main draupadi nahin hun
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

श्रेष्ठा! श्रेष्ठा! श्रेष्ठा! बार-बार यह नाम कानों में अनायास ही गूँजने लगा। अरे! नहीं… नहीं… ऐसा कुछ भी नहीं है। खा गए ना धोखा तुम भी। नहीं भई! कुछ भी तो नहीं है ऐसा। वो तो यूँ ही बस… वैसे तो वह लड़की थी ही ऐसी कि कोई भी मोहित हो जाए। फिर मैं तो स्वभाव से थोड़ा, ठहरा ही कलाप्रेमी। फोटोग्राफी व चित्रकारी का शोक मुझे कहीं पर भी सुन्दरता देखकर खड़ा कर लेता है।

वो सब कल ही की बातें लगती हैं। इसी शोक के चलते एक दिन मैं हिमाचल की ओर निकल आया था और यहाँ की खूबसूरती में खो सा गया था। देवभूमि हिमाचल अपनी मिट्टी के जर्रे-जर्रे में न जाने कितने देवी-देवताओं को समाए हुए है। यह कितना सच है और कितना कपोल-कल्पित, इस विवाद में न भी पड़ें तो भी उसकी प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य की सत्ता को तो कोई नहीं नकार सकता। आँखें उसे अँजुलि भर-भरकर पीने पर भी तृप्त नहीं होतीं! खूबसूरत वादियों में कलकल बहती व्यास, एक समा बाँध देती है। घण्टों उसके किनारे ठण्डे पानी में पैर डुबोकर बैठा रहा था मैं।

इसके किनारे ही थोड़ी दूरी पर पाँच-सात झोंपड़ीनुमा घर भी नजर आ रहे थे। जिनमें से कुछ बच्चे निकलकर नदी के किनारे पड़े पत्थरों व रेत में खेलने लगे थे। मैं छप-छप पानी की ठण्डी-ठण्डी फुहारों का आनन्द लेने में लीन था तो इसीलिए आस-पास से तटस्थ ही बना बैठा रहा। तभी किसी बच्चे ने जोर से आवाज लगाई- “श्रेष्ठा!” मेरा ध्यान भंग हुआ। एक 14-15 वर्ष की किशोरी झोंपड़ी से निकल इन बच्चों में आ मिली। बच्चे मुझसे अनभिज्ञ थे। देखता हूँ कि इसका नाम वास्तव में ही श्रेष्ठा होना चाहिए था। वह सब बच्चों से अलग नजर आ रही थी। यूँ सबसे बड़ी भी वही थी पर इसीलिए अलग नहीं थी। सृष्टि चितेरे ने अपनी कला का तोड़ करके रख दिया था उस बाला में। पहाड़ी लोग वैसे तो थोड़े से ज्यादा सुन्दर होते ही हैं मैदानी लोगों से: लेकिन मैंने अब तक ऐसे अपरूप सौन्दर्य का खजाना इस उम्र के बच्चों में कम ही देखा था। मेरी दृष्टि बँध गई थी। इसे शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकता क्योंकि मैं कवि नहीं हूँ ना। मात्र फोटोग्राफर ही तो हूँ। हाँ! मैंने उस उन्मुक्त खिलते यौवन को कैमरे में कैद करना चाहा। डर था कहीं वह मुझे देख ना ले। इसीलिए अपने को एक पेड़ की ओट में कर लिया। सभी बच्चे रेत के घरौंदे बनाकर खेलने लगे। वह भी इनसे थोड़ा हटकर अकेली इसी काम में व्यस्त हो गई। बीच-बीच में बच्चों से हँसती-बतियाती भी रही। हँसती तो जैसे कानों में घण्टियाँ बजने लगतीं। मैं आश्वस्त था कि किसी का भी ध्यान मेरी ओर नहीं था। अब मैं आराम से अपना काम कर सकता था। सो कैमरे का रुख उसकी ओर करके मैं बैठ गया। वह घरौंदा बना रही है।

