Hindi Short Story: नया वर्ष आ चुका था और अजय सुबह जल्दी उठकर स्कूल में अध्यापन का कार्य करने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुका था। सुबह का सूरज अभी बादलों के पीछे छुपा हुआ था और शहर अभी अपनी नींद में सपनों को देख रहा था। मगर अजय अपने सपनों को जीने के लिए खुद को तैयार करने में लगा हुआ था। ” अरे अजय आज किताब घर से मेरे लिए इतिहास की किताब लेकर आ जाना ” राहुल ने नींद में सपनों को देखते हुए अजय से कहा। अजय ने राहुल की तरफ देखते हुए कहा – ” जो जागता है वही अपने सपनों को प्राप्त करता है “। इतना कहकर अजय बगीचे में व्यायाम करने चला जाता है। सूरज ने अपने दर्शन अजय को देना शुरू कर दिया और अजय ने सूर्य नमस्कार करना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद अजय स्कूल के लिए चला जाता है घर से स्कूल के रास्ते में जिला पुलिस अधीक्षक अधिकारी का दफ्तर और उनका बंगला आता है अजय हर दिन उसे देखता और स्वयं को वहां होने की कल्पना करने लगता है। अजय का यह ” उम्मीदों का सहारा ” होता है जो अजय को ” सब्र ” की राह पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता है। अजय खुद से कहता है – ” यही मेरा सपना है जो मेरा अपना है और सबकुछ भ्रम है “।
कुछ देर बाद अजय स्कूल पहुंच जाता है और फिर कक्षाओं में अपना अध्यापन का कार्य करना आरंभ कर देता है। अजय इतिहास का शिक्षक है और वह बच्चों को इतिहास से सीखने की सलाह देता है इतिहास से सीखने के लिए हमें ” सब्र ” रखना होता है इसको एक योग्यता के रूप में समझकर उसका अभ्यास करने से हमें अपने व्यक्तिव में एक अच्छा बदलाव देखने को मिलेगा। अजय की इन सब बातों में उसका अनुभव होता था जो उसने अपने जीवन में महसूस किया था। अजय ने एक वर्ष पहले भारतीय पुलिस सेवा के लिए प्रारंभिक परीक्षा और अभी तीन महीने पहले मुख्य परीक्षा देकर अब साक्षात्कार की तैयारी करने का निश्चय किया है। अभी परिणाम की सूची में उसका नाम सबसे आखिरी प्रतिभागी के रूप में नजर आ रहा था। अजय अब अपने नाम को परिणाम सूची में प्रथम स्थान पर देखना चाहता है। अजय स्वयं को हमेशा प्रेरित रखता था मगर कई बार उसके साथ में रहने वाले लोग उसको नकारात्मक बातों में उलझा देते जिससे उसका मनोबल टूटने लगता और फिर वह अवसाद की तरफ बढ़ने लगता मगर उसकी आत्मा की आवाज उसकी ” उम्मीदों का सहारा ” बनकर सफलता की राह पर चलने के लिए प्रेरित करती रहती है।
दोपहर को वापिस घर आकर अजय ने अपने साक्षात्कार के बारे में विचार करना शुरू कर दिया। तभी राहुल ने आज के अखबार को अजय की मेज़ पर रखते हुए उससे कहा – ” अजय यह आज के अखबार में ख़बर आई है कि भारतीय पुलिस सेवा की प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा का परिणाम एक बार फिर से आयेगा क्योंकि कुछ गड़बड़ी की शिकायत सामने आई है इसलिए आयोग ने पुराने परिणामों को निरस्त कर दिया है और नए परिणाम अभी तीन महीने बाद आएंगे और फिर तीन हफ्ते बाद साक्षात्कार का आयोजन किया जाएगा “। अजय यह सब सुनकर अखबार में ख़बर पढ़ने लगता है और सोचने लगता है और फिर अजय स्वयं से पूछने लगता है – ” यह वर्ष भी एक प्रतिभागी के रूप में ही चला जाएगा ? पिछले तीन साल से इस परीक्षा की तैयारी के लिए मैंने सबकुछ छोड़ दिया है ” ? तभी राहुल अजय से कहता है -” अजय मैं अब वापिस अपने गाँव जाना चाहता हूं क्योंकि अब और ” सब्र ” मैं नहीं कर सकता हूं ” मैं अब और ” उम्मीदों का सहारा ” लेकर यहां नहीं रह सकता हूं।
अगले दिन राहुल अपने गाँव चला जाता है और फिर अजय स्वयं से सवाल करने लग जाता है। अजय फिर निश्चय करता है कि उसके पास अब और कोई रास्ता नहीं है वह अब इस रास्ते को छोड़ नहीं सकता उसे इस रास्ते पर ही चलना चाहिए क्योंकि अगर वह वापिस अपने गाँव जाता है तो फिर वह कभी भी भारतीय पुलिस सेवा में शामिल नहीं हो पाएगा और उसे गाँव में रहना होगा। और यहां उसे अपने ” सब्र ” का इम्तिहान देना होगा। उसे स्कूल में अध्यापन के कार्य के साथ में स्वयं को भी मजबूत करना होगा। उसे स्वयं के लिए ” उम्मीदों का सहारा ” बनना ही होगा क्योंकि अब उसके पास सिर्फ जीतने का ही विकल्प है क्योंकि उसके पास अब हारने के लिए कुछ भी नहीं है। अजय कमरे में शीशे के सामने खड़ा हो जाता है और स्वयं की आँखों में देखकर कहता है – ” मुझे इस इम्तिहान में सफल होना ही होगा क्योंकि यह इम्तिहान सिर्फ मेरे अकेला का नहीं मेरे तीन वर्षों के ” सब्र ” का है यही मेरी ” उम्मीदों का सहारा ” है। अजय कुर्सी पर बैठकर सोचने लगता है।
अजय अपनी दैनिक दिनचर्या में व्यस्त था। उसका जीवन घर से स्कूल और इसके बीच में जिला पुलिस अधीक्षक अधिकारी का दफ्तर में कार्यरत होने का सपना ही था। तीन महीने बाद परिणामों में अजय का स्थान आखिरी था मगर इसने अजय का मनोबल कम नहीं किया। अजय ने अपने साक्षात्कार के अभ्यास को एक स्तर देना शुरू कर दिया। तीन हफ्ते बाद अजय साक्षात्कार के लिए निकल जाता है। रास्ते में अजय ने खुद का हाथ कुछ ऐसे पकड़ा हुआ था जैसे कोई पिता अपने बच्चे का हाथ पकड़ता है। कुछ समय बाद अजय को बुलाया जाता है और अजय साक्षात्कार के लिए साक्षात्कार कक्ष में चला जाता है। कुछ समय बाद अजय बाहर आ जाता है और एक हफ्ते बाद परिणाम में अजय को प्रथम स्थान मिलता है। अजय बहुत खुश होता है अगली सुबह अजय तैयार होकर घर से निकल जाता है मगर स्कूल के स्थान पर जिला पुलिस अधीक्षक अधिकारी दफ्तर जाने के लिए। अजय ने यह साबित कर दिया ” सब्र ” और ” उम्मीदों का सहारा ” आपके सपनों को हकीक़त में बदल सकते हैं।
