छली - गृहलक्ष्मी की कहानी | Hindi Stoires | Grehlakshmi

अमित से मंजरी की जान-पहचान मात्र एकाध हफ्ते की थी। इतने कम समय में किसी के मूल चरित्र को समझ पाना संभव है? जाहिर है नहीं। तिसपर वह भावनाओं पर नियंत्रण न रख सकी। अमित पर भरोसा करके उसे सबकुछ सौंप दिया। उसका मन कचोटने लगा। क्या वह कभी अपने आपको माफ कर पायेगी?

मंजरी की अमित से मुलाकात एक एज्यूकेशनल कैम्प में हुई थी, जो अंर्तविश्वविद्यालय की तरफ से लगाया गया था, जहां दोनों एक दूसरे के करीब आये। फिर हमेशा के लिए जुदा हो गये। इस सीमित समय में दोनों एक दूसरे को चाहने लगे थे मगर दिल की बात दिल में रह गई। समय गुजरता गया।

आहिस्ता-आहिस्ता दोनों एक दूसरे को भूल गये। मंजरी की जिंदगी में सुधीर आया। सुधीर के पिता बहुत बड़े अधिकारी थे। काफी संपन्न परिवार था। मंजरी का मीडिल क्लास परिवार उसके आगे कहीं नहीं टिकता था। इसके बाद भी दोनों का प्रेम परवान चढ़ा, जिसकी परिणति शादी पर जाकर खत्म हुई।

मामूली से क्वार्टर में रहने वाली मंजरी के लिए सुसराल किसी महल से कम नहीं था। नौकर चाकर, कार, रूतबा सब कुछ उसे एकाएक मिल गया। नहीं मिला तो वह सम्मान जिसकी वह हकदार थी। सास उसे हमेशा हिकारत भरी नजरों से देखती थी। इसका बहुत बड़ा कारण था मंजरी का उसकी अपेक्षा निम्न स्तर का होना।

पढ़ाई-लिखाई, रंग-रूप, सबमें वह बीस थी तिसपर सास का रवैया उसके लिए भारी पड़ रहा था। एक दिन तंग आकर मंजरी ने सुधीर से कहा, ‘मेरा यहां दम घुटता है। सास मुझे जब तब ताने देती है कि मैंने तुम्हे फांस लिया।’

‘धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा’, सुधीर ने टाला।
‘कुछ नहीं ठीक होगा। छ: महीने हो गये। आज भी उनके तेवर जस के तस हैं। क्या तुमने शादी उनकी मर्जी के खिलाफ की है?’ सुनकर सुधीर को अटपटा लगा। जो चीज गुजर गई उसके बारें में सवाल उठाने का क्या तुक? माना कि उनकी मर्जी के खिलाफ की तो भी क्या अब तलाक ले ले! सुधीर के पिता को कोई एतराज न था। सुधीर को भरोसा था कि एक दिन मां मंजरी के गुणों से प्रभावित होकर उसे अपना लेगी।

क्या सोच रहे हो?’ मंजरी ने उसकी तंद्रा तोड़ी।
‘तुम चाहती क्या हो?’
‘क्या हम अलग घर लेकर नहीं रह सकते?’ सुधीर को अच्छा नहीं लगा, मगर संयत रहा।
‘एक ही शहर में अलग-अलग रहेंगे तो लोग क्या कहेंगे? मम्मी से नहीं निभ रही मगर पापा, वे तो हमेशा मेरे साथ खड़े रहे।

उनपर क्या बीतेगी जब उन्हे पता चलेगा कि उनका बेटा उन्हें छोड़कर दूसरी जगह रहने जा रहा है।’ मंजरी पर सुधीर की बातों का कोई असर नहीं हुआ। वह अंतत: अपने मायके आकर रहने लगी। मायके आकर उसने एक स्कूल ज्वॉयन कर लिया। इस बीच सुधीर उससे मिलने आता रहा। जब भी आता उसे उसके फैसले पर पुन:विचार करने का दबाव बनाता।

मगर वह अपने फैसले पर अडिग रहती। सुधीर को मंजरी की कमी हमेशा खलती। ऐसा ही हाल मंजरी का भी था। सुधीर के पिता से सुधीर की मनोदशा छिपी न थी। उन्हें यह सब देखकर तकलीफ होती। एक दिन सब खाने की मेज पर थे तो सुधीर के पिता ने मंजरी का प्रसंग छेड़ा। सुनते ही मां बिफर गईं। ‘आपको उसके जाने का ज्यादा कष्ट है? ऐसा है तो आप ही उसके पास जाकर रहिये।’ वह तुनकीं। आगे बोलीं, ‘मैं सुधीर की दूसरी शादी करूंगी।’