सबसे पहले उसने पत्थरों से चारदीवारी बनाई। चारदीवारी का सुन्दर सा गेट भी बना लिया। मानों यह गेट किले का सुरक्षाकवच हो जिसे भेदकर कोई अन्दर नहीं आ सकता। अब इस किले के अन्दर भवन का निर्माण होने लगा। दोनों पैरों को रेत में घुसा कर व ढेर सारा रेत पाँव के ऊपर लादकर वह उसे थप थपाने लगी। धीरे-धीरे पाँव बाहर आ रहे हैं रेत से। “ध्यान से, कभी सपनों का महल टूट न जाए।” मैं दूर से ही मानो उसे सावधान करने लगा। “धत् तेरे की! यह क्या किया! झटके से हाथ ऊपर थोड़े ही रखना था, टूट गया ना। ऐसी भी क्या उतावली थी पगली तुझे? गई ना सारी की सारी मेहनत बेकार? अब दोबारा फिर से बनाओ। और हाँ, थोड़ी सावधानी से।” मन-ही-मन मैं उसे फिर समझाने लगा। इस बार वह घर बनाने में कामयाब हो गई है। अब उसे सजाने की बारी है। महारानी है आखिर, सूने-फीके घर में थोड़े ना रहेगी। इसलिए पहले फूलों और पत्तियों से छत ढकी गई फिर आँगन को रंगोली से सजाया गया।

हल्दी और आटा पहले ही घर से लाए गए थे सो उनका सदुपयोग हुआ। लो! महल सज- धजकर तैयार हुआ। बस, अब इस नए घर की खुशियाँ साथियों संग बाँटनी बाकी हैं। तालियाँ पीट-पीटकर व खिलखिलाकर वह जता देना चाहती है कि वह श्रेष्ठा ऐसे ही थोड़े है! सब बच्चों से अभी तक चारदीवारी भी नहीं बनी और इसने महल की इन्टीरियर डैकोरेशन तक कर डाली है। सभी बाल कारीगर एकाएक व्यस्तता छोड़कर उसके घर को देखने आ जुटते हैं। “पर, “तुमने इसमें रहने वाली रानी तो बनाई ही नहीं! रानी कहाँ है? बच्चे पूछते हैं।” “इसमें मुझे ही तो रहना है! यह तो मेरा घर है! इसे तो मैंने बनाया है।” वह जवाब देती है। “लेकिन तुम अकेली कैसे रहोगी? तुम्हें डर नहीं लगेगा? क्योंकि रानी तो हमेशा राजा के साथ रहती है? तुम्हारा तो कोई राजा ही नहीं।” फिर से बच्चों ने अन्देशा दिखाया। वह एकपल के लिए सोच में पड़ जाती है। फिर तत्काल ही चारों ओर घूमकर देखती है और एक साथ कई पत्थर उठाकर अपने घरौंदे में रखती है।

“लो! मेरे घर में एक नहीं, कई-कई राजकुमार हैं। अब तो ठीक है ना?” “पर राजकुमार तो एक ही होता है कई-कई थोड़े ही होते हैं! पागल कहीं की।” सब मिलकर उसका मजाक करते हैं। वह सब पत्थर उठाकर फेंक देती है। “मैं अकेली ही रहूँगी, बिलकुल अकेली। कोई राजकुमार नहीं चाहिए मुझे। मैं बिलकुल नहीं डरूँगी अकेली, हाँ नहीं तो। मैं सारी रात दीया जलाकर पढ़ती रहूँगी। मुझे नहीं चाहिए राजकुमार-वाजकुमार कोई भी। अब तो ठीक है?” वह खीज़ गई थी। बच्चे फिर से जाकर अपनी कारीगरी में व्यस्त हो गए थे। उन्होंने इसकी बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। तभी उसकी माँ ने आकर उसे बकरी की रस्सी थमाते हुए कहा- “जा! इसे थोड़ी देर खेतों में घुमा ला। सुबह से बँधी हुई मिमिया रही है बेचारी। और सुन, अब तू बड़ी हो गई है, सारा दिन यूँ बच्चों में खेलना क्या शोभा देता है? भगवान ने चाहा होता तो अब तक ससुराल की रौनक होती तू।” फिर ऊपर देखते हुए कहती है, “हे भगवान! धी ना देना कभी किसी को। धी दे; तो धन जरूर देना भगवान, वरना बेटी को जन्मते ही संभाल लेना।”

