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शर्मा जी की बड़ी ख्वाहिश थी कि एक ऐसा आशियाना होना चाहिए, जिसमें उनका पूरा परिवार एक साथ रह सके हमेशा के लिए न सही लेकिन कभी-कभी तो सब इकट्ठे हों। बच्चों की किलकारियां गूंजें ,बहू के पायल की खनक से रौनक हो जाए और बेटियों के आने से घर आंगन महक उठे। रिटायरमेंट के बाद शर्मा जी ने अपना ऐसा ही आशियाना बना लिया। लेकिन उस आशियाने में ज्यादा दिनों तक रह न सके। बीमारी से उनकी मृत्यु हो गयी और उनका सपना सिर्फ सपना बनकर रह गया। बच्चों की अपनी अलग ही ख्वाहिशें थीं।  बड़े बेटे ने नौकरी के समय ही घर छोड़ दिया था और कभी -कभी ही घर आना हो पाता था, और छोटे की तो बात ही अलग थी वो शायद दूर कहीं अपना एक अलग आशियाना बनाने की होड़ में लगा था।
ये कहानी सिर्फ शर्मा जी की न होकर न जाने कितने ही बुजुर्ग माता-पिता की है जो अपने बच्चों के इंतज़ार में और बच्चों के घर आने की आस में आंखें गड़ाए बैठे रहते हैं और बच्चों के पास  उनके लिए समय ही नहीं होता है। 
 
प्रतिस्पर्धा का चक्कर  
आजकल की भागदौड़ वाली जीवनशैली में जब लोगों को प्रतिस्पर्धा ने घेर लिया है अपनों के लिए ही समय नहीं रह गया है। बच्चे बड़े होकर घर छोड़कर कभी पढ़ाई के लिए बाहर चले जाते हैं तो कभी अच्छी नौकरी की चाह और ललक उन्हें अपनों से दूर कर देती है। माता-पिता का बनाया हुआ आशियाना दिन प्रतिदिन बच्चों के इंतजार में माता-पिता के साथ-साथ बूढ़ा होता हुआ नज़र आने लगता है और बच्चे बहुमंजिला इमारतों के बीच अपना भविष्य बनाने के लिए उम्मीद ढूंढते नज़र आते हैं।
 
अक्सर बच्चे बहुमंजिला ऊंची इमारतों की किसी ऊपर की मंज़िल में अपना 3 या 4 कमरे का मकान ले लेते हैं।  जिसमें उनका कमरा होता है , उनके बच्चों  का कमरा और स्टडी रूम होता है यहां तक कि गेस्ट रूम भी होता है लेकिन कमी होती है सिर्फ उनके माता-पिता के कमरे की। ये एक बहुत बड़ी विडम्बना है कि अपना अस्तित्व बनाने की प्रतिस्पर्धा में बच्चों के दिल से ही नहीं उनके घर से भी माता -पिता का नाम नदारद होने लगता है। कभी कोई मजबूरी होती है तो कभी आगे बढ़कर पैसे कमाने और अपना करिअर बनाने का जज़्बा लेकिन इन सारी जद्दोजहद में पीछे छूट जाते हैं, पैरेंट्स जिन्होंने न जाने कितनी ही रातें अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए बिना सोए हुए गुजारी होती हैं। उन्ही बच्चों के पास अपने पैरेंट्स की बीमारी तक में भी उनका इलाज कराने का समय नहीं होता है।