Hindi Poem: निहार रहा चांद गुलाब को अपने
पर नियति उसकी रही कि …कभी उससे मिल ना सका।
बिखेर दी चांदनी अपनी-अपने गुलाब पर उसने,
जब पल दो मिलन के चांद गुलाब संग पा ना सका।
जवां था चांद पूरा,
पर प्रियतम के वियोग में,
धीरे-धीरे घटता गया।
घटना रहा आकार उसका,
अमावस के गर्त में वो फंसता गया।
उधर गुलाब भी जो जवान सुर्ख लाल था,
मिलन की तड़प में चांद से अरसे से बिलख रहा।
जब मिलन न हो सका पूरा दोनों का,
तो पत्ती दर पत्ती झड़ता गया गुलाब …
अस्तित्व खोता रहा प्रियतम के वियोग में …
और नितांत पीला पड़ता गया।
पर देखो ना दोनों ने कैसे प्रेम को अपने अंगीकार किया,
मंजूर थी अपनी जुदाई, पर प्रेम को अपने रुसवा ना होने दिया,
इसलिए कभी प्रेम को दोनों ने ही जग जाहिर न किया।
जो प्रेम प्रकट ना किया जाए वही पवित्र प्रेम है-गृहलक्ष्मी की कविता