मैं श्रेष्ठा को कैमरे में बन्द कर चुका था। वह बकरी लेकर दूर जा चुकी थी और मैं भी अब घर की ओर रवाना हो चुका था। आज मैं अपने साथ प्रकृति की केवल जड़ तस्वीरें ही नहीं ले जा रहा था। मैं महसूस कर रहा था कि उनमें आज प्राण प्रतिष्ठा हो गई है। कई वर्षों से मैं यहाँ पहाड़ों में झरने की जिस हँसी को ढूँढ़ता था या नदी की गोद में हठखेलियाँ करती जिन तरंगों में संगीत की स्वर-लहरियाँ खोजता था; वे असल में मुझे आज ही मिल पाई थीं। और आकाश, आकाश पर तो जैसे आज मेरा कब्जा हो गया था। वह सिमटकर मेरी मुट्ठी में आ गया था।

इतने वर्षों के बाद आज फिर से कानों में वही आवाज! मन एक बार फिर उन्हीं वादियों में जाने को मचल उठा है। मन तो पहुँच भी गया लेकिन शरीर को तो जाने के लिए किसी बस में लदना ही पड़ेगा कि नहीं? लो! यह भी कुछ देर से सही, पर पहुँच ही गया। अब क्या देखता हूँ कि यहाँ झोंपड़ियों की संख्या कुछ बढ़ गई है। वही पेड़ पहले से मोटा व घना हो गया है। पर बच्चे अब भी वैसे ही रेत के घरौंदे बनाकर खेल रहे हैं। श्रेष्ठा वहाँ नहीं है। कहाँ होगी वह? कहाँ गई होगी वह जिसे देखने मैं इतनी दूर से आया हूँ? मैं भी कितना बुद्धू हूँ। भला क्या वह अब तक बच्ची ही होगी? उसकी शादी नहीं हो गई होगी? हाय रे पुरुष मन! तू औरत के मामले में हमेशा ऐसा क्यों सोचता है कि उसके शरीर पर समय ने चोंच नहीं मारी होगी? सफेद बालों के रूप में वक्त ने जो निशानी तुझे दी है उसे क्या बख्स दिया होगा? 60 वर्ष का वृद्ध भी षोडशी के आकर्षण को क्यों नहीं छोड़ पाया आज तक? क्यों औरत का यौवन ही उसे सर्वाधिक प्रिय होता है? क्यों? आखिर क्यों वही रूप देखने वह इतने वर्षों बाद भी यहाँ भटक रहा है? श्रेष्ठा यहाँ नहीं है, लेकिन उसका मन यह मानने को तैयार नहीं।

वह नयनों की मशाल से कण-कण में उसे ढूँढ़ रहा है। उसे वहाँ की हवा में उसी की खुशबू महसूस होने लगती है। लहरों में उसकी हँसी सुनाई पड़ती है। वह धीरे-धीरे बच्चों की टोली के पास खिसक आता है। सोचता है, कैसे बात करूँ इन बच्चों से? कैसे पूछूँ कि श्रेष्ठा…? अगर इन्होंने ही उल्टे मुझसे पूछ लिया कि मैं कौन होता हूँ उसका तो…? क्यों पूछ रहा हूँ उसे? तो क्या जवाब दूँगा इन्हें? क्या रिश्ता बताऊँगा मैं उससे? इसी उलझन में घिरा वह अभी उचित शब्दों की तलाश कर रहा था पूछने के लिए कि इतने में एक प्रौढ़ा वहाँ आ पहुँची।

आँधियों के थपेड़े खाकर भी जैसे घने पेड़ पर कुछ पत्ते शेष रह जाते हैं या कीचड़ से लथपथ होने पर भी ज्यों हीरे की चमक बरकरार रहती है; पूर्णतया लुप्त नहीं होती बिलकुल, इन श्रीमती जी को देखकर ऐसा ही आभास हुआ। समय के सौदागर के लूट लिए जाने पर भी यौवन की झलक बाकी थी। सिर के बाल खिचड़ी हो आए थे। आँखों को स्याह घेरों ने घेर लिया था लेकिन होंठ अभी खिले-खिले गुलाब से गुलाबी व रस भरे थे। आवाज में ठहराव था लेकिन शहद भरा था। वह प्रौढ़ा अपनी बेटी सुगन्धा को बुलाने आई थी और उसे लेकर चलने लगी। क्योंकि शाम घिर आई थी। वैसे भी पहाड़ों में सूर्य महाराज जल्दी ही विश्राम करने चले जाते हैं। मेरा मन अपने विश्वास पर मुहर लगाने को व्याकुल था। सो मैं उसके पीछे-पीछे ही चलने लगा। मेरे कदमों की आहट सुनकर उसने गर्दन घुमाकर पीछे देखा तो मैंने साहस बटोरकर उससे पूछ ही लिया- “आप… आप श्रेष्ठा हैं क्या? मेरा मतलब है कि… आप श्रेष्ठा ही हैं ना?” उसने विस्मय से मेरी ओर देखते हुए सवाल का, सवाल में ही जवाब दिया।