‘मूर्खतापूर्ण बातें मत करो। यह कोई गुड्डे-गुड्डी का खेल नहीं’, सुधीर के पिता बिगड़े। दोनों में बहसा-बहसी शुरू हो गई। सुधीर से रहा न गया। बोला, ‘मम्मी, आपने जरा सी समझदारी दिखाई होती तो मंजरी घर छोड़कर नहीं जाती।’

‘तुझे मंजरी की इतनी फिक्र है तो चला जा उसके पास।’ वह रूंआसी हो गईं।
‘चला जाएगा। शादी की है तो निभाना पड़ेगा’, सुधीर के पिता बोले। मां उठकर जाने लगीं। उन्हें सुधीर के पिता की बात नागवार लगी।

अगले दिन सुधीर अपने पिता की बात मानकर मंजरी के साथ अलग रहने लगा। पांच साल गुजर गये। इस बीच वह एक बच्ची की मां बनी। बच्ची का नाम शालिनी रखा। बच्ची तीन साल की हो गई। तभी एक दुर्घटना घटी। सुधीर कार एक्सीडेंट में चल बसा। दोनो परिवारों पर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। एक दिन सुधीर के पिता से रहा न गया। वे सुधीर की मां से बोले, ‘हमें बेटे का सुख नहीं मिला।

क्या बहू-पोती का भी नहीं मिलेगा?’ सुनकर वह सुबकने लगी। उसे अपने किये पर पछतावा था। सुधीर के पिता ने मंजरी को ससुराल में रखने का मन बनाया, जिसे मंजरी ने ठुकरा दिया। बोली, जब पति ही नहीं रहा तो कैसा ससुराल? सुधीर की मां चिढ़ गई। उसे इसमें मंजरी का अहंकार नजर आया।

मंजरी ने सरकारी स्कूल में आवेदन दिया। जल्द ही उसे नौकरी मिल गई। उसकी पहली पोस्टिंग लखनऊ में हुई। स्कूल शहर से दस किलोमीटर दूर एक गांव में था। उसने अपना ठिकाना शहर में ही बनाया। जब भी अकेली होती अतीत में डूब जाती।

अतीत एक-एक कर चलचित्र की भांति उसकी निगाहों के सामने घूमने लगता। ऐसे ही भावुक पल में जब सुधीर की तस्वीर आती तो वह खुद पर नियंत्रण न कर पाती। आंख के दोनो कोर भींग जाते, जिसे जल्द ही वह पोंछ डालती। वह अपनी बच्ची के सामने खुद को कमजोर होने देना नहीं चाहती थी। मंजरी के पिता गांव में खेती बाड़ी करते थे।

उनकी नजर में एक दुहाजू लड़का था, जो सरकारी विभाग में क्लर्क था। मगर मंजरी ने उसे इनकार कर दिया। लड़का कहीं से भी उसके लायक नहीं लगा। फिर कौन दूसरे के जन्मे बच्चे को पालेगा? एक तरह से मंजरी ने शादी न करने का फैसला कर लिया।

शालिनी आठ साल की हो चुकी थी। तभी उसकी जिंदगी में अमित ने आकर हलचल पैदा कर दी। अमित जिसे वह लगभग भूल चुकी थी एक मॉल में खरीदारी करते हुए दिखा। आमना-सामना हुआ।
‘मंजरी’, वह मुस्कुराया।
‘पहचान गये’, मंजरी हंसी।
‘क्यों नहीं पहचानुंगा! हम दोनों ने एक साथ कैम्प में दस दिन गुजारे थे। उसने आसपास नजरें घुमाई। ‘तुम्हारे पति नहीं दिख रहे? यह प्यारी सी बेटी तुम्हारी है?’ उसने नजरें झुका कर उस बच्ची के गालों पर हाथ फेरा।

‘हां, मेरी ही बेटी है, शालिनी।’ कहकर मंजरी का चेहरा क्षणांश उदास हो गया। अमित ने उसके चेहरे को पढ़ लिया।
‘चलो पास के किसी रेस्टोरेंट में चलते हैं। वहीं बैठ कर बातें करेंगे।’ अमित का यह प्रस्ताव उसे अच्छा लगा।

