फिर कुछ दिन बाद का किस्सा है। मम्मी किसी काम में लगी थीं कि अचानक उन्हें याद आया, बड़ी देर से गोगो नहीं दिखाई दी। कहीं फिर बाहर तो नहीं निकल गई? तभी उन्हें अंदर वाले कमरे में फर्श पर बैठी गोगो की झलक दिखाई दी तो थोड़ी तसल्ली हुई—चलो, गोगो खेल में लगी है। अब देर तक इसी में लीन रहेगी।
मम्मी जानती थीं कि गोगो का खेल शुरू होता है तो देर तक रुकने का नाम ही नहीं लेता। कुछ और नहीं, तो गोगो अपने सारे खिलौनों से बातें करना ही शुरू कर देती है। और उसकी बातें इतनी खिंचती चली जाती हैं, इतनी लंबी कि कब सुबह से दोपहर हो गई, कुछ पता ही नहीं चलता।
गोगो पर एक नजर डालकर मम्मी फिर कपड़े धोने में जुटने वाली थीं कि अचानक उनका ध्यान इस बात पर गया कि गोगो आज खिलौनों से नहीं खेल रही है। गोगो के साथ तो कोई पक्षी है। बहुत सुंदर और अनोखा पक्षी, जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा।
गोगो खेल में लीन थी। मम्मी ने सोचा, उसका खेल बिगाड़े बगैर दूर से ही झाँककर देखना चाहिए। उन्होंने कुछ और पास आकर देखा तो उन्हें गोगो के आगे बैठा हुआ एक हंस जैसा खूबसूरत पक्षी दिखाई दिया।
‘अरे, यह तो डोडो है!’ मम्मी को हैरानी हुई। डोडो तो आजकल कहीं नहीं दिखाई देता। इसे तो विलुप्त पक्षी मान लिया गया है, जो धरती से एकदम गायब ही हो गया है। मगर फिर गोगो के पास डोडो कैसे आ गया! कहाँ से आ गया?…यह तो एक पहेली ही है।
मम्मी इस उधेड़बुन में थीं, पर नन्ही गोगो इस सबसे बेखबर डोडो के साथ बातें करने में लीन थी।
“कहानी सुनोगे डोडो?” गोगो प्यार से डोडो से कह रही थी। और फिर उसने एक प्यारी-सी कहानी ‘गुलगुल का चाँद’ सुनानी शुरू की। कहानी पूरी खत्म होने के बाद बोली, “बताओ डोडो, कैसी लगी कहानी? अच्छी है न! तुम्हें पसंद आई? तुम्हारा भी मन करता है न चाँद को पकड़ने का। मैं भी सोचती हूँ, कभी चाँद आए तो उसे पकड़कर अपने पास रख लूँ छोटी-सी गेंद बनाकर और फिर उसी से खेला करूँगी।” कहकर गोगो हँसने लगी—खुदर-खुदर।
“अच्छा, पानी पियोगे? तुम्हें प्यास लग आई होगी। अभी लाती हूँ।” कहकर गोगो दौड़ी-दौड़ी गई और रसोई में जाकर एक कटोरी में पानी भर लाई। साथ में चम्मच भी था।
पानी लाकर गोगो बोली, “डोडो, तुम ऐसे ही पानी पी लोगे न, या चम्मच से पिलाऊँ?”
डोडो सुनकर हँसने लगा। बोला, “अरे, मेरी चोंच ही मेरी चम्मच है। देखो, कैसे झटपट पानी पीता हूँ।” और सचमुच उसने झटपट पूरी कटोरी खाली कर दी।
देखकर गोगो भी हँसने लगी। थोड़ी ही देर में नन्ही गोगो और डोडो की दोस्ती एकदम पक्की हो गई।
मम्मी दूर से नन्ही गोगो और डोडो का यह खेल देख रही थीं।
‘लोग तो कहते हैं कि डोडो पक्षी अब धरती पर कहीं नहीं है। पर देखो न, वह तो यहाँ है—हमारे घर। और गोगो के साथ कितने प्यार से खेल रहा है, जैसे न जाने कितने वर्षों की दोस्ती हो।’ मम्मी सोचने लगीं।
थोड़ी देर और डोडो गोगो के साथ खेलता रहा। दोनों खूब प्यार से बातें कर रहे थे। बीच-बीच में हँस भी रहे थे। फिर डोडो बोला, “अच्छा गोगो, मैं चलता हूँ। मम्मी इंतजार कर रही होगी। कल फिर आऊँगा।”
डोडो के जाने के बाद नन्ही गोगो दौड़ी-दौड़ी मम्मी के पास आई। बोली, “मम्मी-मम्मी, मेरा एक प्यारा दोस्त आया था, जो अब चला गया। कल फिर आएगा। आप उससे मिलना। बड़ा ही प्यारा है वो मम्मी। डोडो नाम है उसका, डोडो!”