“आप कौन हैं? ये सब क्यों पूछ रहे हो?” “देखिए! आप मुझे गलत न समझें। मैं एक फोटोग्राफर हूँ।” और झट मैंने उसकी ओर श्रेष्ठा की वर्षों पुरानी एक तस्वीर सरका दी। उसने मेरे हाथ से तस्वीर ले ली और उसे आश्चर्य से अपनी बेटी को दिखाकर बोली- “तुम्हारी उम्र में मैं ऐसी दीखती थी!-तुमने कब ली मेरी यह फोटो? मैंने तो तुम्हें कभी नहीं देखा यहाँ? तुम पहले भी आते रहे हो यहाँ क्या? कब से आ रहे हो?”

उसने एक साथ कई सवाल पूछ डाले पर मैंने उनका जवाब देना जरूरी नहीं समझा, बल्कि उससे पूछने लगा, “तुम्हारी शादी क्या यहीं, इन्हीं झोपड़ियों में ही हो गई थी? मेरा मत बल है कि क्या तुम आपस में यहीं शादियाँ कर लेते हो? लड़की को मायका छोड़कर दूसरे गाँव या शहर नहीं जाना पड़ता क्या? यानि तब से तुम यहीं हो?” आदि-आदि न जाने मैं भी क्या-क्या अनाप-शनाप पूछे जा रहा था और वह जवाब में बिलकुल चुप खड़ी थी। बल्कि एक उदासी उसकी आँखों में तैर आई थी जिसे देखकर मैंने उससे माफी मांगते हुए कहा, “मैं आपको उदास करना नहीं चाहता था। बल्कि सच पूछो तो मैं तुम्हारी वह खिलखिलाती हँसी ही सुनने यहाँ वापिस आया था। मुझे माफ करना। मैंने नाहक तुम्हारा दिल दुखाया है।”

उसने आँसू पोंछते हुए मुझे आश्वस्त किया कि कोई बात नहीं। मैं उसकी परेशानी का कारण जानना तो चाहता था पर कैसे पूछूँ? इसलिए चुप था। वह सहज होते हुए बोली, “वह हँसी तुम्हें अब कैसे मिल सकती थी! उसको तो वर्षों पहले मैं कुरुक्षेत्र जनपद के दक्षिणी छोर पर दफन कर आई हूँ। क्योंकि मैं… क्योंकि मैं…” कहकर वह जैसे कहीं अतीत में खो गई थी। “क्योंकि क्या? बताओ न ऐसा क्या हुआ था? और तुम वहाँ कैसे पहुँच गई थीं?” मैं उसके लिए बिलकुल अनजान था, फिर भी न जाने कौन से अधिकार से सब मालूम करना चाहता था। उसे भी जैसे मुझ पर भरोसा हो गया था। मेरे पास अपनी फोटो देखकर शायद उसे मुझसे आत्मीयता हो आई हो। या फिर मेरी बोलचाल में उसे कोई जाना-पहचाना सा पुट नजर आया हो।

जो भी हो, वह अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरती हुई, सब कुछ बताने के इरादे को झूठमूठ में टालते हुए कहने लगी, “छोड़ो भी। तुम जानकर क्या करोगे? जिसके भाग्य में ठोकर खानी लिखी हो उसे वे कहीं भी मिल जाती हैं। शाम घिर आई है! तुम अब जाओ। हमें भी काम-धन्धा करना है। रब खैर करे!” उस रात वहाँ से कुछ मील की दूरी पर मैं एक रेस्ट-हाऊस में रुक गया। लेकिन आँखों से नींद का नाता ही जैसे टूट गया हो। सुबह होते ही मैं फिर पहुँच गया वहाँ। इस बार मुझे सौन्दर्य ने नहीं बल्कि सौन्दर्य में लिपटे दर्द ने अपने पास आने के लिए उकसाया था। वह बकरी को दोह रही थी। मुझे देखकर वह चारपाई पर बैठने का इशारा करती है। मैं बैठ गया। वह मुझे चाय के लिए पूछती है।