‘पति एक दुर्घटना में चल बसे। यही एक मात्र संतान है मेरी, जिसे पाल-पोस कर अच्छा इंसान बनाना है।’
‘दूसरी शादी का ख्याल नहीं आया?’
‘आया था, मगर कोई मिले तब ना। अब तो मैंने आस भी छोड़ दी है। नियति जहां ले जाएगी वहीं चली जाऊंगी।’ मंजरी ने उसांस ली।
‘तुम यहां क्या कर रहे हो?’ मंजरी निराशा से उबरी।
‘मैं एयरफोर्स में हूं। यहीं पोस्टिंग मिली है।’
‘पत्नी, बच्चे?’ मंजरी के इस सवाल पर उसके चेहरे पर फीकी मुस्कान तैर गई।
‘तलाक का केस चल रहा है।’ शाम गहराने को था सो बातचीत का सिलसिला यहीं खत्म करके दोनों अपने अपने घर लौट आये।

एक हफ्ते बाद अमित, मंजरी से मिलने उसके घर आया। उसे देखते ही वह भावविह्वïल हो गई। अमित उसका पहला प्यार था, जिसकी चिंगारी वक्त के राख में दब गई थी। आज फिर से उभरने लगा। कॉफी की चुस्कियों के बीच अमित ने उसकी निजी जिंदगी को कुरेदा। उसने कुछ नहीं छुपाया। एक-एक कर अपने अतीत के सारे पन्ने खोलकर रख दिये। अमित को उससे सहानुभूति थी। तभी अमित के फोन की घंटी बजी।

वह मोबाइल लेकर एक तरफ चला गया। लौटा तो उसके चेहरे पर निराशा के शिकन थे। मंजरी को जिज्ञासा हुई।
‘क्या बात है बड़े परेशान लग रहे हो?’
‘मेरी पत्नी का फोन था।’ अमित ने कहा। मंजरी ने आगे कुछ भी पूछना उचित नहीं समझा। हां, इतना जरूर था कि उसका दिल पहले की तरह सामान्य नहीं रहा। क्यों? आखिर किस हक से वह अमित पर इतना भरोसा कर रही है? वह शादीशुदा आदमी है। उसका अपना परिवार है। क्या वह अपनी मर्यादा नहीं तोड़ रही? बहरहाल इस समय यह सब सोचने का वक्त नहीं था। वह तो बस अमित के रूप में पिछला प्यार लौट आने की खुशी से लबरेज थी।

‘तुम कुछ परेशान दिख रहे हो?’
‘मेरी जिंदगी तुम्हारी ही तरह बिडंबनाओं से भरी है’, अमित भरे मन से बोला।
अमित ने एक-एक करके अपने अतीत के सारे पन्ने खोल कर रख दिये। मंजरी को जानकर अच्छा न लगा। इतना होनहार, काबिल, हैंडसम पति की पत्नी इस तरह हो सकती है? कैसे उसका दिल किसी और के साथ गुलछर्रे उड़ाने को करता है? वह भी बिना तलाक के।

‘तुमने तलाक की अर्जी दी?’ मंजरी ने पूछा।
‘हां, पर क्या तलाक होना इतना आसान होता है? काफी रुपयों की डिमंाड करती है, जो मेरे लिए संभव नहीं।’
‘तब क्या करोगे?’
‘यही सोच-सोचकर परेशान रहता हूं।’
‘रहती कहां है?’
‘मेरे ही फ्लैट में। मेरा एक लड़का भी है। घर खर्च भेजता हूं सो अलग।’
‘बंद कर दो। अक्ल ठिकाने लग जायेगी’, मंजरी तैश में बोली।

‘जब तक तलाक नहीं हो जाता वह मेरी पत्नी है।’ मंजरी सोचने लगी कैसी औरत है, जो अपना गृहस्थ जीवन ठीक से नहीं रख सकती? उसके दिल में अमित के प्रति सहानुभूति और बढ़ गई। कहीं यह सहानुभूति प्रेम का प्रथम पायदान तो नहीं? कुछ-कुछ मंजरी को ऐसा ही लगा।

