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शिक्षक के लिए महान व्यक्तियों के अनमोल विचार

जी हां, आज देश भर में शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है… जैसा कि आप सब जानते हैं कि भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस के अवसर पर हर साल 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। दरअसल, डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक शिक्षक से देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति […]

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दीप -पर्व मनाएँ पारम्परिक अंदाज में

आज की भागदौड़ और रफ्तार से भागती जिंदगी में हमारी खुशियां और रिश्ते सब पीछे छूटते जा रहे हैं। व्यस्त दिनचर्या के चलते चाहते हुए भी हम अपने और अपनों के लिए वक्त नहीं निकाल पाते। ऐसे में त्योहारों का आना एक बहाना बन जाता है। खुशियों के पल जीने का।

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बरसाने की बारात में चौधरी – गृहलक्ष्मी कहानियां

भले ही खुद के घर में इनकी कौड़ी इज्जत ना हो पर बाहर किसी की मौत हो या शादी, ये अपना ज्ञान बघारने से बिलकुल भी नही चूकते। ऐसी चौधराहट दिखाते हैं कि घर वाले भी बाहर वाले लगने लगते हैं।

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घर की लक्ष्मी – गृहलक्ष्मी कहानियां

माया को उसके सास-ससुर बात-बात पर ताने मारते। उसका पति तो उसे अधिक दहेज न लाने के कारण रोज तानों के साथ-साथ थप्पड़-मुक्के भी मारने लगा। माया की सुबह गलियों से शुरू होती और शाम लात-घूसे लेकर आती। ये सब सहना तो माया की अब नियति बन गया था। रोज-रोज की दरिंदगी को सहते-सहते माया के आंसू सूख चुके थे…

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सपनों की उड़ान – गृहलक्ष्मी कहानियां

बचपन से एक सपना था, आईआईटी में एडमिशन लेने का, एक विश्वास कि- हां! कुछ करना है। इस विश्वास ने कब जुनून का रूप ले लिया, इसका मुझे खुद भी पता नहीं चला।

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नम्मो की शादी – गृहलक्ष्मी कहानियां

जब भी मैं नम्रता की कहानी सुनाना चाहता हूं, कलेजा मुंह को आ जाता है यह भी समझ नहीं आता कि कहां से शुरू करूं पता नहीं वह ऊपर वाला ऐसी निष्ठुर कहानियां रचता कैसे है। क्या पत्थर का दिल है उसका ! आज मैंने मन कड़ा करके यह निश्चय कर लिया है कि आपको नम्मो की कथा सुनाकर ही रहूंगा।

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आशाओं का सूरज – गृहलक्ष्मी कहानियां

महेश एक बहुत ही होनहार और बुद्धिमान बालक था। उसमें सीखने और जानने की अद्भुत ललक थी। उसके हाथों में तो मानो जादू था। वह अपने चित्रों में प्राण डाल देता था। उसके अध्यापक उसकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे। वह सुबह स्कूल आने से पहले मंदिर अवश्य जाता था ।

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जै हो गैया मैया की – गृहलक्ष्मी कहानियां

शहर की स्वच्छता को चार-चांद लगाते उस सिविल अस्पताल के पिछवाड़े में खाने लायक कुछ ढूंढने वह वह रोज वहां आती थी। वह आती और बड़ी दिलेरी से रोगियों की जूठन या फिर फलों के सड़े गले छिलके तक खाने में वह गुरेज न करती और उस ढेर पर चढ़ती चली जाती, एक ही झटके में, देश के स्वास्थ्य नियमों को ठेंगा दिखाने की नीयत से शायद। इंजेक्शन की सुईयां तो रोगी तक को नहीं चूकती तो फिर उसके नंगे नखों को छलनी करने से क्योंकर कतराती?

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गृहलक्ष्मी की कहानियां : नियति

शादी के बाद से ही परित्यक्ता का जीवन व्यतीत कर रही माधवी के पति ने जब वापसी की इच्छा व्यक्त की तो माधवी और उसके बेटे ने जो निर्णय किया, उस पर उसे गर्व था…

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