मैं हाँ में सिर हिला देता हूँ। अपनी बेटी सुगन्धा को चाय बनाने की कह वह मूढ़ा सरका के मेरे पास आ बैठती है। मैंने संकोच दिखाते हुए कहा- “तुम भी क्या सोचोगी कि क्यों मैं खामखाँ तुम्हारे पीछे पड़ा हूँ। लेकिन कुरुक्षेत्र का नाम लेकर तुमने मुझे सब कुछ जान लेने के लिए बेचैन कर दिया है। वहाँ से तुम्हारा भी कोई रिश्ता है, सुनकर अच्छा लगा। पर, वह रिश्ता ही तुम्हारे दुःख का कारण है, इसका मुझे दुःख भी है। पर हुआ क्या था? साफ-साफ कहो ना!”

मैं लगभग खुशामद पर उतर आया था। वह अतीत की किताब खोलकर पढ़ने लगी- “आज से ठीक 16 वर्ष पहले जब मैं करीबन 18-19 वर्ष की ही हूँगी, अपने माँ-बाप के साथ हँसी-खुशी जी रही थी। लेकिन हम गरीब थे इसलिए मेरी शादी में अड़चने आने लगीं। मेरे बापू जी के पास शादी में देने के लिए दहेज नहीं था। उन्हीं परेशानी के दिनों में एक बार चार-पाँच आदमी हमारे घर आए। वे लोग पहाड़ी नहीं थे। बापू उनसे कुछ बातें कर रहे थे। माँ थोड़ा इनसे हटकर और मैं, झोपड़ी में बैठी इनकी ओर कान लगाए सुनने की कोशिश कर रही थी। पर साफ-साफ कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। कोई सौदा तय करके वे सब चले गए। मुझे बाद में माँ और बापू की आपसी बातचीत से पता चला कि वे मेरी शादी की बात करने आए थे और बापू ने उनसे तीस हजार में बात पक्की कर ली है। बापू, माँ को बता रहे थे कि वे हरियाणा से आए थे। “हमने कौन-सा उनका पैसा खुद पर खर्च करना है; उनका पैसा उन्हीं के स्वागत-सत्कार में लगा देंगे।” बापू सफाई-सी देते हुए कहने लगे। वे लोग एक महीने का समय देकर गए हैं। देखो, आगे क्या होता है?”

“पर लड़की को इतनी दूर, बिलकुल अनजान लोगों के हाथों सौंपना क्या ठीक रहेगा? कुछ अता-पता ठिकाना भी मालूम है उन लोगों का कि नहीं? कौन लाया उन्हें यहाँ हमारे पास? यहाँ का कोई आदमी भी है बीच बिचौले में या नहीं?” बापू से यह सब पूछते हुए मैंने माँ की आँखों में सशंकित भय देखा था। वह मुझे आज प्यार से पुचकार रही थी और बापू से खोद-खोदकर तहकीकात कर रही थी। बापू उसकी बातों से खीज़ उठे थे। ‘तुम्हें मुझ पर विश्वास भी है या नहीं? यह मेरी बेटी नहीं है क्या? क्या तुमने अकेले ही जना है इसे? मैं इसे बेच नहीं रहा हूँ ब्याह कर रहा हूँ इसका। और फिर, शादी के बाद तो लड़की को जाना ही होता है घर से। तो दूर क्या और पास क्या? मैंने सब कुछ मालूमात कर लिया है। वे भले लोग हैं।