कल तक जो जिंदगी उसके लिए बोझ थी आज एकाएक खूबसूरत लगने लगी। वह अमित के साथ जिंदगी गुजारने का ख्वाब देखने लगी। जब भी शाम को खाली होती अमित के साथ मोबाइल पर बैठ जाती। दोनो घंटों बातें करते। मंजरी की यह हाल था मानो वह प्रेम का कहकहा सीख रही हो अमित से।
‘कल तलाक हो जाएगा तब हम दोनों शादी कर लेंगे। शालिनी भी तुमको पिता के रूप में देखने लगी है। उस रोज तुम्हारे साथ कितना घुलमिल गई थी।’ मोबाइल पर यही सब बातें होती रहती।
अमित के लिए मंजरी का घर अंजाना नहीं रहा। अमित, शालिनी के साथ खूब मस्ती करता। यह देखकर मंजरी आह्लïादित थी। मंजरी को पूरा विश्वास था कि अमित से शादी हो जाएगी तो शालिनी को उसे पिता के रूप में अपनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। यही तो सबसे बड़ी समस्या थी, जिसकी वजह से वह शादी से कतराती थी।

आहिस्ता-आहिस्ता एक साल गुजर गये। दोनों के संबंध पति-पत्नी की तरह बन गये थे। एक रोज फ्लैट की एक पड़ोसन ने अमित के बारे में मंजरी से सवाल किया, जिसे सुनकर उसे अच्छा न लगा। उस रात जब दोनों हमबिस्तर थे तब मंजरी ने इस घटना की चर्चा की। ‘तुम बेकार लोगों की बातों पर गौर करती हो। जैसे ही तलाक मिलेगा मैं तुमसे शादी करके इन लोगों के मुंह पर तमाचा मार दूंगा।’

मंजरी को तत्काल राहत मिली मगर मन में उठने वाले सामाजिक रूसवाईयों को लेकर उसकी बेचैनी कम नहीं हुई। देखते-देखते तीन साल गुजर गये। इस बीच अमित जब कभी मुंबई अपनी पत्नी के पास जाता तो उसका एक ही जवाब होता, ‘तलाक के सिलसिले में जा रहा हूं। तारीख पड़ी हैैै।’ एक दिन मंजरी से रहा न गया। वह तल्ख स्वर में बोली, ‘वह चाहती क्या है?’

‘उसने तीस लाख रुपयों की डिमंाड की है साथ में हर माह पचास हजार घर खर्च। कहां से इतना रुपया लाऊं?’ अमित झल्लाया। उसके तेवर देखकर मंजरी ने खुद को संयत किया।
‘तुम्हें इतना देने में दिक्कत क्यों हो रही है? मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूूं। रही पचास हजार, अगर वह तुम्हारे तनख्वाह का आधा ले लेती है तो देकर मुक्ति पाओ। मैं खुद सरकारी नौकरी में हूं। आराम से रह लेंगे।’ मंजरी को लगा कि इसे सुनकर अमित का सारा तनाव खत्म हो जाएगा। मगर ऐसा हुआ नहीं।
‘जैसा तुम समझती हो वैसा कुछ नहीं है। वह एक नंबर की धूर्त है। आज तीस मांगी है कल चालीस का डिमंाड करेगी। इसलिए सोचता हूं कि कोर्ट जो फैसला लेगी वही ठीक रहेगा’, अमित ने कहा।
‘भले ही सारी जिंदगी निकल जाए’, मंजरी चिढ़ी। मंजरी बोली, ‘तुम मुझे अपनी पत्नी का मोबाइल नंबर दो। मैं उससे बात करूंगी।’

‘तुम ऐसा कभी नहीं करोगी’, अमित एकाएक घबरा गया। ‘यह हमारा आपसी मामला है।’
‘समय निकलता जा रहा है। शालिनी बड़ी होती जा रही है। पता नहीं आगे वह इस रिश्ते के लिए तैयार होगी भी या नहीं।.

