था। मां ने हमें पढ़ाया-लिखाया। बड़ी होने के बाद मैं भी मां की सिलाई में हाथ बटाती थी।
भाई बड़ा होने लगा था, मां हमेशा पिताजी को समझाती थी कि तुम्हें शराब पीते देख वो भी पीने लगेगा। पर पिताजी पर कभी इस बात का असर नहीं हुआ। शुक्र है मां के संस्कारों ने भाई को इस दिशा में जाने नहीं दिया। माँ समझ गई थी कि पिताजी शराब छोड़ेंगे नहीं और इसका जीवन खराब हो जाएगा. भाई को उसने हॉस्टल में रख दिया था। हॉस्टल का खर्च उठाने के लिए हमें डबल मेहनत करनी पड़ती थी, पर मन में शांति थी कि कम से कम शराब से तो दूर रहेगा।
मां पिताजी को मेरे बड़े होने का हमेशा अहसास कराती रहती थी कि वो शादी के लायक हो गई है, उसके लिए लड़के की तलाश शुरू कर देना चाहिए। किन्तु पिताजी ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। उन्हें तो अपनी रोज की पार्टी की चिंता रहती थी। भला हो शर्मा अंकल का जो पिताजी को मेरे रिश्ते दिखाते रहते थे। इन्हीं रिश्तों में से एक सुमित का भी था। सुमित का रिश्ता उनमें से बेहतर था। पिताजी ने कुछ ज्यादा खोजबीन की कोशिश भी नहीं की और रिश्ता तय कर दिया। मुझे भी लगा कि चलो इस बू से कम से कम मुक्ति तो मिल जाएगी। पर ये बू है कि मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही है।
पुरानी यादों से बाहर निकल कर सुमित के बारे में सोचने लगी। डॉक्टर की बात उसकी कानों में गूंज रही थी कि अब केवल लीवर ट्रांसप्लांट ही एक उपाय है। इसके अलावा उसके पास कोई विकल्प नहीं था। सुनीता डॉक्टर के पास गई और बोली साहब कितना खर्च आएगा। डॉक्टर बोले लगभग तीस लाख। सुनीता के पैरों से जमीन खसक गई थी, वो उलटे पैर लौट गई। दो तीन दिन सोचने के पश्चात उसने अंतिम निर्णय ले ही लिया कि वो ट्रांसप्लांट करवाएगी। उसने अपने पास के सारे जेवर और आसियाना बेचने का निर्णय ले लिया इस उम्मीद में कि वो अब इस नर्क भरी जिंदगी से मुक्ति पा लेगी।
सुनीता डॉक्टर के पास गई और आठ दिन का समय मांगा। डॉक्टर ने समय दे दिया। सुनीता ने सब कुछ दांव पर लगा कर पैसे का इंतजाम कर लिया। अंततः वो दिन आ गया, जब सुमित का ऑपरेशन होना था। सुनीता के पास अब केवल एक मंगल सूत्र और छोटी-सी उम्मीद थी। ऑपरेशन शुरू हुआ। कुछ घंटे पश्चात सुमित को ऑपरेशन थियेटर से बाहर लाकर आईसीयू में शिफ्ट कर दिया। सुनीता आईसीयू की खिड़की से सुमित को देखती रहती थी। आईसीयू के दरवाजे की उस छोटी-सी विंडो से उसे बड़ी उम्मीद नजर आ रही थी। कुछ दिनों पश्चात सुमित को रूम में शिफ्ट कर दिया गया।
सुमित के रूम में शिफ्ट होने के बाद उसके दोनों बच्चे वहाँ आए। सुनीता अपने दोनों बच्चों को लेकर सुमित के पास पहुंची। आज सुनीता सुमित का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बच्चों के सर पर रखते हुए बोली सुनो, तुम मुझसे वादा करो कि अब तुम इन बच्चों की खातिर शराब को कभी हाथ नहीं लगाओगे। सुमित ने वादा किया कि वो अब शराब से दूर रहेगा। सुनीता उसी खिड़की से बाहर खुले आसमान में उड़ रहे पक्षियों को देखने लगी इस उम्मीद में कि उसे उस बू से मुक्ति मिल गई जो वो बचपन से सह रही थी।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
