मेरी गली के सामने रोज बैठा करता था वो। मैं उसे रोज देखती थी, उसके बारे में सोचती थी। जब भी उसके पास से गुजरती थी, उसके पास कुछ देर बैठ कर बात करने को दिल करता था। लेकिन सोचती थी लोग क्या कहेंगे और यही सोच मेरे कदमों को आगे ढकेल देती थी।
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गृहलक्ष्मी की कहानियां सरिता पत्रिका की कहानी गृहशोभा मैगजीन की कहानियाँ मनोरंजक कहानियों और महिलाओं से जुड़ी हर नई खबर स्टोरी इन हिंदी. यहां आपको मिलेगी परिवार, समाज और रोमांस की एक से बढ़कर एक कहानियां. Story in hindi
नयी सहर – गृहलक्ष्मी कहानियां
निधि गई, उसके पीछे पीछे मोहित भी अपने कमरे में चला आया । वह मुंह दूसरी ओर किये लेटी थी। मोहित समझ रहा था वह रो रही है मगर उसके आंसुओं का सामना करने की हिम्मत अभी मोहित में नहीं थी। लाइट बुझा कर वह भी लेट गया।
मां का प्यार – गृहलक्ष्मी कहानियां
ट्रेन जैसे ही प्लेटफार्म पर रुकी, मैंने इधर उधर नज़रे दौड़ाई। तभी सामने चाय की दुकान पर छह- सात बरस के बच्चे पर निगाह पहुंच गयी। नए पैंट-शर्ट, धूल-धूसरित बाल, फटे गाल, वो लड़का वहां पड़े कुल्हड़ों में बची चाय पीने की कोशिश कर रहा था।
हाय हाय ये महंगाई – गृहलक्ष्मी कहानियां
धन्य है हमारी श्रीमती जी, जिन्होंने महंगाई से जंग लडऩे का संकल्प लिया। लाख समझाया कि तुम्हारे वश की बात नहीं, तो कहने लगी अपनी असफलताओं से ही सबक लेना चाहिए
गृहलक्ष्मी की कहानियां : टेलीफोन
कॉलेज टाइम से वो एक दूसरे को प्यार करते थे। घरवालों ने खुशी-खुशी रिश्ता मंजूर कर लिया, धूमधाम से शादी हुई और कब दो साल गुजर गये, पता ही नहीं चला। पर कल उस फोन की घंटी से जैसे सब कुछ थम सा गया…
सहारा- बेसहारा – गृहलक्ष्मी कहानियां
पांव में दर्द आज कुछ ज़्यादा ही महसूस हो रहा था। शायद ठण्ड की दस्तक का असर था । बदन में सिहरन भी थी। बालकनी में बाहर निकल कर देखी तो रास्तों पर गाड़ियां भी कम ही दिख रही थी। सामने वाले पार्क में छोटे बच्चे दौड़- दौड़ कर खेल रहे थे,
वक्त का पहिया – गृहलक्ष्मी कहानियां
सुनील अपने डेढ़ साल के बेटे अमित को कंधे से लगाए कॉरिडोर में चहल कदमी कर रहा था। पास ही उसकी पत्नी शशि कागजों का पुलिंदा लिए कुछ लिख रही थी। सुनील और शिक्षा एक मल्टीनेशनल कंपनी में अधिकारी पद पर कार्यरत थे। आज अपने बेटे के नर्सरी में एडमिशन के लिए ऑफिस से आधे दिन की छुट्टी ले कर आये थे। उन्हींं के जैसे अनेक जोड़े वहां उपस्थित थे जो अलग अलग वेशभूषा में अपने बच्चों के साथ आये थे ।
कभी न भूलने वाली कहानी – गृहलक्ष्मी कहानियां
बात है सावन महीने में बिहार के सिंहेश्वर नाम के बाबा भोले नाथ की छोटी सी नगरी की जहां बहुत से श्रद्धालु देश विदेश से पूजा करने और बाबा को जल अर्पित करने आते हैं।
संगति का असर – गृहलक्ष्मी कहानियां
दामू दादा सुमित को मेला घुमा कर घर की ओर लौट रहे थे कि मेले में इतना घूमने के कारण सुमित को भूख सताने लगी थी। दामू दादा चूंकि घर से कुछ खाने का लाए नहीं थे, सो नजदीक की किराने की दुकान से बिस्किट का पैकेट खरीद लिया। चलते चलते पैकेट खोलकर अभी वे सुमित को कुछ बिस्किट दे ही रहे थे कि उन्होंने पीछे देखा कि एक कुत्ता बिस्किट को ललचाई नजरों से देख रहा है। दया भाव दिखाते हुए उन्होंने दो तीन बिस्किट उसकी ओर उछाल दिए और शेष बिस्किट अपने झोले में रख लिए।
मज़ाक – गृहलक्ष्मी कहानियां
विनय आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। वह बहुत तेज तर्रार और शरारती लड़का था। सदा कुछ न कुछ शरारत करता ही रहता था, परन्तु कभी भी पकड़ा नहीं जाता था। उल्टा उसके कारण दूसरों को डाट पड़ जाती थी। एक दिन उसने अपने एक मित्र सुरेश की साइकिल के टायर में पिन चुभो दिया।