‘तुम व्यर्थ परेशान होती हो। सब ठीक हो जाएगा’, उसका हाथ अपने हाथ पर लेते हुए अमित यूं बोला मानो कुछ हुआ ही न हो। उसकी निश्चिंतता मंजरी को बेचैन करती। उसकी स्थिति परकटे परिंदे की तरह हो गई थी। न उड़ सकती थी और न दूर तक चल सकती थी। एकाएक मंजरी ने अपना हाथ खींच लिया। अमित को अटपटा लगा। मंजरी भरे गले से बोली, ‘अमित, तुम्हें कुछ-न-कुछ फैसला लेना ही होगा।’ अमित के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। कल तक वह सहज थी। मगर आज बेहद गंभीर और निर्णायक मूड में थी। अचानक ऐसा क्या हो गया? उसने मंजरी को फिर से सामान्य स्थिति में लाने के लिए उसे बाहों में भर लिया।

‘डाॄलग, इतना परेशान क्यों होती हो, कुछ महीनों की बात है। वकील ने कहा है कि अब फैसला होने में देर नहीं होगी।’
‘इसमें नई बात क्या है’, उसकी पकड़ से दूर होती हुई मंजरी बोली। ‘साल भर के लिए कहा था, अब तीन साल हो रहे हैं। तलाक में समस्या क्या आ रही है उसका खुलासा भी नहीं करते। क्या तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो?’
‘मैं कुछ छुपा नहीं रहा हूं।’ अपनी कोशिशें नाकाम होते हुए देख अमित सोफे पर बैठ गया। मंजरी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
‘इसमें टेसुए बहाने की क्या जरूरत है? हमने जो किया आपसी सहमति से किया।’
‘तुम कहना क्या चाहते हो?’
‘यही कि अगर तुम इस रिश्ते को आगे नहीं ले जाना चाहती तो मेरी तरह से आजाद हो।’
‘अमित’, मंजरी चीखी। ‘तीन साल पति-पत्नी की तरह रहे हम दोनो और आज कह रहे हो कि मैं तुम्हें आजाद करता हूं। जिस्मानी संबंध बनाते हुए तुमने मुझे क्या आश्वासन दिया था? मैं कोई वेश्या हूूं जो तुमसे अपनी शारीरिक जरूरतें पूरा करने के लिए जुड़ी।”

‘हां, दिया था कि जैसे ही तलाक हो जाएगा मैं तुमसे शादी कर लूंगा’, अमित बोला। ‘मगर तलाक हो तब ना।’
‘कब तक होगा?’ मंजरी के इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह उसे संभालने की नीयत से बोला’, मंजरी, इतना आवेशित मत हो। मैं तुम्हारी जिंदगी से जाने वाला नहीं। बस थोड़ा इंतजार करो। जैसे ही तलाक हो जाएगा मैं तुमसे शादी कर लूंगा।’

‘तुम कभी नहीं करोगे।’ मंजरी ने मानो उसके मन की बात पकड़ ली हो। वह आगे कही, ‘मुझे तुम दोहरे चरित्र के आदमी लगते हो। मुझे तो यह भी शक है कि तुम्हारा मुकदमा चल भी रहा है या नहीं।’ अमित निरूत्तरित था। उस रोज किसी तरह वह मंजरी के सवालों से बच कर निकल आया। मंजरी की मनोदशा देखकर वह अंदर ही अंदर भयभीत था। उसे सपने में भी भान नहीं था कि मंजरी शादी को लेकर इतना संजीदा है। वह भरसक चाहती कि जल्द से जल्द उन दोनों की शादी हो जाए ताकि असुरक्षित जिंदगी से छुटकारा मिल सके।

दो दिन अमित उसके पास नहीं आया। मंजरी को लगा वह उससे नाराज है। जब उसका गुस्सा शांत हुआ तो उसे इस बात के लिए बेहद अफसोस हुआ कि क्यों अमित पर तोहमत लगाई? हो सकता है वह जो कह रहा है सही हो? उसने अमित को फोन लगाकर माफी मांगना चाहा। मगर उसने उठाया नहीं। बार-बार स्विच आफ के संकेत मिल रहे थे। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

तो क्या अमित उससे अपने अपमान का बदला ले रहा है? सोचकर वह सिहर गई। मन आशंकाओं से भर गया। वह अपने आपको दोषी मानने लगी। मगर अगले पल यथार्थ के धरातल पर आयी तो लगा जो कहा सही कहा। जिंदगी भावनाओं से नहीं चलती।

ऐसे कब तक चलेगा? कल शालिनी परिपक्व हो जाएगी तब भी क्या इस रिश्ते को उसी रूप में लेगी, जैसी लेती आई है? परिपक्वता आएगी तो निश्चय ही उसे यही लगेगा कि मैं चरित्रहीन हूं। फिर तो अपनी बेटी की नजरों से भी गिर जाऊंगी।

