nanhi gogo ki badi mushkil
nanhi gogo ki badi mushkil

एक बार की बात, शाम के समय नन्ही गोगो घर की छत पर गई। वहाँ उसे दिखाई दिया आसमान से झाँकता चाँद। गोरा-गोरा, उजला-उजला चाँद, जो सब ओर चाँदनी बरसा रहा था।

नन्ही गोगो चाँद को देखती रही, देखती रही। चाँद वाकई बहुत सुंदर लग रहा था। वह पूनम का चाँद था, एकदम गोल-मटोल। उसने अपने आपसे कहा, ‘काश, यह चाँद नीचे उतर आता तो मैं इससे खूब दोस्ती कर लेती।’

सोचते-सोचते नन्ही गोगो छत पर पड़ी चारपाई पर लेट गई। अब चाँद उसे और भी साफ नजर आ रहा था। थोड़ी देर तक गोगो चाँद को एकटक देखती रही, प्यार से। अचानक उसे लगा, चाँद उसे देखकर हँसा है और उससे बातें कर रहा है, बड़ी मीठी-मीठी बातें।

गोगो को बड़ी खुशी हुई, जैसे उसके मन की मुराद पूरी हो गई हो।

कुछ देर बाद गोगो को लगा, चाँद नीचे उतर आया है और उसके साथ आँखमिचौनी और पकड़म-पकड़ाई खेल रहा है। कभी गोगो छिप जाती, कभी चाँद। फिर वे एक-दूसरे को ढूँढ़ने लगते, अरे-अरे, कहाँ गई गोगो…अरे-अरे, कहाँ गया चाँद…?

ढूँढ़ते और हँसते, हँसते और ढूँढ़ते।…यही तो खेल था! और चाँद तो एकदम गोल-मटोल था, गेंद जैसा। इसलिए खेलते-खेलते खुद ही टप्पे खाने लगता।

गोगो हैरान हुई। सोचने लगी कि वाह, यह तो सचमुच जादू-मंतर है। मम्मी तो एक दिन कह रही थीं कि गोगो-गोगो, चाँद धरती पर कभी नहीं आता है। मगर देखो, यह तो सचमुच नीचे उतर आया। और मजे में किसी गेंद की तरह टप्पे खा रहा है। खूब उछल-कूद कर रहा है।

“आओ-आओ चाँद, अब जरा बैठकर बातें करते हैं।” गोगो खेलते-खेलते थक गई, तो उसने चाँद से कहा।

अब तो चाँद और गोगो…गोगो और चाँद ढेर सारी बातें करने लगे। वे इतने प्यार से हँस-हँसकर बातें कर रहे थे कि समय का कुछ पता ही नहीं चला। चाँद की बातें भी बड़ी प्यारी थीं। इतनी अच्छी कि गोगो बार-बार खिलखिलाकर हँस देती।

इधर नीचे मम्मी परेशान! उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि गोगो भला कहाँ गई? उन्होंने इधर देखा, उधर देखा। यहाँ देखा, वहाँ देखा। घर के एक-एक कोने में झाँक लिया। पर गोगो कहीं नहीं थी।

अब तो मम्मी को चिंता हो गई। सोचने लगीं, बड़ी अजीब है यह लड़की। अब जाने कहाँ चली गई? यह भी नहीं देखती कि मम्मी कितनी परेशान हो रही होगी।

फिर अचानक उन्हें खयाल आया, जरा छत पर जाकर भी देखना चाहिए। कभी-कभी गोगो छत पर चली जाती है और देर तक वहीं गोल-गोल घेरे में चहलकदमी करती, घूमती रहती है।

मम्मी झटपट दौड़ी-दौड़ी छत पर गईं। देखा, छत पर जो एक टूटी-सी चारपाई पड़ी थी, गोगो उसी पर सोई पड़ी है।

मम्मी ने बड़े प्यार से उसे उठाया। बड़ी किनमिन-किनमिन करके नन्ही गोगो उठी। आँख खुलते ही सामने मम्मी को पाकर वह टुकुर-टुकुर देखने लगी। फिर बोली, “मम्मी-मम्मी, चाँद…चाँद कहाँ गया?”

मम्मी को कुछ अजीब लगा। सोचने लगी, कहीं दिमाग तो नहीं चल गया इसका! बोली, “अरे गोगो, तू क्या कह रही है, मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता। चाँद तो वो रहा ऊपर आसमान में…! वो दिखाई पड़ रहा है न?”

“नहीं-नहीं मम्मी, ये नहीं, वो वाला चाँद!” गोगो झल्लाई हुई-सी बोली।

“वो वाला…मतलब? तो तेरा मतलब है, चाँद एक नहीं है, और भी चाँद हैं।”

“अरे मम्मी!” गोगो खीजकर बोली, “वो वाला चाँद जो मेरे साथ खेल रहा था।”

“तेरे साथ…?” मम्मी की आँखें फटी की फटी रह गईं। बोलीं, “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा। क्या कह रही है तू, गोगो?”

“हाँ मम्मी, हाँ! मैं ठीक कह रही हूँ। वो मेरा दोस्त है। मेरे साथ देर तक छुपम-छुपाई और पकड़म-पकड़ाई खेलता रहा। और मम्मी, उसने मेरे साथ खूब सारी बातें भी कीं, बड़ी प्यारी-प्यारी बातें!”

“तूने जरूर सपना देखा होगा।” मम्मी ने मुसकराकर कहा।

“नहीं मम्मी नहीं, वो सपना नहीं, चाँद आया था धरती पर। एकदम सच्ची बात है, सच्ची!” गोगो समझाने की कोशिश कर रही थी।

“सच!” अबके मम्मी को अचरज हुआ।

“हाँ मम्मी, सच्ची-मुच्ची। चाँद मेरे साथ खेलता रहा बड़ी देर तक। वो तो बड़ा प्यारा दोस्त है मम्मी।” कहते हुए गोगो की आँखों में एकदम चाँदनी जैसा उजाला था।

“अच्छा ठीक है, ठीक है! हो सकता है, कल फिर आ जाए और तेरे साथ खेले। चल, अब उठकर खाना खा। मैंने तेरे लिए गरम-गरम खीर और पूरियाँ बनाई हैं।” मम्मी मुसकराईं।

नन्ही गोगो मम्मी के साथ नीचे चल दी। वह मम्मी का हाथ पकड़े हुए धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतर रही थी। पर उसकी आँखें अब भी आसमान के चाँद पर टँगी हुईं थीं। नन्ही गोगो की यह बड़ी-सी मुश्किल हल नहीं हुई कि आसमान में चाँद वैसा का वैसा झाँक रहा है, तो वो चाँद कहाँ गया, जो छत पर तेज-तेज उसके साथ भागते और आँखमिचौनी खेलते हुए धमाचौकड़ी मचा रहा था!

ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंBachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)