यहाँ की लड़कियाँ पहले भी वहाँ ब्याह कर गई हुई हैं। उन्हीं से पता लगाकर ये लोग आए थे हमारे पास। अभी भी एक महीना पड़ा है। हमने कौन-सा कुछ लिया-दिया है अभी? ठीक जँचेंगे, तो ही हमारी श्रेष्ठा वहाँ जायेगी, वरना नहीं। जहाँ अब तक कुँवारी है, कुछ दिन और सही। तू चिन्ता मत कर।” माँ को अब बापू की बातों से कुछ-कुछ तसल्ली सी हो गई थी। लेकिन मुझे यहाँ से इतनी दूर ब्याह कर जाना, वो भी बिलकुल अनजान जगह पर कतई पसन्द नहीं था। न जात का पता न बिरादरी का। सबसे बड़ी समस्या तो मेरे लिए बोली की होगी, सोचकर परेशान हो उठी थी मैं। मैं सोच रही थी कि दुःख-सुख बाँटने के लिए तो अपनी सगी बोली ही बोलने वाला व्यक्ति चाहिए होता है।

वहाँ कौन मिलेगा मुझे ऐसा? शादी के बाद का जीवन कैसा होगा? लड़कियों के लिए माता-पिता से बिछुड़ने का गम क्या कम होता है? फिर भी वे समभाषी या समजाति साथी को पाकर उसे जल्दी ही भूलने लगती हैं। पर, वहाँ तो सब कुछ अनजान, बिलकुल ही अजनबी सा होगा। एक महीना जैसे पंख लगाकर उड़ गया। एक मिनी बस सुबह आकर झोंपड़ी के सामने रुकी; जिसमें से 10-12 आदमी नीचे उतरे। उनमें वह व्यक्ति भी था जो सेहरा बाँधे दुल्हा बनकर आया था। उसमें दूल्हे जैसे कोई भी लक्षण नहीं थे। उम्र पक चुकी थी, गाल पिचके हुए थे और रंग उम्र के साथ ही ढलकर श्यामल हो गया था। देखते ही मन विक्षोभ से भर गया। पर मैं क्या कर सकती थी। बापू की जुबान का सवाल था।

उसकी इज्जत तो मुझे रखनी ही थी। शाम को उनके साथ मुझे विदा कर दिया गया। अगले दिन बस, गाँव में एक छोटे-से घर के आगे जा रुकी। कुछ औरतें मुझे उतारकर अन्दर ले गईं। वहाँ मुझे पता चला कि इनकी दो बहनें व ये पाँच भाई हैं। माता-पिता पहले ही मर चुके हैं। बहनें दोनों शादी-शुदा हैं और भाई अभी सभी कुँवारे ही हैं। जमीन-जायदाद कुछ भी नहीं है। मेहनत-मजदूरी पर ही जीवन चल रहा है। यानि कि आकाश से गिरी खजूर में अटकी। मैं समझ गई कि यहाँ भी मुझे रानी बनाकर बिठाने के लिए नहीं लाया गया है। सुहागरात की घड़ी आई और चली गई। ज्यादा उम्मीद मैंने भी नहीं लगाई थी। भीषण लुओं के थपेड़े खाकर बरसाती नदी, भरी हुई तो नहीं रह सकती पर बिलकुल सूख भी नहीं जाती है। उसमें एक आध प्यासे पंछी की प्यास बुझाने लायक पानी तो फिर भी रहता ही है। उस रात मैंने यह महसूस जरूर किया कि भाषा और जाति भेद, भावनाओं के आड़े नहीं आ सकता। मैंने इन्हें स्वीकार लिया था। बल्कि सच कहूँ तो मैं इनके प्यार के आगे सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त हो नतमस्तक थी,

“लेकिन, लेकिन क्या? कहो ना श्रेष्ठा! फिर क्या हुआ?” मैंने उसे टटोलते हुए पूछा। “सब कुछ फिर ही तो हुआ बाबू जी”। वह अब मुझे बाबू जी बुलाने लगी थी। उसने बात आगे बढ़ाई- “जब अगली रात मैं इनके इन्तजार में बैठी थी तो झोंके की तरह वो आया और आते ही मुझ पर… मैं जब संभली तो पाया कि यह ‘वो’ नहीं था। मैं मारे क्रोध व भय के काँप रही थी और इसे बाहर धकेलने के लिए संघर्ष कर रही थी। जो कुछ भी हाथ में आता मैं उसी से इसे मारे जा रही थी। पर यह टस से मस नहीं हो रहा था। मैं चिल्ला रही थी- “चले जाओ! जानवर, कौन हो तुम? मैं तेरा खून पी जाऊँगी, बदजात! मेरा पति आता ही होगा।

