उस दिन इतवार था, छुट्टी का दिन। नन्ही गोगो के बहुत-से दोस्त और सहेलियाँ उसके साथ खेलने आए थे। गोगो सबको अपने खिलौने दिखा रही थी। प्यारे-प्यारे, रंग-बिरंगे खिलौने। गरदन नचाने वाला गुड्डा और पुलपुल गुड़िया, झप-झप लाइट वाला हवाई जहाज, लकड़ी की चकरी, लट्टू, फिरकनी, लंदन से पिंटू चाचा द्वारा भेजे गए पूसी कैट और भालू…नया वाला टेडीबियर और तमाम खिलौने।
उसके दोस्त और सहेलियों ने उन खिलौनों की तारीफ की, फिर खुशी-खुशी उनसे खेलने लगे।
सबसे पहले गरदन नचाने वाले गुड्डे और पुलपुल गुड़िया की सगाई और फिर शादी का खेल चला। आधे बच्चे गुड्डे के दोस्त और घर वाले हो गए और आधे नखरीली गुड़िया के रिश्तेदार। कुछ गुड़िया की हँसोड़ सहेलियाँ भी थीं। फिर अच्छा-खासा धूम-धड़ाके वाला नाटक चला गुड्डे-गुड़िया की शादी का। एक-दो बार तो हँसते-हँसते सब लोटपोट हो गए। इसके अलावा भी एक से एक मजेदार खेल थे। आइस-पाइस और आँखमिचौनी में तो और भी मजा आया।
पर सबसे ज्यादा मजा तब आया, जब नन्ही गोगो मैडम बनी। और मैडम भी कैसी—बाप रे बाप, बड़ी ही रोबदार!
“अच्छा बच्चो, अब बैठो। मैं तुम्हें पढ़ाती हूँ।” नन्ही गोगो ने मम्मी की आँखों पर बड़े-से फ्रेम का चश्मा लगा लिया था और अब मैडम बनी कह रही थी।
“हाँ भई बीनू, जरा खड़े होकर तुम कोई अच्छी-सी कविता तो सुनाओ।…कविता आती है कि नहीं?” गोगो की एकदम मैडम जैसी रोबीली आवाज गूँजी।
जब बीनू ने कविता सुनाना शुरू किया तो गोगो ने मुँह बनाकर टोका, “अरे भई, ऐसे नहीं, ऐसे…! सुर में गाओ सुर में, जैसे मैं गा रही हूँ।” और गोगो ने सच्ची-मुच्ची कविता गाकर सुना दी।
फिर गोगो ने मीना को खड़ा किया। बोली, “सुना है मीना, तुम्हें चुटकुले बहुत अच्छे आते हैं। चलो, कोई अच्छा-सा चुटकुला सुनाओ…जल्दी! ऐसा कि सुनकर दिल खुश हो जाए।”
जब मीना ने चुटकुला सुनाया तो गोगो ने तीन बार सिर दाएँ-बाएँ हिलाकर कहा, “अरे भई मीना, यह क्या! हँसी तो बिल्कुल नहीं आई। चलो, मैं सुनाती हूँ—मैं।”
और गोगो ने सचमुच बढ़िया अंदाज में विशु और उसके शेरू कुत्ते को लेकर एक चुस्त, फड़कता हुआ चुटकुला सुना दिया। सुनकर सब जोरों से ही-ही करके हँसे।
सचमुच गोगो का रंग जमता जा रहा था। इस बात से खुद उसे भी मजा आ रहा था।
फिर उसने इधर देखा, उधर देखा—अपना बड़ा-सा चश्मा उतारा। जरा गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “इस क्लास में लगता है कि सारे के सारे बच्चे नालायक हैं। पर दिप्पी थोड़ी समझदार लग रही है। हाँ, तो दिप्पी खड़ी हो जाओ। चलो, अब तुम कोई अच्छी-सी कहानी सुनाओ।”
सुनकर दिप्पी बगलें झाँकने लगी। बोली, “वो…वो…ऐसा है मैम कि कहानी मुझे याद तो थी, पर आपका गुस्से वाला मूड देखकर भूल गई!”
