मन अहंकार का एक अंग है जिसे पता है कैसे बन्द हुआ जाए परन्तु उसे खुलना कैसे है यह पता ही नहीं है। प्रेम करने का अर्थ खुलना, समर्पण करना है।
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महापुरुष की पहचान – परमहंस योगानंद
ईश्वर ने महान पुरुषों को विशेष रूप से निर्मित नहीं किया है। वे अपने ही प्रयासों द्वारा दक्ष बने हैं। जिस प्रकार बाकी सारी मानव जाति आत्म-स्वतंत्रता के प्रकाश के लिए संघर्ष करती है, उसी प्रकार उनको भी परिश्रम और संघर्ष करना पड़ा।
ध्यान और कर्म का संतुलन – परमहंस योगानंद
आपका अच्छा स्वास्थ्य हो और आप इसे बिल्कुल भी सराहते न हों। परन्तु यदि आप अस्वस्थ हो जाएं तो, हो सकता आप उसका महत्त्व समझेंगे ईश्वर ने जो आपको प्रदान किया है उसके लिए उनका आभार प्रकट करें, विपरीत परिस्थितियों की प्रतीक्षा किए बिना कि वे आपको कृतज्ञ बनाएं।
ईश्वर की सुन्दरता अपार है – परमहंस योगानंद
जब तक आपकी ईश्वरीय भक्ति और ईश्वरीय बोध पूरे नहीं हो जाते, विश्राम से न बैठें, ध्यान करने के समय नींद में न चले जाएं। ईश्वर की अपेक्षा अन्य किसी वस्तु को प्राथमिकता कभी न दें उनका प्रेम ही महानतम प्रेम है।