वे तुम्हें कच्चा चबा जाएँगे पापी! तुझे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे वो! चला जा बदजात!” वह ठहाका मारकर हँसते हुए बोला- “हां… हां… हां… वह किस-किस को जान से मारेगा? हाँ? बताओ किस-किस को मारेगा जान से? कल तुम्हारे पास तीसरा आएगा, परसों चौथा व नरसों पाँचवां… वह अकेला थोड़े ही तुम्हारा पति है? फिर, हमें बाहर निकालने वाला वह होता कौन है? हम पाँचों ने मिलकर तुम्हें खरीदा है। समझी? बड़ा होने के नाते पहला नम्बर पा गया तो वह तुम्हारा पति हो गया और हम कुछ नहीं! चुप हो जा साली, वरना मसलकर रख दूँगा। इसी में तेरी भलाई है कि चुपचाप पड़ी रहो वरना… तू समझती क्या है अपने आपको? तुम पटरानी बनकर रहोगी यहाँ? ज्यादा सती-सावित्री बनने की जरूरत नहीं है। यह कुरुक्षेत्र भूमि है। यहाँ द्रौपदी जैसी राजकुमारी के भी पाँच-पाँच पति थे। तुम्हारी औकात क्या है? तुम्हारे बाप को इतने पैसे दिए किसलिए हैं? सीता बनने चली है। कमजात साली। खबरदार! अगर किसी के आगे मुँह भी खोला तो, जुबान खींच लेंगे तेरी। काट के दाब देंगे जमीन में साली को।”

वह बके जा रहा था और मेरे अन्दर की सारी शक्ति जैसे खत्म हो गई थी। मैं सुनकर सुन्न हो गई थी। मेरे लिए एक नरक का द्वार खुल गया था। मुझे जैसे कुम्भीपाक में धकेल दिया गया हो। मैं द्रौपदी बनकर नहीं रहना चाहती थीं लेकिन मेरे विरोध को कोई भी सुनने वाला नहीं था। सो चुपचाप सुबह होने के इन्तजार में सब कुछ झेलती रही। भोर की किरण आने से पहले मुँह अंधेर ही मैं एक औरत के साथ हजत के लिए खेतों में आ गई। मेरे लिए भागने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था। इसलिए चारे की फसल में हजत के लिए घुसकर दुबारा नहीं निकली। मैं बदहवास भागे जा रही थी। सूर्य उगने से पहले मैं वह गाँव छोड़ चुकी थी। यद्यपि मेरे सामने कोई स्पष्ट मंजिल नहीं थी, यहाँ तक कि मुझे रास्ता तक भी मालूम नहीं था, लेकिन मैं चलती गई और जब तक चलती गई जब तक पाँव बिलकुल जवाब न दे गए। कुछ दिन छुप-छुप कर रही। लेकिन मुझे महसूस होने लगा कि मैं उन दो रातों की निशानी ले आई हूँ।

मुझे एक सहारा चाहिए था और यही निशानी मेरा सहारा बन सकती थी। मुझे पुरुष जाति से नफरत सी हो गई थी। यहाँ तक कि अब मैं अपने पिता की शक्ल भी देखना पसन्द नहीं करती थी। जब तक जिन्दा रहे मैंने उन्हें नहीं देखा। उनके मरने के बाद ही मैं फिर यहाँ लौट आई। ‘सुगन्धा’ मेरी बेटी, वही निशानी है। बाबू जी! आप ही बताइए; क्या द्रौपदी बार-बार जन्म लेती रहेगी? नहीं ना? मैंने उन्हें छोड़कर क्या बुरा किया बाबू जी? मैं द्रौपदी नहीं बनना चाहती थी!” वह प्रश्न पर प्रश्न कर रही थी और मैं, गाँवों में आई ऐसी कितनी ही श्रेष्ठाओं के बारे में ऐसी कल्पना से ही सिहर उठा था। जवाब में इतना ही कह पाया, तुमने बहुत अच्छा किया श्रेष्ठा! बहुत अच्छा किया तुमने कि तुम उस नरक से निकल आईं। हर बार द्रौपदी बनकर, सामाजिक असंगति की त्रासदी को क्यों झेले-भला-औरत? भ्रूण हत्या भी उसी की हो और उसके परिणाम की सजा भी उसे ही मिले! क्यों भला…?

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’