“अच्छा!” मम्मी मुसकराईं और नन्ही गोगो से डोडो के बारे में सारी बातें सुनने लगीं।
रात को मम्मी ने पापा को बताया, “आज तो कमाल हुआ! डोडो आया हमारे घर और नन्ही गोगो के साथ खेलता रहा। सचमुच का डोडो! इसका मतलब, डोडो अब भी इस धरती पर कहीं न कहीं तो जरूर हैं।”
“अरे वाह, फिर तो जब डोडो आएगा, तो गोगो बेटी और डोडो का साथ-साथ खेलते हुए फोटो लेंगे। किसी अखबार में छपने को देंगे या फिर ‘आजतक’ में भी क्यों नहीं दिखाया जा सकता? सब हैरान रह जाएँगे कि डोडो आज भी है, कहीं गया नहीं!” पापा ने उत्साहित होकर कहा।
अगले दिन उन्होंने अपने कैमरे में नई रील डलवाई और बोले, “जिस समय डोडो आए गोगो के साथ खेलने के लिए, तो बताना। मैं चुपके से उसकी फोटो खींचूँगा।”
अगले दिन फिर डोडो आया और गोगो से बोला, “तुम्हारी बातें मुझे बहुत अच्छी लगती हैं। तुम बहुत सीधी-सादी हो न! पर इतना नटखटपन भी है तुममें कि तुम्हारी बातें सुन-सुनकर मुझे बड़ी हँसी आती है। मैंने घर जाकर अपनी मम्मी को भी बताया। वो भी तुम्हारे बारे में सुनकर बहुत खुश हुईं।”
गोगो बोली, “और डोडो, तुम्हें भी लगता है, कि तुम किसी अनोखी दुनिया के प्राणी हो! लोग कहते हैं कि पक्षी बोलते नहीं, पर तुम तो ऐसे प्यारे किस्से-कहानियाँ सुनाते हो कि क्या कहूँ! बैठो, प्यास लगी होगी, मैं तुम्हारे लिए पानी लाती हूँ।”
नन्ही गोगो और डोडो बातें कर रहे थे, इतने में ही ‘क्लिक’ की आवाज हुई। गोगो के पापा ने डोडो का फोटो खींचा था।
पर जाने कैसे डोडो को यह पता चल गया। बोला, “गोगो, मुझे यह अच्छा नहीं लगा। अब मैं यहाँ नहीं आऊँगा, कभी नहीं।”
बेचारी गोगो हक्की-बक्की! उसे समझ में नहीं आया, गोगो इतना नाराज किसलिए हो गया?
अगले दिन गोगो के पापा ने कैमरे की रील धुलवाई तो वहाँ डोडो का चित्र था ही नहीं। उसकी जगह बस, एक नीला-नीला धब्बा दिखाई पड़ रहा था।
“अरे, यह तो सचमुच शर्मीला पक्षी है, इसलिए फोटो तक में नहीं आया।” गोगो की मम्मी बोलीं।
“शायद हमसे गलती हो गई। डोडो फोटो नहीं खिंचवाना चाहता था, फिर हमें क्या जरूरत थी?” गोगो के पापा पछता रहे थे।
कई दिनों तक डोडो नहीं आया तो गोगो उदास रही। पापा बोले, “सॉरी, वैरी सॉरी गोगो! मेरे कारण डोडो नाराज हो गया। चलो, अब तुम्हारे लिए एक नया टेडीबियर ला देते हैं। तुम उससे खूब खेलना और बातें करना।”
उसी दिन पापा गोगो के लिए एक बड़ा टेडीबियर लेकर आए। गोगो को वह बहुत ही सुंदर लगा। उसके साथ खेल में वह लीन हो गई। नाराज पोपू को भी उसने मना लिया था और वह फिर से उसके साथ लॉन में भागने-दौड़ने लगा था। लेकिन फिर भी उसे डोडो की बहुत याद आती थी। कभी-कभी वह मम्मी से कहा करती, “मम्मी-मम्मी, डोडो बड़ा अच्छा था। वह पता नहीं क्यों इतना नाराज हो गया?”
इस पर मम्मी कहतीं, “मैं क्या जानूँ बेटी! हो सकता है, वह पूरी धरती की परिक्रमा करने गया हो और लौटकर फिर कभी आए।”
“हाँ-हाँ, वह आएगा, जरूर आएगा।…जैसे मुझे उसकी याद आती है, उसे भी तो मेरी याद आती होगी।” कहकर गोगो डोडो की बातें याद करके मन ही मन मुसकरा उठती।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