इस पर मैडम बनी गोगो ने फिर से चश्मा लगाकर सबको घूरा। फिर चश्मा हिला-हिलाकर खासी नाराज होकर बोली, “बहाने क्यों बना रही हो? नहीं आती न, तो ठीक है, बैठो। चुपचाप बैठ जाओ अपनी सीट पर। हे राम, कैसे बुद्धू बच्चे हैं, जो एक ढंग की कहानी तक नहीं सुना सकते! अरे भई, तुमसे अच्छे तो ये खिलौने हैं। कितनी ही कविता-कहानियाँ इन्हें रटी पड़ी हैं—यकीन मानोगे?”
“खिलौने, अरे बाप रे! क्या खिलौने कविता-कहानी सुनाएँगे?” नन्ही रिंकू ने हैरान होकर कहा।
“ऐं, सच्ची…!” शरारती बच्ची पिंकी ने भी आँखें चमकाईं।
“और क्या?” गोगो ने कहा, “सुनाएँगे क्यों नहीं, खूब सुनाएँगे और तुमसे अच्छा सुनाएँगे।”
“देखो, हाथी अभी उठकर सुनाएगा ‘हाथी धम्मक-धम्मक’ वाली पोयम। हाँ, तो हाथी दादा, आ जाओ मंच पर…! शाबाश, पर जरा धीरे-से चढ़ना, कहीं हमारा मंच न टूट जाए।”
और नन्ही गोगो ने ‘हाथी धम्मक-धम्मक’ वाली पोयम निकाली और एकदम हाथी की तरह मंच पर नाचते हुए कविता सुनानी शुरू की—
धम्मक-धम्मक…मैं हूँ हाथी
धम्मक-धम्मक,
चलता हूँ मैं झम्मक-झम्मक,
हाँ, रे भाई झम्मक-झम्मक,
ओ रे भाई, झम्मक-झम्मक,
दाँत दिखाता दम्मक-दम्मक,
कान हिलाता खम्मक-खम्मक,
हाँ, रे भाई, झम्मक-झम्मक,
चलता हूँ मैं धम्मक-धम्मक!
“अरे यह तो तुम सुना रही हो गोगो, तुम! कोई हाथी थोड़े ही सुना रहा है।” नन्ही रिंकू ने शिकायती टोन में कहा।
इस पर गोगो ने हँसकर कहा, “ऐसा है भई, तुम आवाज मेरी सुनो और हाथी की तरफ देखो। तुम्हें लगेगा, सचमुच हाथी दादा ही सुना रहे हैं, ‘धम्मक-धम्मक, हाथी धम्मक-धम्मक’…!” नन्ही गोगो एकबार फिर लचक-लचककर गाने की तर्ज पर नाची, तो सब जोर से हँस पड़े।
फिर इसी अंदाज में खरगोश, हिरन, चीता, भालू और लंगूर सबने लचक-लचककर कविताएँ सुनाईं। और असल में तो सबके नाम पर खुद मैडम बनी गोगो ने कविताएँ सुनाईं और खूब रोब गालिब किया।
इस पर सब बच्चे तो खुश थे ही और बार-बार तालियाँ बजा रहे थे। गोगो के मम्मी-पापा भी बालकॉनी से देख रहे थे और हँस-हँसकर गोगो की इस अदा की तारीफ कर रहे थे।
दोस्तों के जाने के बाद गोगो ने मम्मी से कहा, “मम्मी-मम्मी, जानती हो, आज मैं मैडम बनी थी। और मैंने बड़ा अच्छा रोल निभाया।…बहुत ही अच्छा!”
इस पर गोगो की मम्मी हँसकर बोलीं, “हाँ-हाँ, मैंने देखा था और तुम्हारे पापा ने भी। तुम तो अच्छी-खासी डाँट लगा रही थीं और उन बच्चों को हँसा भी रही थीं।”
“अच्छा, फिर तो मैं पास हो गई मम्मी। मैडम के रोल में पास—एकदम पास!” कहकर नन्ही गोगो नाचने लगी। झम्मक-झम्मक!
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