मंजरी ने कई बार अमित से बात करने की कोशिश की मगर हर बार उसे नाकामी हाथ लगी। उसकी आकुलता बढ़ती ही जा रही थी। काफी सोच-विचार कर उसने उसके क्वार्टर जाने का फैसला लिया। तीन साल में वह पहली बार उसके क्वार्टर जाएगी। न अमित ने कहा, न ही उसने कभी जाने का दबाव डाला।

क्वार्टर पर ताला लगा था। पड़ोस की महिला ने बताया कि वह अपने घर मुंबई गये हैं। क्यों, के सवाल पर बोली, ‘आपको पता नहीं! उनकी पत्नी की तबीयत एकाएक खराब हो गई है।’ सन्न रह गई मंजरी यह सुनकर। एक चरित्रहीन पत्नी के लिए आज भी इतना लगाव! जो मुझसे बिना बताए चला गया! यह छल नहीं है तो क्या है? जब तक मेरे पल्लू से बंधा था सिवाय उसकी बुराई के उसे कुछ नहीं सूझता था और आज एकाएक उसकी बीमारी की खबर सुनते ही मुंबई भाग गया।

सोचकर मंजरी से न रोते बन रहा था न ही हंसते। किसी तरह भारी कदमों से चलकर अपने घर आई। रह-रह कर उसके सामने अमित का चेहरा आ जाता। उसने उसे पहचानने में कितनी बड़ी भूल की। वह अमित से ज्यादा खुद को कुसूरवार मानने लगी।

क्या जरूरत थी अमित पर इतना भरोसा करने की? अमित से मंजरी की जान-पहचान कितने दिनों की थी? मात्र एकाध हफ्ते की थी। इतने कम समय में किसी के मूल चरित्र को समझ पाना संभव है? जाहिर है नहीं। तिसपर वह भावनाओं पर नियंत्रण न रख सकी। अमित पर भरोसा करके उसे सबकुछ सौंप दिया।

उसका मन कचोटने लगा। क्या वह कभी अपने आपको माफ कर पायेगी? अब मंजरी समझ चुकी थी कि वह छली जा रही है। दुश्चिंताओ में डूबी थी मंजरी कि तभी मोबाइल की घंटी बजी। फोन अमित ने किया था। यह आग में घी से कम नहीं था मंजरी के लिए।
‘फोन क्यों किया।’
‘तुम्हारा मिस काल आया था?’
‘पत्नी कैसी है?’ मंजरी ने तंज कसा।
‘मैं कुछ समझा नहीं?’
‘बनने की कोशिश मत करो। मुझे सब पता चल चुका है।’
‘मैंने तुम्हें इसलिए फोन किया है कि मेरा ट्रांसफर हो चुका है और हां, यह सच है कि मेरी अपनी पत्नी के साथ तलाक का मुकदमा चल रहा है, मगर मेरी भरसक कोशिश यही है कि सबकुछ सामान्य हो जाए। कोई अपने बसे बसाये घर को तबाह होते नहीं देख सकता। मेरा एक बड़ा बेटा है। अब क्या मैं उसे खोना चाहूंगा?’ जैसे ही वह फोन रखने जा रहा था मंजरी ने रोका।

‘मेरी भी सुनते जाओ। यह मत समझना कि मुझसे छल कर तुम चैन से जी लोगे। तुमने दो-दो जिंदगियां बर्बाद की है। एक मेरी, दूसरी मेरी बेटी की। पर याद रखना मैं कमजोर नहीं हूं। मैं अपने पहचान के साथ जीऊंगी। नहीं जरूरत है मुझे तुम जैसे कायर जीवनसाथी की। अच्छा हुआ जो तुमने पहले ही अपनी असलियत बता दी। वर्ना मैं अपने आपको कभी माफ न कर पाती।’ कहते-कहते मंजरी की आंखें छलछला आईं। अमित ने फोन काट दिया।

तभी मंजरी की नजर सामने खड़ी शालिनी पर गई। ऐसा लगा वह दोनों की बातें सुन रही थी। शालिनी स्कूल से कब आई? अभी इसी उधेड़बुन में थी कि वह अपनी मां के करीब आई। उसके आंसू पोछते हुए बोली, ‘मां, तुम रोओ मत। ऐसे गंदे आदमी की मुझे भी जरूरत नहीं।’ इतनी समझदारी की बात करने वाली ग्यारह वर्षीय बेटी को उसने गोद में भर लिया और फूटफूट कर रोने लगी।

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